सिददीक ए अकबर अली इब्न अबू तालिब अलैहिस्सलाम हैं

सिददीक ए अकबर
अली इब्न अबू तालिब
अलैहिस्सलाम अ.स.
हैं कोई और ना

तिबरानी और दैलमी ने रसूल अल्लाह स.अ.व.
के जाँ निसार सहाबी हज़रत सलमान फारसी और हजरत अबूज़र गफ़्फ़ारी र.अ. से रिवायत की है के
हजरत रसूलअल्लाह स.अ.व. ने
हज़रत अली इब्न अबू तालिब अ.स. का हाथ पकड़ कर फ़रमाया ये वो है जो सबसे पहले मुझ पर ईमान लाने का एलान किया है
और इस उम्मत मे
हक व बातिल के दरमियान फ़र्क करने वाला है
और मोमनों का अमीर, सरदार है
और ये वो है जो
क्यामत के रोज़ सब से पहले मुझ से मुलाकात करेगा और ये
” सिददीक ए अकबर ” है
तफ़सीर इब्न अलहाज मे इब्न अब्बास र.अ. से रिवायत है के
हजरत रसूलअल्लाह स.अ.व. ने
हज़रत अली इब्न अबू तालिब अ.स.से फ़रमाया के तू सबसे पहले मुझ पर ईमान लाया है और तू “सिददीक अकबर”है
अल मुहिब अलबतरी ,रियाज़ुल नज़रह मे जनाब मआदा अदोयह र.अ. से रिवायत है कहते हैं के मैने बसरा के मिम्बर पर
मौला अली इब्न अबू तालिब अ.स. को फ़रमाते सुना है के मैं
” सिददीक ए अकबर” हूँ
हाकिम ने मुसतदरक मे
निसाई ने ख़सायस मे
और अहमद ने मनाकिब मे नेज़ हाफ़िज़ अबू ज़ैद और आसिम और हाफ़िज़ अबू नईम ने अपनी अपनी किताबों मे अबाद बिन अब्दुल्लाह से रिवायत की है के
हज़रत अली इब्न अबू तालिब अ.स.ने फ़रमाया के मै खुदा का बंदा और खुदा के
रसूल स.अ.व.का भाई हूँ औरमैं
“सिददीक ए अकबर” हूँ
सिवा ए मेरे जो अपने को
–-–———————— “सिददीक ए अकबर “
–————————–
कहे झूठा मुफ़तरी
(दगाबाज़ फ़रेबी) है
–———————–
अल्लामा सियूती कहते हैं के इब्न असाकर ने मुसतनद रिवायत की है के मोहम्मद बिन सअद ने अपने वालिद सअद र.अ.से पूछा के क्या अबू बकर तुम से पहले ईमान लाए थे
उन्होने कहा के नहीं बलके उनसे पहले पाँच से ज़्यादा आदमी ईमान ला चुके थे
इब्न कसीर ने कहा के सबसे पहले ईमान लाने वालों मे अहले बैत अ.स. हैं दुनीया मे
यानी मौला अली अ.स.
सैयदा बीबी ख़दीज़ा स.म.अ.
और हुज़ूर स.अ.व.के गुलाम जैद इब्न अरकम र.अ.और इनकी बीवी उम्मे ऐमन र.अ. के और वरक़ह र.अ.
तिबरी ने मोहम्मद इब्न सअद र.अ. से भी इस रिवायत को दर्ज किया है
रियाज़ुलनज़रह. जिल्द 2 सफ़ा 157 ,
इस्तियाब जिल्द 2 सफ़ा 470 , तिबक़ात इब्न सअद जिल्द 3 सफ़ा 251 , असदुल ग़ायह जिल्द 14 सफ़ा 16 पर हजरत सलमान फारसी र.अ.
हजरत अबू ज़र गफ़्फ़ारी र.अ.
हजरत मिक़दाद र.अ. हज़रत अम्मार बिन यासर र.अ.
हजरत जाबिर बिन अब्दुल्ला र.अ.
हजरत हुज़ैफ़ा यमानी र.अ.
