ताजियादारीऔरफैजाने इमाम हुसैन अलैहिसलाम

ताजियादारीऔरफैजाने इमाम हुसैन अलैहिसलाम

दीदार कर ला रश्के अकीदत है ताजिया बाकी रहा यजीद न उसकी मजीदियत फर्ज वफा निभाते रहेंगे तमाम उम्र हम सुन्नियों के वास्ते रहमत है ताजिया जिन्दा इमामे हक हैं सलामत है ताजिया गुल अशरफी रजाएं मुहब्बत है ताजिया

सुन्नी उलमा-ए-किराम और औलिया-ए-ऐज़ाम ताज़ियादारी की हिमायत में से है औरएक आलम बहुत सी वजहाँ से मुस्तफीज़ होता है और इससे दीनीफाएदे हासिल होते हैं ।(तफसीरतुल ईमान दीने मुहम्मदी औरताजियादारी)

आला हज़रत अज़ीमुल बरकत सैयद ख्वाजा मुईनुद्दीन हसन चिश्ती रदि अल्लाहो तआला अन्हु : के आस्ताने अजमेर शरीफ में 1 ता 12 मुहर्रम अपने कदीम रिवायती शान से ताजियादारी मनाई जाती है । मुल्कके हरगोशे से लाखों जायरीन अकीदतमंदान तकरीबात में शरीक होते हैं, 7 मुहर्रम छतरी गेट अंजुमन मुईनिया चिश्तिया खुहामे गरीब नवाज़ की जानिब से फातिहा ख्वानी सैयदना इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत, सानहे कर्बला परमनाकंबतो मर्सिया ख्वानी और बैरूनी उल्माए किराम की फल्सफऐ शहदात पर तकरीरों के अलावा बाजे व नक्कारेवदीगरप्राग्रम अंजाम पाते हैं, 8 मुहर्रम को जुलूस की शक्ल में ताजिया निज़ाम गेट पररखी जाती है, 9 मुहर्रम रात में खुद्दामे गरीब नवाज़ की जमाअत बड़े ही अदब व एहतेराम के साथ कांथे परउठाये हुए हजारों हजारकी तादाद में जुलूस में शरीक होते हैं, 10 मुहर्रम आशूरा के दिन हल्वे व शरबत व दीगरतबरूंकात तकसीम किए जाते हैं। रात में ताजिये को दरगाह के सोलह खंबे के करीब झालरे के पानी में ठंडा किया जाता है । ( अखबार इत्तेहाद, यकुम जुलाई 1992, सलीम चिश्ती अजमेरी ) 5 मुहर्रम शरीफ को हुजूर बाबा फरीद गंजे शकर रदि अल्लाहो तआला अन्ह के उर्स मुबारक के मौके पर हुजूर बाबा साहब का चिल्ला खाना खुलता है। सैयदना सुल्तानुल हिन्द गरीब नवाज़ मुईनुल मिल्लत अजमेरी की दरगाह शरीफ के लंगर खाने में चाँदी का ताजिया शरीफ रखा हुआ है जाएरीन हर जुमेरात को अम्र से इशा तक उसकी ज़्यारत से फैज़याब होते हैं । ( दीने मुहम्मदी और ताजियादारी)(ताजिया शरीफका शरई हुक्म सफा 302)

किछौछा शरीफ में मुहर्रमदारी-सादाते किछौछा शरीफ के मुहर्रम मनाने का अपना ही तरीका है। यहाँ जुलूस और दीगर राइज तरीकों के अलावा खुसूसी दुआ और सलात का एहतमाम किया जाता है। यकुम मुहर्रम से 10 वीं मोहर्रम तक मजलिसों का दौर जारी रहता है । यहाँ मुहर्रम के मौके पर दो खुसूसी जुलूस उठते हैं । सातवीं मुहर्रम को चौकी उठती है । जिसे में आम में मेहंदी का जुलूस कहा जाता है, 9 मुहर्रम की शाम को दरगाह आला हज़रत अजीमुल बरकत मख्दूमे आज़म औहदुहीन सैयद अशरफ जहांगीरसिमनानी रदि अल्लाहो तआला अन्हु किछौछा शरीफ से ताज़िये शरीफ का जुलूस बरामद होता है। इसको हुजूरी ताजिया का जुलस कहते हैं । इस ताजिये की खास बात ये है कि इस पर आला हज़रत अजीमुल बस्कत मख्दूमे आज़म औहदुद्दीन सैयद अशरफ जहांगीर सिमनानी रदि अल्लाहो तआला अन्हु की चाद डाल दी जाती है । जुलूस रात भर गश्त करता है और मनकबत ख्वानी होती है। सुबह के वक्त कोतवाली चौक पहुंचकर किछौछा शरीफ में रख दिया जाता है। जहाँ अलविदा पढ़ी जाती है। आखिर में ताजिया को आला हज़रत अजीमुल बरकत मख्दूम आजम औहदुद्दीन सैयद अशरफ जहांगीरसिमनानी रदि अल्लाहो तआला अन्हु की दरगाह शरीफ की नीर शरीफ में ठंडा कर दिया जाता है और चादरवापिस तबरूंकात की जगह रख दी जाती है। आला हज़रत

