हिजरत का छटा साल part 2

मज़लूमीने मक्का

हिजरत के बाद जो लोग मक्का में मुसलमान हुए उन्होंने कुफ्फार के हाथों बड़ी बड़ी मुसीबतें बर्दाश्त की। उनको जन्जीरों में बाँध बाँधकर कुफ्फार कोड़े मारते थे लेकिन जब भी उनमें से कोई शख़्स मौकअ पाता तो छुपकर मदीना आ जाता था। सुलहे हुदैबिया ने इसका दरवाजा बंद कर दिया। क्योंकि इस सुलहनामा में ये शर्त तहरीर थी कि मक्का से जो शख्स भी हिजरत करके मदीना जाएगा वो फिर मक्का वापस भेज दिया जाएगा।

हज़रते अबू बसीर का कारनामा

सुलहे हुदैबिया से फारिग हो कर जब हुजूर सल्लल्लाहु

तआला अलैहि वसल्लम मदीना वापस तशरीफ़ लाए तो सब से पहले जो बुजुर्ग मक्का से हिजरत करके मदीना आए वो अबू

बसीर रदियल्लाहु अन्हु थे। कुफ्फारे मक्का ने फौरन ही दो आदमियों को मदीना भेजा कि हमारा आदमी वापस कर दीजिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हजरते अबू बसीर रदियल्लाहु अन्हु

से फरमाया कि “तुम मक्का चले जाओ” तुम जानते हो कि हम ने कुफ्फारे कुरैश से मुआहदा कर लिया है। और हमारे दीन में अहद शिकनी और गद्दारी जाइज़ नहीं। हज़रते अबू बसीर रदियल्लाहु . अन्हु ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! क्या आप मुझको काफिरों के हवाले फरमाएँगे ताकि वो मुझको कुफ्र पर मजबूर करें? आपने इर्शाद फ़रमाया कि तुम जाओ! खुदावंदे करीम, तुम्हारी रिहाई का कोई सबब बना देगा। आख़िर मजबूर होकर अबू बसीर रदियल्लाहु अन्हु दोनों काफिरों की हिरासत में मक्का वापस हो गए। लेकिन जब मकामे “जुल हलीफ़ा” में पहुंचे तो सब खाने के लिए बैठे। और बातें करने लगे। हज़रते अबू बसीर रदियल्लाहु अन्हु ने एक काफ़िर से कहा कि अजी! तुम्हारी तलवार बहुत अच्छी मालूम होती है। उसने खुश होकर नियाम से तलवार निकालकर दिखाई और कहा कि बहुत उम्दा तलवार है। और मैं ने बारहा लड़ाईयों में इसका तजर्बा किया है। हज़रते अबू बसीर रदियल्लाहु अन्हु ने कहा कि ज़रा मेरे हाथ में तो दो । मैं भी देखू कि कैसी तलवार है? उसने उनके हाथ में तलवार दे दी उन्होंने तलवार हाथ में लेकर इस ज़ोर से तलवार मारी कि काफिर की गर्दन कट गई। और उसका सर दूर जा गिरा। उसके साथी ने जो ये मंजर देखा तो वो सर पर पैर रखकर भागा। और सर पट दौड़ता हुआ मदीना पहुँचा, और मस्जिदे नबवी में घुस गया। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उसको देखते ही फरमाया कि ये शख्स ख़ौफ़ज़दा मालूम होता है। उसने हाँपते काँपते हुए बारगाहे नुबूब्बत मे अर्ज किया कि मेरे साथी को अबू बसीर ने कत्ल कर दिया। और मैं भी ज़रूर मारा जाऊँगा। इतने में हजरते अबू बसीर

रदियल्लाहु अन्हु भी नंगी तलवार हाथ में लिये हुए आन पहुँचे। और अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) अल्लाह तआला ने आपकी ज़िम्मेदारी पूरी कर दी। क्योंकि सुलहनामा की शर्त के ब-मूजिब आपने तो मुझको वापस कर दिया। अब ये अल्लाह तआला की मेहरबानी है कि उसने मुझ को उन काफिरों से नजात दे दी। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इस वाकिआ से बड़ा रंज पहुँचा और आपने खफा होकर फरमाया कि वैलु उम्मिही मिस-अरु हरबिन लौ काना लहू अ-हदुन। इसकी माँ मरे! ये तो लड़ाई भड़का देगा काश इसके साथ कोई आदमी होता जो इसको रोकता.।