हजरत अबू सईद ख़ज़री र.अ. और
हजरत जैद इब्न अरक़म र.अ. से रिवायत की है के दुनीया मे
हज़रत मौला अली इब्न अबू तालिब अ.स. वो हैं जिन्होने सबसे पहले अपने ईमान का ऐलान किया और दावत ए ज़ुल अशीरा जो रसूल अल्लाह स.अ.व. के हुक्म से जनाब अबू तालिब अ.स. ने अपने घर मे तीन रोज दावत की उसमे
मौला अली इब्न अबू तालिब अ.स.ने
अशहदो ला इलाहा
इल्ला अल्लाह व
अशहदो अन्ना मोहम्मदुन रसूल अल्लाह का ऐलान किया के
मै गवाही देता हूँ के अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नही और मोहम्मदुन अल्लाह के रसूल स.अ.व. हैं
सनन इब्न माज़ा सफ़ा 12 रियाज़ुल नज़रह जिल्द 2 सफ़ा 158 और असदुलगायह जिल्द 4 सफ़ा 71व अज़ालतुल ख़फा मकसद 2 सफा 252 पर
हजरत मौला अली इब्न अबू तालिब अ.स.का ये इरशाद दर्ज है के
मैने दूसरो से सात बरस पहले रसूल अल्लाह स.अ.व. के साथ अल्लाह की इबादत की है यानी नमाज.पढ़ी
ख़साइस नेसाई सफ़ा 3 , मसनद इमाम हंबल जिल्द 2 सफा़209 ,
रियाज़ुल नज़रह जिल्द 2 सफा़ 158 ,
असादुल गायह जिल्द 1 सफ़ा 24 मे इब्न अफ़ीफ़ कंदी से रिवायत है के उसने मिना में एक डेरे से एक मर्द एक औरत और एक लड़के को निकलकर सूरज़ ढलने के बाद नमाज़ पढ़ते देखा इसने अब्बास इब्न अब्दुल मुत्तलिब अ.स.से दरयाफ़्त किया के ये कौन है उन्होने जवाब दिया यह मेरा भतीजा मोहम्मद स.अ.व. और उसकी बीवी ख़दीज़ा स.म.अ. और मोहम्मद का इब्न अम
अली अ.स. है और अब्बास इब्न अब्दुल मुत्तलिब अ.स.ने कहा के मोहम्मद स.अ.व.कहते हैं के वो अल्लाह के रसूल स.अ.व.हैं
मगर बजुज़ उनकी बीवी और उनके इब्न.अम के कोई उन पर ईमान नही लाया है
रियाज़ुलनज़रह जिल्द 2 सफ़ा158
,मुनतखिब ,
कंज़ुलआमाल सफ़ा 30 पर हजरत रसूलअल्लाह स.अ.व. का यह इरशाद दर्ज है के
” सिददीक” सिर्फ़ 3 हैं एक यूशअ बिन नून अ.स.जिन्होने
हजरत मूसा अ.स. की तसदीक की दूसरे
सहाबे यासीनअ.स.
जिन्होने हजरत ईसा अ.स. की तसदीक की और तीसरे अली इब्न अबू तालिब अ.स. जिसने मेरी तसदीक की
रियाज़ुल नज़रह जिल्द 2 सफा़ 154 ,158 व जामअ सग़ीर सफ़ा 42 ,व मुनतखि़ब कंजुल आमाल सफ़ा 30 पर और नेज़ वसीलतुल मुताबेदीन और मसनद अहमद बिन हंबल मे अबुल लैला गफ़्फारी र.अ.से रिवायत है के हजरत रसूल अल्लाह स.अ.व. ने फ़माया “सादिक” 3 हैं एक हबीब नज्जार जिस का कौल कुरआन ने नकल किया है के ,
ऐ लोगो अल्लाह के रसूलों की पैरवी करो दूसरे हज़क़ील जो आले फ़िरऔन मे से मोमिन थे जिसने कहा था के क्या तुम उस शख्स को इस बात पर मार डालते हो के वो कहता है के उसका बचाने वाला
रब्बुल आलमीन है
तीसरे
अली इब्न अबू तालिब अ.स. जो इन तमाम से अफ़ज़ल है
ये मुसललमा (मानी हुई तसलीम शुदा ) है
के सबसे पहले रसूल अल्लाह स.अ.व.की रिसालत की तसदीक करने वाले हजरत अली इब्न अबू तालिब अ.स. हैं
अल्लाह तआला ने अपने कलाम पाक मे कई मकामात पर इसका ज़िक्र फ़रमाया है के रसूल अल्लाह स.अ.व.के गवाह हजरत अली अ.स.बनाए गए हैं
इस सिलसिले मे यह नुक़ता बड़ी संजीदगी से गौर करने के काबिल है के किसी अम्र के मान लेने और किसी अम्र की तसदीक करने मे बहुत बड़ा बलके ज़मीन व आसमान का फर्क़ है कोई बात अच्छी मालूम हो और अपनी अक़्ल मे आ जाए और उसको कु़बूल कर लिया जाए तो ये महज़ मान लेना या उसका ऐतेराफ़ कर लेना हूआ ।
