इमामत ए अली

बहुत सारे मुसलमान भाई, इस बारे में भी परेशान रहते हैं कि इमाम कौन हैं, एक तरफ़, अहले सुन्नत, ख़लीफाओं का ज़िक्र ज़्यादा करते हैं, वहीं दूसरी ओर, अहले तश्ययो, इमामों को ज़्यादा तरजीह देते हैं।

एक और फर्क, जानने लायक है वह ये कि अहले सुन्नत के ज्यादातर मसलक, हज़रत मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के बाद सहाबा रज़िअल्लाह को अफ्ज़ल मानते हैं, वहीं अहले तश्ययो, अहलेबैत को ज़्यादा तरजीह देते हैं।

साथ साथ ये भी बताता चलूँ कि सारे शिया सहाबा रज़िअल्लाह को गाली नहीं देते, बहुत सारे शिया ऐसे हैं जिनके आलिम सरे आम कुछ सहाबा रज़िअल्लाह को बुरा कहते मिले हैं लेकिन ऐसा एक तरफा नहीं होता, अहले सुन्नत के कई मसलक ऐसे भी हैं जिनके कई आलिम सरे आम यजीद को रजिअल्लाह कहते हुए पाए गए हैं।

अहले सुन्नत के कुछ आलिम मुझसे कहा करते थे कि शिया सहाबा को गालियाँ देते हैं पर जब मैंने शियाओं को पढ़ा तो पाया कि शिया, सारे सहाबा रज़िअल्लाह को बुरा नहीं कहते, उन्हें दिक्कत है तो बस आठ दस लोगों से जिन्हें, सुन्नी सहाबा कहते हैं और शिया सहाबा मानते ही नहीं।

शिया, सुन्नी के बीच में कुछ तफ्जीली सुन्नी भी होते हैं, जो सहाबा रज़िअल्लाह को मानते हैं, खिलाफ़त ए राशिदा भी मानते हैं लेकिन साथ ही साथ इस बात के भी कायल होते हैं कि बाद ए नबी सल्लललाहु अलैहे वसल्लम, आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के आल औलाद यानी पंजतन ओअहलेबैत सबसे अफ्ज़ल हैं।

खिलाफत और इमामत के बीच के फर्क को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम पहले सहाबा रजिअल्लाह और अहलेबैत अलैहिस्सलाम के बीच के फर्क को समझें।

अक्सर देखने में आता है कि ज़िक्र ए अहलेबैत को तरह-तरह से दबाने की कोशिश की जाती है। कभी शियाअत की आड़ लेकर, कभी राफज़िअत के बहाने से ज़िक्र ए पंजतन रोका जाता है।

इसी सिलसिले में एक झूठी बात जोड़ ली गई है वह ये की अहलेबैत को सहाबा रजिअल्लाहु अन्हो के साथ मिला दिया जाता है और दोनों को एक-सा साबित करने की बेफिजूल कोशिशें की जाती हैं।

सहाबा रजिअल्लाहु अन्हो को अहलेबैत से अलग मानना उनकी तौहीन करना नहीं है बल्कि ज़रूरी है ताकि लोगों को फर्क समझ आए।

मेरी नज़र में सहाबा वह हैं जो रसूलुल्लाह के दोस्त हैं जिन्होंने ईमान की हालत में आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम को देखा या आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने उन्हें तब देखा जब वह ईमान की हालत में थे या आपके हाथ पर कलमा पढ़ रहे थे। सहाबा रजिअल्लाहु अन्हो वह हैं जो आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के वफादार रहे और आपके बाद, आपकी अहलेबैत अलैहिस्सलाम से मुहब्बत और वफा निभाते रहे।

वहीं दूसरी ओर, अहलेबैत कहते हैं रसूलुल्लाह के घर वालों को और तमाम घरवालों में पंजतन का मर्तबा सबसे बुलंद और आला है। रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने सबसे ज़्यादा मुहब्बत, अपनी अहलेबैत से ही की है। आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने हज़रत फातिमा सलामुल्लाह अलैहा को अपना हिस्सा बताया, हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपना वसी … अपनी नफस बताया और जिन जिनके मौला नबी हैं, उन सबका मौला अली को भी बताया।

हज़रत हसन अलैहिस्सलाम को अपना बेटा और सैयद बताया, हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम को अपना बेटा बताया बल्कि ये तक कहा कि हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से हूँ। रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम का ये कौल करबला के मैदान में सारी उम्मत को समझ आ गया लेकिन फिर भी लोगों ने उस तरह से बयान नहीं किया, जिस तरह से किया जाना चाहिए था।

रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने हसनैन अलैहिस्सलाम को जन्नत के जवानों का सरदार कहा तो वहीं हज़रत फातिमा सलामुल्लाह अलैहा को जन्नत की औरतों कि सरदार बताया।

