ख़िलाफ़त ए अली

सबसे पहले बात करते हैं ख़िलाफ़त की, यकीन मानिए मुझे इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं की खलीफा कौन बना था, किसको बनना चाहिए था। ये शिया-सुन्नी के बीच चला आ रहा एक बहुत बड़ा मसला है।

आइए हम सबसे पहले ख़िलाफ़त को समझते हैं, ख़िलाफ़त कोई सियासत या राज करने के लिए नहीं है बल्कि ये मखलूक के लिए की जाती है। अल्लाह रब उल इज्जत अपने रसूल भेजते हैं, नबी भेजते हैं और उन नबियों के ख़लीफा होते हैं। यहाँ पर ध्यान रखने वाली बात ये है कि इस्लाम में शासन चलाने के लिए ख़िलाफ़त का तरीका इतियार किया जाता है।

अब ज़रा सोचकर देखिए, जब अपने रसूल, अल्लाह खुद भेजता है तो खलीफा? क्या इंसान चुनता है ख़लीफा? अगर इंसान चुनता है, तो खलीफा चुनने के लिए मीजान क्या होना चाहिए?

इन सब पर बहुत बड़ी-बड़ी दलीलों के साथ शिया और सुन्नी, दोनों मसलकों के पास ढेरों किताबें हैं,सबकी अपनी दलील भी है लेकिन कहते हैं, जब दो हदीसों या दलीलों में टकराव पैदा हो जाए तो कुरआन की तरफ़

वापिस आ जाना चाहिए।

इस बात में भी शक नहीं की रसूलुल्लाह के नाम से बहुत सारी झूठी हदीसें, हर दौर में जोड़ी गईं और हमारे मुहदिसों ने अपने-अपने इल्म, तहकीक और तसदीक़ से उन्हें अलग-अलग हिस्सों में छाँटा और कुछ हदीसों को सहीह करार दिया, कुछ को हसन करार दिया और कुछ को रद्द भी किया। बावजूद इसके हर मसलक, अपने-अपने फायदे की हदीसें पकड़कर रखा है, अगर अपना मतलब निकल रहा हो तो सहीह हदीस को नज़रअंदाज़ करके, हसन हदीस को बयान करता है।

एक बात हमेशा से कहता आ रहा हूँ, हमारा अकीदा कुरआन है और अकीदा एक आयत को पढ़कर नहीं बनता बल्कि सारी आयतों को पढ़कर बनता है। कुरआन की एक आयत राज़ है तो दूसरी आयत खुलासा। कुरआन की एक आयत में इशारा है तो दूसरी आयत में तफसीर।

ठीक ऐसा ही मामला है इल्म का, एक हदीस पढ़कर पूरा मसला समझ नहीं आता, उस मसले से जुड़ी हर हदीस को पढ़कर, समझकर, तहकीक और तसदीक के बाद ही हक़ समझा जा सकता है।

कुछ वक्त के लिए अपने मसलकों को भूलकर, शिया सुन्नी के बीच के विवादों को भूलकर, कुरआन में देखते हैं। जब कुरआन में सारे सवालों के जवाब मौजूद हैं तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि खिलाफ़त के बारे में कोई आयत ना आई हो।

जब हम कुरआन में सूरः बकर की तिलावत करते हुए आयत नंबर ३० पर पहुँचते हैं और आयत नंबर ३३ तक पढ़ते हैं तो पाते हैं इन आयतों

में अल्लाह रब उल इज्जत फरमाते हैं जिसे मैं तर्जुमे के साथ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ

और याद करो जब तुम्हारे रब ने फरिश्तों से कहा कि “मैं ज़मीन में (इन्सान को) ख़लीफा बनाने वाला हूँ।” उन्होंने कहा, “क्या दुनिया में उसे ख़लीफा बनाएँगे जो फ़साद करे और खून-खराबा करे और हम तेरी हम्द की तस्बीह करते ही हैं और तुझे पाक़ कहते हैं।”, रब ने फरमाया, मुझको वो सब मालूम है , जो तुम नहीं जानते।” (सूरः बकर , नंबर ३०) पर आयत

और अल्लाह ने आदम को सारे नाम सिखा दिए, फिर उन्हें फरिश्तों के सामने पेश किया और कहा, “अगर तुम सच्चे हो तो मुझे इनके नाम बताओ।” (सूरः बकर , आयत नंबर ३१)

