ज़िक्र तीन तरह का होता है

ज़िक्र तीन तरह का होता है (१) लिसानी (२) कलबी (३) बिलजवारेह। ज़िक्रे लिसानी तस्बीह तकदीस सना वगैरह बयान करना है। खुतबा तौबा इस्तिग्.फार दुआ वगैरह इसमें दाख़िल हैं। ज़िक्रे कलबी अल्लाह तआला की निअ.मतों का याद करना उसकी अज़मत व किब्रियाई और उसके दलाइले कुदरत में गौर करना उलमा का इस्तिम्बाते मसाइल में गौर करना भी इसी में दाखिल है। ज़िक्रे बिलजवारेह, यह है कि आज़ा ताअते इलाही में मशगल हों जैसे हज के लिए सफ़र करना यह ज़िक्र बिलजवारेह में दाखिल है नमाज़ तीनों किस्म के ज़िक्र पर मुश्तमिल है तस्बीह व तकबीर सना व किराअत तो ज़िक्रे लिसानी है और ख.शूअ. व ख. गुज अ, इख़्लास ज़िक्रे कलबी और कियाम रुकूअ, व सुजूद वगैरह का ज़िक्र बिलजवारेह है इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने फरमाया अल्लाह तआला फ़रमाता है तुम ताअत बजा लाकर मुझे याद करो मैं तुम्हें अपनी इमदाद के साथ याद करूंगा सहीहैन की हदीस में है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है कि अगर बन्दा मुझे तन्हाई में याद करता है तो मैं भी उसको ऐसे ही याद फ़रमाता हूं और अगर वह मुझे जमाअत में याद करता है तो मैं उसको उससे बेहतर जमाअत में याद करता

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