अजीमुल बस्कत हुजूर अशरफी मियां रदि अल्लाहो तआला अन्हुभी बड़े अदब व एहतेराम के साथ ताजिया शरीफकी ज्यास्तफरमाते थे। किछौछा शरीफ में एक ऐसी तस्वीह है जिसके मुताअल्लिक रिवायत है कि इसमें उस जगह की मिट्टी भी शामिल है जहाँ इमामे आली मुकाम को शहीद किया गया था । इस तस्बीह की खुसूसियत ये है कि यौमे आशूरा को उसके चंद दाने अपना रंग बदलना शुरू कर देते हैं । जो रफ्ता रफ्ता इतने सुर्ख हो जाते हैं कि लगता के खून बस टपकने ही वाला है। (अखबारउर्दू टाइम्स 14 मार्च 2002, इश्तहारराहत शाहवारसीकश्मीरी)।

मौलाना मोहम्मद नईमुद्दीन अशरफी मुरादाबादी-(मुफस्सिरेकुरआन कंजुल ईमान ) की ताजियादारी, इल्म आगही, के आफताब सैयदना हुजूर सदरूल अफाजिल सैयद मोहम्मद नईमुद्दीन अशरफी मुरादाबादी रदि अल्लाहो तआला अन्हु, ताज़िया बनाने में पाबंदी से चंदा दिया करते थे । और आप ही के मुरीदीनों मोअतकेदीनो मुतवस्सेलीनो अहले मुहल्ला आपके माली तआवुन से ताज़िया बनाते थे ।( अख्खारनिदाए अहले सुन्नत वीकली, 21 फरवरी 2003 औरताजिया शरीफका शरई हुक्म, सफा नं. 40) हज़रत सज्जादानशीन मौलाना सैयद इज़हारुद्दीन उर्फ हनफी मियां का इकरार-आप हनफी मियाँ ने फरमाया, मेरे वालिदे माजिद ( मौलाना नईमुद्दीन अशरफी मुरादाबादी) हमेशा ताजिया बनाने में चंदा देते थे और आपने पूरी ज़िन्दगी में कभी ताज़िया की मुखालफत न की । (अख्वार निदाए अहले सुन्नत वीकली, 21 फरवरी 2003 और ताजिया शरीफका शरई हुक्म, सफा नं. 41 ) हज़स्त शाह अब्दुल अजीज़ देहलवी रदि अल्लाहो तआला अन्हुका मामूल लिखा हुआ है कि वो ताजिये को कंधा लगाते थे ।( असरारूल्लाह विश्शहादतैन, सफा नं. 9) हज़रत अब्दुर्रज्जाक साहब बांसवी का तरीका था कि जिस वक्त ताजिया उठता था तो आप नंगे पैरवहाँ तशरीफ ले जाते थे ।(करामाते रज्जाकिया सफा नं. 65) हज़रत अल्लामा मौलाना सलामतुल्लाह साहब देहलवी शागिर्दै रशीद हजरत शाह अब्दुल अजीज़ मुहद्दिस देहलवीफरमाते हैं कि खुदा का शुक है कि ताजियादारी आसारेइस्लाम में

