हिजरत का आठवाँ साल part 2

मीलों तक आग ही आग

मक्का से एक मंज़िल के फासले पर “मरुज्जहरान’ में पहुँचकर इस्लामी लश्कर ने पड़ाव डाला। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फौज को हुक्म दिया कि हर मुजाहिद अपना अलग अलग चूल्हा जलाए। दस हज़ार मुजाहिदीन ने जो अलग अलग चूलहे जलाए तो “मरुज्ज़हरान” के पूरे मैदान में मीलों तक आग ही आग नजर आने लगी।

कुरैश के जासूस

गो कुरैश को मालूम ही हो चुका था कि मदीने से फौजें आ रही हैं। मगर सूरते हाल की तहकीक़ के लिए कुरैश ने अबू सुफ़यान बिन हरब ए हकीम बिन हिंजाम, व बुदैल बिन वरका को अपना जासूस बनाकर भेजा। हजरते अब्बास रदियल्लाहु अन्हु बेहद फिकरमंद होकर कुरैश के अंजाम पर अफसोस कर रहे थे वो ये सोचते थे कि अगर रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इतने अज़ीम लश्कर के साथ मक्का में फातिहाना दाखिल हुए तो आज कुरैश का ख़ातमा हो जाएगा । चुनान्चे वो रात के वक्त रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के सफेद खच्चर पर सवार होकर इस इरादे से मक्का चले कि कुरैश को इस ख़तरे से आगाह कर के उन्हें आमादा करें कि चलकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से माफी माँगकर सुलह कर लो वर्ना तुम्हारी खैर नहीं। (जरकानी जि.२ स 3०४)

मगर बुख़ारी की रिवायत है कि कुरैश को ये ख़बर मिल गई कि रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मदीना से रंवाना हो गए हैं। मगर उन्हें ये पता न था कि आपका लश्कर “मरुज्जहरान” तक आ गया है। इस लिए अबू सुफयान बिन हरब और हकीम बिन हजाम व बुदैल बिन वरका इस तलाश व जुसतजू में निकले थे कि रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम

का लश्कर कहाँ है? जब ये तीनों “मरुज्जहरान” के करीब पहुंचे तो देखा कि मीलों तक आग ही आग जल रही है ये मंजर देखकर ये तीनों हैरान रह गए। और अबू सुफयान बिन हरब ने कहा कि मैंने तो ज़िन्दगी में कभी इतनी दूर तक फैली हुई आग इस मैदान में जलते हुए नहीं देखी। आखिर ये कौनसा कबीला है?

बुदैल बिन वरका ने कह! कि बनी खुजाआ मालूम होते हैं। अबू सुफ़यान ने कहा कि नहीं बनी खुजाआ इतनी कसीर तअदाद में कहाँ हैं जो उनकी आग से “मज्जहरान” का पूरा मैदान भर जाएगा।

(बुख़ारी जि.२ स. ६१३) बहर हाल हज़रते अब्बास रदियल्लाहु अन्हु की इन तीनों से मुलाकात हो गई और अबू सुफ़यान ने पूछा कि ऐ अब्बास! तुम कहाँ से आ रहे हो? और ये आग कैसी है? आप ने फ़रमाया कि यू रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लश्कर की आग है। हज़रते अब्बास दियल्लाहु अन्हु ने अबू सुफ़यान बिन हरब से कहा कि तुम मेरे खच्चर पर पीछे सवार हो जाओ। वर्ना अगर मुसलमानों ने तुम्हें देख लिया तो अभी तुम को कत्ल कर डालेंगे। जब ये लोग लश्कर गाह में पहुँचे तो हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु और दूसरे चन्द मुसलमान जो लश्कर गाह का पहरा दे रहे थे। अबू सुफ़यान को देख लिया हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु अपने जज़्बए इन्तिकाम को जब्त न कर सके। और उबू सुफ़यान को देखते ही उनकी ज़बान से निकला कि “अरे ये तो खुदा का दुश्मन अबू सुफयान है’ दौड़ते हुए बारगाहे रिसालत में पहुंचे और अर्ज किया कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अबू सुफयान हाथ आ गया है। अगर इजाज़त हो तो अभी उसका सर उड़ा दूं। इतने में हज़रते अब्बास रदियल्लाहु अन्हु भी उन तीनों मुश्रिकों को साथ सथ लिए हुए दरबारे रसूल में हाज़िर हो गए और उन लोगों की जाँ बख्शी की सिफारिश पेश कर दी और ये कहा कि या रसूलल्लाह! सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मैं ने इन सभों को अमान दे दी है।

अबू सुफ़यान का इस्लाम ???

अबू सुफ़यान बिन हरब की इस्लामी दुश्मनी कोई ढकी छुपी चीज़ नहीं थी। मक्का में रसूले करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को सख्त से सख़्त ईजाएँ देनी, मदीना पर बार बार हमला करना, कबाइले अरब को इश्तेआल दिलाकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के कत्ल की बारहा साज़िशें, यहूदियों और तमाम कुफ्फारे अरब से साज़ बाज़ करके इस्लाम और बानिए इस्लाम के खात्मे की कोशिशें ये वो ना काबिले मुआफ जराइम थे जो पुकार पुकार कर कह रहे थे कि अबू सुफयान का कत्ल बिल्कुल दुरुस्त व जाइज़ और बर महल है लेकिन रसूले करीम जिन को कुरआन ने “रऊफरहीमके लकब से याद किया है। उनकी रहमत चुमकार चुमकार कर अबू सुफ़यान के कान में कह रही थी कि ऐ मुजरिम! मत डर । ये दुनिया के सलातीन का दरबार नहीं है। बल्कि रहमतुल, लिल आ-लमीन की बारगाहे रहमत है। बुख़ारी शरीफ़ की रिवायत तो यही है कि अबू सुफ़यान बारगाहे अकदस में हाज़िर हुए तो फौरन ही इस्लाम कबूल कर लिया। इस लिए जान बच गई। (बखारी जि.२ स ६१३)

