दिल्ली की पहली महफ़िल-ए-समाअ’

ख़्वाजा नसीरुद्दीन चिराग़ दिल्ली के एक मुरीद-ओ-ख़लीफ़ा सय्यद
मोहम्मद जा’फ़र मक्की ने अपनी किताब बह्र-उल-मा’नी में लिखा है कि जब
हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी अपने मुर्शिद ख़्वाजा अजमेरी की इजाज़त
से दिल्ली तशरीफ़ लाये तो वह जुमअ’ का दिन था। दिल्ली की क़दीम
मस्जिद में सय्यद नूरुद्दीन मुबारक ग़ज़नवी और क़ुतुब साहब की मुलाक़ात
हुई। सय्यद नूरुद्दीन मुबारक ग़ज़नवी सुहरवर्दिया सिलसिले की एक शाख़
सुहरवर्दिया-ग़ज़नविया के बानी और शैख़ शहाबुद्दीन उमर सुहरवर्दी के

मुरीद-ओ-ख़लीफ़ा और भांजे तथा सुल्तान इल्तुतमिश के शैख़-उल-इस्लाम थे।
मुलाक़ात पर क़ुतुब साहब ने नुरुद्दीन मुबारक ग़ज़नवी से गुज़ारिश की कि ऐ
मख़्दूमज़ादा –ए-कोनैन! मेरी दिली ख़्वाहिश है कि मैं समाअ’ सुनूँ और आप भी
वहां तशरीफ़ लायें। सय्यद मुबारक ग़ज़नवी ने फ़रमाया- मैं नहीं सुन पाऊंगा। उसी रात उनके ख्व़ाब में नबी (PBUH) की आमद हुई और उन्होंने फ़रमाया– ऐ फ़र्ज़न्द! क़ुतुबुद्दीन समाअ’ सुनेंगे तुम भी शामिल हो जाना। यूँ अगले दिन दिल्ली में पहली बार समाअ’ हुई जिसमें सय्यद मुबारक ग़ज़नवी भी शामिल हुए।
क़ुतुब साहब के मल्फ़ूज़ात ‘फ़वायद-उस-सालिकीन’ में हाज़िरीन-ए-मज्लिस में जहाँ सय्यद मुबारक ग़ज़नवी का नाम मिलता है वहीं दिल्ली के चंद और सुहरवर्दी मशायख़ का नाम भी मौजूद है। इन मजालिस में क़ुतुब साहब के हाँ आयोजित होने वाली महाफ़िल-ए-समाअ’ की इत्तिलाअ’ मिलती है।

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