मुसलमानों की जहालत और मुल्लों की बदगुमानीयां।

मुसलमानों की जहालत और मुल्लों की बदगुमानीयां।

आज के इस मुनाफिकत और खारजीयत के दौर में कुछ हरामी मुल्लों ने काफ़ी बदगुमानीयां अवाम में फ़ैला रखी है, जो खास तौर पर अल्लाह के रसूल नबी ए करीम मोहम्मदे अरबी सलल्लाहु अलयहे वसल्लम और आप के खानदान के मुताल्लिक।

  • जैसे की पंजतन पाक को सिर्फ शिया लोग ही मानते है!
  • हजरत अली को मानने से शिया हो जायेंगे!!
  • हजरत मौला अली और ईमाम हुसैन के पीछे अलहीस्सलाम नहीं लगा शकते!!
  • ईमाम हुसैन के ताजिये को देखने से निकाह टुट जाता है!!

-22रज्जब को खीर-कुंडे पर फातेहा जायज नहीं!!

  • मौला अली अलहीस्सलाम की विलादत और शहादत नहीं मना सकतें!!

और मुसलमान जो इल्म से अधूरा है वो इन हरामखोर मुल्लों की बातों में आकर अपनी आखिरत खराब कर लेता है।

आइये हम आम मुसलमानों के बीच में जो बदगुमानीयां पंजतन पाक के फैलायी गयी है उस्का जवाब देने की कोशिश करतें हैं ।

हमारे आका मोहम्मद स.अ.व और आपकी आल जो अहलेबैत कंही जाती हे,वो पाक जाते गिरामी में मोहम्मद स.अ.स,माँ फातिमा सलामुल्लाह अलयहा, मौला अली,इमाम हसन और ईमाम हुसैन अलहीस्सलाम शामिल है और आप तमाम जन्नत के मालिक और सरदार है,अब इनको छोड़कर आपको कीसी और तरीकों से जन्नत मिलती है तो वो आपका नसीब।

मौला अली के बारे में अल्लाह के रसूल मोहम्मद (स अ व) ने 18 जिल्हज को अपने आखिरी हज करने के बाद गदिर नामक जगह पर कमोबेश एक लाख चालीस हजार सहाबा ए किराम की मौजूदगी में 70 वसियते फरमायी है जिसमें ये खास है “मन कुन्तो मौला फहाजा अली मौला” में जिस्का मौला उन सबका अली मौला,इस एलाने वसीयत के बाद सबसे पहले हजरत अबुबकर सिद्दीक और हजरत उमर रदीअल्लाहु तालाअन्हु ने मौला अली को मुबारक बाद पेश की।अब अगर कोई मौला अली को मानने वाला शिया है तो सबसे पहले हजरत अबुबकर सिद्दीक और हजरत उमर रदीअल्लाहु ताला अन्हु शिया हे

पंजतन पाक के पीछे अलहीस्सलाम नहीं लगा शकते ये कहेना है कुछ खारजियो का, आइये पहेले इस्का मतलब समझ लेते हैं

अलहीस्सलाम: अल्लाह की सलामती हो जिस तरह हम आपस में सलाम पेश करतें हैं उसी तरह हम अहलेबैत पर सलाम भेजते हैं। इसमे कीसी को क्या बुराई लगती हैं?

रदीअल्लाहु ताला अन्हु:अल्लाह आपसे राजी याने कि खुश हो।

जो हम सहाबा ए किराम के पीछे लगाते हैं,और हम उन्से अल्लाह के खुश होने की गवाही देतेहैं

करमल्लाहु वजहुल करीम: वो चेहरा जिसे देखकर अल्लाह का करम नज़र आये

और ये कुल कायनात में सिर्फ मौला अली अलहीस्सलाम के मुताल्लिक कहा जाता है कयोंकि आपका चेहरा देखना भी इबादत है।

ऊम्मुल मोमेनीन हजरते आयेशा सिद्दीका सलामुल्लाह अलयहा फरमाती है की जब अल्लाह के रसूल नबी ए करीम मोहम्मदे अरबी सलल्लाहु अलयहे वसल्लम की महेफिल में मेरे वालीद हजरत अबुबकर सिद्दीक आकर बैठते थे तो उनकी नजर हमेशा मौला अली अलहीस्सलाम की तरफ होतीं थी, में ने एकबार अपने बाबा से इसके मुताल्लिक पूछा तब मेरे बाबा हजरत अबुबकर सिद्दीक ने मुझे बताया की ए मेरी बेटी आप सुनों, अल्लाह के रसूल नबी ए करीम मोहम्मदे अरबी सलल्लाहु अलयहे वसल्लम ने फरमाया है कि मौला अली अलहीस्सलाम के चहरे को देखना भी इबादत है,इसलिए मैं जब भी मौला अली अ.स.को देखता हूँ तो मेरी इबादत हो जातीं हैं। अब कोई अगर मौला अली को मानने से शिया हो जायें तो क्या पहले खलीफा हजरत अबुबकर सिद्दीक शिया थे?

