असीराने हरम का काफिला मदीने में

जिस वक्त अहले हरम का काफिला मदीने के करीब पहुंचा तो हज़रत सैय्यदा जैनब के हुक्म पर काफिला बैरूने शहर रोका गया। हज़रत सैय्यदा जैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा ने एक शख्स को शहर में भेजा कि जाकर मदीने में ऐलान कर दे कि अहले हरम वापस आ गये हैं। तो सबसे पहले हज़रत जाबिर इने अब्दुल्लाह ने उस काफिले का खैर मकदम किया।

अहले मदीना जमाअत दर जमाअत हाज़िर होने लगे। मदीने में कोई ऐसी पर्दादार औरत न थी जो आह व फुगां करते हुए बाहर न निकल आई हो। लोगों का इज़्देहाम हो गया। हर तरफ रोने की आवाजें बुलन्द थीं। हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन रजि अल्लाहु अन्हु ने तमाम रूदादे सफर पर रौशनी डाली। जिसे अहले मदीना सुन कर तड़प गये और बेखुद हो गये जिन-जिन हालात का मुकाबला अहले बैत को करना पड़ा सब पर रौशनी डाली गई।

यह मुकद्दस काफिला मदीने में दाखिल हुआ हजरत सैय्यदा ज़ैनब का यह हाल था कि घुटनों के बल चल कर मदीने में दाखिल हुईं। मदीने के ज़र्रे-ज़र्रे से जो हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु को वाबस्तगी थी वह न किसी तफ़सील की मुहताज है न तशरीह की। यह मदीना ही तो है जहां हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु और हज़रत सैय्यदा जैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा पैदा हुए, पले बढ़े और जवान हुए यह वही मदीना है अब जहां सिर्फ हज़रत सैय्यदा जैनब थीं और हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु न थे। हज़रत उम्मे कुल्सूम रज़ि अल्लाहु अन्हा की यह हालत थी कि ज़ार व कतार रो रही थीं और अर्ज करती जा रही थीं : ऐ नाना जान! हम आपके दरे पाक में हसरत भरे दिलों से लोट आए हैं।

तमाम माओं की गोदें सूनी हो गईं। हम सब व रज़ा पर हर हाल में कायम हैं। ऐ नाना! हम आपकी चहेती और लाडली बेटियां हैं, ऐ नाना! आज हम पर यह जुल्म हुआ कि हम ऊंटों पर बेहिजाब व बेपर्दा सवार की गई।

हज़रत सैय्यदा ज़ैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा का यह हाल था कि आप घुटनों के बल दूध पीते बच्चे की तरह घसीटती हुई मदीने में दाखिल हुई इसी तरह रौज़-ए-रसूल तक गईं क्योंकि खड़े होने की सकत न थी। नाना जान के मज़ारे अक्दस से लिपट कर हज़रत सैय्यदा जैनब बेहोश हो गईं, कोई क्या बताए कि वह क्या मन्ज़र रहा होगा। हज़रत सैय्यदा जैनब ने अपने नाना से क्या कहा।

भाई के ईफ़ाए वादा का तकिरा किया या उम्मत की शिकायत की। अपने बाजुओं के नील दिखाए या भाई का खून आलूद पैरहन पेश किया।

रौज़-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हिलने लगा बाज मुअरेखीन का ख्याल है कि मदीना में कई दिन तक मातम रहा। हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन रज़ि अल्लाहु अन्हु नाना के रौजे पर हाज़िर हुए और दस्तबस्ता अर्ज़ करने लगे : “ऐ नाना जान! दुश्मनों ने हमारा सब कुछ लूट लिया, हमारे वालिदे मोहतरम को बड़ी तौहीन व तहकीर के साथ कत्ल कर दिया।

और आपके जिगर के टुक्ड़े हजरत सैय्यदना इमाम हुसैन रजि अल्लाहु अन्हु बड़ी बेदर्दी से शहीद हुए। दुश्मनों ने उनका सरे मुबारक काट कर नोक नेज़ह पर बुलन्द किया। लेकिन वह सरे मुबारक नेज़े पर ऐसा चमकता था जैसे आसमान में चौदहवीं का चांद चमकता है।

ऐ नाना! दुश्मनों ने हम पर मज़ालिम के पहाड़ तोड़े, हमारे माल व असबाब को छीन लिया। और हमारे खेमों को लूट लिया हमारा कोई मुआविन व मददगार न था। उन्होंने हमारी तौहीन करने के लिए ऊंटों की नंगी पीठों पर सवार करके शहर-शहर, करिया-करिया घुमाया और दमिश्क में लाकर यज़ीद के दरबार में खड़ा कर दिया।

यजीद ने कहा कि मैंने तुमसे अपना मक्सद हासिल कर लिया और तुम्हारे पिद्र मुअज़म के कत्ल से मुझे खुशी हुई। क्योंकि बद्र व उहद का बदला लिया है, ऐ नाना जान! उसने तो मुझे भी कत्ल करना चाहा था मगर मेरी फूफी हजरत सैय्यदा ज़ैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा चिल्ला उठी और शोर मचाया तो यज़ीद ने कहा उसे छोड़ दो यह आज़ादों में से है।

ऐ नाना जान! कल क्यामत में उस से हमारा हक लीजिए और हथ में कल फैसला के दिन फैसला कीजिए।

उसके बाद सरे इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु को पहलूए सैय्यदा खातूने जन्नत में दफन किया गया। हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन रज़ि अल्लाहु अन्हु ने वापसी करबला के बाद मदीना मुनव्वरा को अपना मसकन बनाया। और आबादी से अलग थलग रहने लगे।

बिन अब्दुल मलिक ने 75 हिज. में आपको ज़हर दिलवा दिया।

वलीद 57/साल की उम्र पाक में 18 मुहर्रमुल-हराम बरोज़ मंगल पहलूए सैय्यदना हज़रत इमाम हसन रजि अल्लाहु अन्हु जन्नतुल-बकी में दफन हुए। (मिरातुल-असरार)

हज़रत इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु का शहीद होना था कि यज़ीद ने खुल्लम खुल्ला जना, लेवातत, हराम कारी, भाई बहन का बियाह, सूद व शराब खोरी को फरोग देना शुरू किया।

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