किसी अम्र की तसदीक करने के लिए वसाइल तसदीक और वो मालूमात जिनकी बिना पर तसदीक की जा सकती है और मनसब ए तसदीक हासिल होना ज़रूरी है
जो तसदीक कुनंदा हो
वो जानता हो के किस चीज़ की वो तसदीक कर रहा है । वो दर हकीकत है क्या । जब तक कोई शख़्स किसी अम्र के हसन व क़बीह ( अच्छा,सही,गलत)से वाकिफ़ ना हो
उसके मुताल्लिक ना तो कोई राए दे सकता है और ना तसदीक करने के मौकिफ़ मे हो सकता है । अल्लाह तआला ने हर बात के लिए गवाही का लज़ूम( ज़रूरी) रखा है यहाँ तक के हर शख़्स का आमाल नामा लिखते दो फ़रिश्ते करामन कातबीन मुक़र्रर फ़रमाऐ हैं ।
जन्नत व दोज़ख़ का फैसला भी आमाल के मुताल्लिक गवाही पर होगा ।
आइम्मा ए ताहेरीन अ.स.की इमामत का गवाह
हजरत रसूल अल्लाह स.अ.व.को बनाया और अपने रसूलों की रिसालत के गवाह भी उसने मुक़र्रर फ़रमाऐ हैं ।
रसूलअ.स.के
सच्चे रसूलअ.स.होने की तसदीक करना हर एक के बस की बात नही है । रिसालत की गवाही वही देगा जिसको रसूल स.अ.व. के रसूल स.अ.व. होने का इल्म हासिल हो।
हज़रत रसूल अल्लाह स.अ.व. के पैगाम को.जो कोई कुबूल करता जाऐ और मुसलमान होता जाए वो रिसालत का गवाह हरग़िज नही कहला सकता ।
वो तो क़ुबूल कुनुंदा पैगाम है.।
वरना हर मुसलमान रिसालत का गवाह कहलाएगा ।
इस अम्र की तसदीक करना के पैगाम सच्चा है उसी का काम है
जिसको पैगाम सच्चा होने का इल्म हो ।
चुनांचे इस अम्र का तसफ़ीया (साफ़ करना) के हजरत रसूलअल्लाह स.अ.व. की रिसालत का गवाह कौन है ।
खुद अल्लाह तआला ने अपने कलाम पाक मे
ब सराहत व ब तकरार फ़रमा दिया है ।
और ये फ़रमाता है के जिसको हम ने इल्म किताब अता कर दिया है और जिसको हमने गवाह बना दिया है और जो हमारे अता करदा इल्म लदुन्नी बिना ए पर देखता है के
रसूल अल्लाह स.अ.व.
पर जो नाज़िल हुआ है वो हक है
बस वही रिसालत का गवाह है
इन इरशादात बारी तआला से रिसालत के मसनूई (झूठे) गवाहों की खुद ब खुद नफ़ी हो जाती है ।
चुनांचे सूरह रअद की आयत 43 है
व याक़ूलो अलज़ीन कफ़रू लसता मुरसलन .कुल कफ़ा बेअल्लाहे शहीदन बैनी व बैनकुम व मन इन्दहू इल्मुल किताब
तर्ज़मा- काफ़िर लोग कहते हैं के तुम हरगिज़ पैगम्बर नहीं (ए रसूल) तुम (इन काफ़िरों ) से कह दो के मेरे और तुम लोगों के दरमियान (मेरी रिसालत की ) गवाही के लिए अल्लाह और वो शख़्स जिस के पास (आसमानी) किताबों का इल्म है ।काफ़ी है
और यह आयत मौला इब्न अबू तालिब अ.स. की शान मे नाज़िल हुई है फरमान ए रसूलअल्लाह स.अ.व. है
अना मदीनतुल इल्म व अली बाबोहा ,
मै इल्मों का शहर हूँ और अली उसका दरवाज़ा हैं
और सूरह हूद की आयत 17 है
अफ़मन काना अला बैयेनतिन मिन रब्बेही व यतलूहो शाहदुन मिन्हो
तर्ज़मा – जो शख़्स अपने परवरदिगार की तरफ़ से रौशन दलील पर हो और उसके पीछे ही उन्ही का एक गवाह हो ।
फरमान ए रसूलअल्लाह स.अ.व. है के
कुरआन अली के साथ है और अली कुरआन के साथ है
सूरह सबा की आयत 6 है
व यरल्लज़ीना ऊतुल इल्मा अल्लज़ी उनज़ेला इलैका मिन रब्बेका होवल हक.