ताजियादारी या ताजिया देखने से निकाह टुट जाता है!!

अजीबोगरीब जहालत है ये,क्या कोई मर्द अपनी बीवी को बिना तल्लाक दिये अपने-आप तल्लाक हो जाती है क्या? दरअसल ये गुमराही कुछ हरामी मुल्लों ने अवाम में फ़ैला रखी है,ये जिन मदरसों में पढ़े होते हे वो, जकात और चंदो से ही चल रहे होते हे,अब इन गम के महीनों में इन्हे मजलिस या वाअज पढने के लिए इन्हे नजराना चाहिए और ऐसे मौके पर इनकी दाल नहीं गलती,जैसे रमजान,बकरीद, ग्यारहवीं और दीगर महीनों मे अपने चंदे और नजरानो के लिए मस्जिद,मदरसों में गले फाड़ फाड़कर चिखते चिल्लाते रहते हैं।ये लोग हमेशा अपनी ही वाहवाही करवाने और मनमानी करने में लगे रहते हैं,जैसे ये ही लोग दिन के ठेकेदार होऔर मोहरम में उन्हें वो भाव नहीं मिलता कयोंकि हर मुसलमान इमाम हुसैन का गम मनाता है,इस पर ये मौलवी-मुल्ले अनाप सनाप नुकतेचिनी करके मुसलमानों को गुमराह कर रहे हैं।

सदियों से हम हमारे छठ्ठे ईमाम जाफर अल सादिक अ.स.पर खीर-पुरी (कुंडों) का फातेहा दिलवाते हैं,जिसे ये जकातखोर मुल्ले ना जाने क्या क्या बुरा भला कहते हैं,और मुसलमानों को जायज- नाजायज के चक्कर मे उलझाए रखा है, अब कुंडों की हकीकत ये है कि हजरत ईमाम जाफर अल सादिक अ.स.को रज्जबुल मुरज्जब की 22तारीख को अल्लाह ने मकामे गौषियत से नवाजा था,जिस पर आपने अल्लाह का शुक्र अदा करने के लिए आपके घर में मौजुद मीठी चीज जो खीर होती है उसपर फातेहा दिलवाते हुए अल्लाह से दुआ की थी,की अय अल्लाह मैंने आपकी बारगाह में ये नजर पेश कि है उसे कबुल फरमा और मेरे नाम से कोई भी इस रोज फातेहा दिलवाकर गरीबों को खिलाये उसकी आख़िरत में बखस्वाने की ज़मानत मुज पर है।

अलहम्दुलिल्लाह, हम एहले सुन्नत वल जमात है और हमारा अक़ीदा है की हमे हमारे नबी रोजे महेसर मे बख्शीश करेंगें और हम औलिया अल्लाह को मानने वाले हैं और हिन्दूस्तान में इस्लाम औलिया अल्लाहो की बदौलत ही हमें मिला है, और ये जकातखोर, चंदाखोर मुल्ले आजकल के पैदा हुए हैं जो अहले सुन्नत के नाम पर फित्ना फसाद फैलाकर नादान मुसलमानों को बहेका रहें हैं,हमें चाहिए की हम इन मुल्लों के बहकावे में ना आए और सहीयुल सुन्नी अक़ीदा खानकाहो,पीर- औलियाओ और मजारात से राबता रखें ताकी हमारी दुआओं में वो तासीर पैदा हो,जिससे हम लोग दोनो जंहा की कामयाबी पा सकें,हमारे ही चंदो से पलने और ईमामत करने वाले ये मुल्ले हमारे रहेबर नहीँ है,ये सिर्फ़ पेशनमाज है जो अपनी नौकरी करते है जो उन्हे दी जाती है, और जीनकी महीने की तनख्वाह भी चंदा कर के दी जाती है,एसे मुल्ले क्या हमारे रहेबर हो सकतें है? आप खुद सोचिये और जल्दी से जल्दी इस गुमराही से बहार नीकलिये,हमारी आखेरत हमे बनानी है,कोई मुल्ले नहीँ आयेंगे लेकीन हमारी बख्शीश कराने मे पंजतन पाक और आप की आल औलाद जरुर आयेंगे ये हमारा अक़ीदा है।

हमारे भोले भाले मुसलमान भाइ दिनी इल्म की कमी की वजह से इन्के बहकावे में आ जाते हैं और ना जाने कितने फितनो में उलझ जातें हैं और अपनी दुनिया और आख़िरत दोनों बरबाद कर लेते हे, अल्लाह हमारा इमान सलामत रखें और अहले बयत का दामन हमारे हाथों मे थमाये रखें

इसमेसेज आप आगे भी फॉरवर्ड कीजिये ताकी और भी नादान मुसलमानों को समझने मे आसानी रहे।

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