सन्न ११ हिजरी

जैशे उसामा

इस लशकर का दूसरा नाम. “संरिय्या उसामा भी है। ये सब से आखिरी फौज है जिस के रवाना करने का रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हुक्म दिया २६ सफ़र ११ हिजरी दोशंबा के दिन हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने रूमियों से जंग की तय्यारी का हुक्म दिया। और दूसरे दिन हज़रत उसामा बिन जैद रदियल्लाहु अन्हु का बुलाकर फ़रमाया कि मैं ने तुम को इस.फौज का अमीर लशकरे मुकर्रर किया। तुम अपने बाप की शहादत गाह मकाम “उबना” में जाओ। और निहायत तेजी के साथ सफ़र करके उन कुफ्फारों पर अचानक हमला कर दो। ताकि वो लोग जंग की तय्यारी न कर सकें। बावुजूद ये कि मिज़ाजे अकदस नासाज़ था। मगर इसी हालत में आप ने खुद अपने दस्त मुबारक से झन्डा बाँधा। और ये निशाने इस्लाम हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु के हाथ में देकर इर्शाद फरमाया कि तर्जमा :- अल्लाह के नाम से और अल्लाह की राह में जिहाद करो और काफिरों के साथ जंग. करो!

हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु ने हज़रत बुरीदा बिन

अनहसीब रदियल्लाहु अन्हु को अलम बरदार बनया। और मदीना से निकल कर एक कोस दूर मकाम “जुर्फ में पड़ाव किया। ताकि वहाँ पूरा लशकर जमा हो जाए। हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अनसार व मुहाजिरीन के तमाम मुअज्जज़ीन को भी उस लशकर में शामिल हो जाने का हुक्म दिया बअज लोगों पर ये शाक गुज़रा कि ऐसा लशकर जिस में अनसार व मुहाजिरीन के अकाबिर- अमाएद मौजूद हैं एक नौ उम्र लड़का जिस की उम्र बीस बरस से जाएद नहीं किस तरह अमीर लशकर बना दिया गया? जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इस एअतिराज़ की खबर मिली। तो आप के कल्बे नाजुक पर सदमा गुज़रा । और आप ने अलालत के बावुजूद सर में पट्टी बाँधे हुए एक चादर ओढ़ कर मिम्बर पर एक खुत्बा दिया। जिस में इर्शाद फरमाया कि अगर तुम लोगों ने उसामा की सिपा सालारी पर तना ज़नी की है। तो तुम लोगों ने उस से क़ब्ल उस के बाप के सिपा. सालार होने पर भी तअना ज़नी की थी। हालाँकि खुदा की कसम उस का बाप (जैद बिन हारिसा) सिपा सालार होने के लाएक था और इस के बाद इंस का बेटा (उसामा बिन जैद) भी सिपा सालार होने के काबिल है और ये मेरे नज़दीक मेरे महबूब तरीन सहाबा में से है। जैसा कि इस का बाप मेरे महबूब तरीन अस्हाब में से था लिहाज़ा उसामा रदियल्लाहु अन्हु के बारे में तुम लोग मेरी नेक वसीय्यत को कबूल करो। कि वो तुम्हारे बेहतरीन लोगों में से है।

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ये खुत्बा दे कर मकान में तशरीफ़ ले गए और आप की अलालत में कुछ और भी अज़ाफ़ा हो गया।

हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु हुक्म नबवी की तमील करते हुए मकामे जुर्फ में पहुंच गए थे। और वहाँ लशकरे इस्लाम का इज्तिमा होता रहा। यहाँ तक कि एक अज़ीम लशकर तय्यार हो गया। १० रबीऊल अव्वल.११ हिजरी को जिहाद में जाने वाले

ख्वास हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से रुख्सत होने के लिए आए और रुख्सत होकर मकाम जुर्फ में पहुंच गए। इस के दूसरे दिन हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की अलालत ने और ज्यादा शिद्दत इख्तियार कर ली। हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु भी आप की मिज़ाज पुर्सी और रुखसत होने के लिए ख़िदमते अकदस में हाज़िर हुए। आप ने हज़रते उसामा रदियल्लाहु अन्हु को देखा। मगर जुअफ की वजह से कुछ बोल न सके। बार बार दस्त मुबारक को आसमान की तरफ़ उठाते थे और उन के बदन पर अपना मुकद्दस हाथ फिराते थे। हजरत उसामा रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि इस से मैं ने ये समझा कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मेरे लिए दुआ फरमा रहे हैं। इस के बाद हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु रुख्सत होकर अपनी फौज में तशरीफ ले गए। और १२ रबीऊल अव्वल ११ हिजरी को

