इमामत और उम्मत

इमामत और उम्मत

रब ए कायनात ने सारी कायनात के लिए रसूल बनाकर हुजूर ए पाक को भेजा और वो ही अशरफुल अंबिया खातिमुल नबी थे उनके बाद कोई नबी नही आने वाला था तो वो पूरी उम्मत को राह दिखाने के लिए खुद के बाद किसी एक को मुंतखीब करते तो उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपना नायब बनाया और पूरी उम्मत को ये हुक्म दिया की मैं जिसका मौला हु अली उसका मौला है यही से इमामत शुरू ऐलानिया हो जाती है।
खिलाफत ए बरहक हम सभी सुन्नी तस्लीम करते है की हज़रत अबू बक्र सद्दीक हज़रत उमर फारूक हज़रत उस्मान गनी रज़ी खलीफा ए बरहक है ये हमारा ईमान है।
हज़रत अली खलीफा ए बरहक भी है और साथ ही इमामे बरहक भी है।
हज़रत अली ने यही सिलसिला यूं ही जारी रखा और हज़रत इमाम हसन और हज़रत इमाम हुसैन को इमामत मुंतखिल की हज़रत इमाम हुसैन ने ये इमामत हजरत इमाम जैनुल आबेदीन को मुंतखील की और इन्होंने हज़रत इमाम मोहम्मद बाकिर को इमामत अता की और इन्होंने हज़रत इमाम जाफर सादिक को इमामत मुंतखिल की और इन्होंने हज़रत इमाम मुसी ए काजीम को इमामत अता की और इन्होंने हज़रत इमाम अली रजा को इमाम बनाया और इन्होंने हज़रत इमाम तकी को इमामत अता की इन्होंने हज़रत इमाम नकी को और इन्होंने इमामत हजरत इमाम हसन असकरी को और इन्होंने हज़रत इमाम मेहंदी अलैहिस्सलाम को मुंतखिब किया जो पैदा हो चुके है लेकिन रूह पोश है बाद में वक्त आने पर जाहिर होंगे जो हदीस से साबित है।
चारो फिकाह के इमाम हजरत इमाम अबू हनीफा हजरत इमाम मालिक हज़रत इमाम शाफई हजरत इमाम अहमद बिन हंबल इन सब इमामों ने इन बारह इमामों को माना है हालांकि कुछ इमाम इन फीकाह के इमामों के बाद पैदा हुवे है।
हज़रत इमाम अबू हनीफा रह ने हज़रत इमाम जाफर सादिक रज़ी को अपना पीर माना और उनका कोल मशहूर है की नोमान हलाक हो जाता अगर ढाई साल हज़रत इमाम जाफर सादिक की सोहबत में नही रहता तो।
किसी ने इमाम अबू हनीफा से पूछा की आपकी उम्र कितनी है तो उन्होंने फरमाया कि ढाई साल ये वो ही ढाई साल है जो मैंने उनकी खिदमत में गुजारे।
एक मर्तबा वक्त के खलीफा बादशाह ने उनको पूरी हुकूमत के लिए इमामत के ओहदे पर मुंतखिब करने की पेशकश की लेकिन इमाम अबू हनीफा ने ये पेशकश ठुकरा दी तो बादशाह ने उन पर सख्ती की लेकिन आपने पेशकश कुबूल नही की तब उनके खास शागिर्द हज़रत यूसुफ़ ने उनसे अर्ज की के आप इमामत का ओहदा क्यों नही कुबूल करते आप इसके काबिल है तो हज़रत इमाम अबू हनीफा ने फरमाया की इस वक्त वक्त के इमाम हजरत इमाम जाफर सादिक है अल्लाह के रसूल और इमामेन के जरिये इमामत उन तक पहुंची है मैं इमामत का ओहदा लेना उनकी शान मे बेअदबी समझता हू लिहाज़ा मैं कतई ही नही लूंगा उनकी इस अकीदत और अदब की वजह से अल्लाह ने उनको पूरी दुनिया में इमाम अबू हनीफा मशहूर कर दिया।
मुसलमानो ने इन बारह इमामों को शियाओ का इमाम समझ लिया जबकि ये असल में सुन्नियों के इमाम है।
जितने भी सुन्नियों में मसलक है उन सब के मौलवी हजरात ने अपने अपने मसलक के बानीयो को इतना ज्यादा हाईलाइट किया की उम्मत के लोग बारह इमामों को एक तरह से भूल से गए जिसका नतीजा है की हम असल इस्लाम से दूर हो गए।
बारह इमाम की मुहोब्बत ऐन इस्लाम है।
जब तक उम्मते मुस्लिमा इन बारह इमामों से अकीदत मुहोब्बत रखती थी तब तक मुसलमान सुर्ख रू था आज हम इन मुकद्दस हस्तियों को भूल गए तो हम अपना हश्र खुद देख रहे है।
अफसोस होता है जब मुसलमान ये पूछता है की ये अहलेबैत कौन है कोई बच्चा पूछे तो समझ में आ जाता है लेकिन हाजी नमाजी उमर रसीदा मुसलमान जब ये पूछता है की मैं तो नही जानता की ये अहलेबैत कौन है ये गलती उस मुसलमान की नही जो नही जानता है बल्कि उन मसलको के मौलवी साहब की है जो अपने मसलक को तो इस्लाम की आड़ में मजबूत करने में लगे है लेकिन असल इस्लाम कमजोर कर रहे है।
अल्लाह हम सबको अहलेबैत खलीफा ए राशेदीन सहाबा किराम बारह इमाम और औलिया अल्लाह इन सबकी मुहोब्बत अकीदत और अदब ताजीम करने की तौफिक नसीब करे।
आमीन।

इमामत एक अल्लाह की अता करदा वो पावर है जो पूरी कायनात में सबसे बड़ा सबसे ताकतवर बाइख्तियार शख्स होता है जो वारिस ए नबी सरापा नूर होता है जो जाहिर में इंसान होता है लेकिन उसकी शान नूर है सिर्फ नूर, पूरी उम्मत वक्त के इमाम के ताबेह होती है। बाकी आप जितनी इनसे अकीदत मुहोब्बत रखोगे उतनी आपके समझ में आती जायेगी।

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