तर्ज़मा- (ए रसूल ) जिन लोगों को हमारी बारगाह से इल्म अता किया गया वो जानते हैं के जो (कुरआन) तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से तुम पर नाज़िल हुआ है वो हक है
फ़रमान ए रसूलअल्लाह स.अ.व. है के
अली नातेके कुरआन है यानी बोलता कुरआन है
बजुज़ उस शख्स के जिसको अल्लाह तआला ने इल्मुल किताब अता फ़रमाया हो और जो इल्म लदुन्नी की बिनाअ पर देख़ता हो के
हजरत रसूल अल्लाह स.अ.व.पर जो नाज़िल हुआ है हक है और जिसको गवाही का मंसब देकर अल्लाह तआला ने तसदीक करने के काबिल बनाकर मुक़र्रर कर दिया हो
किसी और के बस की बात नही के रिसालत की तसदीक़ करने या तसदीक़ का अहल होने का दावा कर सके
ये और बात है के
“पीरान ए नमी पर नद मुरीदान ए मी परानन्द” यहाँ पर यह अम्र भी बतौर ख़ास ज़हन.मे रखने के क़ाबिल है के हजरत मौला अली अ.स. के मुताल्लिक यह कहा जाता है के आप बाद ए बअश्त
रसूल अल्लाह स.अ.व. पर ईमान लाए ।
यह बिल्कुल इसी तरह की बात है जैसा यह कहना के रसूलअल्लाह स.अ.व. को.40 साल की उम्र मे नबूवत अता हुई
हजरत मोहम्मद मुस्तफ़ा स.अ.व. उस वक्त से नबी थे जब
हजरत आदम अ.स. अभी आबो गुल की मंज़िल मे थे और उसी वक़्त से
मौला अली अमीरुल मोमनीन अ.स.थे
हजरत मोहम्मद स.अ.व.और
हजरत अली स.अ.व.का नूर
तख़लीख एआदम अ.स. से चौदह हज़ार क़ब्ल से तसबीह व तसदीस मे मसरूफ़ था
इन ज़वात ए अकदस के लिए जदीद (नए)तौर पर नबूवत अता होने या ईमान लाने का कोई सवाल ही ना था ये अज़ल से मोमिन और पाक व मुतहर दुनीया मे तशरीफ़ लाए ।
यह बात महज़ असबाब ज़ाहिर के वाकेआत को ज़ाहिर करती है और एक इस्तेलाही नोअय्यत रखती है के
हजरत रसूलअल्लाह स.अ.व. 40 साल की.उम्र मे मबऊस बा रिसालत हुऐ या यह के हजरत अली अ.स.ने उस वक़्त ईमान लाए बा असबाब ज़ाहिर जब हजरत रसूलअल्लाह स.अ.व.ने अपनी रिसालत का ऐलान फ़रमाया या उस वक़्त मौला अली अ.स. ने भी आपके रिसालत की तसदीक और अपने ईमान का ऐलान फ़रमाया
अल्लाह तआला ने अपने अज़ली मोमनीन के इस बा असबाब ज़ाहिर ऐलान को अपने इस इरशाद मे बिल्कुल वाज़ह फ़रमाया है
सूरह अलनिसा 136 या अय्योहल लज़ीन आमनू आमेनू बेअल्लाहे व रसूलेहि
तर्ज़मा- ऐ ईमान वालो अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ । यानी ईमान ला चुके हुए लोगों से ईमान की फ़हमाइस बिल्कुल यहि मायने रखती है के ऐ वो लोगो जो इबतिदा ही से मोमिन हो अल्लाह और उसके रसूल पर अपने ईमान का ऐलान कर दो बेशक हज़रत मौला अली अ.स.तो सब मोमिनो के सरदार ,अमीर ही थे और सिर्फ़ “मोमिन” का भी वो गिराँ कद्र लफ़्ज़ है के अल्लाह तआला अपने ऊलुल अज़्म पैगम्बरों की भी “मोमिन”के लफ़्ज़ से तौसीफ़ फ़रमाता है जैसे सूरह सफ़्फ़ात की आयत 122 मे इरशाद है इन्नाहुमा मिन इबादेना अलमोमनीन ० यानी ये दोनो
(मूसा व हारून अ.स.) हमारे मोमिन बंदो मे से थे (किताब कलमतुल हक हिस्सा अव्वल बाब चहारुम)

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