हिजरत का नवाँ साल part 3

सन्न ९ हिजरी के वाकिआते मुतफ़र्रिका (१) इस साल पूरे मुल्क में हर तरफ अमन- अमान की फज़ा पैदा हि गई और जकात का हुक्म नाज़िल हुआ। और जकात की वसूली के लिए आमिलीन और मुहस्सिलों का तक़र्रुर हुआ।

(जरकानी जि.३ स. १००) (२) जो गैर मुस्लिम कौमें इस्लामी सल्तनत के ज़ेरे साया रहीं उनके लिए जज़िए का हुक्म नाज़िल हुआ और कुरआन की आयत उतरी कि हत्ता युअतुल जिज़या अंय्यदिवें व हुम सागिरुन।

तर्जमा :- वो छोटे बनकर “जजिया अदा करें। (३) सूद की हुर्मत नाज़िल हुई। और इसके एक साल बाद सन्न १० हिजरी में “हज्जतुल विदाअ के मौकी पर अपने खुत्बों में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इसका खूब खूब एलान फ़रमाया। (बुख़ारी व मुस्लिम बाब तहरीमुल ख्न) (४) हशा का बादशाह जिनका नाम हज़रते असहमा रदियल्लाहु तआला अन्हु था। जिनके जेरे साया मुसलमान मुहाजिरीन ने चन्द साल हशा में पनाह ली थी। उनकी वफ़ात हो गई। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मदीना में उनकी गायबाना नमाज़े जनाज़ा पढ़ी और उनके लिए मगफिरत की दुआ माँगी। (५) इसी साल मुनाफ़िकों का सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई मर गया। उसके बेटे हज़रते अब्दुल्लाह रदियल्लाहु अन्हु की दरख्वास्त पर उनकी दिलजुई के वास्ते हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उस मुनाफ़िक के कफ़न के लिए अपना पैराहन अता फ़रमाया। और उसकी लाश को अपने ज़ानुए अकदस पर रखकर उसके कफ़न में अपना लुआबे दहन डाला। और हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु के बार बार मना करने के बावुजूद चूँकि अभी तक मुमानित नाज़िल नहीं हुई थी। इस लिए हुजूर सल्लल्लाहु

तआला अलैहि वसल्लम ने उसके जनाजे की नमाज पढ़ाई। लेकिन इसके बाद ही ये आयत नाजिल हो गई कि –

वला तुसल्लि अला अ-हदिम मिन्हुम माता अ-बद वला तकुम अला कब-रिही। इन्न-हुम क-फ-रू बिल्लाहि व रसूलिही व मातू व हुम फ़ासिकून। (तौबा)

तर्जमा :- (ऐ रसूल!) इन (मुनाफिकों) में से जो मरें कभी आप उन पर नमाज़े जनाज़ा न पढ़िए और न उनकी कब्र के पास आप खड़े भी न हों यकीनन उन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल

के साथ कुफ्र किया है? और कुफ्र ही की हालत में ये लोग मरे हैं।

इस आयत के नुजूल के बाद फिर कभी आपने किसी मुनाफ़िक की नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ाई। न उसकी कब्र के पास खड़े हुए। (बुख़ारी जि.१ स. १६.९, स.१८० व ज़रकानी जि.३ स.९५, ९६)

वुफूदुल अरब

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तब्लीगे इस्लाम के लिए तमाम अतराफ व इकनाफ़ में मुबल्लिगीने इस्लाम और आमिलीन व मुजाहिदीन को भेजा करते थे। उनमें से बअज़ कबाएल तो मुबल्लिगीन के सामने ही दवते कुबूल करके मुसलमान हो जाते थे मगर बअज़ कबाएल इस बात के ख्वाशिमंद होते थे कि बराहे रास्त खुद बारगाहे नुबूब्बत में हाज़िर होकर अपने इस्लाम का एअलान करें। चुनान्चें कुछ लोग अपने अपने कबीलों के नुमाइन्दा बनकर मदीना मुनव्वरा आते थे। और खुद बानीए सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ज़बाने फैजे तर्जुमान से दवते इस्लाम का पैगाम सुनकर अपने इस्लाम का एलान करते थे।

और फिर अपने अपने कबीलों में वापस लौटकर पूरे कबीले वालों को मुशर्रफ ब-इस्लाम करते थे। इन्ही कबाएल के नुमाइन्दों को हम “वुफूदुल अरब के उनवान सेबयान करते हैं!

इस किस्म के वुफूद और नुमाइन्दगाने कबाएल मुख़्तलिफ ज़मानों में मदीना मुनव्वरा आते रहे। मगर फ़तेह मक्का के बाद नागहाँ सारे अरब में एक अजीम तगय्युर (तबदीली)वाकेअ हो गया। और सब लोग इस्लाम की तरफ माइल होने लगे। क्योंकि इस्लाम की हक्कानियत वाजेह और ज़ाहिर हो जाने के बा वुजूद बहुत से कबाएल महज कुरैश के दबाव और अहले मक्का के डर से इस्लाम कुबूल नहीं कर सकते थे। फतह मक्का ने इस रुकावट को भी दूर कर दिया। और अब दवते इस्लाम और कुरआन के मुकद्दस पैगाम ने घर घर पहुँचकर अपनी हक्कानियत और एजाज़ी तसर्रुफ़ात से सब के कुलूब पर सिक्का बिठा दिया जिसका नतीजा ये हुआ कि वही लोग जो एक लम्हा के लिए इस्लाम का नाम सुनना, और मुसलमानों की सूरत देखना गवारा नहीं कर सकते थे आज परवानों की तरह शमले नुबूव्वत पर निसार होने लगे। और जोक दर जोक बल्कि फौज दर फौज हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में दूर व दराज़ के सफ़र तय करते हुए वुफूद की शकल में आने लगे। और ब-रिजा व रगबत इस्लाम के हल्क बगोश बनने लगे। चूंकि इस किस्म के वुफूद अकसर व बेशतर फ़तेह मक्का के बाद सन्न ६ हिजरी में मदीना मुनव्वरा आए इस लिए सन्न ६ हिजरी को लोग ‘सनतुल वुफूद (नुमाइन्दों का साल) कहने लगे।