हज़रते अबू बसीर रदियल्लाहु अन्हु इस जुमले से समझ गए। कि मैं फिर काफिरों की तरफ लौटा दिया जाऊँगा। इस लिए वो वहाँ से चुपके से खिसक गए। वो साहिले, समुन्दर के करीब मकामे “अस” में जाकर ठहरे इधर मक्का से हज़रते अबू जन्दल रदियल्लाहु अन्हु अपनी जन्जीर काटकर भागे। और वो भी वहीं पहुंच गए। फिर मक्का के दूसरे मज़लूम मुसलमानों ने भी मौका पाकर कुफ्फार की कैद से निकलकर यहाँ पनाह लेनी शुरू कर दी। यहाँ तक कि उस जंगल में सत्तर आदमियों की जमाअत जमा हो गई। कुफ्फ़ारे कुरैश के तिजारती काफ़िलों का यही रास्ता था.। जो काफ़िला भी आमद-ने रफ्त में यहाँ से गुज़रता। ये लोग उसको लूट लेते। यहाँ तक कि कुफ्फारे कुरैश का नाक में दम कर दिया। बिल आख़िर कुफ्फारे कुरैश ने खुदा और रिश्तेदारी का वास्ता देकर हुजूर. सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ख़त लिखा कि हम सुलहनामा में अपनी शर्त से बाज़ आए। आप लोगों को साहिले समुन्दर से मदीना बुला लीजिए। और अब हमारी तरफ़ से इजाज़त है कि जो मुसलमान भी मक्का

से भागकर मदीना जाए आप उसको मदीना में ठहरा लीजिए। हमें इस पर कोई एअतिराज न होगा।

(बुख़ारी बाबुश-शुरूत फिल जिहाद जि. १ स. ३८०) ये भी रिवायत है कि कुरैश ने खुद अबू सुफयान को मदीना भेजा कि हम सुलहनामा हुदैबिया में अपनी शर्त से दस्त बरदार हो गए। लिहाजा आप अबू बसीर रदियल्लाहु अन्हु को मदीना बुला लें। ताकि हमारे तिजारती काफिले उन लोगों के कत्ल- गारत से महफूज़ हो जाएँ । चुनान्चे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते अबू बसीर रदियल्लाहु अन्हु के पास ख़त भेजा कि तुम अपने साथियों समेत मकाम “अससे मदीना चले आओ। मगर अफ्सोस! फ़रमाने रिसालत उनके पास ऐसे वक्त पहुँचा जब वो नज़अ की हालत में थे। मुकद्दस ख़त को उन्होंने अपने हाथ में लेकर सर और आँखों पर रखा और उनकी रूह परवाज़ कर गई। हज़रते अबू जन्दल रदियल्लाहु अन्हु ने अपने साथियों के साथ मिल जुलकर उनकी तहजीज़ व तकफ़ीन का इन्तिज़ाम किया। और दफ्न के बाद उनकी कब्र शरीफ के पास यादगार के लिए एक मस्जिद बना दी। फिर फ़रमाने रसूल के ब-मूजिब ये सब लोग वहाँ से आकर मदीना में आबाद हो गए।

(मदारिजुन्नुबूब्बत जि. २ स. २१८)

सलातीन (बादशाहो) के नाम दवते इस्लाम

सन्न ६ हिजरी में सुलहे हुदैबिया के बाद जंग- जदाल के ख़तरात टल गए। और हर तरफ़ अम्न- सुकून की फ़ज़ा पैदा हो गई। तो चूँकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नुबूव्वत व रिसालत का दाएरा सिर्फ ख़ित्तए अरबं ही तक महदूद न था। बल्कि आप तमाम आलम के लिए नबी बनाकर भेजे गए. थे। इस लिए आपने इरादा फरमाया कि इस्लाम का पैगाम तमाम दुनिया में पहुंचा दिया जाए। चुनान्चे आपने रूम के बादशाह

सीरतुल मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला

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“कैसर” फारस के बादशाह “किसरा” हब्शा के बादशाह “नजाशी” मिस्र के बादशाह “अजीजे मिस्र” और दूसरे सलातीने अरब व अजम के नाम दअवते इस्लाम के खुतूत रवाना फ़रमाए ।’

सहाबए किराम में से कौन कौन हजरात उन खुतूत को लेकर किन किन बादशाहों के दरबबार में गए? उनकी फेहरिस्त काफी तवील है। मगर एक ही दिन छे खुतूत लिखवाकर और अपनी मुहर लगाकर जिन छे कासिदों को जहाँ जहाँ आपने रवाना फरमाया वो ये हैं। (1) हज़रते दिया कल्बी रदियल्लाहु अन्हु

