कूफा का कैदखाना

इने ज़्याद के हुक्म से अहले हरम को कूफा के ऐसे तारीक कैद खाना में रखा गया जो ज़मीन दोज़ था। अन्धेरे की घुटन और ज़ख्मों की बेइंतिहा तक्लीफ और यतीम बच्चों के कराहने की मुसलसल आवाजें तक्रीबन चौंतीस दिन कैदखाने में रहने के बाद 18 सफर को अहले हरम का यह काफिला शाम की रवानगी के लिए कैदखाना से निकाला गया तो हालत यह हो गई थी कि सिर्फ हड्डियों के ढांचे रह गये थे। चेहरे पीले पड़ गये थे, लिबास बेहद बोसीदा हो गये थे। हद यह कि उन में से किसी की सूरत पहचानी न जाती थी। इतने में यज़ीद का हुक्म नामा पहुंचा कि उस काफिले को फौरन शाम रवाना कर दो। हुक्म पाते ही यह अहले हरम का काफिला शाम की तरफ रवाना कर दिया गया।

तारीखे तबरी में है कि इने ज़्याद ने शुहदाए किराम के सरों को और असीराने अहले बैत को, ज़हर बिन कैस, अबू बुर्दा बिन औफ़ अज़री और तारिक बिन अबू ज़िबयान अज़री के हमराह शिम्र की सरकरदगी में यज़ीद पलीद के पास दमिश्क इस हालत में रवाना किया कि हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन. रज़ि अल्लाहु अन्हु के हाथ पांव को जंजीरों में जकड़ दिया गया था। (सआदतुल-कौनैन, स. 33) और बीवियों को ऊंटों की नंगी पीठ पर बिठाया गया था और फिर इने ज़्याद ने हुक्म दिया कि सरों को नेज़ों पर चढ़ाए हुए आबादियों से गुज़रना ताकि लोगों को इससे इबरत हो और आइन्दा कोई भी यज़ीद की मुखालिफत पर आमादा न हो। असीराने हरम का यह नूरानी काफिला शाम की तरफ रवाना हुआ। जिन में से चन्द शहर काबिले जिक्र हैं

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