इस किस्म के वुफूद की तदाद में मुसन्निफीने सीरत का बहुत ज़्यादा इख़्तिलाफ़ है हज़रते शैख़ अब्दुल हक मुहद्दिस देहलवी अलैहिर्रहमा ने उन वुफूद की तअदाद ६० से ज़्यादा बताई

(मदारिज जि.२ स. ३५८) और अल्लामा किस्तलानी व हाफ़िज़ इने कय्यम ने इस

किसम के चौदह वुफूदों का तज़्किरा किया है। हम भी अपनी इस मुख्तसर किताब में चन्द वुफूद का तज़्किरा करते हैं।

इस्तिकबाले वुफूद

हुजूर सय्यदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कबाएल से आनले वाले वुफूदों के इस्तिकबाल और उनकी मुलाकात का ख़ास तौर पर एहतमाम फरमाते थे चुनान्चे हर वपद के आने पर आप निहायत ही उम्दा पोशाक जेबे तन फरमाकर काशानए अकदस से निकलते और अपने खुसूसी असहाब को भी हुक्म देते थे कि बेहतरीन लिबास पहनकर आएँ। फिर उन मेहमानों को अच्छे से अच्छे मकानों में ठहराते। और उन लोगों की मेहमान नवाज़ी और खतिर मदारात का खास तौर पर ख़याल फरमाते थे और मेहमानों से मुलाकात के लिए मस्जिदे नबवी में एक सुतून से टेक लगाकर नशिस्त फरमाते थे फिर हर एक वफ्द के साथ निहायत ही खुश रवी और खन्दा पेशानी के साथ गुफ़्तुगू फ़रमाते । और उनकी हाजतों और हालतों को पूरी तवज्जोह के साथ सुनते। और फिर उनको ज़रूरी अकाएद व अहकामे इस्लाम की तअलीम व तल्कीन भी फरमाते और हर वपद को उनके दरजात व मरातिब के लिहाज़ से कुछ न कुछ नक्द या सामान भी तहाएफ और इनआमात के तौर पर अता फरमाते।

वफ्दे सकीफ

जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जंगे हुनैन के बाद ताएफ से तशरीफ लाए और “जिइर्राना से उम्रा अदा करने के बाद मदीना मुनव्वरा तशरीफ़ ले जा रहे थे तो रास्ते, ही में कबीलए सकीफ़ के सरदारे अअज़म “उरवा बिन मसऊद सकफी’ बारगाहे रिसालत में हाज़िर होकर ब-रिज़ा व रगबत दामने इस्लाम में आ गए। ये बहुत ही शानदार और बा-वकार आदमी

परस्ती को एक लम्हा के लिए भी बर्दाश्त

थे। और उनका कुछ तज्किरा सुलह हुदैबिया के मौका पर हम तहरीर कर चुके हैं। उन्होंने मुसलमान होने के बाद अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) आप मुझे इजाज़त अता फरमाएँ कि मैं अब अपनी कौम में जाकर इस्लाम की तब्लीग करूँ। आप ने इजाजत दी दी और ये वहीं से लौटकर अपने कबीला में गए और अपने मकान की छत पर चढ़कर अपने मुसलमान होने का एलान किया। और अपने कबीले वालों को इस्लाम की दवत दी। इस अलानिया दअवते इस्लाम को सुनकर कबीलए सकीफ़ के लोग गैज़- गज़ब में भर कर इस कदर तैश में आ गए कि चारों तरफ से उन पर तीरों की बारिश करने लगे। यहाँ तक कि उनको एक तीर लगा और ये शहीद हो गए। कबीलए सकीफ के लोगों ने उनको कल तो कर दिया। फिर ये सोचा कि तमाम कबाए अरब इस्लाम कबूल कर चुके हैं। अब हम भला इस्लाम के खिलाफ कब तक? और कितने लोगों से लड़ते रहेंगे? फिर मुसलमानों के इन्तिकाम और एक लम्बी जंग के अंजाम को सोचकर दिन में तारे नज़र आने लगे। इस लिए उन लोगों ने अपने एक मुअज़्ज़ज़ रईस अब्द यालील बिन अमर को चन्द मुमताज़ सरदारों के साथ मदीना मुनव्वरा भेजा। इस वफ़्द ने मदीना पहुँचकर बारगाहे अकदस में अर्ज़ किया कि हम इस शर्त पर इस्लाम कुबूल करते हैं। कि तीन साल तक हमारे बुत लात को न तोड़ा जाए। आपने इस शर्त को कुबूल फ़रमाने से इन्कार फरमा दिया और इर्शाद फ़रमाया कि इस्लाम किसी हाल में भी बुत लिहाजा बुत तो ज़रूर तोड़ा जाएगा। ये और बात है कि तुम लोग इसको अपने हाथ से न तोड़ो। बल्कि मैं – अबू सुफयान और मुगय्यरा बिन शुबा (रदियल्लाहु अन्हुमा) को भेज दूंगा। वो इस बुत को तोड़ डालेंगे। चुनान्चे ये लोग मुसलमान हो गए। और हज़रते उस्मान बिनुल आस रदियल्लाहु अन्हु को जो इस कौम के एक मुअज्ज़ज़ और मुमताज़ फ़र्द थे। इस कबीले का