आला हज़रत अज़ीमुल बरकत शाहनवाज़ बेनयाज़रदि अल्लाहो तआला अन्हु बरेलीशरीफ सरकारशाहनियाज़ बेनियाज़ रदि अल्लाहो तआला अन्हुबरेलवी से लोगों ने दरियाफ्त किया कि हुजूरताजियादारी क्या है ? सरकारशाहनियाज़ बेनियाज़ रदि अल्लाहो तआला अन्हुबरेलवी ने फरमायाके अगरतुम लोगा ताजिया शरीफबनाते हो तो मैं मना नहीं करूंगा बल्कि मुझसे जहाँ तक होगा ताजिया शरीफका अदब करूंगा और दिल से एहतेराम करूगा और आप पाबंदी से उसकी ज़ियारत करते थे । एक बारकिसी मौलवी साहब ने हुजूर शाह नियाज़ बेनियाज़ रदि अल्लाहो तआला अन्हुकं इस मामूल पर ऐतराज़ किया।आपको जलाल आ गया चुनांचे आपने उसकी गर्दन पकड़कर एक ताजिये की तरफ इशारा करते हुए एक खास जज़्ये के साथफरमाया मौलवी देख क्या नज़र आता है। मौलवी साहब देखते ही बेहोश होकर गिर पड़े, देरतक इसी हालत में रहे, होश आने पर रिक्क़त तारी हो गई। जब हालत दुरूस्त हुई तो लोगों के दरयाफ्त करने पर बतायाके मुझं हसनैनकरीमैन की ज़ियास्त हुई जिससे मुझ परबेहोशी तारी हो गई थी । मैं बयान नहीं कर सकता मैंने क्या नज़ारा देखा

। उसके बाद उन्होंने अपने फासिद ख्याल से तौबा करलिया (किताब रियाजुलफज़ाइल सफा नं. 229.230 )करामाते निजामिया में लिखा है कि हज़रत शाहनियाज़ बेनियाज़ 10 मुहर्रम की रात को पांच सात ताजियों की जियारत के लिए तशरीफले जाते थे। आखिर उम्र में एक बारकमज़ोरी का गल्बा था, चलने की ताकत नहीं थी हज़रत मुस्तग़स्क बैठे हुए थे सूरते नूरानी हज़रत बीबी सैयदा फातमा ज़हरा अलैहिस्सलाम ज़ाहिर हुई। औरफरमाया मियां आज हमारे बच्चों की जियारत को न उठोगे हज़रत शाह नियाज़ बेनियाज़ पर रिक्कत तारी हो गई और खुद्दामको हुक्म दिया के हमको ले चलो।अर्ज कियाके चारपाई परया पालकी परले चलें, फरमाया नहीं पैदल ले चलो , चुनांचे खुद्दाम ने दोनों तरफ बगलों संकंधा दिया औरहजस्त ने पांच ताजियों की जियारत की ।आखिरी उम्र तक आपका यही मामूल था।

आला हज़रत अज़ीमुल बरकत सैयद बारिस पाक रदि अल्लाहो तआला अन्हु देवा शरीफ की ताजियादारी- और इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि आला हज़रत अज़ीमुल बरकत सैयद वारिस पाक रदि अल्लाहो तआला अन्हु देवा शरीफ खुद अपने हाथों से ताज़िया बनाते थे, साथ – साथ ताजियों के जुलूस में भी शिस्कतफरमाते थे औरताज़िये शरीफको काँधा लगाते थे और बड़ी अकीदत के साथ ताजिये का अदब और एहतराम करते थे। ताजियों को देखते वक्त आपके चेहरए अनवरकी अजीब हालत मुशाहिदे में आती थी और देरतक आप आलमे सुकूत में रहते थे । एक बार एक साहब ने आपसे अर्ज़ किया कि सस्कारकुछ लोग ताजियों को बिदअत कहते हैं तो सरकारवारिस पाक ने जलाल में फरमाया ये सब झगड़े हैं, लोगफातिहा, दुरूद, लंगर, खैरात बंद कराना चाहते हैं जो कयामत तक बंद नहीं होगा ।(मिश्कातुल हक्कानिया स. नं. 214)(सवानेहवारिस सफा नं. 44) आला हज़रत अज़ीमुल बरकत सरताजुल औलिया सैयद शाह ताजुद्दीन बाबा रदि अल्लाहो तआला अन्हु भी ताजिया शरीफ की जियारत के लिये जाया करते थे।

