मौला अली का इल्म :जानवरों में जज़्बात

अली मौला ने इक दफा, खुत्बे के बीच में ये इर्शाद फरमाया कि “अल्लाह, हर जीदार की सिसकियों की आवाज़ से वाकिफ़ है।”

यहाँ सबसे पहली याद रखने लायक बात तो ये है कि ये खुत्बा, आज या सौ, दो-सौ साल पहले नहीं दिया जा रहा बल्कि 1400 साल से भी पहले दिया गया था। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उस वक्त ये कहा कि अल्लाह हर जानदार की सिसकियों की आवाज़ से वाकिफ़ है। इससे दो खुलासे हुए पहला तो ये कि लफ्ज़ जीदार का इस्तेमाल करना बता रहा है कि बात सिर्फ इंसानों की नहीं हो रही और दूसरा खुलासा ये कि बात सिसकियों कि की गई यानी इसका ताल्लुक जज़्बात से है। क्या इंसानों में जज्बात होते हैं?

आज भी साइंस, इस सवाल पर घूम रहा है, कुछ तो मानता ही नहीं और जितना मानता है, उतना साबित नहीं कर सकता। साइंस भी मानता है कि जानवरों में अच्छा बुरा समझने की कुछ हद तक ताकत होती है, वह खाना पीना खुद देखकर खाता है या छोड़ देता है, मुहब्बत देखकर, करीब आता है, ख़तरा देखकर दूर हट जाता है। जानवरों में दर्द का एहसास भी होता है।

लेकिन अगर हम इसे सोचकर देखें तो पायेंगे कि ये सब तो कम दिमाग इंसान भी करता ही है, अगर किसी का दिमाग़ सही ना हो तो भी वह भूख लगने पर खाने की तरफ़, प्यास लगने पर पानी की तरफ़ जाएगा।

सवाल तो ये है कि क्या जानवरों को बिछड़ने वाले साथियों का ग़म होता है, क्या जानवरों में आपस में दुश्मनी होती है, क्या किसी जानवर की मौत पर दूसरे जानवर, अफ़सोस करते हैं, क्या बच्चे के बीमार पड़ने पर, जानवर गमगीन होते हैं, क्या ये भी वैसे ही सिसकियाँ लेकर आँसू बहाते हैं, जिस तरह वह इंसानी माँ आँसू बहाती है, जिसका मासूम-सा बच्चा, बहुत बीमार हो?

इनमें से बहुत सवालों के जवाब साइंस तलाश रहा है और बहुत सवालों के जवाबों से अब तक दूर है। हमारी इस्लामी तारीख़ में जानवरों और इंसानों के बीच मुहब्बत और जज़्बात के कई वाक्ये मिलते हैं, उनमें से दो वाक्ये बताता हूँ।

जब करबला के मैदान में जंग छिड़ी और शाह ए करबला के लश्कर पर पानी बंद कर दिया, तब हज़रत अब्बास, नहर ए फुर्रात पर पानी लेने गए, आपने दरिया में घोड़ा उतारकर, उसकी लगाम को ढीला छोड़ दिया लेकिन उस कई दिनों के प्यासे घोड़े ने भी पानी नहीं पिया क्योंकि उसे मालूम था कि मेरा मालिक और मालिक का घराना, कई दिनों से प्यासा

करबला में ही एक और वाक्या देखने मिला जब हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम को शहीद किया गया तो उनका घोड़ा, “जुलज़नाह” अपनी पेशानी पर हज़रत का खून मलकर, खेमे की तरफ़ आया और बीबियों के सामने खामोश लहजे में ये इशारा करने लगा कि मुझसे मेरा प्यारा सवार बिछड़ गया है। यहाँ गौर करने वाली बात ये भी है कि जुलज़नाह खुद भी बहुत जख्मी था, फिर भी उसे फिक्र थी मेरे इमाम

अलैहिस्सलाम की।

दुनिया की बात करूँ तो एण्ड्रोक्लीज़ का किस्सा भी बहुत मशहूर है जो कि बच्चों को स्कूली शिक्षा के दौरान पढ़ाया भी जाता है। उसने एक घायल शेर का इलाज किया था, बाद में जब उसे मौत की सजा मिली और भूखे शेर के पिंजड़े में डाला गया, ये वह ही शेर था जिसका इलाज, उसने किया था। वह कई दिनों का भूखा शेर भी, उसके करीब जाकर लिपट गया और खाने से इंकार कर दिया।

ये बहुत-सी बातें हैं जिन्हें साइंस नकारती है, कुछ पर रिसर्च करती है, कुछ चौंकाने वाले नतीज़े भी सुनाती है लेकिन अभी बहुत सवालों के जवाब ढूँढ़ने बाकि हैं, जिनमें से कई सवालों के जवाब, दुनिया ढूँढ़ भी लेगी लेकिन मौला के इल्म का कोई जवाब नहीं।

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