अमीर मुकर्रर फ़रमा दिया। और इन लोगों के साथ अबू सुफयान और – मुगय्यरा बिन शुबा रदियल्लाहु अन्हुमा को ताएफ भेजा और उन दोनों हज़रात ने उन के बुत ‘लात” को तोड़ फोड़कर रेज़ा रेज़ा कर डाला। (मदारिजुन्नुबूव्वा जि.२ स. ३६६)

वफ्दे किन्दा

ये लोग यमन के अतराफ में रहते थे। इस कबीले के साठ या अस्सी सवार बड़े ठाठ बाट के साथ मदीना आए। खूब बालों में कंघी किये हुए। और रेश्मी गोंट के जुब्बे पहने हुए। हथियारों से सजे सजाए मदीना की आबादी में दाखिल हुए। जब ये लोग दरबारे रिसालत में बारयाब हुए। तो आपने उन लोगों से दर्याप्त फ़रमाया कि क्या तुम लोगों ने इस्लाम कुबूल कर लिया है? सब ने अर्ज किया कि ‘जी हाँ आपने फ़रमाया कि तुम लोगों ने ये रेश्मी लिबास क्यों पहन रखा है? ये सुनते ही उन लोगों ने अपने जुब्बों को बदन से उतार दिया। और रेश्मी गोंटो को फाड़ फाड़ कर जुब्बों से अलग कर दिया। (मदारिज जि. २ स. ३६६)

वफ्दे बनी अशअर

ये लोग यमन के बाशिन्दए और कबीलए “अशअर के मुअज्ज़ज़ और नामवर हज़रात थे जब ये लोग मदीना में दाखिल होने लगे तो जोशे महब्बत और फ़र्ते अकीदत से रजज़ का ये शेअर आवाज़ मिलाकर पढ़ते हुए शहर में दाखिल हुए कि –

मुहम्मदवे व सहबह कल हम लोग अपने महबूबों से यानी हज़रते मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और आपके सहाबा से मुलाकात करेंगे हजरते अबू हुरैरा रदियल्लाहु अन्हा का बयान है कि मैं ने रसूले

खुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ये इर्शाद फरमाते हुए सुना कि यमन वाले आ गए। ये लोग बहुत ही नर्म दिल है। ईमान तो यमनीयों का ईमान है और हिकमत भी यमनीयों में है। बकरी पालने वालों में सुकून वकार है। और ऊँट पालने वालों में फल और घमन्ड है। चुनान्चे इर्शाद नबवी की बरकत से अहले यमन इल्म व सफाईए कल्ब और हिकमत व मझुरिफ़ते इलाही की दौलतों से हमेशा माला माल रहे खास कर हजरते अबू मूसा अशअरी रदियल्लाहु अन्हु को ये निहायत ही खुश आवाज़ थे। और कुरआन शरीफ ऐसी खुशल अल्हानी के साथ पढ़ते थे कि सहाबए किराम में उनका कोई हम मिरल न था। इल्म अकाएद में अहले सुन्नत के इमाम शैख़ अबुल हसन अशअरी रहमतुल्लाह अलैह इन्ही हज़रते अबू मूसा अशअरी रदियल्लाहु अन्हु की औलाद में से हैं।

(मदारिजुन्नुबूव्वा जि.२ रा. ३६७)

वफ्द बनी असद

इस कबीले के चन्द अशख़ास बारगहे अकदस में हाज़िर हुए और निहायत ही खुश दिली के साथ मुसलमान हो गए। लेकिन फिर एहसान जताने के तौर पर कहने लगे कि या रसूलल्लाह। (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) इतने सख़्त कहत के ज़माने में हम लोग बहुत ही दूर दराज़ भी मसाफ़त तै करके यहाँ आए हैं। रास्ते में हम लोगों को कहीं शिकम सैर होकर खाना भी नसीब नहीं हुआ। और बिगैर इसके कि आपका लश्कर हम पर हमला आवर हुआ हो। हम लोगों ने ब-रिजा व रग़बत इस्लाम कबूल कर लिया है। इन लोगों के इस एहसान जताने पर खुदावंदे कुद्दूस ने ये आयत नाजिल फरमाई

तर्जमा :- ऐ महबूब! तुम पर एहसान जताते हैं कि हम मुसलमान हो गए। आप फरमा दीजिए कि अपने इस्लाम का एहसान मुझ पर न रखो । बल्कि अल्लाह तआला तुम पर एहसान रखता है कि उसने तुम्हें इस्लाम की हिदायत की अगर तुम सच्चे हो।

वफ्दे फ़ज़ारह

ये लोग उयैयना बिन हिसन फ़ज़ारी के कौम के लोग थे। बीस आदमी दरबारे अकदस में हाज़िर हुए। और अपने इस्लाम का एलान क्यिा। और बताया कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) हमरे दयार में इतना सख़्त कहत और काल पड़ गया है कि अब फ़क्र व फ़ाके की मुसीबत हमारे लिए ना काबिले बर्दाश्त हो चु की है। लिहाज़ा आप बारिश के लिए दुआ फ़रमाईए। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जुमअ के दिन मिंबर पर दुआ फरमा दी। और फौरन ही बारिश होने लगी। और लगातार एक हफ्ते तक मूसलाधार बारिश का सिलसिला जारी रहा। फिर दूसरे जुमआ को जबकि आप मिंबर पर खुतबा पढ़ रहे थे। एक अअराबी ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) चौपाए हलाक होने लगे। और बाल बच्चे भूक से बिलकने लगे। और तमाम रास्ते मुनकतअ (कट) हो गए। लिहाज़ा दुआ फरमा दीजिए कि ये बारिश पहाड़ों पर बरसे और खेतों, बस्तीयों पर न बरसे। चुनान्चे आपने दुआ फरमा दी। तो बादल शहरे मदीना और उसके अतराफ़ से कट गया। और आठ दिन के बाद मदीना में सूरज नज़र आया।