हरकुल कैसरे रूम के दरबार में। (2) हज़रते अब्दुल्लाह बिन हुज़ाफा रदियल्लाहु अन्हु

खुसरो परवेज़ शाहे ईरान के दरबार में। (3) हज़रते हातिब रदियल्लाहु अन्हु

मुक़ौ-किस अज़ीज़ मिस्र के दरबार में। (4) हज़रते अमर बिन उमय्या रदियल्लाहु अन्हु

नजाशी बादशाह हब्शा के दरबार में। (5) हज़रते सुलैत बिन उमर रदियल्लाहु अन्हु

हौजा, बादशाहे यमामा के दरबार में। (6) हजरते शुजाअ बिन वहब रदियल्लाहु अन्हु

हारिस गस्सानी वाली गस्सान के दरबार में |

नामए मुबारक और कैसर

हज़रते दिहया कल्बी रदियल्लाहु अन्हु हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का मुकद्दस ख़त लेकर “बुसरा” तशरीफ ले गए। और वहाँ कैसर रूम के गवर्नरे शाम हारिस गस्सानी को दिया। उसने उस नामए मुबारक को “बैतुल मुक़द्दस भेज दिया। क्योंकि कैसरे रूम (हरकुल) उन दिनों बैतुल मुकद्दस के दौरे पर आया हुआ था। कैसर को जब ये मुबारक खत मिला। तो उसने

सल्लल्लाहु तआला हुक्म दिया कि कुरैश का कोई आदमी मिले तो उसको हमारे दरबार में हाज़िर करो। कैसर के हुक्काम ने तलाश किया। तो इत्तिफाक से अबू सुफयान और अरब के कुछ ताजिर मिल गए। ये सब लोग कैसर के दरबार में लाए गए। कैसर ने बड़े तमतराक के साथ दरबार मुनअकिद किया। और ताजे शाही पहन कर तख्त पर बैठा। और तख्त के गिर्द अराकीने सल्तनत, बतारका, और अहबार व रुहबान वगैरा सफ बाँधकर खड़े हो गए। इसी हालत में अरब के ताजिरों का गिरोह दरबार में हाजिर किया गया। और शाही महल के तमाम दरवाजे बंद कर दिये गए। फिर कैसर ने तर्जुमान को बुलाया। और उसके जरीओ गुफ़्तुगू शुरू की। सब से पहले कैसर ने ये सवाल किया कि अरब में जिस शख्स ने नुबूव्वत का दअवा किया है। तुम में से उनका सब से करीबी रिश्तेदार कौन है? अबू सुफ़यान ने कहा कि “मैं” कैसर ने उनको सब से आगे किया। और दूसरे अरबों को उनके पीछे खड़ा किया। और कहा कि देखो! अगर अबू सुफ़यान कोई गलत बात कहे तो तुम लोग उसका झूट ज़ाहिर कर देना। फिर कैसर और अबू सुफ़यान में जो मुकालमा हुआ वो ये है :कैसर मुद्दई-ए-नुबूब्बत का ख़ानदान कैसा है? अबू सुफयान उनका खानदान शरीफ है। कैसर क्या इस खानदान में इनसे पहले भी किसी ने

नुबूव्वत का दअवा किया था? अबू सुफ़यान नहीं। कैसर क्या उनके बाप दादाओं में कोई बादशाह था? अबू सुफ़यान नहीं। कैसर जिन लोगों ने उनका दीन कुबूल किया है वो

कमजोर लोग हैं, या साहिबे असर? अबू सुफ़यान कमज़ोर लोग हैं। कैसर उनके मुत्तबेइन बढ़ रहे हैं या घटते जा रहे हैं? अबू सुफयान बढ़ते जा रहे हैं।

कैसर क्या कोई उनके दीन में दाखिल होकर फिर इस

को ना पसन्द करके पलट भी जाता है? अबू सुफयान नहीं। कैसर

क्या नुबूव्वत का दवा करने से पहले तुम लोग

उन्हें झूटा समझते थे अबू सुफ़यान नहीं। कैसर

क्या वो कभी अहद शिकनी और वअदा खिलाफी

भी करते हैं? अबू सुफयान अभी तक तो नहीं की है। लेकिन अब हमारे और

उनके दर्मियान (हुदैबिया) में जो एक नया मुआहदा

हुआ है। मालूम नहीं वो इसमें क्या करेंगे? कैसर

क्या कभी तुम लोगों ने उनसे जंग भी की है? अबू सुफ़यान हाँ कैसर नतीजए जंग क्या रहा? अबू सुफ़यान कभी हम जीते कभी वो। कैसर वो तुम्हें किन बातों का हुक्म देते हैं? अबू सुफ़यान वो कहते हैं कि सिर्फ एक खुदा की इबादत करो।

किसी और को खुदा का शरीक न ठहराओ। बुतों को छोड़ो, नमाज़ पढ़ो। सच बोलो। पाकदामनी

इख्तियार करो। रिश्तेदारों के साथ नेक सुलूक करो। इस सवाल- जवाब के बाद कैसर ने कहा। कि तुमने उनको खानदानी शरीफ बताया है। और तमाम पैगम्बरों का यही हाल है कि हमेशा पैगम्बर अच्छे ख़ानदानों ही में पैदा होते हैं। तुम ने कहा कि उनके खानदान में कभी किसी और ने नुबूव्वत का दवा नहीं किया। अगर ऐसा होता तो मैं कह देता कि ये शख़्स औरों की तरह नकल उतार रहा है। तुम ने इकरार किया है कि उनके खानदान में कभी कोई बादशाह नहीं हुआ है। अगर ये बात होती तो मैं समझ लेता कि ये शख्स अपने आबा व अजदाद की बादशाही का तलबगार है। तुम मानते हो कि नुबूब्बत का दवा