कूच करने का एलान भी फ़रमा दिया। अब सवार होने के लिए तय्यारी कर रहे थे कि उन की वालिदा हज़रत उम्मे ऐमन रदियल्लाहु अन्हा का फ़रिस्तदा आदमी पहुँचा कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम नज़अ की हालत में हैं। ये होश रुबा ख़बर सुन कर हज़रत उसामा व हज़रत उमर व हज़रत अबू उबैदा वगैरा वगैरा ल फौरन ही मदीना आए। तो ये देखा कि आप सकरात के आलम में हैं। और इसी दिन दोपहर को या सह पहर के वक्त आप का विसाल हो गया। ये ख़बर सुन कर हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु का लशकर मदीना वापस चला आया। मगर जब हज़रत अबू बकर सिद्ददीक रदियल्लाहु अन्हु मस्नदे ख़िलाफ़त पर रौनक अफ्रोज़ हो गए। तो आप ने बअज़ लोगों की मुखालिफ़त के बावुजूद रबीउल आखिर की आखिरी तारीखों में इस लशकर को रवाना फ़रमाया। और हज़रत उसामा रदियल्लाहु अन्हु मकाम उबना” में तशरीफ ले गए। और वहाँ बहुत ही खू रेज़ जंग के बाद लशकर इस्लाम फ़तेहयाब हुआ। और आप ने अपने बाप के कातिल और दूसरे

कुफ्फार

को कत्ल किया। और बे शुमार माले गनीमत लेकर चालीस दिन के बाद मदीना वापस तशरीफ लाए। (मदारिजन्नुबुब्बा जिल्द ३ स. ४९ ता स ४११ व जुरकानी जि. ३ स.१०७ ता स.११३)

वफ़ाते अकदस

हुजूर रहमतुल्लिल आलमीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इस आलम में तशरीफ़ लाना सिर्फ इस लिए था कि आप खुदा के आखिरी और कतई पैगाम, यानी दीने इस्लाम के अहकाम उस के बन्दों तक पहुँचा दें। और खुदा की हुज्जत फ़रमा दें। उस काम को आप ने क्योंकर अंजाम दिया? और इस में आप को कितनी कामयाबी हासिल हुई? इस का इजमाली जवाब ये है कि जब से ये दुनिया आलमे वजूद में आई हज़ारों अंबिया व रुसुल अलैहिमुस्सलाम इस अज़ीमुश्शान काम को अंजाम देने के लिए इस आलम में तशरीफ़ लाए। मगर तमाम अंबिया व मुरसलीन के तब्लीगी कारनामों को अगर जमा कर लिया जाए तो वो हुजूर सरवरे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के तब्लीगी शाहकारों के मुकाबला में ऐसे ही नज़र आएँगे जैसे आफ़्ताबे आलम ताब के मुकाबला में एक चराग़ या एक समुन्दर के मुकाबला में एक कतरा, आप की तब्लीग ने आलम में ऐसा इन्किलाब पैदा कर दिया कि काएनाते हस्ती की हर पस्ती को मेअाजे कमाल की सर बुलन्दी अता फरमा कर ज़िल्लत की ज़मीन को इज्जत का आस्मान बना दिया। और दीने हनीफ़ के उस मुक़द्दस और नूरानी महल को जिस की तश्मीर के लिए हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से लेकर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम तक तमाम अंबिया व रुसुल मेझुमार बना कर भेजे जाते रहे। आप ने ख़ातिमुन्नबीय्यीन की शान से उस कम हिदायत को इस तरह मुकम्मल फ़रमा दिया कि हज़रत हक जल्ला जलालहू ने उस पर

) की मुहर लगा दी।

जब दीने इस्लाम मुकम्मल हो चुका और दुनिया में आप के तशरीफ़ लाने का मक्सद पूरा हो चुका । तो अल्लाह तआला के वअदहु मुहकम के पूरा होने का वक्त आ गया!