(मदारिजुन्नुबूव्वा जि.२ स ३५९)

वफ्दे बनी मुर्रह

इस वपद में बनी मुर्रह के तेरह आदमी मदीना आए थे। उनका सरदार हारिस बिन औफ भी इस वफ्द में शामिल था। उन सब लोगों ने बारगाहे अकदस में इस्लाम कुबूल किया और कहत की शिकायत और बाराने रहमत की दुआ के लिए दरख्वास्त पेश की। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इन लफ्तजों के साथ दुआ माँगी कि

(ऐ अल्लाह! इन लोगों को बारिश से सैराब फरमा दे) फिर आपने हज़रते बिलाल रदियल्लाहु अन्हु को हुक्म दिया कि इन में से हर शख्स को एक एक उकिया चाँदी, और चार चार सौ दिरहम इनआम और तोहफ़ा के तौर पर अता करें। और आपने उनके सरदार हज़रते हारिस बिन औफ को बारह उकिया चाँदी का शाहाना अतिया मरहमत फ़रमाया।

जब ये लोग मदीना से अपने वतन पहुंचे तो पता चला कि ठीक उसी वक्त उनके शहरों में बारिश हुई थी जिस वक्त सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उन लोगों की दरख्वास्त पर मदीने में बारिश के लिए दुआ मांगी थी।

(मदारिजुन्नुबूव्वा जि. २ स. ३६०)

वफ्दे बनिल बक्का

इस वफ्द के साथ हज़रते मुआविया बिन सौर बिन अब्बाद रदियल्लाहु अन्हु भी आए थे जो एकम सौ बरस की उम्र के बूढ़े थे। उन सब हज़रात ने बारगाहे अकदस में हाज़िर हो कर अपने इस्लाम का एलान किया। फिर हज़रते मुआविया बिन सौर बिन अब्बाद रदियल्लाहु अन्हु ने अपने फ़रज़न्द हज़रते बशीर रदियल्लाहु अन्हु

को पेश किया। और ये गुज़ारिश की कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) आप मेरे इस बच्चे के सर पर अपना दस्ते मुबारक फिरा दें। उनकी दरख्वास्त पर हुजूरे

अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उनके फरज़न्द के सर पर अपना मुकद्दस हाथ फिरा दिया। और उनको चन्द बकरियाँ भी अता फरमाई। और वपद वालों के लिए खैर- बरकत की दुआ फरमा दी। इस दुआए नबवी का ये असर हुआ कि उन लोगों के दयार में जब भी कहत और फक्र-फाका की बला अती तो उस कौम के घर हमेशा कहत और भुकमरी की मुसीबतों से

(मदारिजनबला जि.२ स ३६०)

महफूज रहे।

वफ्दे बनी किनाना

इस वफ्द के अमीरे कारवाँ हज़रते वासिला बिन असका रदियल्लाहु अन्हं थे। ये सब लोग दरबारे रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम में निहायत ही अकीदतमंदी के साथ हाज़िर होकर मुसलमान हो गए और हज़रते वासिला बिन असल रदियल्लाहु अन्हु बैअते इस्लाम करके जब अपने वतन में पहुंचे तो उनके बाप ने उनसे नाराज़ व बेज़ार हो कर कह दिया कि मैं खुदा की कसम! तुझ से कभी कोई बात न करूँगा। लेकिन उनकी बहन ने सिदके दिल से इस्लाम कुबूल कर लिया। ये अपने बाप की हरकत से रन्जीदा और दिल शिकस्ता होकर फिर मदीने मुनव्वरा चले आए और जंगे तबूक में शरीक हुए। और फिर असहाबे सुफ्फा की जमाअत में शामिल होकर हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत करने लगे। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि दसल्लम के बाद ये बसरा चले गए। फिर आखिर उम्र में शाम गए और सन्न ४५ हिजरी में शहरे दमिश्क के अन्दर वफात पाई।

(मदारिजुन्नुबूव्वा जि.२ स. ३६०)

वफ्दे बनी हिलाल

इस वफ्द के लोगों ने भी दरबारे रिसालत में हाज़िर हो कर इस्लाम कुबूल कर लिया। इस वफ्द में हज़रते ज़ियाद बिन

अब्दुल्लाह रदियल्लाहु अन्हु भी थे। ये मुसलमान होकर दन्दनाते हुए हज़रते उम्मुल मुमिनीन बीबी मैमूना रदियल्लाहु अन्हा के घर में दाखिल हो गए क्योंकि वो उनकी ख़ाला थीं।

ये इत्मिनान के साथ अपनी खाला के पास बैठे हुए गुपतुगू में मसरूफ थे। जब रसूले खुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मकान में तशरीफ लाए। और ये पता चला कि हज़रते ज़ियाद रदियल्लाहु अन्हु उम्मुल मुमिनीन के भान्जे हैं। तो आपने अजराहे शफ़क़त उनके सर और चेहरे पर अपना नूरानी हाथ फेर दिया। इस दस्ते मुबारक की नूरानियत से हज़रते ज़ियाद रदियल्लाहु अन्हु का चेहरा इस कदर पुर नूर हो गया कि कबीलए बनी हिलाल के लोगों का बयान है कि इसके बाद हम लोग हज़रते ज़ियाद बिन अब्दुल्लाह रदियल्लाहु अन्हु के चेहरे पर हमेशा एक नूर और बरकत का असर देखते रहे। (मदारिजुन्नुबूत्वा जि.२ स. ३६०)