करने से पहले वो कभी झूट नहीं बोल तो जो इसा में झूट नहीं बोलता। भला वो खुदा पर क्योंकर झूट बाँध सकता। तुम कहते हो कि कमजोर लोगों ने उनके दीन को कुबूल किया है तो सुन लो हमेशा इब्तिदा में पैगम्बरों के मुत्तयेईन मुफ्लिस और कमजोर ही लोग होते रहे हैं। तुम ने ये तस्लीम किया है कि उनकी पैरवी करने वाले बढ़ते ही जा रहे हैं तो ईमान का मामला हमेशा ऐसा ही रहा है कि उसके मानने वालों की तथदाद हमेशा बढ़ती ही जाती है। तुम को ये तस्लीम है कि कोई उनके दीन से फिर कर मुर्तद नहीं हो रहा है। तो तुम्हें मालूम होना चाहिए कि ईमान की शान,ऐसी ही हुआ करती है जब उसकी लज्जत किसी के दिल में घर कर लेती है तो फिर वो कमी निकल नहीं सकती तुम्हें इसका एअतिराफ़ है कि उन्होंने कभी कोई गद्दारी और बद अह्दी नहीं की है तो रसूलों का यही हाल होता है कि वो कभी कोई दगा फरेब का काम करते ही नहीं। तुमने हमें बताया कि वो खुदाए-वाहिद की इबादत, शिर्क से परहेज़, बुत परस्ती से मुमानअत, पाकदामनी, सिलाए रहमी का हुक्म देते हैं। तो सुन लो कि तुम ने जो कुछ कहा है। अगर ये सही है तो वो अनकरीब इस जगह के मालिक हो जाएँगे जहाँ इस वक्त मेरे क़दम हैं। और मैं जानता हूँ कि एक रसूल का जुहूर होने वाला है मगरा मेरा ये गुमान नहीं था कि वो रसूल तुम अरबों में से होगा। अगर मैं ये जान लेता कि मैं उनकी बारगाह में पहुँच सकूँगा तो मैं तकलीफ़ उठाकर वहाँ तक पहुँचता। और अगर मैं उनके पास होता तो मैं उनका पावँ धोता। कैसर ने अपनी इस तकरीर के बाद हुक्म दिया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ख़त पढ़कर सुनाया जाए। नामए मुबारक की इबारत ये थी। अल्लाह के नाम से शुरू जो निहायत मेहरबान रहम वाला। अल्लाह के बन्दे और रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला

अलैति

का तरफ से ये खत कुल के नाम है जो रूम का बादशाह है उस शख्स पर सलामती हो जो हिदायत का पैरो है।

इसके बाद मैं तुझको इस्लाम की दअवत देता हूँ तू मुसलमान हो जा। तू सलामत रहेगा। खुदा तुम को दुगना सवाब देगा। और अगर तूने रूगरदानी की तो तेरी तमाम रिआया का गुनाह तुझ पर होगा। ऐ अले किताब एक ऐसी बात की तरफ़ आओ जो हमारे और तुम्हारे दर्मियान यकसाँ है और वो ये है कि हम खुदा के सिवा किसी की इबादत न करें और हम में से खुदा के सिवा किसी की इबादत न करें और हम में से बअज़ लोग दूसरे बअज़ लोगों को खुदा न बनाएँ और अगर तुम नहीं मानते तो गवाह हो जाओ कि हम मुसलमान हैं!

कैसर ने अबू सुफ़यान से गुफ्तुगू की इस से उसके दरबारी पहले ही इन्तिहाई बरहम और बेज़ार हो चुके थे। अब ये ख़त सुना। फिर जब कैसर ने उन लोगों से ये कहा कि ऐ जमाअते रूम! अगर तुम अपनी फलाह, और बादशाही की बका चाहते हो तो इस नबी की बैअत कर लो। तो दरबारियों में इस क़दर नाराज़गी और बेज़ारी फैल गई कि वो लोग जंगली गधों की तरह बिदक बिदककर दरबार से दरवाज़ों की तरफ भागने लगे। मगर चूँकि तमाम दरवाजे बंद थे। इस लिए वो लोग बाहर न निकल सके। जब कैसर ने अपने दरबारियों की नफरत का ये मंज़र देखा तो वो उन लोगों के ईमान लाने से मायूस हो गया और उसने कहा

