सवार-ए-दोश-ए-रसूल

एक वाक्या है जो हदीसों में मौजूद है जिसे शिया और सुन्नी दोनों की मस्जिदों में बयान किया जाता है। हदीस में सिर्फ रसूलुल्लाह के सवारी बनने का जिक्र है लेकिन जो उलेमा बयान करते हैं वह आप सबके सामने रख रहा हूँ

एक दफा हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम और हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम ने अम्मा फातिमा सलामुल्लाह अलैहा से कहा कि इस ईद पर हमें नए कपड़े चाहिए, आप फातिमा सलामुल्लाह अलैहा ने दिलाने का वादा किया और हज़रत अली अलैहिस्सलाम से कपड़े लाने कहा, आप बाबा अली अलैहिस्सलाम, तीन रोज़ तक मजदूरी की त

में गए लेकिन कोई काम ना मिला, यहाँ तक ईद के एक दिन पहले की रात आ गई, हज़रत अली अलैहिस्सलाम को खाली हाथ देखकर अम्मा फातिमा सलामुल्लाह अलैहा के दिल में ख्याल आया कि कल अगर बच्चों को कपड़े ना मिले तो उनको बहुत तकलीफ़ होगी।

आप ग़मगीन होकर दुआओं में मश्गूल हो गईं कि सुबह के वक्त दरवाजे पर दस्तक हुई, एक दर्जी सामने था जिसके हाथ में दो कुर्ते थे, वह भी हसनैन अलैहिस्सलाम के पसंद के रंगों के, आप बीबी फातिमा सलामुल्लाह अलैहा ने बच्चों को तैयार किया, कुछ देर में रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम अपनी बेटी के घर तश्-रीफ़ ले आए. फातिमा सल्लललाहु अलैहा ने जब अपने बाबा से पूरा वाक्या बयान किया तो रसूलुल्लाह ने फरमाया कि वह कुर्ते लाने वाला दर्जी नहीं फरिश्ता था।

दोनों शहजादे तैयार होकर, अपने नाना के साथ नमाज़ ए ईद पढ़ने निकले, अचानक मेरे प्यारे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम रोने लगे जो कि उस वक्त काफी छोटे थे। आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने रोने की वजह पूछी तो कहते हैं कि सबके पास अपनी सवारी है, अगर हमारे पास भी होती तो हम भी उसपर बैठकर जाते।

जब रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने ये सुना तो मुस्कुराकर फरमाया, आपके नाना आपकी सवारी बनेंगे, दोनों शहजादों को अल्लाह के हबीब ने अपने कंधों पर बिठाया और दोनों सवार, दोशए-रसूल पर सवार होकर सवारी करने लगे कि अचानक हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम फिर रोने लगे, आका सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने पूछा कि अब क्या हुआ तो फरमाते हैं, नानाजान वह देखिए, बच्चे अपने सवार की लगाम पकड़े हैं, जब हबीब ए खुदा ने ये सुना तो अपनी दस्तार को दो हिस्सों में करके एक हिस्सा इमाम हसन को और दूसरा इमाम हुसैन को पकड़ा दिया, कुछ रिवायतों में आका की पाक जुल्फों को पकड़ाने की बात भी मिलती है।

सैयद शादाब अली

अब दोनों सवार, खुश थे, कभी इमाम हसन अलैहिस्सलाम अपनी ओर खींचते तो मेरे आका इस तरफ़ जाते, कभी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपनी तरफ़ खींचते तो रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम दूसरी ओर जाते।

एक सहाबा रज़िअल्लाह की नज़र पड़ी तो कहते हैं कि अल्लाह की कसम मैंने ऐसी सवारी पहले कभी नहीं देखी। आका सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने मुस्कुराकर कहा कि हाँ क्योंकि तुमने ऐसे सवार भी तो पहले नहीं देखे थे।

अब क्या ये बच्चों को खिलाने की बात है? मेरे आका सल्लललाहु – अलैहे वसल्लम, अल्लाह के हबीब हैं, रसूल हैं। आपका कोई भी अमल या बात अपने आप में राज़ समेटे हुए है। अगर आप दिल से सोचो तो समझ आएगा कि आका सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ये इशारा फरमा गए हैं कि नाना वहाँ जाएँगे, जहाँ नवासे चाहेंगे। रसूलुल्लाह का फरमान है कि मेरी मुहब्बत को मेरी इतरत ए अहलेबैत में तलाश करो। कभी फिकर् कीजिएगा इस पर।

बेदम यही तो पांच हैं मक़सूद ए क़ायनात खैरुन्निसा , हुसैन ओ हसन , मुस्तफ़ा , अली

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