वफ्दे ज़िमाम बिन सअल्बा

ये कबीलए सद बिन बकर के नुमाइन्दा बनकर बारगाहे रिसालत में आए ये बहुत ही खूबसूरत सुर्ख व सफेद रंग के गेसू दराज़ आदमी थे। मस्जिदे नबवी में पहुँचकर अपने ऊँट को बिठाकर बाँध दिया। फिर लोगों से पूछा कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) कौन हैं? लोगों से दूर से इशारा करके बताया कि वो गोरे रंग कि खूबसूरत आदमी जो तकिया लगाकरर बैठे हुए हैं। वही हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हैं। हज़रते ज़िमाम बिन सअल्बा रदियल्लाहु अन्हु सामने आए। और कहा कि ऐ अब्दुल मुत्तलिब के फ़रज़न्द! मैं आप से चन्द चीजों के बारे में सवाल करूँगा। और मैं अपने सवाल में

बहुत ज़्यादा मुबालगा और सख्ती बरतूंगा। आप इस से मुझ पर खफा न हों। आपने इर्शाद फरमाय कि तुम जो चाहो पूछ लो। फिर हस्बे जैल मुकालमा हुआ

ज़िमाम बिन सल्बा मैं आपको उस खुदा की कसम देकर जो आपका और तमाम इन्सानों का परवरदिगार है। ये पूछता हूँ कि क्या अल्लाह ने आपको हमारी तरफ अपना रसूल बनाकर भेजा है? नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम “हाँ” जिमाम बिन सअल्बा मैं आपको कसम देकर ये सवाल करता हूँ कि क्या नमाज़ व रोज़ा और हज्ज व ज़कात को अल्लाह ने हम लोगों पर फर्ज किया है? नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम “हाँ जिमाम बिन सल्बा आपने जो कुछ फ़रमाया मैं उस पर ईमान लाया और मैं ज़िमाम बिन सअल्बा हूँ। मेरी कौम ने मुझे इस लिए आपके पास भेजा है कि मैं आपके दीन को अच्छी तरह समझ कर अपनी कौम बनी सअद बिन बकर तक इस्लाम का पैगाम. पहुँचा दूँ।

हज़रते ज़िमाम बिन सल्बा रदियल्लाहु अन्हु मुसलमान होकर अपने वतन में पहुँचे। और सारी कौम को जमअ करके सब से पहले अपनी कौम के तमाम बुतों यानी ‘लाद व उज्ज़ा’ और ‘मनात व हुबल’ को बुरा भला कहने लगे। और खूब खूब इन बुतों की तौहीन करने लगे। उनकी कौम ने जो अपने बुतों की तौहीन सुनी तो एक दम सब चौकं पड़े और कहने लगे कि ऐ सअल्बा के बेटे! तू क्या कह रहा है? ख़ामोश हो जा। वर्ना हम को ये डर है कि हमारे ये देवता तुझे बर्स (सफ़ेद दाग) और कोढ़ और जुनून (पागल पन) में मुब्तला कर देंगे। आप ये सुनकर तैश में आ गए और तड़प कर फ़रमाया कि ऐ बे अक्ल इन्सानो! ये पत्थर के बुत भला हम को क्या नफअ व नुकसान पहुंचा सकते हैं? सुनो! अल्लाह तआला जो हर नफअ व नुकसान का मालिक है उस ने अपना एक रसूल भेजा है। और एक किताब नाज़िल फरमाई है ताकि तुम इन्सानों को इस गुमाराही और जहालत से नजात अता फरमाए। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई मअबूद नहीं है और

हजरते मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं। मैं अल्लाह के रसूल की बारगाह में हाज़िर हो कर इस्लाम का पैगाम तुम लोगों के पास लाया हूँ। फिर उन्होंने अअमाले इस्लाम यानी नमाज़ व रोज़ा और हज्ज व ज़कात को उन लोगों के सामने पेश किया और इस्लाम की हक्कानियत पर ऐसी पुर जोश और मुअस्सर तकरीर फ़रमाई कि रात भर में कबीले. के तमाम मर्द औरत मुसलमान हो गए। और उन लोगों ने अपने बुतों को तोड़ फोड़ कर पाश पाश कर डाला और अपने कबीले में एक मस्जिद बना ली और नमाज व रोजा और हज्ज व ज़कात के पाबन्द होकर सादिकुल ईमान मुसलमान बन गए।

(मदारिजुन्नुबूव्वा जि.२ स. ३६४)

वफ्दे बल्लीय

ये लोग जब मदीना मुनव्वरा पहुंचे तो हज़रते अबू रुवैफिस रदियल्लाहु अन्हु जो पहले ही से मुसलमान होकर खिदमते अकदस में मौजूद थे उन्होंने इस वक़्त का तआरुफ़ कराते हुए ये अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ये लोग मेरी कौम के अफराद हैं। आपने इर्शाद फरमाया कि मैं तुमको और तुम्हारी कौम को “खुश आमदीद’ कहता हूँ। फिर हज़रते अबू रुवैफिअ रदियल्लाहु अनहु ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ये सब लोग इस्लाम का इकरार करते हैं। और अपनी पूरी कौम के मुसलमान होने की जिम्मेदारी लेते हैं। आपने इर्शाद फरमाया कि अल्लाह तआला जिसके साथ भलाई का इरादा फ़रमाता है। उसको इस्लाम की हिदायत देता है।

इस वपद में एक बहुत ही बूढ़ा आदमी भी था। जिसका नाम “अबुज्जैफ था। उसने सवाल किया कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मैं एक ऐसा आदमी हूँ कि मुझे मेहमानों

की मेहमान नवाजी का बहुत ज्यादा शौक है तो क्या इस मेहमान नवाज़ी का मुझे कुछ सवाब भी मिलेगा? आपने इर्शाद फरमाया कि मुसलमान होने के बाद जिस मेहमान की भी मेहमान नवाजी करोगे ख्वाह वो अमीर हो या फ़कीर तुम सवाब के हकदार ठहरोगे।