कि इन दरबारियों की को बुलाओ। जब सब आ गए तो कैसर ने कहा कि अभी अभी मैं ने तुम्हारे सामने जो कुछ कहा। इस से मेरा मकसद तुम्हारे दीन की पुख्तगी का ईमान लेना था। तो मैंने देख लिया कि तुम लोग अपने दीन में बहुत पक्के हो। ये सुनकर तमाम दरबारी कैसर के सामने सज्दा में गिर पड़े और अबू सुफयान वगैरा दरबार से बाहर निकाल दिए गए। और दरबार बरखास्त हो गया। चलते वक्त अबू सुफयान ने अपने साथियों से कहा कि अब यकीनन अबू कब्शा के बेटे (मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) का मामला बहुत बढ़ गया है। देख लो। रूमियों का बादशाह उन से डर रहा है। (बुख़ारी बाब कैफा काना बददुल वही जि. १ स.४ ता ५ व मुस्लिम जि. २ ९७ ता ९९ व मदारिज जि.२ स. २२१ वगैरा)

कैसर चूँकि तौरात व इन्जील का माहिर और इल्मे नुजूम से वाकिफ था इस लिए वो नबीए आख़िरुज-ज़माँ के जुहूर से बा ख़बर था। और अबू सुफयान की ज़बान से हालात सुनकर उसके दिल में हिदायत का चिराग रौशन हो गया था। मगर सल्तनत की हिरस- हवंस की आँधियों ने इस चिरागे हिदायत को बुझा दिया। और वो इस्लाम की दौलत से महरूम रह गया!

खुसो परवेज़ की बद दिमागी

तकरीबन इसी मज़मून के खुतूत दूसरे बादशाहों के पास भी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने रवाना फ्रमाए। शहंशाहे ईरान खुसरो परवेज़ के दरबार में जब नामए मुबारक । पहुँचा। तो सिर्फ इतनी सी बात पर उस के गुरूर और घमण्ड का. पारा इतना बढ़ गया कि उसने कहा कि इस ख़त में मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ने मेरे नाम से पहले अपना नाम क्यों लिखा? ये कहकर उसने फरमाने रिसालत फाड़ डाला। और पुर्जे पुर्जे करके ख़त को ज़मीन पर फेंक दिया। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ये खबर मिली तो आपने

फरमाया कि मज्जका किताबी मज्ज़कल्लाहु मुल कहू (इसने मेरे खत को टुकड़े टुकड़े कर डाला खुदा उसकी सल्तनत को टुकड़े टुकड़े कर दे।)

चुनान्चे उसके बाद ही खुसो परवेज़ को इसके बेटे शीरवया ने रात में साते हुए उस का शिकम फाड़कर उसको कत्ल कर दिया। और उसकी बादशाही टुकड़े टुकड़े हो गई। यहाँ तक कि हज़रत अमीरुल मुमिनीन उमर फारूके अअज़म रदियल्लाहु अन्हु के दौरे खिलाफ़त में ये हुकूमत सफहए हस्ती से मिट गई।

(मदारिजुन्नुबूब्बत जि.२ स. २२५ वगैरा व बुख़ारी जि. १ स. ४११)

नजाशी का किरदार

नजाशी बादशाहे हशा के पास जब फ़माने रिसालत पहुँचा तो उसने कोई बे अदबी नहीं की। इस मामले में मुअरिंखीन का इख़्तिलाफ़ है कि इस नजाशी ने इस्लाम कबूल किया या नहीं? मगर मवाहिबे लदुन्निया में लिखा हुआ है कि ये नजाशी जिसके पास एअलाने नुबूव्वत के पाँचवें साल मुसलमान मक्का से हिजरत करके गए’थे। और सन्न ६ हिजरी में जिसके पास हुजूर सल्लल्लाहु तआला. अलैहि वसल्लम ने ख़त भेजा। और सन्न ९ हिजरी में जिसका इन्तिकाल हुआ और मदीना में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जिसकी गाएबाना नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई इस का नाम “असहमा’ था। और ये बिला शुब्हा मुसलमाना हो गया था लेकिन इस के बाद जो नजाशी तख़्त पर बैठा उसके पास भी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस्लाम का दअवत नामा भेजा था। मगर उसके बारे में कुछ मालूम नहीं होता कि उस नजाशी का नाम क्या था? और उसने इस्लाम कुबूल किया या नहीं? मशहूर है कि ये दोनों मुकद्दस खुतूत अब तक

सलातीने हब्शा के पास मौजूद हैं और वो लोग इसका बेहद अदब व एहतराम करते हैं। वल्लाहु तआला अअलम।

(मदारिजुन्नुबूब्वत जि.२ स. २४०)