बोले, “अजीम व बरतर है तू ! तूने जो कुछ हमें बताया उसके सिवा हमें कोई इल्म नहीं। बेशक तू सब कुछ जानने वाला, साहिब ए हिकमत है।” (सूरः बकर, आयत नंबर ३२)

तब अल्लाह ने कहा, “ऐ आदम ! उन्हें , इन लोगों के नाम बताओ।” फिर जब आदम ने उन सबके नाम बता दिए, रब ने कहा, “क्या मैंने तुमसे कहा ना था कि मैं आसमानों और ज़मीन के राज़ को जानता हूँ? और मैं जानता हूँ , जो कुछ तुम जाहिर करते हो और जो कुछ छिपाते हो ।” (सूरः बकर, आयत नंबर ३३)

अब इन आयतों को पढ़कर बहुत सारी बातें हैं जो समझने लायक हैं, पहली तो ये कि जब अल्लाह रब उल इज्जत ने आदम अलैहिस्सलाम को ख़लीफ़ा बनाने का सोचा तो वहाँ भी कुछ और दावेदार (फरिश्ते) आए जिन्होंने आदम को ख़िलाफ़त के लायक नहीं बताया और कहा कि हम तो हैं आपकी हम्द ओ सना करने। यहाँ एक और बात समझने लायक है कि ज़रूरी नहीं ऐतराज़ करने वाला ख़राब ही हो, वहाँ तो ऐतराज़ फरिश्ते कर रहे थे।

दूसरी गौर करने वाली बात ये है कि जब ख़लीफा को लेकर बात उठी तो अल्लाह रब उल इज्जत ने फैसला बैत दिलवाकर नहीं किया और ना ही जबरन अपना फरमान लागू कर दिया बल्कि फरिश्तों को मुतमईन भी किया और ज़मीन पर अपना खलीफा, आदम अलैहिस्सलाम को बनाया, साथ ही साथ, ये साबित भी किया कि हज़रत आदम

अलैहिस्सला. ही ख़लीफा बनने के लायक हैं।

अब तीसरी और सबसे अहम बात ये है कि अल्लाह रब उल इज्जत

ने ख़िलाफ़त के लायक कौन है, ये इल्म की बुनियाद पर तय किया अल्लाह के चुने खलीफा का इल्म बाकि सबसे ज्यादा था। ये हो गई सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के पर्दा फरमा लेने के बाद ख़िलाफ़त की बात उठी, लोगों में बहस और इख्तिलाफ़ हुआ। क्या कुरआन पर अमल करते हुए इल्म की बुनियाद पर फैसला नहीं होना चाहिए था?

कुरआन की बात, आइए अब तारीख़ की तरफ़ लौटते हैं, मेरे आका

अगर इल्म की बुनियाद पर फैसला होता, जैसा की इशारा, कुरआन में है तो दुनिया जानती है, आका सल्ललाहु अलैहे वसल्लम ने फरमाया, “मैं इल्म का शहर हूँ और अली उसका दरवाज़ा है।”

बाबुल इल्म से बढ़कर, ख़िलाफ़त और किसकी होगी। यहाँ एक बात और है, जिसपर लोगों का ध्यान नहीं जाता, वह ये कि क्या ये मुमकिन है कि जो नबी, ज़िन्दगी भर, दिन-रात अपनी उम्मत की बशिश के लिए रोते रहे, वह आका सल्लललाहु अलैहे वसल्लम, अपनी उम्मत को यूँ बेसहारा, यतीम, लावारिस छोड़कर जाएँगे?

गदीर का मैदान याद है? रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम का आख़िरी हज़याद है? नबी के हाथ में अली का हाथ याद है? रसूलुल्लाह जब जंग ए तबूक पर जा रहे थे तो किसे अपनी जगह आमिल बनाकर

गए थे?

रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने जंग ए तबूक में कभी हज़रत अली को अपनी जगह आमिल बनाकर बताया, कभी सुलह ए हुदैबिया के मौके पर अपनी जगह अली से लिखवाकर इशारा किया, कभी ये कहकर हज़रत अली का मर्तबा बताया कि अली मेरे लिए ऐसा है जैसे मूसा के लिए फिरऔन। हद तो ये है कि ग़दीर के मैदान पर तो

आप सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने, हज़रत अली का हाथ, अपने हाथ में लेकर बुलंद किया और साफ़ लफ्जों में ऐलान तक कर दिया. मैं जिसका मौला हूँ, अली भी उसका मौला है।”

अब जब हज़रत अली को हमारा मौला बता दिया, सरपरस्त बना दिया, इसका मतलब ही साफ़ है कि हमारे प्यारे आका सल्लललाहु अलैहे वसल्लम ने हमें लावारिस नहीं छोड़ा था बल्कि दुनिया से पर्दा फरमाने के पहले अपना वसी और हमारा सरपरस्त हमें देकर गए थे।

अहले तश्ययो एक बात कहते हैं कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम, रसूलुल्लाह के ख़लीफ़ा हैं वह भी बिना फासले के हालाँकि वह भी मानते हैं कि सबसे पहले हज़रत अबु बकर रजिअल्लाह, उसके बाद हजरत उमर रजिअल्लाह, फिर हज़रत उस्मान रजिअल्लाह ने खिलाफत की, चौथे नंबर पर जाकर हज़रत अली अलैहिस्सलाम को खिलाफ़त मिली।

अहले सुन्नत भी ये ही मानते हैं लेकिन उन्हें ऐतराज़ इस बात से होता है कि हज़रत अली बिना फासले के खलीफा नहीं हैं लेकिन गौर करने वाली बात ये भी है कि अहले सुन्नत के भी सारे बड़े बुजुर्ग और पीर, हज़रत अली अलैहिस्सलाम के नाम पर बैत लेते हैं।

मैंने किसी बुजुर्ग से ये नहीं सुना कि फला-फलाँ सहाबा रजिअल्लाह, रसूलुल्लाह से जोड़ने के लिए एक सीढ़ी हैं लेकिन तसव्वुफ के हर बड़े आलिम का दावा है कि रसूलुल्लाह को पाने के लिए सबसे पहले मौला अली को पाना होता है। यानी दो बात गौर करने लायक हैं. पहली तो ये कि जाहिरी और रूहानी दो तरह की खिलाफत होती हैं, दूसरी ये कि दुनियावी ख़िलाफ़त में इंसान फेर बदल कर सकता है लेकिन रूहानी खिलाफत में नहीं।

अगर कुछ मसलकों को छोड़ दें तो लगभग हर मुसलमान ये मानता है कि मुआविया ने यजीद को छटा खलीफा बनाया था, अब आप खुद तय

करें कि आप किसे छटा खलीफा मानते हैं, यजीद को या हज़रत हुसैन

अलैहिस्सलाम को?

अगर तारीख़ उठाकर देखो तो यजीद ने ख़िलाफ़त की है लेकिन हकीकत महसूस कर सको तो समझ आ जाएगा कि आज भी हमारे दिलों

पर हुकूमत के ख़िलाफ़त, सिर्फ़ हुसैन अलैहिस्सलाम की है।

मैं यहाँ ये नहीं कह रहा कि ख़लीफा कौन बना और किसको बनना था, बस ये बताने कोशिश कर रहा हूँ कि अगर कोई इसपर ऐतराज़ करे तो इस बात से ईमान में फर्क नहीं पड़ता। बहुत सारे सहाबा रजिअल्लाह ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के बाद, हज़रत अली की ख़िलाफ़त को सही ठहराया था जिनमें, हज़रत अबुज़र गफ्फारी रज़िअल्लाह, हज़रत अम्मार बिन यासिर रज़िअल्लाह, हज़रत मालिक ए अश्तर रज़िअल्लाह, हज़रत बिलाल रज़िअल्लाह, हज़रत मिक्दाद रज़िअल्लाह और भी कई सहाबा रज़िअल्लाह के नाम शामिल

हैं।

इस इखतिलाफ़ की वजह से एक दूसरे का ईमान तय करना बंद करो, एक दूसरे पर फत्वे लगाने छोड़ दो। हाँ अगर आपको लगता है कि आप हक़ जानते हो तो हिकमत ओ मुहब्बत के साथ अपनी बात रखो, जिसे मानना होगा मानेगा वरना सबको अपने हिसाब से सोचने का हक़ है। हश्र के रोज़ अल्लाह फैसला कर देगा, लिहाजा ज़मीनी खुदा बनने से

बचें।

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