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपनी वफात का इल्म

को अपनी वफात का इल्म हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को बहुत पहले से अपनी वफात का इल्म हासिल हो गया था और आप ने मुख्तलिफ़ मवाकेअ पर लोगों को इसकी खबर भी दे दी थी चुनान्चे हज्जतुल वदाअ के मौके पर आप ने लोगों को ये फ़रमा कर रुख्सत फ़रमाया था कि

‘शायद इस के बाद मैं तुम्हारे साथ हज न कर सकूँगा।

इसी तरह गदीर खुम’ के खुत्बा में इसी अंदाज़ से कुछ इसी किस्म के अल्फाज़ आप की ज़बान अकदस से अदा हुए थे अगरचे इन दोनों खुत्बात में लफ़्ज़ (ल-अल्ला) (शायद) फ़रमा कर ज़रा पर्दा डालते हुए अपनी वफ़ात की खबर दी। मगर हज्जतुल वदाअ से वापस लौट कर आप ने जो खुत्बात इर्शाद फ़रमाए। उस में (ल-अल्ला) (शायद) का लफ्ज़ आप ने नहीं फ़रमाया। बल्कि साफ़ साफ़ और यकीन के साथ अपनी वफात की ख़बर से लोगों को आगाह फ़रमाया दिया। चुनान्चे बुख़ारी शरीफ में हज़रत उक्बा बिन आमिर रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि

एक दिन हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम घर से बाहर तशरीफ़ ले गए। और शुहदाए उहुद की कब्रों पर इस तरह नमाज़ पढ़ी जैसे मय्येत पर नमाज़ पढ़ी जाती है फिर पलट कर मिंबर पर रौनक अफ़ोज़ हुए और इर्शाद फरमाया कि मैं तुम्हारा पेश रू (तुम से पहले वफ़ात पाने वाला हूँ और तुम्हारा गवाह हूँ।

और मैं खुदा की कसम अपने हौज़ को इस वक्त देख रहा हूँ।

(बुखारी किताबुल हौज़ जि. २ स. ९७५) इस हदीस में (

) “इन्नी फ-रतुन लकुम फ़रमाया । यानी मैं अब तुम लोगों से पहले ही वफ़ात पाकर जा रहा हूँ ताकि वहाँ जाकर तुम लोगों के लिए हौजे कौसर वगैरा का इन्तिज़ाम करूँ।

ये किस्सा मरजे वफ़ात शुरू होने से पहले का है। लेकिन इस किस्सा को बयान फरमाने के वक्त आप को इस का यकीनी इल्म हासिल हो चुका था कि मैं कब और किस वक्त दुनिया से जाने वाला हूँ।

और मरजे वफ़ात शुरू होने के बाद तो अपनी साहिबज़ादी हज़रते बीबी फ़ातिमा रदियल्लाहु अन्हा को साफ़ साफ़ लफ़्ज़ों में बिगैर शायद’ का लफ्ज़ फ़रमाए हुए अपनी वफ़ात की ख़बर दे दी। चुनान्चे बुखारी शरीफ़ की रिवायत है कि

अपने मरजे वफ़ात में आप ने हज़रत फ़ातिमा रदियल्लाहु अन्हा को बुलाया और चुपके चुपके कुछ फ़रमाया तो वो हंस पड़ीं।जब ज़वाजे मुतहहरात ने इस के बारे में हज़रत बीबी फ़ातिमा रदियल्लाहु अन्हा से दरयाफ्त किया। तो उन्होंने ने कहा कि हुजूर म ने आहिस्ता आहिस्ता मुझ से ये फरमाया कि मैं इसी बीमारी में वफ़ात पा जाऊँगा तो मैं रो पड़ी। फिर चुपके चुपके मुझ से ये फरमाया कि मेरे बाद मेरे घर वालों में से सबं से पहले तुम वफ़ात पाकर मेरे पीछे आओगी। तो मैं हंस पड़ी।

(बुखारी बाब मरजन्नबी जि. २ स. ६३८) बहर हाल हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपनी वफात से पहले अपनी वफात का इल्म हासिल हो चुका था। क्यों न हो कि जब दूसरे लोगों की वफात के औकात से सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अल्लाह ने आगाह फरमा दिया था तो अगर खुदावंद अल्लामुल गुयूब के बता देने से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपनी वफात के वक्त का