हक़ कहने से किसी की अज़मत कम नहीं होती, सहाबा रजिअल्लाहु अन्हो का अपना मकाम है लेकिन अहलेबैत की शान बयान करना नामुमकिन है। जब तक आप अहलेबैत की अज़मत बयान करना शुरू नहीं करेंगे तब तक आपकी नस्लों में असल दीन नहीं आएगा।

जिन सवारों की सवारी अल्लाह के हबीब और रसूलुल्लाह हों, उनकी अजूमत हम इंसानों से बयान हो ही नहीं सकती। लेकिन हमें कोशिश करना चाहिए की जिक्र ए अहलेबैत आम करें। याद रखें घरवालों में और दरवालों में फर्क होता है।

एक और बात देखने को मिलती है कि कुछ जाहिल लोग हज़रत जाफ़र सादिक अलैहिस्सलाम, हज़रत मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम वगैरह का नाम सुनकर सोचते हैं कि ये शियाओं के इमाम हैं।

गलती इनकी नहीं है बल्कि उन मौलवियों की है जिन्होंने हज़रत अबु हनीफा रहमातुल्लाह आलेह के बारे में तो बताया, हज़रत इमाम मालिक रहमातुल्लाह आलेह के बारे में तो बताया। अहमद बिन हम्बल रहमातुल्लाह आलेह और इमाम शाफई रहमातुल्लाह आलेह के बारे में भी बताया लेकिन ये नहीं बताया कि इन इमामों के भी उस्ताद कौन हैं।

शायद आप लोगों को ना पता हो कि इमाम अबु हनीफा रहमातुल्लाह आलेह की शहादत की वजह भी इश्क ए अहलेबैत ही थी। इमाम नसाई रहमातुल्लाह आलेह की शहादत की वजह भी इश्क ए अहलेबैत ही थी और हर वक्त के इमामों ने अहलेबैत से मुहब्बत खुलकर बयान की।

इन सारे इमामों के अपने-अपने दर्जात और बुलंदी हैं लेकिन वह बारह इमाम, जो रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के आइम्मा ए अहलेबैत हैं उनकी शान सबसे अलग और बुलंद है। हर वली ने, हर आलिम ने, हर इमाम ने उन्हें अपना इमाम माना है।

खिलाफ़त को आप सियासत से जोड़कर देख सकते हैं जिसकी तर्ज हुकूमत भी हो सकती है लेकिन इमामत दिलों पर वह रूहानी हुकूमत है जो आल ए रसूल सल्लललाहु अलैहे व आलिही वसल्लम ने की है और इमामत चलती रहेगी, जब तक आख़िरी इमाम यानी मेंहदी अलैहिस्सलाम का जुहूर ना हो जाए।

आज लोगों ने अपनी मर्जी से जिसे चाहा उसे इमाम मान लिया लेकिन ये भूल गए कि इमाम भी अल्लाह ही भेजता है।

आज शिया हो या सुन्नी दोनों का मानना है कि आख़िरी इमाम यानी इमाम मेंहदी का जुहूर होगा लेकिन वह ये नहीं बता पाते की जब आख़िरी इमाम, अल्लाह रब उल इज्जत भेजेंगे तो पहले इमाम कौन होंगे ये इंसान कैसे तय कर सकते हैं?

तो इमामत को ख़िलाफ़त से ना जोड़कर देखें, आपके पहले खलीफा हज़रत अबुबकर सिद्दीक़ रज़िअल्लाह या हज़रत अली अलैहिस्सलाम हो सकते हैं लेकिन पहले इमाम हज़रत अली अलैहिस्सलाम ही हैं और उनके बाद बाकि अहलेबैत के ग्यारह इमाम आते हैं।

याद रखें ये इस्लाम के इमाम हैं, हर मुसलमान के इमाम हैं, इन्हें शिया सुन्नी में बाँटकर अपनी आख़िरत खराब ना करो।

आज शिया हो या सुन्नी दोनों का मानना है कि आख़िरी इमाम यानी इमाम मेंहदी का जुहूर होगा लेकिन वह ये नहीं बता पाते की जब आख़िरी इमाम, अल्लाह रब उल इज्जत भेजेंगे तो पहले इमाम कौन होंगे ये इंसान कैसे तय कर सकते हैं?

तो इमामत को ख़िलाफ़त से ना जोड़कर देखें, आपके पहले खलीफा हज़रत अबुबकर सिद्दीक़ रज़िअल्लाह या हज़रत अली अलैहिस्सलाम हो सकते हैं लेकिन पहले इमाम हज़रत अली अलैहिस्सलाम ही हैं और उनके बाद बाकि अहलेबैत के ग्यारह इमाम आते हैं।

याद रखें ये इस्लाम के इमाम हैं, हर मुसलमान के इमाम हैं, इन्हें शिया सुन्नी में बाँटकर अपनी आख़िरत खराब ना करो।

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