मगर एक रिवायत ये भी है कि हकीम बिन हज़ाम और बुदैल बिन वरका ने तो फौरन ही इस्लाम कबूल कर लिया मगर अबू सुफ़यान ने सुबह कलिमा पढ़ा। (जरकानी जिस 3०४) रिवायात में ये भी आया है कि अबू सुफ़यान

और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दर्मियान एक मकालमा हुआ उसके बाद अबू सुफयान ने अपने इस्लाम का एलान किया। वो मकालमा ये है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम

क्यों ऐ अबू सुफयान! क्या अब भी तुम्हें यकीन न आया कि

और बअज

खुदा एक है?

अबू सुफयान – क्यों नहीं। कोई और खुदा होता तो आज हमारे

काम आता।

क्या इस में तुम्हें कोई शक है कि मैं अल्लाह का रसूल अबू सुफयान – हाँ। इसमे तो अभी मुझे कुछ शुबह है।

मगर फिर इसके बाद उन्होंने कलिमा पढ़ लिया। और उस वक्त गो उनका ईमान मुतज़लज़ल था। लेकिन बाद में बिल आखिर वो सच्चे मुसलमान बन गए। चुनान्चे गजवए ताइफ में मुसलमानों की फौज में शामिल होकर उन्होंने कुफ्फार से जंग की और इसी में उनकी एक आँख जख्मी हो गई। फिर ये जंगे यरमूक में भी जिहाद के लिए गए।

(सीरते इने हश्शाम जि. २ स. ४०३ व जरकानी जि.२ स १३)

लश्करे इस्लाम का जाहलो जलाल

मुजाहिदीने इस्लाम का लश्कर जब मक्का की तरफ बढ़ा तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते अब्बास रदियल्लाहु अन्हु से फ़रमाया कि आप अबू सुफ़यान को किसी ऐसे मकाम पर खड़ा कर दें कि ये अफवाजे इलाही का जलाल अपनी आँखों से देख ले। चुनान्चे जहाँ रास्ता कुछ तंग था। एक बुलन्द जगह पर हज़रते अब्बास रदियल्लाहु अन्हु ने अबू सुफ़यान को खड़ा कर दिया। थोड़ी देर के बाद इस्लामी लश्कर समुन्दर की मौजों की तरह उमंडता हुआ रवाना हुआ। और क़बाइले अरब की फौजें हथियार से सज सज कर यके बाद दीगरे अबू सुफयान के सामने से गुजरने लगीं। सब से पहले कबीलए गिफार का बा वकार परचम नजर आया। अबू सुफयान ने सहम कर पूछा कि ये कौन लोग हैं? हज़रत अब्बास रदियल्लाहु अन्हु ने कहा कि ये कबीलए गिफार के शहसवार हैं। अबू सुफ़यान ने कहा कि मुझे कबीलए गिफार से क्या मतलब है? फिर जुहैना, फिर सद बिन हुजैम, फिर सुलैम के कबाएल की फौजें ज़र्क बर्क हथियारों में डूबे हुए परचम लहराते, और तकबीर के नब्रे मारते हुए सामने से

निकल गए। अबू सुफ़यान हर फौज का जलाल देखकर मरऊब

हो जाते थे और अब्बास रदियल्लाहु अन्हु से हर फौज के बारे में पूछते जाते थे कि ये कौन हैं? ये किन लोगों का लश्कर है? इसके बाद अन्सार का लश्करे पुर अनवार इतनी अजीब शान और ऐसी निराली आन बान से चला कि देखने वालों के दिल दहल गए। अबू सुफ़यान ने इस फौज की शानो शौकत से हैरान होकर कहा कि ऐ अब्बास! ये कौन लोग हैं? आपने फ़रमाया कि ये “अन्सार’ हैं। नागहाँ अन्सार के अलमबरदार हज़रते सध्द बिन उबादा रदियल्लाहु अन्हु झण्डा लिए हुए अबू सुफ़यान के करीब से गुजरे। और जब अबू सुफ़यान को देखा तो बुलन्द आवाज़ से कहा कि ऐ अबू सुफ़यान अल-यौमा यौमुल मल-हमह अल-यौमा तुस-त-हल्लुल कब (आज घमसान की जंग का दिन है। आज कबा में खून रेज़ी हलाल कर दी जाएगी।)

अबू सुफ़यान ये सुनकर घबरा गए। और हज़रते अब्बास रदियल्लाहु अनहु से कहा कि एक अब्बास! सुन लो। आज कुरैश की हलाकत तुम्हें मुबारक हो। फिर अबू सुफ़यान को चैन नहीं आया तो पूछा कि बहुत देर हो गई। अभी तक मैंने मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को नहीं देखा। कि वो कौन से लश्कर में हैं! इतने में हुजूर ताजदारे. दो आलम मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम परचमे नुबूब्बत के साया में अपने नूरानी लश्कर के हमराह पैगम्बराना जाह- जलाल के साथ नुमूदार हुए। अबू सुफ़यान ने जब शहंशाहे कौनैन को देखा तो चिल्लाकर कहा कि ऐ हुजूर! क्या आपने सुना? कि सद बिन उबादा क्या कहते हुए गए हैं? इर्शाद फरमाया कि उन्होंने क्या कहा है? अबू सुफयान बोले कि उन्होंने ये कहा कि आज कबा हलाल कर दिया जाएगा। आपने इर्शाद फरमाया कि सअद बिन