शाहे मिस्र का बरताव

हज़रते हातिब बिन अबी बलतआ रदियल्लाहु अन्हु

को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने “मुकै-किस’ मिस्र व असकन्दरिया के बादशाह के पास कासिद बनाकर भेजा। ये निहायत ही अख्लाक के साथ कासिद से मिला। और फरमाने नबवी को बहुत ही तअज़ीम व तमकरीम के साथ पढ़ा। मगर मुसलमान नहीं हुआ। हाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में चन्द चीज़ों का तोहफ़ा भेजा। दो लौंडिया एक हज़रत “मारिया कबतिया’ थीं। जो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के हरम में दाखिल हुईं। और इन्हीं के शिकमे मुबारक से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के फ़रज़नद हज़रते इब्राहीम रदियल्लाहु अन्हु पैदा हुए। दूसरी हज़रते सीरीन’ थीं जिनको आपने हज़रते हस्सान बिन साबित रदियल्लाहु अन्हु को अता फरमा दिया। उनके बतन से हज़रते हस्सान के साहिबजादे हज़रते अब्दुर्रहमान पैदा हुए। उन दोनों लौंडियों के अलावा एक सफेद गधा जिसका नाम “यअफूर था। और एक सफेद खच्चर जो “दुलदुल’ कहलाता था। एक हज़ार मिसकाल सोना, एक गुलाम, कुछ शहद, कुछ कपड़े भी थे। (मदारिजुन्नुबूब्बत जि. २ स.२२९)

बादशाहे यमामा का जवाब

हज़रते सुलैत रदियल्लाहु अन्हु जब “हुज़ा’ बादशाहे यमामा क पास ख़त लेकर पहुंचे तो उसने भी कासिद का एहतराम किया। लेकिन इस्लाम कुबूल नहीं किया और जवाब में लिखा कि आप जो बातें कहते हैं वो निहायत अच्छी हैं। अगर आप अपनी

हुकूमत में से कुछ मुझे भी हिस्सा दें तो मैं आपकी पैरवी करूंगा। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस का खत पढ़कर फरमाया कि इस्लाम मुल्क गीरी की हवस के लिए नहीं आया है। अगर जमीन का एक टुकड़ा भी हो तो मैं न दूंगा।

(मदारिजुन्नुबूव्वत जि.२ स. २२९)

हारिस गस्सानी का घमन्ड

हज़रते शुजाअ रदियल्लाहु अन्हु ने जब हारिस गस्सानी वालिए गस्सान के सामने नामए अकदस को पेश किया तो दो मगरूर खत को पढ़कर बरहम हो गया। और अपनी फौज को तय्यारी का हुक्म दे दिया। चुनान्चे मदीना के मुसलमान हर वक्त उसके हमले के मुन्तज़िर रहने लगे। और बिल आख़िर गज़वए मूता और गज़वए तबूक के वकिआत दरपेश हुए। जिनका मुफ़स्सल तकिरा हम आगे तहरीर करेंगे।

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इन बादशाहों के अलावा और भी बहुत से सलातीन व उमरा को दवते इस्लाम के खुतूत तहरीर फ़रमाए जिनमें से कुछ ने इस्लाम कुबूल करने से इन्कार कर दिया और कुछ खुश नसीबों ने इस्लाम कुबूल करके हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खिदमते अकदस में नियाजमंदों से भरे हुए खुतूत भी भेजे। मसलन यमन के शाहाने हमीर में से जिन जिन बादशाहों ने बारगाहे नुबूब्बत में अर्जीयाँ भेजी। जो गजवए तबूक से वापसी पर आपकी ख़िदमत में पहुँची। उन बादशाहों के नाम ये हैं। (१) हारिस बिन अब्द गलाल (२) नईम बिन अब्द कुलाल (३) नुअमान, हाकिमे जूरऔन व मआफिर व हमदान (8) जुरआ ये सब यमन के बादशाह हैं।

इन के अलावा “फरदा बिन अमर’ जो कि सल्तनते रूम की जानिब से गवर्नर था। अपने इस्लाम लाने की ख़बर कासिद के

ज़री बारगाहे रिसालत में भेजी। इस तरह “बाज़ान’ जो बादशाहे ईरान किसरा की तरफ से सूबए यमन का सूबेदार था अपने दो बेटों के साथ मुसलमान हो गया। और एक अर्जी तहरीर करके हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इस्लाम की खबर दी। इन सब का तज्किरा “सीरते इब्ने हश्शाम व जरकानी व मदारिजुन्नुबूव्वत वगैरा में मौजूद है। हम अपनी मुख्तसर किताब में इनका मुफस्सल हाल बयान तहरीर करने से मअज़िरत ख्वाह हैं।

