हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन और एक बूढ़े शामी की गुफ्तगू

एक बूढ़ा शामी हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन रज़ि अल्लाहु अन्हु के पास आया और बेअदबाना अन्दाज़ में गुफ्तगू की और सख्त व सुस्त जुमले कहे। वह बूढ़ा हकीकते हाल से बिल्कुल बेख़बर था।

उस बूढ़े ने हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन रज़ि अल्लाहु अन्हु से कहा कि तुम कौन हो। हज़रत जैनुल आबेदीन रज़ि अल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि ऐ शैख तुमने कुरआन पढ़ा है।

उसने कहा : तुम्हें कुरआन से क्या मतलब ?

इमाम जैनुल आबेदीन रज़ि अल्लाहु अन्हु ने कहा : मैं तुमसे पूछता हूं कि तुमने यह आयत पढ़ी है :

इमाम ने कहा बताओ वह कुर्बा कौन हैं।

बूढ़े ने कहा : वह आले मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं। इमाम ने फरमाया खुदा की कसम हम वही आले मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं।

जब इतना सुना तो वह बूढ़ा बदहवास हो गया। उसने गौर से इमाम जैनुल आबेदीन की शक्ल देखी और पूछा खुदा की कसम क्या आप ही लोग आले मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं।

इमाम ने फरमाया : हां हम ही आले मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं।

उस बूढ़े ने इमाम से रो-रो कर माफी मांगी और कहा : बखुदा हमें उसका इल्म न था। हम को तो कुछ और बताया गया था।

काफिला आगे बढ़ा, लोगों का हुजूम बढ़ता जा रहा था। इब्ने असाकिर ने निहाल बिन अमर से रिवायत की है। वह कहते हैं वल्लाह मैंने बचश्म खुद देखा कि जब सरे मुबारक इमाम हुसैन रज़ि अल्लाहअन्हु को यज़ीदी ने» पर लिए जा रहे थे उस वक्त मैं दमिश्क में था सरे मुबारक के सामने एक शख्स सूरः कहफ की तिलावत कर रहा था जब वह इस आयत पर पहुंचा।

अस्हाबे कहफ और असहाबे रकीम हमारी निशानियों में से थे। उस वक्त सरे इमाम पाक ने फसीह ज़बान में इरशाद फरमाया : असहाबे कहफ के वाकए से मेरा कत्ल और मेरे सर को लिए फिरना अजीब तर है।

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