आला हज़रत अज़ीमुल बरकत हाफिज़ सैयद बहादुर अली शाह चिश्ती सुलेमानी दादा मियाँ रदि अल्लाहो तआला अन्हु (जबलपुर शरीफ) अपनी खानकाह में ताज़िया बनवाते थे और वहीं उसकी जियारत करते थे। हजरत सैयद महमूदुल हसन चिश्ती रदि अल्लाहो तआला अन्हु ( जोबट शरीफ वाले बाबा ) भी ताजिया शरीफका अदब व एहतेगम के साथ जियारत करते थे और उसके सामने फातिहा देते थे । आपके खानवादे के अफराद मस्जिदे सुलेमानी से मुत्तसिल खानकाह में आज भी ताजियादारी के निज़ाम को कायम रखे हुए हैं।

आला हज़रत अज़ीमुल बरकत आगा मोहम्मद शाह नियाज़ी रदि अल्लाहो तआला अन्हु ( जबलपुर शरीफ) 7 मुहर्रम को अलम की जियारत को ज़रूरतशरीफ ले जातेफातिहा ख्वानीफरमाते, 9 मुहर्रम की शबको चंद ताजियों की जियारतफरमाते उसके सामने फातिहा पढ़ते औरशब बेदारी करते । 10 वीं मुहर्रम को कर्बला शरीफ( रानीताल ) ज़रूर तशरीफ ले जाते औरफातिहा ख्वानी करते । आपकी ताजिबादारी से मुहब्बत का सुबूत ये है कि जिस जगह आज आपका मज़ारेपाक है उसके मुताअल्लिक आपनेफरमाया के इसी रास्ते से ताजिया शरीफ भी जाते हैं औरसामने मकामी कर्बला है जिसकी जियारत यहां से बे तकल्लुफ होती है मुझे ये ज़मीन बहुत पसंद है ।( तजकिरा हज़रत शाहआगा मोहम्मद सफा नं. 73, 95) इसी तरह आपके फर्ज़न्द व सज्जादानशीन हज़रत डॉ. शाह मुर्तुजा हुसैन रदि अल्लाहो तआला अन्हु मुहर्रम को शहरकी 3 ताजियों की जियारत को तशरीफले जाते थे । एक अकबरखान उर्फ अक्कू मियां का ताजिया, दूसरा चिराग अली शाह की मस्जिद का तीसरा मुशी फकीर मोहम्मद मरहूम का ताजिया मस्जिद कोतवाली का होता । आप ताजिये के तख्त को बा देते औरफातिहा पढ़ते औररिक्कत का अजीब आलम आप परतारी होता ( रियाजुलफज़ाइल, सफा नं. 229)

हज़रत मौलाना सूफी मोहम्मद इफ्तिखारुल हक सिद्दीकी कादरी चिश्ती रदि अल्लाहो तआला अन्हु का फरमान है कि निस्बते इमामे हुसैन से ताजिया जाइज है और अहले तरीक़त के लिए ताजिया शरीफ पंजतन पाक से अकीदतो मुहब्बत का मज़हर है ।(किता जवाजुत्ताज़िया 1916 कलकत्ता) सिर्फ आज ही नहीं बल्कि पहले ज़माने में भी खानकाहों से ताअल्लुक रखने वाले सूफियाए किराम, औलिया, बुजुर्गाने दीन और मुहिब्बाने अहले बैत ताजियादारी को जाईज़, दुरूस्त और बाइसे हुसूले फैज़ानो बरकात मानते जानते रहे हैं इसलिये आज भी अजमेरी शरीफ, बहराइच शरीफ, देहली शरीफ, कलियर शरीफ, किछौछा शरीफ, बदायूँ शरीफ, मकनपुरशरीफ, बरेली शरीफ, देवा शरीफ, जबलपुरशरीफ, जो कि रूहानियत के मराकिज़ हैं । मुख्तसरये के हिन्दूस्तान पाकिस्तान में ताजियादारी की रस्म बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। रसूल और आले रसूल और बुजुर्गों से मुहब्बत रखने वालों के लिए मुहर्रमदारी औरताजियादारी औरगम हुसैन मनाने के लिये इतना सुबूतकाफी है।वमा तौफीकी इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यिल अजीम ।

वो किछौछा हो कि अजमेर हो या देवा शरीफ बा आदब ताज़ियादारी को मनाऐं सुन्नी

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