कल्ल अज वक्त इल्म हो गया तो उस में कौन सा इस्तेआद है। अल्लाह तआला ने तो आप को इल्म मा-काना वमा यकून अता फरमाया। यानी जो कुछ हो चुका । और जो कुछ हो रहा है। और जो कुछ होने वाला है सब का इल्म अता फरमा कर आप को दुनिया से उठाया। चुनान्चे इस मज़मून को हम ने अपनी किताब “कुरआनी तकरीरें में मुफस्सल तहरीर कर दिया है।

अलालत की इब्तिदा

मरज़ की इब्तिदा कब हुई? और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कितने दिनों तक अलील रहे। इस में मुअरिखीन का इख़्तिलाफ़ है। बहर हाल २० या २२ सफर ११ हिजरी को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जन्नतुल बकीअ में जो आम मुसलमानों का कब्रिस्तान है आधी रात में तशरीफ ले गए। वहाँ से वापस तशरीफ़ लाए तो मिज़ाजे अकदस नासाज़ हो गया। ये हज़रत मैमूना रदियल्लाहु अन्हा की बारी का दिन था।

(मदाराजुन्नुबूवा जि.२ स.४१७ व ज़रकानी जि.३) दो शंबा के दिन आप की अलालत बहुत शदीद हो गई। आप की ख्वाहिश पर तमाम अज़वाजे मुतहहरात ने इजाज़त दे दी कि आप हज़रत बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा के यहाँ कयाम फरमाएँ। चुनान्चे हज़रते अब्बास व हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हुम ने सहारा दे कर आप को हज़रत बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा के हुजरए मुबारका में पहुंचा दिया। जब तक ताकत रही आप खुद मस्जिद नबवी में नमाजें पढ़ाते रहे। जब कमज़ोरी बहुत ज्यादा बढ़ गई। तो आप ने हुक्म दिया कि हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु मेरे मुसल्ले पर इमामत करें। चुनान्चे सतरह नमाजें हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहुं अन्हु ने पढ़ाई।

एक दिन जुहर की नमाज़ के वक्त मरज़ में कुछ इफाका

महसूस हुआ। तो आप ने हुक्म दिया कि सात पानी की मशकें मेरे ऊपर डाली जाएँ। जब आप गुस्ल फ़रमा चुके तो हजरत अब्बास और हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हुम आप का मुकद्दस बाजू थाम कर आप को मस्जिद में लाए। हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु नमाज़ पढ़ा रहे थे। आहट पाकर पीछे हटने लगे। मगर आप ने इशारा से उन को रोका और उन के पहलू में बैठ कर नमाज़ पढ़ाई। आप को देख कर हज़रत अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु और हज़रत अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु को देख कर दूसरे मुक्तदी लोग अरकाने नमाज़ अदा करते रहे। नमाज़ के बाद आप ने एक खुत्बा भी दिया। जिस में बहुत सी वसीय्यतें और अहकाम इस्लाम बयान फ़रमा कर अन्सार के फ़ज़ाएल और इन के हुकूक के बारे में कुछ कलिमात इर्शाद फ़रमाए और सूरए वल अम्र और एक आयत भी तिलावत फ़रमाई।

मिदारिजुन्नुबूवा जि.२ स.४२५ व बुखारी जि.२ स.६३९) घर में सात दीनार रखे हुए थे। आप ने हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा से फ़रमाया कि तुम इन दीनारों को लाओ ताकि मैं इन दीनारों को खुदा की राह में खर्च कर दूं चुनान्चे हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु के ज़रीले आप ने इन दीनारों को तक़्सीम करा दिया। और अपने घर में एक ज़र्रा भर भी सोना या चाँदी नहीं छोड़ा।