उबादा ने गलत कहा। आज तो कबा की अजमत का दिन है। आज तो कबा को लिबास पहनाने का दिन है। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि सअद बिन उबादा ने इतनी गलत बात क्यों कह दी? आपने उनके हाथ से झण्डा लेकर उनके बेटे कैस बिन सअद रदियल्लाहु अन्हु के हाथ में दें दिया।

और एक रिवायत में ये है कि जब अबू सुफयान ने बारगाहे रसूल में ये शिकायत की कि या रसूलल्लाह! अभी अभी सअद बिन उबादा ये कहते हुए गए हैं कि अल-यौमा यौमुल मल-हमह Sachin

) आज घमसान की लड़ाई का दन है।

तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने ख़फ़गी का इज़हार फ़रमाते हुए इर्शाद फरमाया कि सअद बिन उबादा ने गलत कहा। बल्कि ऐ अबू सुयान! अल-यौमा यौमुल मर-हमह (आज का दिन तो रहमत का दिन है।) (ज़रकानी जि.२ स. ३०६)

फिर फातिहाना शानो शौकत के साथं बानीए कबा के जा नशीन हुजूर रहमतुल लिल आ-लमीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मक्का की सरज़मीन में नुजूले इजलाल फ़रमाया और हुक्म दिया कि मेरा झण्डा मकाम “हजून” के पास गाड़ा जाए। और हज़रते ख़ालिद बिन वलीद रदियल्लाहु अन्हु के नाम फ्रमान जारी फ़रमाया कि वो फौजों के साथ मक्का के बालाई हिस्से यानी “कुदा” की तरफ से मक्के में दाखिल हों। (बुख़ारी जि.२ स. ६१३ ज़रकानी जि.२ स. ३०४ ता स. ३०६)

फातहे मक्का का पहला फरमान

ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मक्का की सरज़मीन में कदम रखते ही जो पहला फरमान जारी फ़रमाया वो ये एअलान था कि जिसके लफ्ज़ लफ्ज़ में रहमतों के

दरिया मौजें मार रहे हैं।

“जो शख्स हथियार डाल देगा उसके लिए अमान है।

जो शख्स अपना दरवाजा बंद करेगा उसके लिए अमान है। * जो कबा में दाखिल हो जाएगा उसके लिए अमान है।

इस मौका पर हज़रते अब्बास रदियल्लाहु अन्हु ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अबू सुफयान एक फल पसन्द आदमी है उसके लिए कोई ऐसी इम्तियाज़ी बात फरमा दीजिए कि उसका सर फन से ऊँचा हो जाए तो आपने फरमा दिया कि

अबू सुफ़यान के घर में दाखिल हो जाए उसके लिए अमान है। इसके बाद अबू सुफ़यान मक्का में बुलन्द आवाज़

से

पुकार पुकार कर एअलान करने लगा कि ऐ कुरैश! मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) इतना बड़ा लश्कर लेकर आ गए हैं कि इस का मुकाबला करने की किसी में भी ताक़त नहीं है जो अबू सुफ़यान के घर में दाखिल हो जाए उसके लिए अमान है। अबू सुफयान की ज़बान से ये कम हिम्मती की बात सुनकर उसकी बीवी हुन्द बिन्ते उतबा जल भुनकर कबाब हो गई और तैश में आकर अबू सुफयान की मूंछ पकड़ ली। और चिल्लाहकर कहने लगी कि ऐ बनी किनाना! इस कम बख़्त को कत्ल कर दो। ये कैसी बुज़दिली और कम हिम्मती की बात बक रहा है। हुन्द की इस चीख पुकार की आवाज़ सुनकर तमाम बनू किनाना का ख़ानदान अबू ‘सुफयान के मकान में जमा हो गया। और अबू सुफ़यान ने साफ साफ कह दिया कि इस वक्त गुस्से और तैश की बातों से कुछ काम नहीं चल सकता। मैं पूरे इस्लामी लश्कर को अपनी आँख से देखकर आया हूँ और मैं तुम लोगों को यकीन दिलाता हूँ कि अब हम लोगों से मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) का मुकाबला नहीं हो सकता। ये खैरियत है कि उन्होंने एलान कर दिया है कि जो अबू सुफयान के मकान में

चला जाए उसके लिए अमान है। लिहाज़ा ज़्यादा से ज़्यादा लोग मेरे मकान में आकर पनाह ले लें। अबू सुफयान के ख़ानदान वालों ने कहा कि तेरे मकान में भला कितने इन्सान आ सकेंगे? अबू सुफ़यान ने बताया कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ने उन लोगों को भी अमान दे दी है जो अपने दरवाजे बंद कर लें। या मस्जिदे हराम में दाखिल हो जाएँ। या हथियार डाल दें! अबू सुफयान का ये बयान सुनकर कोई अबू सुफयान के मकान में चला गया। कोई मस्जिदे हराम की तरफ भागा। कोई अपना हथियार ज़मीन पर रखकर खड़ा हो गया। (जरकानी जि.२ स. ३१३)