सिरीय्या नज्द

सन्न ६ हिजरी में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते मुहम्मद बिन मसलमा रदियल्लाहु अन्हु की मा-तहती मे एक लश्कर नज्द की जानिब रवाना फ़रमाया। उन लोगों ने बनी हनीफ़ा के सरदार सुमान बिन उसाल को गिरफ्तार कर लिया। और मदीना लाए। जब लोगों ने उनको बारगाहे रिसालत में मेश किया तो आपने हुक्म दिया कि इस को मस्जिदे नबवी के एक सुतूम में बाँध दिया जाए। चुनान्चे ये सुतून में बाँध दिए गए। फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम उसके पास तशरीफ ले गए और दर्याफ्त फरमाया कि ऐ सुमामा! तुम्हारा हाल क्या है? और तुम अपने बारे में क्या गुमान रखते हो? सुमामा ने जवाब दिया कि ऐ मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मेरा हाल और ख़याल तो अच्छा ही है। अगर आप मुझे कत्ल करेंगे तो एक खूनी आदमी को कत्ल करेंगे और अगर मुझे अपने इनआम से नवाज़कर छोड़ देंगे तो एक शुक्र गुज़ार को छोड़ेंगे। और अगर आप मुझ से कुछ माल के तलबगार हों तो बता दीजिए। आपको माल दिया जाएगा हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ये गुफ्तगू करके चले आए। फिर दूसरे रोज़ भी यही सवाल व जवाब हुआ। फिर तीसरे रोज़ भी यही हुआ। इसके बाद आपने सहाबए किराम से फ़रमाया कि सुमामा को छोड़ दो।

चुनान्चे लोगों ने उनको छोड़ दिया। सुमामा मस्जिद से निकलकर एक खजूर के बाग में चले गए जो मस्जिदे नबवी के करीब ही में था। वहाँ उन्होंने गुस्ल किया। फिर मसिजदे नबवी में वापस आए और कलिमए शहादत पढ़कर मुसलमान हो गए और कहने लगे कि खुदा की कसम! मुझे जिस क़दर आपके चेहरे से नफरत थी उतनी रूए जमीन पर किसी के चेहरे से न थी। मगर आज आप के चेहरे से मुझे इस कदर महब्बत हो गई है कि इतनी मुहब्बत किसी चेहरे से नहीं है। कोई दीन मेरी नज़र में इतना ना पसन्द नही था जितना आप का दीन । कोई शहर मेरी निगाह में इतना बुरा न था जितना आपा शहर। और अब मेरा ये हाल हो गया है कि अपके शहर से ज़्यादा मुझे कोई शहर महबूब नहीं है। या रसूलल्लाह! सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मैं उम्रा अदा करने के इरादे से मक्का जा रहा था कि आपके लश्कर ने मुझे गिरफ्तार कर लिया। अब आप मेरे बारे में क्या हुक्म देते हैं? हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उनको दुनिया व आख़ित की मालाईयों का मुज़दा सुनाया। और फिर हुक्म दिया कि तुम मक्का जाकर उम्रा अदा कर लो! जब ये मक्का पहुँचे और तवाफ़ करने लगे। तो कुरैश के किसी काफ़िर ने उनको देखकर कहा कि ऐ सुमामा तुम साबी (बे दीन) हो गए हो। आपने निहायत जुर्रत के साथ जवाब दिया कि मैं बे दीन नहीं हुआ हूँ। बलिक मुसलमान हो गया हूँ। और ऐ अहले मक्का! सुन लो! जब तक रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इजाज़त न देंगे तुम लोगों को हमारे वतन से गेहूँ का एक दाना भी नहीं मिल सकेगा। मक्का वालों के लिए उनके वतन “यमामा” ही से गल्ला आया करता था। (बुखारी जि, २ स.६२७ बाब वपद बनी हनीफा व हदीस. सुमामा व मुस्लिम जि. २ स, ९३. बाब रन्तुल असीर व मदारिज जि. २ स. १८९)

अबू राफेअ कत्ल कर दिया गया

सन्न ६ हिजरी के वाकिआत में से अबू राफेअ यहूदी का

कत्ल भी है। अबू राफेअ यहूदी का नाम अब्दुल्लाह बिन अबिल हुकैक या सल्लाम बिनुल हुकैक था। ये बहुत ही दौलतमंद ताजिर था। लेकिन इस्लाम का जबरदस्त दुश्मन और बारगाहे नुबूब्बत की शान में निहायत ही बद तरीन गुस्ताख और बे अदबी था। ये वही शख्स है जो हुय्या बिन अख्तब यहूदी के सथ मक्का गया और कुफ्फारे कुरैश और दूसरे कबाएल को जोश दिलोकर गजवए खन्दक में मदीना पर हमला करने के लिए दस हजार की फौज लेकर आया था और अबू सुफ़यान को उभारकर उसी ने उस फौज का सिपह सालार बनाया था। हुय्या बिन अख्तब तो जगे खन्दक के बाद गजवए बनी कुरैज़ा में मारा गया था। मगर ये बच निकला था और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ईजा रिसानी, और इस्लाम की बीख कनी में तन, मन, धन से लगा हुआ था। अन्सार के दोनों कबीलों अवस व खुज़रज में हमेशा मुकाबला रहता था। और ये दोनों अकसर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के. सामने नेकियों में एक दूसरे से बढ़ जाने की कोशिश करते रहते थे चूँकि कबीलए अवस के लोगों में हज़रते मुहम्मद बिन मस्लमा वगैरा रदियल्लाहु अन्हुम ने सन्न ३ हिजरी में बड़े ख़तरे में पड़कर एक दुश्मने रसूल कब बिन अशरफ़ यहूदी’ को कत्ल किया था। इस लिए कबीलए खुजाज़ के लोगों ने मशवरा किया कि अब रसलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का सब से बड़ा दुश्मन “राफेअ रह गया है। लिहाज़ा हम लोगों को चाकिए कि इसको कत्ल कर डालें। ताकि हम भी कबीलए अवस की तरह एक दुश्मने रसूल को कत्ल करने का अज- सवाब हासिल कर लें। चुनान्चे हज़रते अब्दुल्लाह बिन अतीक, व अब्दुल्लाह बिन उनीस, व अबू कतादा व हारि बिन रिबुई. व मसऊद बिन सिनान व खुज़ाई बिन असवद रदियल्लाहु अन्हुम इसके लिए मुसतअद और तय्यार हुए। उन लोगों की दरख्वास्त पर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इजाजत दे दी। और हज़रते अब्दुल्लाह बिन अतीक रदियल्लाहु अन्हु को इस

