क़ातिलीन ए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का अंजाम पार्ट 4

फिर मुख़्तार ने तमाम इराक पर कब्जा कर लिया और जितने लोग कले इमाम में शामिल थे एक-एक को पकड़वा कर कत्ल कर डाला और यज़ीदियों का ख़ातमा कर दिया। इस तरह अल्लाह का वादा पूरा हो गया। एक लाख चालीस हजार लोग कत्ले इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु के बदले में मारे गये। अल्लामा सुयूती मुहाज़िरात में फरमाते हैं कि एक साल कूफा में हो गया।

चेचक हुई उसमें डेढ़ हज़ार लोग अन्धे हो गये, जो करबला में शरीक (मुहाज़िरात) थे।

जिसने इमाम पाक के सर को अपने घोड़े की गर्दन में लटकाया था

यह अल्लामा इने हजर मक्की अलैहिर्रहमा फरमाते हैं कि यजीद के लश्कर का एक सिपाही जिसने हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु के सरे अनवर को अपने घोड़े की गर्दन में लटकाया था।

रज़वी किताब घर 132 मा बअदे करबला कुछ ही दिनों के बाद उसका चेहरा काला हो गया। लोगों ने उस से उसका सबब पूछा कि तू इतना खूबसूरत था इतना काला कैसे हो गया। उसने कहा जिस रोज मैंने इमाम पाक के सर को अपने घोड़े की गर्दन में लटकाया था, उसी रोज़ से हर रात को दो शख़्स मेरे पास आते हैं और मुझे पकड़ कर ऐसी जगह ले जाते हैं जहां भड़कती हुई आग होती है। फिर मुझे मुंह के बल उस आग में डाल कर निकालते हैं इसी वजह से मेरा मुंह काला हो गया है। उसके बाद वह बहुत बुरी मौत मरा। (सवाइके मुहरिका) )

शहादत इमाम की तमन्ना करने वाले का अंजाम

एक बुढे ने बयान किया कि मैंने हुजूर सललल्लाहु अलैहि व सल्लम को ख्वाब में देखा कि आपके सामने एक तश्त रखा हुआ है। जो खून से भरा हुआ है और लोग आपके सामने पेश किए जा रहे हैं और आप इस खून से उनकी आंखों में लगा रहे हैं। यहां तक कि मैं भी आपके सामने हाज़िर किया गया तो मैंने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह सललल्लाहु अलैहि व सल्लम मैं तू कल्ले हुसैन के वक़्त मौजूद नहीं था तो सरकार ने इरशाद फरमाया तो उसकी तमन्ना तो रखता था कि हुसैन कत्ल हों फिर आपने मेरी तरफ़ अपनी उंगली से इशारा किया तो मैं अन्धा हो गया। (सवाइके मुहरिका)

अब्दुल-मलिक इने उमरैशी कहते हैं कि मैंने कूफा के दारुल-इमारत में हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु का सरे मुबारक इने ज़्याद के सामने रखा। देखा उसके बाद उसी जगह उबैदुल्लाह इने ज़्याद का सर मुख्तार सक्फी के सामने रखा देखा उसके बाद उसी जगह मुख्तार का सर हजरत मुसअब बिन जुबैर रज़ि अल्लाहु अन्हु के सामने रखा देखा।

कहते हैं कि जब मैंने अब्दुल-मलिक बिन मरवानं से उसका तज़्किरा किया तो वह कांपने लगा और फौरन ही दारुल-इमारात से बाहर निकल खड़ा हुआ और दारुल-इमारात की जानिब देख कर कहने लगा कि अब इस मकान को पांचवां सर देखना नसीब न हो। उसके बाद दारुल-इमारात को मिस्मार करा दिया।

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