असीराने हरम कूफा में

रास्ता तय करता हुआ काफिला कूफा के करीब पहुंचा, लश्कर वालों की तरफ से फतह व नुसरत की बुलन्द आवाजें औरतों का गिरया व बुका और जख्मियों की कराहें मिली जुली थीं। यह काफिला कूफ़ा पहुंचा जहां मौला अली ने अपना मरकजे हुकूमत बनाया था, जहां आपने अपने अहकाम सादिर किए थे।

ग्यारह मुहर्रम को इने ज़्यादा ने कूफा में कयूं नाफ़िज़ कर दिया कि खबरदार कोई शख्स बाहर न निकले, न किसी चौराहे पर कोई मज्मा हो न ही कोई नजर आए।

कूफा की तमाम सड़कें मुसल्लह सिपाहियों से भर गईं, यह सारी तैयारियां सरहाए शुहदा और असीराने अहले बैत के लुटे हुए काफिले की आमद पर थी। इमाम पाक की शहादत की खबर आम

होने पर कूफा में खौफ व दहशत की फजा तारी थी। लोग एक दूसरे से आहिस्ता-आहिस्ता कहते कि हुसैन कत्ल कर डाले गये, हुसैन मार डाले गये। अब क्या होगा? 12 मुहर्रम को हथियारों में डूबे फौजी कूफा में दाखिल हुए। आगे-आगे कातिले हुसैन था जिसके हाथों में हुसैन रज़ि अल्लाहु अन्हु का सर था। और यह रज्ज़ पढ़ता हुआ जा रहा था।

मेरी रुकाब को चांदी या सोने से भर दे, मैंने बड़े मोहतरम सैय्यद व सरदार को मार डाला, जो बाप और मां के लिहाज से तमाम खलाइक से बेहतर था।

उसके बाद दस सवारों का जत्था पहुंचा जिसके आगे-आगे इस्हाक बिन यज़ीद हूया था यह लोग अपने परचम बुलन्द किए हुए थे ताकि लोग उन्हें पहचान लें और इने ज़्याद उनकी अहमीयत करे। यह लोग यह रज्ज़ पढ़ते हुए जा रहे थे।

हमने पीठ और सीना घोड़ों की टापों से रौंद डाला ऐसे घोड़ों से जिनकी टापें सख्त पड़ती थीं।

यह वही लोग थे जिन्होंने इमाम हुसैन का सीना और पुश्त इने ज़्याद और उमर बिन सअद के हुक्म पर रौंद डाला था। इस मन्ज़र को देख कर लोगों में दहशत की लहर दौड़ गई थी। फौजियों से गली कूचे भरे हुए थे। आदमियों की कसरत से तिल रखने की जगह कूफा में न थी। यह सारी भीड़ कैदियों के काफिले और कारवाने हुसैनी की आमद की मुन्तज़िर थी जो कूफा के करीब आकर इस इंतिज़ार में ठहराया गया था कि तमाशाइयों का पूरा मज्मा इकट्ठा हो जाए।

जब अहले हरम का काफिला करीब आया सारा मज्मा इस्तिक्बाल के लिए आगे बढ़ा। इने ज़्याद के सिपाही दीवार बने हुए थे कि कोई शख्स काफिले के करीब न पहुंच सके। यह वह नाजुक वक्त था कि बड़े से बड़े बहादुर अपने आपको न संभाल सकते थे मगर सैय्यदा ज़ैनब ने

अहले कूफा को बता दिया कि इमाम हुसैन किस मक्सद को लेकर उठे थे और क्यों यज़ीद की बैअत से इंकार किया था।

जब यह लुटा हुआ काफिला कूफा के करीब पहुंचा तो काफिले को शहर के बाहर रोक दिया गया। शहर के अन्दर सजावट होने लगी पूरे शहरे कूफा को सजा दिया गया और गली कूचों में ऐलान होने लगा कि बागियों को (मआजल्लाह) मार डाला गया और उनके सरों को काट कर नेज़ों पर बुलन्द कर दिया गया। और उनके बच्चों और औरतों को कैदी बना कर लाया गया है। लोग जूक दर जूक जमा होने लगे।

यह लुटा हुआ काफिला शहर कूफा में दाखिल किया गया। कहीं-कहीं यह भी ऐलान हो रहा था कि बनी फातिमा की औलाद का तमाशा देखने के लिए निकल पड़ो। कुछ कूफ़ी इकट्ठा हो कर तमाशा देखने लगे और बच्चों को रोटी और खुरमा देने लगे। हज़रत सैय्यदा जैनब ने उन्हें डांटा और फरमाया कि ऐ बेशरमो! अपनी-अपनी निगाहें नीची कर लो और हमारे बच्चों को सदका न दो कि आले मुहम्मद पर सदका हराम है। हज़रत सैय्यदा जैनब बच्चों के हाथों से सदक़ात छीन कर फेंक देती थीं। कहीं-कहीं कुछ कूफ़ी पत्थर भी फेंकते थे। बाख़ुदा जो मुसीबतें अहले बैत पर पड़ीं अगर वह पहाड़ों पर पड़तीं तो वह रेज़ह-रेज़ह हो जाता। समुन्द्रों पर पड़तीं तो वह खुश्क हो जाते मगर अहले बैत ने बड़े सब्र व इस्तिक्लाल से बर्दाश्त फरमाया, कभी ऐसा कोई कलिमा नहीं निकाला जिससे खुदा की बारगाह में शिकायत या नाशुक्री हो।

याद रहे यह वही शहर कूफा है जहां अभी चन्द ही दिन पहले हज़रत अली शेरे ख़ुदा रज़ि अल्लाहु अन्हु खलीफा थे।

मकामे गौर है कि जिस दरबार का अभी-अभी बाप खलीफा था और यही बेटियां शहज़ादियां थीं आज उसी दरबार में शहजादियां

बहैसियत मुज्रिम हैं। हाथ व पैर बंधे हुए हैं। ज़रा सन्जीदगी से गौर करो कि उनके दिल पर क्या गुजरी होगी, काफिला चलता रहा तमाशाई तमाशा देखते रहे।

मज्मा इतना ज़्यादा हो गया कि कूफा के गली कूचों में तिल रखने की जगह बाकी न रह गई थी। इतने में हज़रत सकीना को प्यास से न रहा गया, उसी मकान की छत पर बैठी हुई एक औरत से पानी मांगा औरत ने पानी तो भेजवा दिया लेकिन उस औरत ने कहा कि मेरी भी कुछ हाजत है, पानी पी कर मेरी हाजत पूरी कर देना। इतना सुनना था कि हज़रत सय्यदा ज़ैनब रज़ि अल्लाहु अन्हा ने फरमाया कि बेटी पानी बाद में पीना पहले उस औरत की हाजत पूरी कर दो, पूछो क्या चाहती है। उस छत पे बैठी हुई औरत ने कहा : बेटी अल्लाह से दुआ कर दे कि मेरे बच्चे तेरी तरह यतीम न हों और हमें मेरे आका हुसैन और शहज़ादी जैनब (रज़ि अल्लाहु अन्हुम) की ज़्यारत नसीब हो। इतना सुनना था सैय्यदा ज़ैनब तड़प गईं और चेहरे से बालों को हटाया और फरमाया कि ऐ औरत जिस शहज़ादी के लिए तुमने कहा है वह जैनब मैं हूं और वह आगे वाले नेज़ह पर मेरे भाई इमाम हुसैन का सर है। यह सुनना था कि उस औरत ने एक चीख़ मारी और बेहोश हो कर गिर पड़ी।

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