मिदारिजुन्नुबुब्वा जि.२ स.४२४) आप के मरज़ में कमी बेशी होती रहती थी। खास वफात के दिन यानी दो शंबा के रोज़ तबीय्यत अच्छी थी। हुजरा मस्जिद से मुत्तसिल ही था। आप ने पर्दा उठा कर देखा। तो लोग नमाजे फ़ज पढ़ रहे थे। ये देखकर खुशी से आप हंस पड़े। लोगों ने समझा कि आप मस्जिद में आना चाहते हैं। मारे खुशी के तमाम लोग बे काबू हो गए मगर आप ने इशारा से रोका। और हुजरे में दाखिल होकर पर्दा डाल दिया। ये सब से आखिरी मौका था कि सहाबए किराम ने जमाले नुबूब्बत की ज़ियारत की। हज़रते अनस रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि आप का रुखे अनवर ऐसा

मालूम होता था कि गोया कुरआन का कोई वरक है। यानी सफेद हो गया था।खुखारी जि.२ स.६४० बाब मरजुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

इस के बाद बार बार गशी का दौरा पड़ने लगा। हज़रते फातिमा ज़हरा रदियल्लाहु अन्हा की ज़बान से शिद्दते गम में ये लफ्ज़ निकल गया – ” हाए रे मेरे बाप की बे चैनी। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि ऐ बीटी! तुम्हारा बाप आज के बाद कुभी बेचैन न होगा।

(बुखारी जि.२ स. २४१ बाब मरजुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

इस के बाद बार बार आप ये फरमाते रहे (taste rin यानी इन लोगों के साथ जिन पर खुदा का इनाम है। और कभी ये फ़रमाते कि ( खुदावंदा! बड़े रफ़ीक में। और ( ) भी पढ़ते थे और फरमाते थे कि बे शक मौत के लिए सख्तियाँ हैं हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा कहती हैं कि तंदरुसती की हालत में आप अकसर फ़रमाया करते थे कि पैगम्बरों को इख्तियार दिया जाता है कि वो ख्वाह वफ़ात को कबूल करें या हयाते दुनिया को। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ज़बाने मुबारक पर ये कलिमात जारी हुए तो मैं ने समझ लिया कि आप ने आखिरत को कबूल फ़रमा लिया।

(बुखारी जि.२ स. ६४० व बाब मरजुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

वफात से थोड़ी देर पहले हज़रते आइशा रदियल्लाहु अन्हा के भाई हज़रते अब्दुर्रहमान बिन अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु ताज़ा मिस्वाक हाथ में लिए हाजिर हुए। आप ने उन की तरफ नज़र जमा कर देखा हज़रत आएशा रदियल्लाहु अन्हा ने समझा कि मिस्वाक की ख्वाहिश है। उन्होंने फौरन ही मिस्वाक लेकर अपने दाँतों से नर्म की और दस्ते अकदस में दे दी। आप ने मिसवाक फ़रमाई। सह पहर का वक्त था कि सीनए अकदस में सांस की घर घराहट महसूस होने लगी।

सल्लल्लाहु तआला इतने में लबे मुबारक हिले तो लोगों ने ये अल्फाज़ सुनें कि नमाज, और लौंडी गुलामों का खयाल रखो।

पास में पानी की एक लगन थी इस में बार बार हाथ डालते। और चेहरए अकदस पर मलते। और कलिमा पढ़ते चादर मुबारक को कभी मुँह पर डालते कभी हटा देते। हज़रत बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा सरे अकदस को अपने सीने से लगाए बैठी हुई थीं। इतने में आप ने हाथ उठा कर उंगली से इशारा फरमाया और तीन मर्तबा फरमाया कि. (अब कोई नहीं) बल्कि वो बड़ा रफीक चाहिए।

यही अल्फाज़ ज़बाने अकदस पर थे कि ना गहाँ मुकद्दस हाथ लटक गए। और आँखें छत की तरफ देखते हुए खुली की खुली रहीं और आप की कुदसी रूह आलमे कुदस में पहुंच गई।

برانی غن

الكسل وسلم وبارك على سيدنا محمد واله واصحابه اجمعينة

(बुखारी जि.२ स. ६४० व स. ६४१ बाब मरजुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

तारीखे वफ़ात में मुअरिंखीन का बड़ा इख़्तिलाफ़ है लेकिन इस पर तमाम ओलमाए सीरत का इत्तिफाक है कि दोशंबा का दिन और रबीउल अव्वल का महीना था। बहर हाल आम तौर पर यही मशहूर है कि १२ रबीउल अव्वल ११ हिजरी दोशंबा के दिन तीसरे पहर आप ने विसाल फ़रमाया। (वल्लाह तआला अलम)