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इस एअलाने रहमत निशान यानी मुकम्मल अमन-ने अमान का फरमान जारी कर देने के बाद एक कतरा खून बहने का कोई इमकान ही नहीं था। लेकिन इकरमा बिन अबू जहल व सफवान बिन उमय्या व सुहैल बिन अमर व जिमाश बिन कैस ने मकामे “ख़न्दमा’ में मख्तलिफ कबाइल के औबाश को जमा किया था। उन लोगों ने हज़रते ख़ालिद बिनुल वलीद रदियल्लाहु अन्हु की फ़ौज में से दो आदमियों हज़रते कुर्ज बिन जाबिर फ़हरी, और हुबैश बिन अशअरी रदियल्लाहु अन्हुमा को शहीद कर दिया और इस्लामी लश्कर पर तीर बरसाना शुरू कर दिया। बुख़ारी की रिवायत में इन्ही दो हज़रात की शहादत का ज़िक्र है मगर ज़रकानी वगैरा किताबों से पता चलता है कि तीन सहाबए किराम को कुफ्फ़ारे कुरैश ने क़त्ल कर दिया ।वो जो ऊपर जिक्र किये गए और एक हज़रते सलमा बिनुल मीला रदियल्लाहु अन्हु और बारह या तेरह कुफ्फार भी मारे गए और बाकी मैदान छोड़कर भाग निकले।

(खखारी जि.२ स.693 न जरकानी जि.स. ३१०) हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जब देखा कि तलवारें चमक रही हैं तो आपने दर्याफ्त फरमाया कि मैंने ख़ालिद बिनुल वलीद को जंग करने से मन कर दिया था फिर ये तलवारें कैसी चल रही है? लोगों ने अज़ किया कि पहल कुफ्फार की

तरफ से हुई है। इस लिए लड़ने के सिवा हज़रते ख़ालिद बिनुल वलीद की फौज के लिए कोई चाराए कार ही नहीं रह गया था। ये सुनकर इर्शाद फरमया कि क़ज़ाए इलाही यही थी और खुदा ने जो चाहा वही बेहतर है।

(जरकानी जि.२ स 3990

ताजदारे दो आलम का makkah में दाखिला

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब फातिहाना हैसियत से मक्का में दाखिल होने लेगा तो आप अपनी ऊटनी “कुसवा पर सवार थे। एक स्याह रंग का इमामा बाँधे हुए थे। और बुख़ारी में है कि आप के सर पर “मगफ़रथा। आपके एक जानिव हज़रते अबू बकर सिद्दीक और दूसरी तरफ़ उसेद बिन हुजैर रदियल्लाहु अन्हुमा थे। और आपके चारों तरफ़ जोश में भरा हुआ और हथियारों में डूबा हुआ लश्कर था जिसके दर्मियान कोकबए नबवी था। इस शान- शौकत को देखकर अबू सुफ़यान ने हज़रते अब्बास रदियल्लाहु अन्हु से कहा कि – ऐ अब्बास! तुम्हारा भतीजा तो बादशाह हो गया है। हज़रते अब्बास रदियल्लाहु अन्हु ने जवाब दिया कि तेरा बुरा हो ऐ अबू सुफ़यान! ये बादशाहत नहीं है। बल्कि ये ‘नुबूव्वत है। इस शाहाना जुलूस के जाह- जलाल के बा वुजूद शाहंशाहे रिसालत की शाने तवाज़ो का ये आलम था कि आप सूरए फ़तह की तिलावत फ़रमाते हुए इस तरह सर झुकाए हुए ऊँटनी पर बैठे हुए थे कि आपका सर ऊँटनी के पालान से लग लग जाता था। आपकी कैफियते तवाज़ोअ खुदावंदे कुटूस का शुक्र अदा करने और उसकी बारगाहे अज़मत में अपने इज्ज-नियाज़ मंदी का इजहार करने के लिए थी। (ज़रकानी जि.२ स. ३२० व.स.३२१)

मक्का में हुजूर की कियामगाह

बुख़ारी की रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फ़तहे मक्का, के दिन हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु की

बहन हज़रते उम्मे हानी बिन्ते अबी तालिब के मकान पर तशरीफ़ ले गए और वहाँ गुस्ल फरमाया। फिर आठ रकअत नमाजे चाश्त पढ़ी। ये नमाज़ बहुत ही मुख्तसर तौर पर अदा फ़रमाई। लेकिन रुकूअ व सुजूद मुकम्मल तौर पर अदा फरमाते रहे।

(बखारी

निवाब मंजिलन्नती गौमल फतह) एक रिवायत में ये भी आया है कि आप ने हज़रते उम्मे हानी रदियल्लाहु अन्हा से फ़रमाया कि घर में कुछ खाना भी है? उन्होंने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम खुश्क रोटी के चन्द टुकड़े हैं। मुझे बड़ी शर्म दामनगीर होती हैकि उसको आपके सामने पेश करूँ। इर्शाद फरमाया कि “लाओ” फिर आपने दस्ते मुबारक से उन खुश्क रोटियों को तोड़ा। और पानी में भिगोकर नर्म किया। और हजरते उम्मे हानी रदियल्लाहु अन्हा ने उन रोटियों के सालन के लिए नमक पेश किया। तो आपने फ़रमाया कि क्या कोई सालन घर में नहीं है? उन्होंने अर्ज किया कि मेरे घर में “सिरका’ के सिवा कुछ भी नहीं है। आपने इर्शाद फ़रमाया कि “सिरका लाओ। आपने सिरका को रोटी पर डाला और खाकर खुदा का शुक्र बजा जाए। फिर फरमाया कि “सिरका बेहतरीन सालन है। और जिस घर में सिरका होगा उस घर वाले मुहताज न होंगे। फिर हज़रते उम्मे हानी रदियल्लाहु अन्हा ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मैं ने हारिस बिन हश्शाम (अबू जहल के भाई) और जुहैर बिन उमय्या को अमान दे दी है। लेकिन मेरे भाई हज़रते अली उन दोनों को इस जुर्म में कत्ल करना चाहते हैं कि उन दोनों ने हज़रते ख़ालिद बिनुल वलीद की फौज से जंग की है। तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ऐ उम्मे हानी! जिस को तुमने अमान दे दी उसको हमारी तरफ़ से भी अमान है।

