ऐतराज़ का जवाब

कुछ लोग ऐतराज़ करते हैं कि लोग इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को ज़्यादा मानते हैं, इमाम हसन अलैहिस्सलाम को कम। पहली बात तो ऐसा नहीं है और अगर कोई ऐसा कर रहा है तो वह जाहिल ही कहा जाएगा।

इमाम हसन और इमाम हुसैन, दोनों ही नवासा ए रसूल हैं और जन्नत के जवानों के सरदार हैं। हक़ बात ये है कि दोनों ने ही इस्लाम और मुसलमानों को बचाया है और दोनों ने इमामत की है।

याद रखें इमाम हसन अलैहिस्सलाम का मर्तबा ये है कि वह, हुसैन अलैहिस्सलाम के भी इमाम हैं। अली अलैहिस्सलाम और फातिमा सलामुल्लाह अलैहा की पहली औलाद हैं और रसूलुल्लाह की गोदी में तब भी खेलते थे जब हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम, दुनिया में तश्-रीफ़ नहीं लाए थे।

खुद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कहते थे, हजार हुसैन मिलकर भी एक इमाम हसन नहीं बन सकता। ये शान है मेरे इमाम की, मेरे मालिक की।

आप इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने मुआविया से सुलह करके हजारों बेगुनाहों को बेवजह कत्ल होने से बचाया और इस तरह हक़ दीन जानने वालों की जमात बचाकर, दीन, दुनिया के कोने-कोने तक फैलवाया। आपने उम्मत को जुल्म से बचाने के लिए, दीन पर अमल की शर्तों और कुरआन पर अमल की शर्तों पर सुलह करके, बादशाहत की भीख़ दे दी।

अब कुछ नादान लोग ये कहते हैं कि हज़रत हसन अलैहिस्सलाम ने सुलह की थी क्योंकि सामने वाला नेक था तो उन्हें चाहिए की सुलह ए हुदैबिया पढ़कर देखें, रसूलुल्लाह ने भी सुलह की थी लेकिन जिनसे सुलह की थी वह जालिम कुफ्फार थे। हालाँकि ये बहुत कम लोग समझ पाते हैं कि अहलेबैत जंग कब करते हैं और सुलह कब करते हैं क्योंकि अफसोस, हमें वक्त ही नहीं मिला, अहलेबैत अलैहिस्सलाम को समझने का।

कुछ नादान लोग ये भी कहते हैं, हज़रत हसन नर्म दिल थे इसलिए सुलह की, हज़रत हुसैन जलाल वाले थे इसलिए जंग की। ये भी बेबुनियादी बातें हैं, दोनों ही शहजादे, बहुत नर्म दिल थे। लोगों ने तारीख़ नहीं पढ़ी। हज़रत हसन अलैहिस्सलाम से बादशाहत माँगी गई थी इसलिए सुलह की गई. हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम से बैत माँगी गई थी, इसलिए जंग हुई. पहले वबा अलग थी, बाद में अलग थी इसलिए इलाज भी बदल गया।

हसनैन अलैहिस्सलाम, दोनों ही सखी हैं बल्कि करीम हैं। आप दोनों शुजाअत वाले, इमामत वाले, सरदार हैं। अपने नाना, वालिदा और वालिद की ही तरह आप लोगों ने भी उम्मत से बेइंतिहा मुहब्बत की और

दीन को ऐसे बचाया की आज तक कोई हसनैन की तरह होने का दावा ना कर सका। आप दोनों का सब्र मिसाल है।

आज कुछ मौलवी साहब ये साबित करने की कोशिश करते हैं कि नवासा ए रसूल लड़ने के लिए गए थे जबकि उनके साथ गया उनका परिवार, औरतें और बच्चे गवाह हैं कि वह जंग के इरादे से नहीं गए थे।

हाँ जब जबरन बैत लेने की कोशिश की गई तो आप हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम ने झुकने की जगह जंग करना मंजूर किया और इस्लाम के साथ-साथ सारी इंसानियत को बचा लिया। आपकी शहादत से इस्लाम बका पा गया।

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