वफात का असर

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की वफ़ात से हज़राते सहाबए किराम और अहले बैते उज़्ज़ाम को कितना बड़ा सदमा पहुँचा? और अले मदीना का क्या हाल हो गया? इस की तस्वीर कशी के लिए हज़ारों सफहात भी काफी नहीं हो सकते। वो शमले नुबूव्वत के परवाने जो चन्द दिनों तक जमाले नुबूब्बत का दीदार न करें तो उन के दिल बेकरार और

उनकी आँखें अश्कबार हो जाती थीं। ज़ाहिर है कि इन आशिकाने रसूल पर जाने आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दाएमी फिराक का कितना रूह फरसा, और किस कदर जान काह सदमए अजीम हुआ होगा? जलीलुल कद्र सहाबए किराम बिला मुबालेगा होश- हवास खो बैठे। उन की अकलें गुम हो गई। आवाजें बन्द हो गईं और वो इस कदर मख्खूतुल हवास हो गए कि उन के लिए ये सोचना भी मुश्किल हो गया कि क्या कहें और क्या करें? हज़रत उस्मान गनी रदियल्लाहु अन्हु पर ऐसा सक्ता तारी हो गया कि वो इधर उधर भागे भागे फिरते थे। मगर किसी से न कुछ कहते थे न किसी की कुछ सुनते थे। हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु रंज- मलाल में निढाल होकर इस तरह बैठ रहे। कि उन में उठने बैठने और चलने फिरने की सकत ही नहीं रही। हज़रत अब्दुल्लाह बिन उनैस रदियल्लाहु अन्हु के कल्ब पर ऐसा धचका लगा कि वो इस सदमे को बर्दाश्त न कर सके। और उन का हार्ट फेल हो गया!

हज़रत उमर रदियल्लाहु अन्हु इस क़दर होश- हवास खो बैठे कि उन्होंने तलवार खींच ली। और नंगी तलवार लेकर मदीना की गलियों में इधर उधर आते जाते थे। और ये कहते फिरते थे कि अगर किसी ने ये कहा कि रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की वफात हो गई तो मैं इसी तलवार से उस की गर्दन उडा दूंगा। हज़रत आइशा रदियल्लाहु अन्हा का बयान है कि वफ़ात के बाद हज़रत उमर व हज़रत मुगीरा बिन शुअबा रदियल्लाहु अन्हुम इजाज़त लेकर मकान में दाखिल हुए। हज़रत उमर रदियल्लाहु अन्हु ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को देख कर कहा कि बहुत ही सख़्त गशी का दौरा पड़ गया है। जब वो वहाँ से चलने लगे तो हज़रते मुगीरा रदियल्लाहु अन्हु ने कहा कि ऐ उमर! तुम्हें कुछ ख़बर भी है? हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का विसाल हो चुका है। ये सुनकर हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु आपे से बाहर हो गए। और तड़प कर बोले कि

ऐ मुगीरा! तुम झूटे हो। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का उस वक्त तक इन्तिकाल नहीं हो सकता, जब तक दुनिया से एक एक मुनाफिक का खात्मा न हो जाए!

मवाहिबे लदुन्निया में तबरी से मन्कूल है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की वफात के वक्त हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु “सुख” में थे जो मस्जिद नबवी से एक मील के फासले पर है। उनकी बीवी हज़रत हबीबिया बिन्ते खारजा रदियल्लाहु अन्हा वहीं रहती थीं। चूंकि दोशंबा की सुबह को मर्ज में कमी नज़र आई और कुछ सुकून मालूम हुआ। इस लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खुद हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु को इजाज़त दे दी थी कि तुम सुख चले जाओ। और बीवी बच्चों को दखते आओ।