फिर अबुज्जैफ रदियल्लाहु अन्हु ने ये पूछा कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मेहमान कितने दिनों तक मेहमान नवाजी का हकदार है? आप ने फरमाया कि तीन दिन तक उसके बाद वो जो खाएगा वो सदका होगा।(मदारिजुन्नुबूब्बा जि.२ स. ३६४)

वफ्दे तुजीब

ये तेरह आदमियों का एक वफ्द था। जो अपने मालों और मवेशियों की ज़कात लेकर बारगाहे अकदस में हाज़िर हुआ था। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मरहबा और खुश आमदीद कहकर उन लोगों का इस्तिकबाल फ़रमाया। और ये इर्शाद फ़रमाया कि तुम लोग अपने इस माले ज़कात को अपने वतन में ले जाओ। और वहाँ के फुकरा व मसाकीन को ये सारा माल दे दो। उन लोगों ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह(सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) हम अपने वतन के फुकरा व मसाकीन को इस कदर माल दे चुके हैं कि ये माल उनकी हाजतों से ज़्यादा हमारे पास बच रहा है। ये सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उन लोगों की उस ज़कात को कुबूल फ्रमा लिया। और उन लोगों पर बहुत ज़्यादा करम फ़रमाते हुए उन खुश नसीबों की खूब मेहमान नवाज़ी फ़रमाई। और ब-वक्ते रुख्सत उन लोगों को इकराम- इनाम से भी नवाज़ा। फिर दर्याफ्त फरामाया कि क्या तुम्हारी कौम में कोई ऐसा शख्स बाकी रह गया है? जिस ने मेरा दीदार नहीं किया है। उन लोगों ने कहा कि जी हाँ। एक जवान को हम अपने वतन में छोड़ आए हैं जो हमारे घरों की हिफाज़त कर रहा है। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि

वसल्लम ने फरमाया कि तुम उस जवान को मेरे पास भेज दो। चुनान्चे उन लोगों ने अपने वतन पहुँच कर उस जवान को मदीना तय्येबा रवाना कर दिया। जब वो जवान बारगाहे आली में बारयाब हुआ। तो उस ने ये गुज़ारिश की कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) आप ने मेरी कौम की हाजतों को तो पूरी फरमाकर उन्हें वतन में भेज दिया है अब मैं भी एक हाजत लेकर आपकी बारगाहे अकदस में हाज़िर हो गया हूँ। और उम्मीदवार कि आप मेरी हाजत भी पूरी फ़रमा देंगे। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने दर्याफ्त फ़रमाया कि तुम्हारी क्या हाजत है? उसने कहा कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मैं अपने घर से ये मकसद लेकर नहीं हाज़िर हुआ हूँ कि आप मुझे कुछ माल अता फरमाएँ बल्कि मेरी फ़क़त इतनी हाजत और दिली तमन्ना है जिसको दिल में लेकर आपकी बारगाह में हाज़िर हुआ हूँ कि अल्लाह तआला मुझे बख़्श दे। और मुझ पर अपना रहम फ़रमाए और मेरे दिल में बे नियाज़ी और इस्तिगना की दौलत पैदा फ़रमा दे। जवान की इस दिली मुराद और तमन्ना को सुनकर महबूबे खुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम बहुत खुश हुए और उनके हक में इन लफ़्ज़ों के साथ दुआ फ़रमाई कि अल्लाहुम्मग फिर-लहू वर-हम्हु वज-अल गिनाहु फी कल्बिही तर्जमा :- ऐ अल्लाह! इस को बख्श दे। और इस पर रहम फरमा और इसके दिल में बे नियाज़ी डाल दे।

वफ्दे मुजैना.

इस वफ्द के सरबराह हज़रते नुअमान बिन मुकर्रन रदियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि हमारे कबीले के चार सौ आदमी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमते अकदस में हाज़िर हुए और जब हम लोग अपने घरों को वापस होने लगे तो आपने फरमाया

कि ऐ उमर! तुम इन लोगो को कुछ तोहफा इनायत करो। हजरते उमर रदियल्लाहु अन्हु ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मेरे घर में बहुत ही थेड़ी सी खजूरे हैं ये लोग इतने कलील तोहफे से शायद खुश न होंगे। आपने फिर यही इर्शाद फरमाया कि ऐ उमर! जाओ। इन लोगों को जरूर कुछ तोहफ़ा अता करो! इर्शादे नबवी सुनकर हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु उन चार सौ आदमियों को हमराह ले कर जब मकान पर पहुँचे तो ये देखकर हैरान रह गए कि मकान में खजूरो का एक बहुत ही बड़ा तोदा पड़ा हुआ है। आपने वफ्द के लोगों से फ़रमाया कि तुम लोग जितनी और जिस क़दर चाहो इन खजूरों में से ले लो। उन लोगों ने अपनी हाजत और मर्जी के मुताबिक खजूरें ले ली। हज़रते नुअमान बिन मुकर्रन रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि सब से आखिर में जब मैं खजूरें लेने के लिए मकान में दाखिल हुआ तो मुझे ऐसा नज़र आया कि गोया उस ढेर में से एक खजूर भी कम नहीं हुई है।

ये वही हज़रते नुअमान बिन मुकर्रन रदियल्लाहु अन्हु हैं जो फ़तहे मक्का के दिन कबीलए मुजैना के अलमबरदार थे ये अपने सात भाइयों के साथ हिजरत करके मदीना आए थे। हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद रदियल्लाहु अन्हु फ़रमाया करते थे क कुछ घर तो ईमान के हैं और कुछ घर निफ़ाक़ के हैं और आले मुकर्रन का घर ईमान का घर है। (मृदारिजुन्नुबूव्वा जि.२ स. ३६७)