(जरकानी जि.२ स. ३२६)

अल-महया मह-याकुम वल-ममातु

(सीरते इने हश्शाम जि. २ स. ४१६)

(अब तो हमारी ज़िन्दगी और वफात तुम्हारे ही साथ है।) ये सुनकर फर्ते मुसर्रत से अन्सार की आँखों से आँसू जारी हो गए। और सब ने कहा कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) हम लोगों ने जो कुछ दिल में ख़याल किया। या ज़बान से कहा। इसका सबब आपकी ज़ाते मुकद्दसा के साथ हमारा जज़्बए इश्क है। क्योंकि आपकी जुदाई का तसव्वुर हमारे लिए नाकाबिले बर्दाश्त हो रहा था। (जरकानी जि.2 स १३३ व सीरने इने हश्शाम जि.२ स. ४१६)

कबा की छत पर अज़ान

जब नमाज़ का वक्त आया तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते बिलाल रदियल्लाहु अन्हु को हुक्म दिया

कि कसबा की छत पर चढ़कर अज़ान दें। जिस वक्त अल्लाहु अकबर –

अल्लाहु अकबर की ईमान अफराज सदा बुलन्द हुई तो हरम के हिसार और कबा के दरदीवार पर ईमानी ज़िन्दगी के आसार नुमूदार हो गए। मगर मक्का के वो नव मुस्लिम जो अभी कुछ ठन्डे पड़ गए थे। अज़ान की आवाज़ सुनकर उनके दिलों में गैरत की आग भड़क उठी। चुनान्चे रिवायत है कि हज़रते अत्ताब बिन उसैद ने कहा कि खुदा ने मेरे बाप की लाज रख ली। कि इस आवाज़ के सुनने से पहले ही उसको दुनिया से उठा लिया और एक दूरे सरदारे कुरैश के मुँह से निकला कि “अब जीना बेकार है। (असावा तकिरए अत्ताब बिन उसैद जि.२ स. ४५१ व जरकानी जि.२ स ३४६)

मगर इसके बाद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के फैज़े सोहबत से हजरते अत्ताब बिन उसैद रदियल्लाहु अन्हु के

दिल में नूरे ईमान का सूरज चमक उठा और वो सादिकुल ईमान मुसलमान बन गए। चुनान्चे मक्का से रवाना होते वक्त हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उन्हीं को मक्का का हाकिम बना दिया।

(सीरते इने हश्शाम जि.२ स. ४१३ व ४४०)

बैअते इस्लाम

इसके बाद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कोहे सफ़ा की पहाड़ी के नीचे एक बुलन्द मकाम पर बैठे और लोग जोक दर जोक आपके दस्ते हक परस्त पर इस्लाम की बैंअत करने लगे। मर्यों की बैअत ख़त्म हो चुकी तो औरतों की बारी आई। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हर बैअत कर लेनी वाली औरत से जब वो तमाम शराएत का इकरार कर लेती तो आप उस से फ़रमा देते थे कि

‘क़द बा यअतुकि’ मैंने तुझ से बैअत ले ली। हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा का बयान है कि खुदा की कसम! आपके हाथ ने बैअत के वक्त किसी औरत के हाथ को नहीं छुवा। सिर्फ कलाम ही से बैअत फ़रमा लेते थे। (बुखारी, जि.१ स. ३७५ किताबुश-शुरूत)

उन्हीं औरतों में नकाब ओढ़कर हुन्द बिन्तें उतबा बिन रबीआ भी बैअत के लिए आईं।

। ये वही हुन्द है। जिन्होंने जंगे उहुद में हज़रते हम्ज़ा रदियल्लाहु अन्हु का शिकम चाक करके उनके जिगर को निकालकर चबा डाला था। और उनके कान नाक को काटकर और आँख को निकालकर एक धागे में पिरो कर गले का हार बनाया था। जब ये बैअत के लिए आईं तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने निहायत दिलेरी के साथ गुफ्तगू की। उनका मुकालमा हस्बे जैल है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम .

तुम खुदा के साथ किसी को शरीक मत करना।

हुन्द बिन्ते उतबा

ये इकरार आपने मों से तो नहीं लिया लेकिन बहर हाल हम को मंजूर है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम

चोरी मत करना हुन्द बिन्ते उतबा –

मैं अपने शौहर (अबू सुफयान) के माल में से कुछ ले लिया करती हूँ। मालूम नहीं ये भी जाइज़ है या नहीं। रसूलुल्लाहु सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम

अपनी औलाद को कत्ल न करना। हुन्द बिन्ते उतबा –

हम ने तो बच्चों को पाला था। और जब वो बड़े हो गए तो आपने जंगे बदर में उनको मार डाला अब आप जानें और वो

(तबरी जि.३ स. ६४३ मुख्तसरन) बहर हाल अबू सुफ़यान और उनकी बीवी हुन्द बिन्ते उतबा दोनों मुसलमान हो गए (m लिहाजा उन दोनों के बारे में बद गुमानी या उन दोनों की शान में बद जुबानी रवाफ़िज़ करी मजहब है अहले सुन्नत के नज़दीक उन दोनों का शुमार सहाबा और सहाबियात की फेहरिस्त में है।

इब्तिदा में गो उन दोनों के ईमान में कुछ तज़बजुब रहा हो। मगर बाद में ये दोनों मुसलमान हो गए।

