ज़िक्र e हज़रत अम्मार बिन यासिर रज़ियल्लाहु अन्हुमा

हज़रत अम्मार बिन यासिर रसूलुल्लाह ﷺ के जलीलुल क़द्र और जाँ निसार सहाबा में से एक थे. यह मक्का के शुरूआती दौर में ही अपने माँ बाप के साथ ईमान ले आए थे. यह उस वक़्त ईमान लाए थे जब इसलाम में दाख़िल होना, मौत के मुँह में दाख़िल होने जैसा था. इसी वजह से इनको और इनके माँ बाप को मुसलमान बनने के एवज़ बहुत तकलीफ़ें सहनी पड़ीं. इनके बाप हज़रत यासिर रज़ियल्लाहु अन्हु और इनकी माँ हज़रत सुमय्या रज़ियल्लाहु अन्हा दोनों, अल्लाह की राह में शहीद होने वाले सबसे पहले सहाबी व सहाबिया थे. अबू जहल ने मक्का में इनकी आँखों के सामने ही इनके वालिदैन को बड़ी बेरहमी से क़त्ल कर दिया था.

हज़रत अम्मार की इसलाम के लिये बहुत क़ुरबानियाँ हैं. नबी ﷺ की तमाम जंगों में हज़रत अम्मार शाना ब शाना रहे. एक बार जब मुसलमान ग़ज़वए तबूक से वापस मदीना लौट रहे थे, तब मदीने से पहले एक संकरी घाटी से मुसलमानों को गुज़र कर जाना था. इधर सहाबा के बीच छुपे कुछ मुनाफ़िक़ों ने रसूलुल्लाह ﷺ को इसी घाटी से नीचे खाई में गिरा कर क़त्ल करने की साज़िश रची. उस वक़्त नबी ﷺ के साथ सिर्फ़ दो सहाबा थे, हज़रत हुज़ैफ़ा और हज़रत अम्मार रज़ियल्लाहु अन्हुमा. इन दोनों सहाबा ने रसूलुल्लाह ﷺ की हिफ़ाज़त करते हुए, अपनी जान पर खेल कर मुनाफ़िक़ों का मुक़ाबला किया.

नबी ﷺ के साथ हज़रत अम्मार ज़िंदगी भर कुफ़्फ़ार के ख़िलाफ़ जंग लड़ते रहे. फिर ख़ुलफ़ाए राशिदीन के साथ दीन की ख़िदमात अंजाम देते रहे और ज़िंदगी का आख़िरी दौर हज़रत अली का साथ देते हुए गुज़ार दिया. अहले बैत से मुहब्बत और उनका एहतराम हज़रत अम्मार के दिल में कूट कूट कर भरा हुआ था. जंगे जमल के दौरान कूफ़ा की एक मस्जिद में हज़रत अम्मार, लोगों को हज़रत अली का साथ देने के लिये, उनके हक़ पर होने की तरग़ीब दिला रहे थे, तो उस मस्जिद के मिंबर पर उन्होंने हज़रत हसन को ऊपर बिठाया हुआ था और ख़ुद नीचे खड़े हुए थे.
जंगे जमल में हज़रत अली का साथ देने के बाद जंगे सिफ़्फ़ीन में शामी फ़ौजों के ख़िलाफ़ हज़रत अली की तरफ़ से लड़ते हुए 93 साल की उमर में शहीद हो गए.
अल्लाह त्आला हज़रत अम्मार रज़ियल्लाहु अन्हु के दरजात बुलंद फ़रमाए – आमीन

अहादीस की किताबों में हज़रत अम्मार के बेशुमार फ़ज़ाएल बयान हुए हैं. यह ऐसे सहाबी थे कि रसूलुल्लाह रसूलुल्लाह ﷺ ने इनकी ज़िंदगी में ही इनकी शहादत की पेशनगोई फ़रमा दी थी.
“अफ़सोस! अम्मार को एक बाग़ी गिरोह क़त्ल करेगा”
[बुख़ारी – 2812]

“अम्मार का क़ातिल और उसका माल लूटने वाला जहन्नम में है”
[अस-सिलसिलातुस-सहीहा – 3524]

एक जगह हज़रत अम्मार की शान में नबी ﷺ ने फ़रमाया :
“अम्मार की ज़ुबान को अल्लाह ने शैतान से महफ़ूज़ कर दिया है”
[बुख़ारी – 3743]

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