वफ्दे दौस

इस वफ़्द के काएद हज़रते तुफैल बिन अमर दौसी रदियल्लाहु अन्हु थे। ये हिजरत से कब्ल ही इस्लाम कुबूल कर चुके थे। उनके इस्लाम लाने का वाकिआ भी बड़ा अजीब है। ये एक बड़े होशमंद और शोअला बयान शाओर थे। ये किसी ज़रूरत से मक्का आए तो कुफ्फारे कुरैश ने उनसे कह दिया कि ख़बरदार तुम मुहम्मद

(सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) से न मिलना और हरगिज़ हरगिज़ उनकी बात न सुनना। उनके कलाम में ऐसा जादू है कि जो सुन लेता है वो अपना दीन व मज़हब छोड़ बैठता है। और अज़ीज़-ने अकारिब से उस का रिश्ता कट जाता है। ये कुफ्फारे मक्का के फरेब में आ गए। और अपने कानों में उन्होंने रुई भर ली कि कहीं कुरआन की आवाज़ कानों में न पड़ जाए लेकिन एक दिन सुबह को ये हरमे कबा में गए तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फज की नमाज़ में किरअत फरमा रहे थे एक दम कुरआन की आवाज़ तो उनके कान में पड़ी। तो ये कुरआन की फ़साहत व बलागत पर हैरान रह गए और किताबे इलाही की अज़मत और उसकी तासीरे रब्बानी ने उनके दिल को मोह लिया। जब हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम काशानए नुबूव्वत को चले तो ये बे ताबाना आपके पीछे पीछे चल पड़े। और मकान में आकर आपके सामने मुअद्दबाना बैठ गए। और अपना और कुरैश की बद गोईयों का सारा हाल सुनाकर अर्ज किया कि खुदा की कसम! मैंने कुरआन से बढ़कर फ़्सीह व बलीग आज तक कोई कलाम नहीं सुना। लिल्लाह! मुझे बताइए कि इस्लाम क्या है? हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस्लाम के चन्द अहकाम उनके सामने बयान फ़रमाकर उनको इस्लाम की दवत दी तो वो फौरन ही कलिमा पढ़कर मुसलमान हो गए।

फिर उन्होंने दरख्वास्त की कि या रसूलल्लाह! मुझे कोई ऐसी अलामत व करामत अता फरमाइए कि जिसको देखकर लोग मेरी बातों की तस्दीक करें ताकि मैं अपनी कौम में यहाँ से जाकर इस्लाम की तब्लीग करूँ। आपने दुआ फ्रमा दी कि इलाही! तू इनको एक ख़ास किस्म का नूर अता फरमा दे। चुनान्चे इस दुआए नबवी की बदौलत उनको ये करामत अता हुई कि उनकी दोनों आँखों के दर्मियान चराग के मानिन्द एक नूर चमकने लगा। मगर उन्होंने ये ख्वाहिश ज़ाहिर की कि ये नूर मेरे सर में मुन्तकिल हो

जाए। चुनान्चे उनका सर किन्दील की तरह चमकने लगा। जब ये अपने कबीले में पहुँचे और इस्लाम की दवत देने लगे तो उनके माँ बाप और बीवी ने तो इस्लाम कुबूल कर लिया। मगर उनकी कौम मुसलमान नहीं हुई बल्कि इस्लाम की मुखालफ़त पर तुल गई। ये अपनी कौम के इस्लाम से मायूस होकर फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खिदमत में चले गए। और अपनी कौम की सरकशी और सरताबी का सारा हाल बयान किया। तो आपने इर्शाद फ़रमाया कि तुम फिर अपनी कौम में चले जाओ। और नर्मी के साथ उनको खुदा की तरफ़ बुलाते रहो। चुनान्चे ये फिर अपनी कौम में आ गए। और लगातार इस्लाम की दअवत देते रहे यहाँ तक कि सत्तर या अस्सी घरानों में इस्लाम की रौशनी फैल गई। और ये उन सब लोगों को साथ लेकर खैबर में ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में हाज़िर हो गए। और आपने खुश होकर खैबर के माले गनीमत में से उन सब लोगों को हिस्सा अता फरमाया।

(मदारिजुन्नुबा जि.२ स. ३७०)

वफ्दे बनी अबस

कबीलए बनी अबस के वफ्त ने दरबारे अकदस में जब हाज़िरी दी। तो ये अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) हमारे मुबल्लिगीन ने हम को खबर दी है कि जो हिजरत न करे उस का इस्लाम मकबूल ही नहीं है। तो या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) अगर आप हुक्म दें तो हम अपने सारे माल- मताअ और मवेशियों को बेचकर हिजरत करके मदीना चले आएँ। ये सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि तुम लोगों के लिए हिजरत ज़रूरी नहीं। हाँ ये ज़रूरी है तुम जहाँ भी रहो खुदा से डरते रहो। और ज़ोह्द- तकवा के साथ ज़िन्दगी बसर करते रहो।

(मदारिजुन्नुबूल्लाह जि.2 स. ३७०)

वफ्दे दारिम

ये वफ्द दस आदमियों का एक गिरोह था जिनका तअल्लुक कबीलए “लखम से था। और उनके सरबराह और पेशवा का नाम हानी बिन हबीब था। ये लोग हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिए तोहफे में चन्द घोड़े और एक रेश्मी जुब्बा और एक मुश्क शराब अपने वतन से लेकर आए। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने घोड़ों और जुब्बे के तहाएफ को तो कुबूल फ़रमा लिया। लेकिन शराब को ये कहकर ठुकरा दिया कि अल्लाह तआला ने शराब को हराम फरमा दिया है। हानी बिन हबीब रदियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) अगर इजाज़त हो तो इस शराब को बेच डालूँ। आपने फ़रमाया कि जिस खुदा ने शराब के पीने को हराम फ़रमाया है उसी ने उसकी खरीद फरोख्त को भी हराम ठहराया है। लिहाज़ा तुम शराब की इस मशक को ले जाकर कहीं जमीन पर इस शराब को बहा दो।