जानें।

हज़रते बीबी आइशा रदियल्लाहु अन्हा का बयान है कि हुन्द बिन्ते उतबा बारगाहे नुबूब्बत में आईं। और ये अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम! रुए ज़मीन पर आप के घर वालों से ज़्यादा किसी घर वाले का ज़लील होना मुझे महबूब न था। मगर अब मेरा ये हाल है कि रुए ज़मीन पर आप के घर वालों से ज़्यादा किसी घर वाले का इज़्ज़तदार होना मुझे पसन्द नहीं।

(खुखारी जि.१ स. ५३९ नाब जिके इन्द्र बिन्ते उतबा)

इसका तसव्वुर भी मुहाल है। इस लिए हम तमाम दुनिया को चैलंनज के साथ दअवते नज़्ज़ारा देते हैं कि

चश्मे अकवाम ये नजारा अबद तक देखे रिफअते शान रफना लका ज़िक-रक देखे

दूसरा खुत्बा

फ़तेह मक्का के दूसरे दिन भी आपने एक खुत्बा दिया जिसमें हरमे कअबा

के अहकाम व आदाब की तअलीम दी। कि हरम में किसी का खून बहाना । जानवरों का मारना, शिकार करना, दरख़्त काटना, इज़ख़र के सिवा कोई घास काटना हराम है। और अल्लाह ने घड़ी भर के लिए अपने रसूल को हरम में जंग करने की इजाजत दी। फिर कियामत तक के लिए किसी को हरम में जंग की इजाजत नहीं है। अल्लाह ने उसको हरम बना दिया है। न मुझसे पहले किसी के लिए इस शहर में लूँ रेज़ी हलाल की गई न मेरे बाद कियामत तक किसी के लिए हलाल की जाएगी। (बुखारी जि.२ स.६१७ फतेह मुक्का)

अन्सार को फ़िराके रसूल का डर

अन्सार ने कुरैश के साथ जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इस करीमाना हुस्ने सुलूक को देखा। और. हुजूर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कुछ दिनों तक मक्का में ठहर गए तो अन्सार को ये ख़तरा लाहिक हो कि शायद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर अपनी कौम और वतन की महब्बत गालिब आ गई है। कहीं ऐसा न हो कि आप मक्का में इकामत फरमा लें। और हम लोग आपसे दूर हो जाएँ जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अन्सार के इस ख़याल की इत्तिलाअ हुई। तो आपने फ़रमाया कि मआज़ल्लाह! ऐ अन्सार!

“आज तुम पर कोई इल्ज़ाम नहीं जाओ तुम सब आज़ाद हो।’

बिल्कुल गैर मुतवक्का तौर पर एक दक अचानक ये फ़रमाने रहमत सुनकर सब मुजरिमों की आँखें फ़र्ते नदामत से अश्कबार हो गईं। और उनके दिलों की गहराईयों से जज्बाते शुक्रिया के आसार आँसुओं की धार बनकर उनके रुख्सार पर मचलने लगे। और कुफ्फार की ज़बानों पर – लॉ इलाहा इल्लल्लाहु मुहम्मदुर रसूलुल्लाह’ के नअरों से हरमे कअबा के दर- दीवार पर हर तरफ अनवार की बारिश होने लगी। नागहाँ बिल्कुल ही अचानक और दफ़अतन एक अजीब इन्क़लाब बरपा हो गया कि समाँ ही बदल गया। फज़ा ही पलट गई। और एक ऐसा महसूस होने लगा कि

जहाँ तारीक था, बे नूर था और सख़्त काला था कोई पर्दे से क्या निकला कि घर घर में उजाला था

कुफ्फार ने मुहाजिरीन की जाएदादों; मकानों, दुकानों पर गासिबाना कब्जा जमा लिया था। अब वक़्त था कि मुहाजिरीन को उनके हुकूक दिलाए जाते। और उन सब की जाएदादों, मकानों, दुकानों, और सामानों को मक्का के गासिबों के कब्जों से वागुज़ार करके मुहाजिरीन के सिपुर्द किए जाते। लेकिन शहंशाहे रिसालत ने मुहाजिरीन को हुक्म दे दिया कि वो अपनी कुल जाएदादें खुशी खुशी मक्का वालों को हिबा कर दें।

अल्लाहु अकबर! ऐ अकवामे आलम की तारीख़ी दासताना! बताओ क्या दुनिया के किसी फातेह की किताबे ज़िन्दगी में कोई ऐसा हसीन व ज़रौं वर्क है? ऐ धरती! खुदा के लिए बताओ? ऐ आस्मान! लिल्लाह बोल! क्या तुम्हारे दर्मियान कोई ऐसा फातेह गुज़रा है? जिसने अपने दुश्मनों के सथ ऐसा हुस्ने सुलूक किया हो? ऐ चाँद और सूरज की चमकती और दूरबी निगाहो! क्या तुम ने लाखों बरस की गर्दिशे लैल- नहार में कोई ऐसा ताजदार देखा है? तुम इसके सिवा और क्या कहोगे? कि ये नबी जमालजलाल का वो बेमिसाल शाहकार है। कि शाहाने आलम के लिए

ये सोच रहे थे कि शायद आज हमारी लाशों को कुत्तों से नुचवाकर, हमारी बोटीयाँ चीलों और कव्वों को खिला दी जाएंगी। और अन्सार व मुहाजिरीन की गज़बनाक फौजें हमारे बच्चे बर्च को खाक

