क़ातिलीन ए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का अंजाम पार्ट 1

यज़ीद की कब्र

सबसे पहले मुख्तार ने यज़ीद की कब्र खुदवाई हुई हड्डियां निकली मुख्तार ने उन हड्डियों को दोबारा जलप उसके बाद मुख्तार ने हुक्म दिया कि जितने भी लोग करबला में इमाम आली मकाम रज़ि अल्लाहु अन्हु की शहादत में शामिल थे उन सबको फौरन ही मेरे रू-ब-रू हाज़िर किया जाए। मुख्तार का हुक्म सुनते ही कूफा के दरो दीवार लरज़ उठे। मुख्तार की आंखें गुस्से से सुर्ख थीं। मुख्तार ने ऐलान किया और कहा कि इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु के

126 रज़वी किताब घर मा बदे करबला खिलाफ तलवार उठाने वाला अगर एक शख्स भी किसी के घर में मिल गया तो उसकी दीवारें उखाड़ फेंकूगा और उसकी नस्लों को जला के खाक करवा दूंगा। मुख्तार ने कहा कि अगर मैं तमाम कूफा वालों को कत्ल कर दूं तब भी इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु के खून के एक कतरे की कीमत अदा नहीं हो सकती।

मुख्तार ने कहा कि मैं खुदा से अहद कर चुका हूं कि जब तक मुख्तार की तलवार कातिलाने हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु को फिन्नार न कर देगी मैं चैन से न बैलूंगा। मुख्तार ने हुक्म दिया कि सारे लोगों को पकड़-पकड़ कर मेरे सामने हाज़िर किया जाए।

मुख्तार के इस ख़ौफ़नाक ऐलान से अहले कूफा कांप गये और मैदाने करबला में जुल्म व सितम करने वाले यज़ीदी कुत्ते पहाड़ों और जंगलों में छुपने लगे। मगर शायद वह यह नहीं जानते थे कि कहरे इलाही जब करवट लेता है तो कौमे लूत को नीस्त व नाबूद कर देता है, कौमे लूत को सह-ए-हस्ती सह-ए-हस्ती से मिटा देता है और बस्तियों की बस्तियां उजाड़ देता है। मुख़्तार की फौज ने हर तरफ़ धावे बोल दिए और कातेलीने इमाम की हर जगह तलाश शुरू कर दी। फिर क्या था कि जगह-जगह करबला के जालेमीन पकड़े जाने लगे किसी को पहाड़ की खोह से, किसी को जंगल से, किसी को सहरा से पकड़-पकड़ कर मुख्तार के सिपाही लाने लगे और मुख्तार सक्फी के दरबार में पेश करने लगे।

शिम्र का अंजाम

मुख्तार के सामने सबसे पहले शिम्र पेश किया गया। यह वही बदबख्त है, जिसने हजरत सैय्यदना इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु की गर्दन पर तल्वार चलाई थी और शहीद किया था। इमाम पाक की शहादत के बाद एक गांव में भाग गया था और जा कर एक झाड़ी में छुप गया था। मुख्तार के जासूसों ने उसे पकड़ कर मुख्तार के दरबार में पेश किया। शिम्र मारे खौफ के कांपने लगा। मुख्तार ने गरजते हुए शिम्र से कहा ओ नाबकार तुझे ज़रा भी गैरत न आई तूने अपने नापाक

हाथों से सैय्यदा के लाल को ज़िबह कर दिया और काबा की दीवार ढा दिया, चिरागे हरम को बुझा दिया। तेरा जिस्म जला कर राख हवा में उड़ा दी जाए। तब भी इमाम आली मकाम के खून का बदला नहीं हो सकता मुख्तार ने जलाल में आकर तलवार उठाई। शिम्र ने कहा कि मैं प्यास से बेचैन हूं, एक बूंट पानी पिला दे। मुख्तार ने कहा ओ नाबकार! तू वह वक्त याद कर जब तूने अहले बैत पर बाइस हजार सिपाहियों का पहरा बिठा दिया था।

अहले हरम और उनके बच्चे बच्चियां तीन रोज़ पानी के एक-एक कतरे को तरस गये। तुझे हरगिज़-हरगिज़ पानी नहीं मिल सकता जहन्नम का खौलता हुआ पानी तेरे इंतज़ार में है। यह कहकर मुख़्तार ने उसके हाथ पैर काट डाले और उसके सर को जिस्म से जुदा कर दिया और नश को कुत्तों के सामने फेंक दिया। (शामे करबला)

हुरमला का अंजाम

अभी शिम्र की लाश तड़प ही रही थी कि इतने में शोर हुआ कि हुरमला पकड़ कर लाया गया है यह वही नाबकार है जिसने हज़रत अली असगर के गले पर तीर मारा था। जब हुरमला मुख्तार के रू-ब-रू पेश किया गया तो मुख्तार की निगाहों में करबला का मन्ज़र घूमने लगा। मुख्तार मारे गज़ब के कांपने लगा। और जल्लाद को हुक्म दिया कि पहले हुरमला के गले पर तीरों की बारिश की जाए और आखिरी तीर ऐसा मारो कि गले के आर पार हो जाए। चुनांचे तीरों की बारिश से हुरमला हलाक हो गया और जहन्नम जा पहुंचा। लाश कुत्तों के सामने डाल दी गई। (तबरी)

खौली का अंजाम

हुरमला के बाद खौली गिरफ्तार करके लाया गया। यह वही ज़ालिम और बेरहम है जिस नाबकार ने हज़रत इमाम आली मकाम रज़ि अल्लाहु अन्हु के सीने में बरछी मारी थी और सरे अक्दस को तने पाक से जुदा

करके नोके नेज़ह पर बुलन्द करके नाचा था। जब मुख़ार के सामने पकड़ कर लाया गया तो मारे खौफ के कांपने लगा। उसे देखते ही मुख्तार की आंखें सुर्ख हो गई। और मुख्तार के सीने में गज़ब की आग भड़क उठी। मुखलार ने जल्लाद को हुक्म दिया कि इस लईन के दोनों हाथ काट डालो। जब उसके दोनों हाथ काट डाले गये तो दोनों पांव काटने का हुक्म दिया, तक्लीफ की शिद्दत से वह ज़मीन पर तड़पने लगा। मुख्तार ने कहा तेरी लगाई हुई आग मुसलमानों के सीनों में भड़कती रहेगी। अभी तेरे आमाल की सज़ा काफी नहीं है। उसके बाद मुख्तार ने खोली के घर वालों को इकट्ठा किया। और उन्हीं के सामने उस नाबकार को तड़पा कर कत्ल कर दिया और फिर उसे जिन्दा जला दिया। मुख़्तार उस वक्त तक उसके लाश के पास खड़ा रहा जब तक उसकी लाश जल कर खाक न (तारीखे तबरी, स. 502, अल-हुसैन स. 165) हो गई।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s