तमस्सुक ए सकलैन

अगर आँखों पर पड़ा हुआ गफ़लत का पर्दा हटाकर हकीकत को देखा जाए तो नज़र ये आएगा कि हम सब इस्लाम से बहुत दूर निकल चुके हैं बल्कि यूँ कहना सही होगा हम पिछड़ चुके हैं। वजह एक बार लिखू या बार-बार लिखू ये ही लिखना होगा कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने हमें जिन दो चीजों को थामने का हुक्म दिया था वह कुरआन और अहलेबैत है। यानी इल्म कुरआन में है और उस इल्म को बताने वाले अहलेबैत हैं, दोनों का साथ कभी ना ख़त्म होने वाला है।

इन दो चीजों को छोड़ने का सबसे बड़ा नुकसान ये हुआ कि हम अस्ल इस्लामी निजाम को कभी समझ ही नहीं पाए. आज हम सब अपनेअपने मौलवियों के बनाए और बताए हुए रास्तों पर चल रहे हैं। अहलेबैत और हमारे बारह इमामों को छोड़कर कोई कामयाबी पा ही नहीं सकता, ना ही हक़ तक पहुँच सकता है।

आज लोग समझ ही नहीं पाते कि सही क्या है? और गलत क्या है, क्योंकि अगर कोई शरीयत ना जानने वाला हुक्मरान भी कोई कानून बना देता है, जो इस्लाम की शरीयत के कानून की तरह दिखता है तो कुछ नादान लोग उसे, इस्लाम की शरीयत साबित करने की कोशिश में लग जाते हैं। इस बात से अनजान की कोई भी शरीयत और कोई भी निज़ाम,

इस्लाम की शरीयत और इस्लामी निजाम की जगह नहीं ले सकता, वह पस्त ही साबित होगा।

आज हमारी कौम की हालत अगर देखी जाए तो हालात खराब नज़र आएँगे, कौम गफ़लत में पड़ी नज़र आएगी, गुनाहों में फँसी, दुनिया के जाल में जकड़ी हुई, मायूस, डरी हुई, हर ऐब और बुराई में शामिल। अपनी पहचान भूलती हुई, अपनी हकीकत भूलती हुई, हक़ और नाहक की तमीज़ खोती हुई।

हर जुमे खुत्बे दिए जा रहे हैं, दीन की अहमियत बताई जा रही है, आमाल नामे की कीमत बताई जा रही है लेकिन हमारी कौम आख़िरत को भूलकर, हक़ से मुँह फेरकर किस ओर जा रही है?

मस्जिदें खाली हैं, खानकाहों से ज्यादा भीड़ बाजारों में है, मदरसे की जगह, दुनियावी तालीमखानों ने ले ली है। ना हक़ सीखने वाले नज़र आ रहे हैं और ना ही हक़ सिखाने वाले ही नज़र आ रहे हैं। अगर हालात यूँ ही चलते रहे तो जल्द ही हक़ कहने वालों को ढूँढ पाना नामुमकिन-सा हो जाएगा और जिस दिन ऐसा हो गया, उस दिन आपकी नस्लों को डूबने से कोई नहीं बचा सकेगा।

आज से ही खुद को बेदार करिए. बेदार करिए उस गफ़लत की नींद से, जो आपके ईमान और नस्लों को खा रही है। इस गफ़लत से बाहर निकलना बहुत आसान है। जिक्र ए अहलेबैत को मिम्बरों से बुलंद कीजिए, अपनी नस्लों को हैदर ए कर्रार और करबला की दास्तान समझाइए, हसन अलैहिस्सलाम की ज़िन्दगी समझाई, अपनी बेटियों को फातिमा सलामुल्लाह अलैहा की ज़िन्दगी समझाइए. इनकी सीरतों को आम कीजिए।

इमामों ने जो इल्म सिखाया है, तर्बियत ओ तालीम दी है, उसे अपनाकर, आमाल में उतारिए, फिर देखिए अपने आप हालात कैसे

और अहलेबैत अलैहिस्सलाम को थाम लीजिए. ये बदलेंगे। कुरआन ही फलाँ का एक वाहिद रास्ता है, जो अल्लाह और अल्लाह के हबीब सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने हमें दिया है।

आज अक्सर लोग ये कहते हुए मिल जाते हैं कि दीन पर चलना आसान नहीं है क्योंकि वह समझे ही नहीं दीन क्या है?

दीन कोई अलग से मानने की चीज़ नहीं है, अपनी ज़िन्दगी को ही अल्लाह, रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम और इमामों के बताए तरीके पर बसर करना। आने वाली हर तकलीफ़, हालात और रुकावटों से उस इल्म और तरीके से निपटना, जिस तरह से इमाम अलैहिस्सलाम ने सिखाया है ये ही दीन पर चलना है। इसमें इबादत से लेकर ख़िदमत और मज़लूम की आह बनने से लेकर जालिम से जंग करने तक सब शामिल है।

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