खून

में मिलाकर हमारी नस्लों को निस्त- नाबूद कर डालेंगे और हमारी बस्तियों को ताख्त व ताराज करके तहस नहस कर डालेंगे। उन मुजरिमों के सीनों में ख़ौफ़- हरास का तूफान उठ रहा था। दहशत और डर से उन के बदनों की बोटी बोटी फड़क रही थी, दिल धड़क रहे थे, कलेजे मुँह में आ गए थे। और आलमे यास में उन्हें जमीन से आस्मान तक धुएँ ही धुएँ के खौफनाक बादल नज़र आ रहे थे। इस मायूसी और ना उम्मीदी की ख़तरनाक फ़ज़ा में एक दम शहंशाहे रिसालत की निगाहे रहमत उन पापियों की तरफ़ मुतवज्जोह हुई। और उन मुजरिमों से आपने पूछा कि “बोलो तुम को कुछ मालूम है? कि आज मैं

तुम

से मामला करने वाला हूँ।

इस दहशत अंगेज़ और ख़ौफ़नाक सवाल से मुजरिमीन हवास बाख्ता होकर काँप उठे। लेकिन जबीने रहमत के पैगम्बराना तेवर को देखकर उम्मीद-ने बीम के महशर में लरज़ते हुए सब यक ज़बान होकर बोले कि – अखुन करीमुन वनु अखिन करीमिन “आप करम वाले भाई, और करम वाले बाप के बेटे हैं।

सब की ललचाई हुई नज़रें जमाले नुबूव्वत का मुँह तक रही थीं और सब के कान शहंशाहे नबूव्वत का फैसला कुन जवाब सुनने के मुन्तज़िर थे कि एक दम दफअतन फातहे मक्का ने अपने करीमाना लहजे में इर्शाद फरमाया कि ला तस-रीबा अलैकुमुल यौमा फज-हबू-अन्तुमुत तु-ल-काउ (ज़रकानी जि.२ स. ३२८)

बार बार आप पर कातिलाना हमले किये थे। वो बे रहम वबे दर्द, भी थे जिनहोंने आपके दन्दाने मुबारक को शहीद और आपके चेहरए अनवर को लुहू लुहान कर डाला था। वो औबाश भी थे जो बरसहा बरस तक अपनी बोहतान तराशियों और शर्मनाक गालियों से आपके कल्ब मुबारक को जख्मर कर चुके थे। वो सफ्फाक व दरिन्दा सिफ़त भी थे जो आपके गले में चादर का फंदा डालकर आपका गला घोंट चुके थे। वो जुल्म-7 सितम के मुजस्समें और

पाप के पुतले भी थे जिन्होंने आपकी साहबज़ादी हज़रते जैनब रदियल्लाहु अन्हा को नेज़ा मारकर ऊँट से गिरा दिया था। और उनका हमल साकित हो गया था वो आपके खून के प्यासे भी थे जिनकी तिश्ना लबी और प्यास खूने नुबूव्वत के सिवा किसी चीज़ से नहीं बुझ सकती थी। वो जफाकार व खूख़्वार भी थे जिनके जारहाना हमलों और ज़ालिमाना यलगार से बार बार मदीना मुनव्वरा के दर- दीवार हिल चुके थे। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के प्यारे चचा हज़रते हम्ज़ रदियल्लाहु अन्हु के कातिल और उनकी नाक कान, काटने वाले उनकी आँखें फोड़ने वाले, उनका ज़िगर चबाने वाले भी इसी मजमझ में मौजूद थे। वो सितमगार जिन्होंने शमओ नुबूव्वत के जाँ निसार परवानों हज़रते बिलाल, हज़रते सुहैब, हज़रते अम्मार, हज़रते हब्बाब, हज़रते खुबैब, हज़रते जैद बिन दसिना वगैरा रदियल्लाहु अन्हुम को रस्सीयों से बाँध बाँधकर कोड़े मार मारकर जलती हुई रेतों पर लिटाया था। किसी को आग के दहकते हुए कोयलों पर सुलाया था। किसी को चटाईयों में लपेट लपेटकर नाकों में धुएँ दिए थे, सैंकड़ों बार गला घोंटा था। ये तमाम जौर- जफ़ा और जुल्म- सितमगारी के पैकर, जिनके जिस्म के रौंगटे रौंगटे और बदन. के बाल बाल, जुल्म उदवान और सरकशी व तुग़यान के वबाल से खौफनाक जुर्मों और शर्मनाक मज़ालिम के पहाड़ बन चुके थे। आज ये सब के सब दस बारह हज़ार मुहाजिरीन व अन्सार के लश्कर की हिरासत में मुजरिम बने हुए खड़े काँप रहे थे और अपने दिलों में

अपने बन्दे (हुजूर अलैहिस्सलाम) की मदद की। और (कुफ्फार के) तमाम लश्करों को तन्हा शिकस्त दे दी। तमाम फख की बातें। तमाम पुराने खूनों का बदला। तमाम पुराने खू बहा, और जाहिलीयत की रस्में सब मेरे पैरों के नीचे हैं। सिर्फ कबा की तौलिय्यत और हुज्जाज को पानी पिलाना। ये दो एजाज़ इस से मुसतसना(बरी) हैं। ऐ कौमे कुरैश! अब जाहिलीयत का गुरूर, और खानदानों का इफ्तिख़ार खुदा ने मिटा दिया। तमाम लोग हजरते आदम अलैहिस्सलाम की नस्ल से हैं। और हज़रते आदम अलैहिस्सलाम मिट्टी से बनाए गए हैं।”

इसके बाद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने कुरआने मजीद की ये आयत तिलावत फ़रमाई जिसका तर्जमा ये

