फ़ज़ाइले मदीना मुनव्वरा

जिस मदीने की यज़ीद की फौजों ने बेहुर्मती की और उसकी हुर्मत को पाश-पाश कर डाला। उसी मदीने के बारे में रसूले खुदा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यूं इरशाद फरमाते हैं :

हजरत सअद रज़ि अल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूले खुदा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया कि :

जो शख्स अहले मदीना से मक्र व फरेब करे या जंग करे तो वह इस तरह पिघल जाएगा जैसे नमक पानी में पिघलता है

तरजुमा: जो अहले मदीना के साथ बुराई का इरादा करेगा तो अल्लाह तआला उसको दोज़ख की आग में रांगे की तरह पिघलाएगा। (मुल्लिम शरीफ जिल्द 1, स. 144)

हजरत अबू हुरैरह रजि अल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया :

तरजुमा : जिसने अहले मदीना को अपने जुल्म से ख़ौफ़ज़दा किया अल्लाह तआला उसे खौफ में मुब्तला करेगा और उस पर अल्लाह तआला फरिश्ते और सब लोगों की लानत है। क्यामत के दिन अल्लाह तआला न उसकी फर्ज़ नमाज़ कबूल फरमाएगा न नफ्ल ।

सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इरशाद फरमाते हैं कि: तरजमा : जो शख़्स अले मदीना को जुल्म से खौफजदा करेगा। अल्लाह उसे खौफजदा करेगा। उस पर अल्लाह और तमाम मलाइका और तमाम इंसानों की लानत है। क्यामत के रोज़ अल्लाह तआला उस से कोई चीज़ उसके गुनाह के फिदये

कबूल न फरमाएगा।

हज़रत अबू दरदा रज़ि अल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि मैंने रसूले खुदा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फरमाते हुए सुना :

तरजुमा : फरमाते थे पहला वह शख्स जो मेरे तरीके को बदलेगा वह बनी उमैया में से होगा जिसे यज़ीद कहा जाएगा।

इमाम मुल्ला अली कारी फरमाते हैं

तरजुमा : और इस हदीस से मुराद यज़ीद बिन मुआविया है। क्योंकि उसी ने मुस्लिम बिन उक्बा को लश्कर देकर मदीना सकीनीया की तरफ भेजा और उसने मदीना को लश्कर के वास्ते तीन रोज़ के लिए मुबाह कर दिया और अखियार अहले मदीना को कसीर तादाद में कत्ल किया।

हाफिज इब्ने कसीर कहते कि उन्हें अहादीस की बुनियाद पर उलमा के एक गरोह ने यज़ीद पर लानत को जाइज़ रखा है। और एक कौल उनकी ताईद में इमाम अहमद बिन हंबल का भी है। (इने असीर स. 170, इमाम पाक और यज़ीद पलीद स. 119 सतर 10)

हज़रत अल्लामा सदुद्दीन तुफ़्ताज़ानी शहर अकाइद में यूं फरमाते

तरजुमा : और हक़ यह है कि यज़ीद का हज़रत इमाम हुसैन के कुल्ल पर राजी होना और अहले बैते नुबुव्वत सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की एहानत करना उन उमूर में से है जो तवातुरे मानवी के साथ साबित हैं अगरचे उनकी तफासीले आहाद हैं तो अब हम तवक्कुफ नहीं

करते। उसकी शान में बल्कि उसके ईमान में अल्लाह की लानत हो उस पर और उसके दोस्तों पर।

और आगे यूं फरमाते हैं

यजीद पर लानत भेजना अलल-इत्लाक जाइज है। इसलिए कि इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु के कत्ल का हुक्म देकर उसने कुफ्र किया।

अल्लामा इने हजर मक्की यूं फरमाते हैं :

कुछ अजब नहीं कि उस (यज़ीद) के कुफ का फतवा दिया जाए। हज़रत इमाम अहमद इब्ने हंबल रजि अल्लाहु अन्हु से उनके साहबजादे हज़रत सालेह ने यज़ीद से दोस्ती रखने या उस पर लानत करने के बारे में पूछा तो हज़रत इमाम अहमद बिन हंबल ने फरमाया। : बेटा कोई अल्लाह पर ईमान रखने वाला ऐसा भी होगा जो यज़ीद से दोस्ती रखे और मैं उस पर क्यों न लानत करूं जिस पर अल्लाह ने अपनी किताब में लानत की है। मैंने अर्ज किया अल्लाह ने अपनी किताब में यज़ीद पर कहां लानत की है। तो फरमाया इस आयत में फ़हल असैतुम अल-आयह कि फिर तुमसे यही तवक्को है कि अगर तुम्हें हुकूमत मिल जाए तो तुम मुल्क में फसाद बरपा करोगे और क़त रहमी करोगे। ऐसे ही वह लोग हैं जिन पर अल्लाह ने लानत की है। फिर उनको बहरा और अन्धा कर दिया। फिर इमाम ने फरमाया। बेटा क्या इस कत्ले हुसैन से बढ़ कर भी कोई फसाद हो सकता है।

तरजुमा: बेटा कोई अल्लाह पर ईमान रखने वाला ऐसा भी होगा जो यज़ीद से दोस्ती रखे और मैं उस पर क्यों न लानत करूं जिस पर अल्लाह ने अपनी किताब में लानत की है। मैंने अर्ज किया अल्लाह ने अपनी किताब में यज़ीद पर कहां लानत की है। तो फरमाया इस आयत में फ़हल असैतुम अल-आयह कि फिर तुमसे यही तवक्को है कि अगर तुम्हें हुकूमत मिल जाए तो तुम मुल्क में फसाद बरपा करोगे और क़त रहमी करोगे। ऐसे ही वह लोग हैं जिन पर अल्लाह ने लानत की है। फिर उनको बहरा और अन्धा कर दिया। फिर इमाम ने फरमाया। बेटा क्या इस कत्ले हुसैन से बढ़ कर भी कोई फसाद हो सकता है।

इमाम अहमद कस्तलानी शारह बुखारी रहमतुल्लाह अलैहि फरमाते हैं:

तरजुमा: और बाज़ उलमा ने यज़ीद पर लानत का इत्लाक किया है जैसा कि अल्लामा सदुद्दीन तुफ़्ताज़ानी का यज़ीद पर लानत करना नकल किया गया है इसलिए कि जब उसने इमाम हुसैन के कत्ल का हुक्म दिया था वह काफिर हो गया था और जम्हूर उलमा उस पर मुत्तफिक हैं कि जिसने इमाम को कत्ल किया और जिसने कत्ल का हुक्म दिया और जिसने उसकी इजाज़त दी और जो उनके कत्ल पर राजी हुआ उस पर लानत करना जाइज़ है। और हक बात यही है कि

यज़ीद का इमाम के कत्ल पर राजी होना और उस पर खुश होना और अहले बैते नुबुव्वत सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की तौहीन करना। तवातुरे मानवी के साथ साबित हो चुका है। अगरचे उसकी तफासील आहाद हैं पस हम नहीं तवकुफ करते उसकी शान में। बल्कि उसके ईमान में अल्लाह की लानत हो उस पर और उसके दोस्तों और मददगारों पर।

हज़रत अल्लामा जलालुद्दीन सुयूती यूं रकमतराज़ हैं :

तरजुमा: अल्लाह की लानत हो इमाम हुसैन के कातिल इने ज़्याद और यज़ीद पर इमाम करबला में शहीद हुए और आपकी शहादत का किस्सा तवील है। कल्ब उसके ज़िक्र का मुतहम्मिल नहीं हो सकता। इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन। (तारीख़ुल-खुलफा)

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