शहीद गाजी इलमुद्दीन

शहीदगाजी_इलमुद्दीन

यह वो गाजी इलमुद्दीन है जब राजपाल नामक हुजूर का गुस्ताख़ जिसने हुजूर की शान में गुस्ताखी की तब 19 साल के इस गाजी ने उसे फी नारे जहन्नम रशीद किया तब अंग्रेजी अदालत ने उन्हें गिरफ्तार किया,

उस वक्त के सबसे बडे वकील ने इलमुद्दीन की तरफ से केस लड़े और बोले की कोर्ट में आप कह देना की सेल्फ #डिफेंस में मेने इसको मारा लेकिन #इलमुद्दीन तो इलमुद्दीन था उसने कहाँ खान साहब बड़ी मुश्किल से यह सर्फ हासिल हुआ अब इसे ऐसे ही जाने दू, ना ना,

बाद में इलमुद्दीन को 31 अक्टूबर 1927 को फाँसी दे दी गई. जब जनाज़ा ले जाया जा रहा था तब जनाज़े की तादाद देखकर लोगो के होश उड़ गए तकरीबन 5 लाख से ज्यादा अफ़राद शामिल और कयादत अल्लामा इक़बाल के हाथ मे जनाज़े को लाहौर लाया गया,

नमाज़ ए जनाज़ा मे वक्त के बड़े बड़े ओलमा ए दीन फुख आये दीन जिसमे #पीरसैयदजमातअलीसाहसाहब भी थे, जब कब्र के पास उनके जनाज़े को रखा गया तब सैयद पिर जमात अली साह साहब गाजी इल्मुद्दीन रहमतुल्लाह के पैर पर अपना अमामा शरीफ रख दिये तब पीछे से आवाज़ आई सैयद साहब आप यह क्या कर रहे है तब सैयद साहब बोले कि इलमुद्दीन ने मेरे नाना का हक अदा कर दिया है,

वो गाजी शहीद इलमुद्दिन, इनकि कब्र लाहौर मे है इनकी उम्र महज़ 19 साल थी और 1919 को यह वाक्या दर पेश हुआ था,

कि मोहम्मद से वफ़ा तूने तो हम तेरे है
यह जहाँ चीज़ है क्या लौह ऑ कलम तेरे है

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