“ऐ लोगो! हमने तुमको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हारे लिए कबीले और ख़ानदान बना दिये ताकि तुम आपस में एक दूसरे की पहचान रखो। लेकिन खुदा के नज़दीक सब से ज़्यादा शरीफ़ वो है जो सब से ज़्यादा परहेजगार है। यकीनन अल्लाह तआला बड़ा जानने वाला और खबर रखने वाला है।

बेशक अल्लाह ने शराब की ख़रीदो फरोख्त को हराम फ़रमा दिया है।” (सीरते इन्ने हश्शाम जि.२ सं. ४१२ मुख्तसरन व बखारी वगैरा)

कुफ्फारे मक्का से खिताब

इसके बाद शहंशाहे कौनैन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उस हज़ारों के मजमअ में एक गहरी निहाग डाली। तो देखा कि सर झुकाए निगाहें नीची किये हुए लरज़ाँ व तरसाँ अशराफे कुरैश खड़े हुए हैं। उन ज़ालिमों और जफा कारों में वो लोग भी थे। जिन्होंने आपके रास्तों में काँटे बिछाए थे। वो लोग भी थे जो बारहा आप पर पत्थरों की बारिश कर चुके थे। वो खूख्वार भी थे जिन्होंने

उनको देखकर फरमाया कि अल्लाह तआला उन काफिरों को मार डाले। उन काफिरों को खूब मालूम है कि उन दोनों पैगम्बरों ने कभी भी अपना फाल नहीं खोला। जब तक एक एक बुत कबा के अन्दर से न निकल गया। आपने कबा के अन्दर कदम नहीं रखा जब तमाम बुतों से कबा पाक हो गया। तो आप अपने साथ हज़रते उसामा बिन जैद और हज़रते बिलाल रदियल्लाहु अन्हुमा और उस्मान बिन तलहा हजबी को साथ लेकर खानए कबा के अन्दर तशरीफ ले गए। और बैतुल्लाह शरीफ के तमाम गोशों में तकबीर पढ़ी। और दो रकअत नमाज़ भी अदा फ़रमाई। इसके बाद बाहर तशरीफ़ लाए। (बुख़ारी जि.१ स. २१८ बाब मन कबर फी नवाहिल कबा व बुख़ारी जि.२ स. ६१४ फ़तेह मक्का वगैरा)

कबा मुकद्दसा के अन्दर से जब आप बाहर निकले तो उस्मान बिन तलहा को बुला का कबा की कुंजी उनके हाथ में अता फरमाई और इर्शाद फरमाया कि –

खुजूहा ख़ालि-दतन तालि-दतन ला यन्-जऊहा मिन्कुम इल्ला ज़ालिमुन। (ज़रकानी जि.२ स. २३९)

शहंशाहे रिसालत का दरबारे आम

इसके बाद ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम शहंशाहे इस्लाम की हैसियत से हरमे इलाही में सब से पहला दरबारे आम मुनअकद फरमाया जिस में अफ़वाज़े इस्लाम के अलावा हज़ारों कुफ्फार व मुशरिकीन के ख्वास व अवाम का एक ज़बरदस्तं अज़दहाम था। इस शहंशाही खुत्बा में आपने सिर्फ अहले मक्का ही से नहीं बल्कि तमाम अक़वामे आलम से खिताबे आम फरमाते हुए ये इर्शाद फरमाया कि

“एक खुदा के सिवा कोई मबूद नहीं। उस का कोई शरीक नहीं। उस ने अपना वदा सच कर दिखाया। उस ने

बैतुल्लाह में दाखिला

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का झन्डा हजून’ में जिसको आजकल जन्नतुल मुअल्ला कहते हैं। “मस्जिदुल फतह के करीब में गाड़ा गया। फिर आप अपनी ऊँटनी पर सवार होकर और हज़रते उसामा बिन जैद को ऊँटनी पर अपने पीछे बिठाकर मस्जिदे हराम की तरफ रवाना हुए और हज़रते बिलाल रदियल्लाहु अन्हु और कबा के कलीद बरदार उस्मान बिन तलहा हजबी भी आपके साथ थे। आपने मस्जिदे हराम में अपनी ऊँटनी को बिठाया और कबा का तवाफ़ किया और हजरे असवद को बोसा दिया।

(बुखारी जि.२ स ६१४ वरोरा) ये इन्कलाबे ज़माना की एक हैरत अंगेज़ मिसाल है कि हज़रते इब्राहीम ख़लीलुल्लाह अलैहिस सलातु वस्सलाम जिन का लकब “बुत शिकन” है। उनकी यादगार ख़ानए कबा के अन्दरूने हिसार तीन सौ साठ बुतों की कतार थी। फातहे मक्का सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का हज़रते खलील का जानशीने जलील होने की हैसियत से फर्जे अव्वलील था कि यादगारे ख़लील को बुतों की नजिस और गन्दी आलाइशों से पाक कर दें चुनान्चे आप खुद ब-नफ्से नफीस एक छड़ी लेकर खड़े हुए। और उन बुतों को छड़ी की नोक से ठोंके मार मार कर गिराते जाते थे और

“जॉ-अल हक्कु व जह-कल बातिल’ की आयत तिलावत फरमाते जाते थे, यानी । हंक आ गया और, बातिल मिट गया। और बातिल मिटने ही की चीज थी! (बखारी जि.२ स. ६१२ फतेह मक्का वगैरा).

फिर उन बुतों को जो जैन कबा के अन्दर थे। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हुक्म दिया कि वो सब निकाले जाएँ चुनान्चे वो सब बुत निकाल बाहर किये गए। उन्हीं बुतों में हज़रते इब्राहीम व हज़रते इस्माईल अलैहुमस्सलाम के मुजस्समे भी थे जिनके हाथा में फाल खोलने के तीर थे।

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