रेश्मी जुब्बा आपने अपने चचा हज़रते. अब्बास रदियल्लाहु अन्हु को अता फरमाया । तो उन्होंने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मैं इस को लेकर क्या करूँगा? जबकि मर्दो के लिए इसका पहनना ही हराम है। आपने फरमाया कि इसमें जिस कदर सोना है। आप उसको इस में से जुदा कर लीजिए। और अपनी बीवियों के लिए जेवरात बना लीजिए। और रेश्मी कपड़े को फरोख्त करके इस की कीमत को अपने इस्तेमाल में लाइए। चुनान्चे हज़रते अब्बास रदियल्लाहु अन्हु ने उस जुब्बे को आठ हजार दिरहम में बेचा।

ये वपद भी बारगाहे रिसालत में हाज़िर होकर निहायत खुश दिली के साथ मुसलमान हो गया। (मदारिजुन्नुबूब्बा जि.२ स. ३६५)

वफ्दे गामिद

ये दस आदमियों की जमाअत थी जो, सन्न १० हिजरी में मदीना आए। और अपनी मंजिल में सामानों की हिफाजत के लिए एक जवान लड़के को छोड़ दिया। वो सो गया। इतने में एक चोर आया और एक बैग चुराकर ले भागा। ये लोग हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खिदमते अकदस में हाजिर थे कि नागहाँ आपने फ़रमाया कि तुम लोगों का एक बैग चोर ले गया। मगर फिर तुम्हारे जवान ने उस बैग को पा लिया। जब ये लोग बारगाहे अकदस से उठकर अपनी मंजिल पर पहुंचे तो उनके जवान ने बताया कि मैं सो रहा था कि एक चोर बैग लेकर भागा। मगर मैं बेदार होने के बाद जब उसकी तलाश में निकला तो एक शख्स को देखा। वो मुझको देखते ही फरार हो गया। और मैं ने देखा कि वहाँ की ज़मीन खुदी हुई है जब मैं ने मिट्टी हटाकर देखा तो बैग वहाँ दफ्न था। मैं उसको निकाल कर ले आया। ये सुनकर सब बोल पड़े कि बिला शुब्हा ये रसूले बरहक हैं। और हम को उन्होंने इसी लिए इस वाकिआ की खबर दे दी ताकि हम लोग उनकी तस्दीक कर लें। उन सब लोगों ने इस्लाम कुबूल कर लिया। और उस जवान ने भी दरबारे रसूल में हाज़िर होकर कलिमा पढ़ा ! और इस्लाम के दामन में आ गया। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते उबई बिन कब रदियल्लाहु अन्हु को हुक्म दिया कि जितने दिनों उन लोगों का मदीने में कियाम रहे। तुम उन लोगों को कुरआन पढ़ना सिखा दो।

(मदारिजन्नबूदा जि.२ स ३७४)

वफ्दे नजरान

ये नजरान के नसारा का वफ्द था। इसमें साठ सवार थे। चौबीस उनके शुरफ़ा और मुअज़्ज़िज़ीन थे। और तीन अश्खास इस दर्जे के थे कि उन्हीं के हाथों में नजरान के नसारा का मजहबी

और कौमी सारा निजाम था। एक आकिब जिसका नाम “अब्दुल मसीह” था दूसरा शख्स सय्येद जिसका नाम “अहम” था। तीसरा शख्स “अबू हारिसा बिन अलकमा” था। उन लोगों ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से बहुत से सवालात किए और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उसके जवाबात दिए। यहाँ तक कि हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम के मामले में गुफ्तगू छिड़ गई। उन लोगों ने ये बात मानने से इन्कार कर दिया कि हजरते ईसा अलैहिस्सलाम कुँवारी मरयम के शिकम से बिगैर बाप के पैदा हुए। इस मौकअ पर ये आयत नाज़िल हुई। जिसको आयते मुबाहला” कहते हैं!

तर्जमा बेशक हजरते ईसा अलैहिस्सलाम की मिसाल अल्लाह के नजदीक आदम (अलैहिस्सलाम) की तरह है। उनको मिट्टी से बनाया। फिर फरमाया “हो जा” वो फौरन हो जाता है। (ऐ सुनने वाले) ये तेरे रब की तरफ से हक है तुम शक वालों में से न होना। फिर (ऐ महबूब) जो तुम से हज़रते ईसा (अलैहिस्सलाम) के बारे में हुज्जत करें बाद इसके कि तुम्हें इल्म आ चुका। तो उनसे फ़रमा दो। आओ। हम बुलाएँ अपने बेटों को और तुम्हारे बेटों को और अपनी औरतों को और तुम्हारी औरतों को और अपनी जानों को और तुम्हारी जानों को फिर हम गिड़ गिड़ाकर दुआ माँगे और झूटों पर अल्लाह की लअनत डालें।

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जब उन लोगों के इस मुबाहले की दवत दी। तो उन नसरानियों ने रात भर की मुहलत माँगी। सुबह को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हज़रते हसन, हज़रते हुसैन, हज़रते अली, हज़रते फ़ातिमा रदियल्लाहु अन्हुम के साथ लेकर मुबाहला के लिए काशानए नुबूब्बत से निकल पड़। मगर नजरान को नसरानियों ने मुबाहला करने से इन्कार कर दिया और जज़िया देने का इकरार करके हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से सुलह कर ली। (तफ्सीरे जलालैन वगैरा)

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