बुखारी शरीफ़ वगैरा में है कि हजरत अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु अपने घोड़े पर सवार होकर “सुख से आए और किसी से कोई बात न कही न सुनी। सीधे हज़रत आइशा रदियल्लाहु अन्हा के हुजरे में चले गए और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रुखे अनवर से चादर हटा कर आप पर झुके। और आप की दोनों आँखों के दर्मियान निहायत गरमजोशी के साथ एक बोसा दिया। और कहा कि आप अपनी हयात और वफात दोनों हालतों में पाकीज़ा रहे। मेरे माँ बाप आप पर फिदा हों हरगिज़ खुदावंद तआला आप पर दो मौतों को जमझ नहीं फ़रमाएगा। आप की जो मौत लिखी हुई थी आप उस मौत के साथ वफ़ात पा चुके इस के बाद हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु मस्जिद में तशरीफ़ लाए तो उस वक्त हज़रत उमर रदियल्लाहु अन्हु लोगों के सामने तकरीर कर रहे थे आप ने फरमाया कि ऐ उमर! बैठ जाओ। हज़रत उमर रदियल्लाहु अन्हु ने बैठने से इन्कार कर दिया। तो हज़रत अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु ने उन्हें छोड़ दिया। और खुद लोगों को मुतव्वजेह करने के लिए खुत्वा देना शुरू कर दिया। कि

अम्मा बअद

— जो शख्स तुम में से मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की इबादत करता था (वो जान लें) कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) का विसाल हो गया। और जो शख्स तुम में से खुदा की परस्तिश करता था। तो खुदा जिन्दा है वो कभी नहीं मरेगा।

फिर उस के बाद हजरते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु ताअला अन्हु ने सूरए आले इमरान कि ये आयत तिलावत फरमाई

तर्जमा :- और मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तो एक रसूल हैं उन से पहले बहुत से रसूल हो चुके तो क्या अगर वो इन्तिकाल फरमा जाएँ या शहीद हो जाएँ तो तुम उलटे पाँव फिर जाओगे? और जो उलटे पाँव फिरेगा। अल्लाह का कुछ नुक्सान न करेगा और अन्करीब अल्लाह शुक्र अदा करने वालों को सवाब देगा।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रदियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि हज़रत अबू बकर रदियल्लहु अन्हु ने ये आयत तिलावत की तो मालूम होता था कि गोया कोई इस आयत को जानता ही न था। इन से सुन कर हर शख्स इसी आयत को पढ़ने लगा।(बुखारी जिप स. १६६ बाब अल दखूल अलल मय्येत इलख व मदारिजुन्नुवा जि. २ स. ४३३)

हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि मैं ने जब हजरत अबू बकर रदियल्लाहु अन्हु की ज़बान से सूरए आले इमरान की ये आयत सुनी तो मुझे मालूम हो गया कि वाकेई नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का विसाल हो गया। फिर हजरत उमर रदियल्लाहु अन्हु इज्तिराब की हालत में नंगी शमशीर ले कर जो एलान करते फिर थे कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का विसाल नहीं हुआ। इस से रुजूअ किया। और इन के साहिबजादे हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रदियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि गोया हम पर एक पर्दा पड़ा हुआ था। इस आयत की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं गया। हज़रत अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु के खुत्बा ने इस पर्दा को उठा दिया।

(मदारिजुन्नुबूबा जि.२ स.४३४)

तजहीज़- तक्फीन

चूँकि हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने वसीय्यत फरमा दी थी कि मेरी तजहीज-तक्फीन मेरे अहले बैत और अहले खानदान करें इस लिए कि ये ख़िदमत आप के खानदान ही के लोगों ने अंजाम दी। चुनान्चे हजरत फ़ज़ल बिन अब्बास व हज़रत कुसम बिन अब्बास व हज़रत अली व हज़रत अब्बास व हज़रत उसामा बिन जैद रदियल्लाहु अन्हुम ने मिल जुल कर आप को गुस्ल दिया और नाफे मुबारक और पलकों पर जो पानी के कतरात और तरी जमअ थी हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु ने जोशे महब्बत और फ़रते अकीदत से इस को ज़बान से चाट कर पी लिया।

(मदारिजुन्नुबूब्वा जि.२ स.४३८व स १३९) गुस्ल के बाद तीन सूती कपड़ों का जो ‘सहूल गाँव के बने थे कफ़न बनाया गया इन में कमीस व अमामा न था।

(बुखारी जि.स.१६९ बाब सयाबुल बैज लिन कफ)

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