खुतबा हज़रत सैय्यदा जैनबदरबारे यज़ीद पलीद में

हज़रत सैय्यदा ज़ैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा ने दुनिया के सबसे बड़े दहशतगर्द यज़ीद के दरबार में बड़ी बरजस्तगी के साथ जो खुतबा दिया उसका मुकाबला आज भी तारीखे आलम न कर सकी। और न कभी कर पाएगी। जनाब जैनब ने दरबारे यज़ीद में ऐसी वलवला अंगेज़ और इंकलाबी तकरीर की कि यज़ीद अपने ही दरबार में ज़लील व ख्वार हो गया। हम्द व नअत के बाद आपने फरमाया कि ऐ यज़ीद तू यह समझता है कि तुने मुझ पर ज़मीन व आसमान तंग कर दिया है। तू जान ले कि अल्लाह ने तुमको मोहलत दी है। ताकि तुम्हारे गुनाहों में और इजाफा हो जाए।

ऐ यजीद यही इंसाफ है कि तेरी औरतें और कनीजें पर्दे में रहें। और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नवासियां असीरों की तरह

शहर-शहर, करिया-करिया नंगे सर और नंगे पैर फिराई जाएं। ऐ यज़ीद अन करीब तू जान जाएगा कि कौन हक है और कौन बातिल है।

उस दिन का हाकिम अल्लाह है जिस दिन तेरे मद्दे मुकाबिल हमारे जद्द

होंगे। तेरे आज़ा तेरे ही खिलाफ गवाही देंगे।

हज़रत सैय्यदा ज़ैनब के इस खुतबा ने यज़ीद को ढेर कर दिया। यज़ीद चाहता था कि इमाम हुसैन रजि. अल्लाहु अन्हु को शहीद करके आपकी सदाए इंकलाब को खामोश कर दे। मगर हज़रत सैय्यदा ज़ैनब ने यज़ीद और यज़ीदियों के नापाक मन्सूबों पर पानी फेर दिया। आपने ऐसी तकरीर की कि दमिश्क के दरो दीवार हिलने लगे। हज़रत जैनब ने वह कारनामे अंजाम दिए कि दुश्मन बौखला उठा। न कूफा ही में उन पर काबू पा सका न शाम ही में, न शाम के दरबार व बाज़ार उनकी सदाए इंकलाब को ख़ामोश कर सके और न शाम के कैदखाने। फिर यज़ीद हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन रज़ि अल्लाहु अन्हु की तरफ मुख़ातिब हुआ हज़रत सैय्यद सज्जाद और यज़ीद से काफी बहस हुई। यज़ीद ने गुस्से में आ कर इमाम ज़ैनुल आबेदीन को कत्ल करने का हुक्म दे दिया।

जल्लाद आगे बढ़ा हज़रत सैय्यदा जैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा ने बुलन्द आवाज़ से फरमाया :

‘ऐ यज़ीद क्या तेरे लिए वह खून जिनको तू बहा चुका काफी नहीं। अगर तू उस बीमार को क़त्ल कराना चाहता है। तू पहले मुझे कत्ल कर दे।

जब जल्लाद ने चाहा कि इमाम जैनुल आबेदीन को क़त्ल करे। तो अचानक गैब से दो हाथ नमूदार हुए और जल्लाद की गर्दन पकड़ कर झिंझोड़ डाली, जल्लाद खौफजदा हो कर भाग गया। और यजीद को इस हालत से बाख़बर किया यज़ीद अपनी इस हरकत से बाज़ आया।

इसी गुस्से में यजीद ने खड़े हो कर यह अश्आर पढ़े।

१ तरजमा : काश मेरे वह बुजुर्ग जो बद्र व उहुद में कत्ल किए गये। आज मौजूद होते तो खुश हो कर मुझे दाद देते कि मैंने किस तरह आले मुहम्मद से उनका बदला लिया है, और बनी हाशिम को कत्ल किया है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर न कोई फरिश्ता आया था न कोई वहीए इस्लाम उनका अपना मनघड़त ढोंग था। (मआज़ल्लाह) इस्लाम को हासिल करने के लिए एक खेल खेला था।

उसके बाद यज़ीद ने कहा कि मैं दीने मुहम्मदी से बेज़ार हूं और ईसा इने मरयम के मज़हब में दाखिल हो गया हूं। (मिरातुल असरार : स. 204)

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