सीरतुल मुस्तफा अलैहि वसल्लम

सल्लल्लाहु तआला

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जमाअत का अमीर मुकर्रर फरमा दिया। और उन लोगों को मनअ कर दिया कि बच्चों और औरतों को कत्ल न किया जाए।

(जरकानी अलल मवाहिब जि.२ स.१६३) हज़रते अब्दुल्लाह बिन अतीक रदियल्लाहु अन्हु अबू राफेअ के महल के पास पहुंचे और अपने साथियों को हुक्म दिया कि तुम लोग यहाँ बैठकर मेरी आमद का इन्तिज़ार करते रहो और खुद बहुत ही खुफिया तदबीरों से रात में उसके महल के अन्दर दाखिल हो गए और उसके बिस्तर पर पहुँचकर अंधेरे में उसको कत्ल कर दिया। जब महल से निकलने लगे तो सीढ़ी से गिर पड़े जिससे उनके पाँव की हड्डी टूट गई। मगर उन्होंने फौरन ही अपनी पगड़ी से अपने टूटे हुए पावँ को बाँध दिया। और किसी तरह महल से बाहर आ गए। फिर अपने साथियों की मदद से मदीना पहुंचे। जब दरबारे रिसालत में हाज़िर होकर अबू राफेअ के कत्ल का सारा माजरा बयान किया तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि “पावँ फैलाव” उन्होंने पावँ फैलाया। तो आपने अपना दस्ते मुबारक उनके पांव पर फिरा दिया। फौरन ही टूटी हुई हड्डी जुड़ गई और उनका पावँ बिल्कुल सही व सालिम

हो गया।

(बुख़ारी जि. १ स २२४ बाब कत्लुलाना इमुल मुशरिक)

सन्न ६ हिजरी की बअज़ लड़ाईयाँ

सन्न ६ हिजरी में सुलहे हुदैबिया से कब्ल चन्द छोटे छोटे लश्करों को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मुख़्तलिफ़ अतराफ़ में रवाना फ़रमाया। ताकि वो कुफ्फार के हमलों की मदाफअत करते रहें। इन लड़ाईयों का मुफस्सल तकिरा जरकानी अलल मवाहिब और मदारिजुन्नुबूव्वत वगैरा किताबों में लिखा हुआ है। मगर इन लड़ाईयों की तरतीब और इनकी तारीखों में मुअरिंखीन का बड़ा इख़्तिलाफ़ है। इस लिए ठीक तौर पर इन की तारीखों

का तअय्युन बहुत मुश्किल है। इन वाकिआत का चीदा चीदा (थोडा थोडा) बयान हदीसों में मौजूद है। मगर हदीसों में भी उनकी तारीखें मजकूर नहीं हैं। अलबत्ता बअज कराएन व शवाहिद तहरीर व सबूत) से इतना पता चलता है कि ये सब सुलह हुदैबिया से कब्ल के वाकिआत हैं। इन लड़ाईयों में से चन्द के

नाम ये हैं:

सरीय्या करता, गज़वए बनी लहयान, सरयल गमर, सरीय्या अली बजानिब जमूम, सरीय्या जैद बजानिब अस, सरीय्या जैद वादीयुल कुरा, सरीय्या अली बजानिब बनी सद, सरीय्या जैद बजानिब उम्मे करफ़ा, सरीय्या इबने रवाहा, सरीय्या इब्ने मुस्लिमा, सरीय्या ज़ैद बजानिब तरफ, सरीय्या उकल व उरीना, सरीय्या जमरी। इन लड़ाईयों के नामों में भी इख़्तिलाफ़ है। हम ने यहाँ इन लड़ाईयों के मजकूरा बाला नाम ज़रकानी अलल मवाहिब की फेहरिस्त से नक्ल किए हैं। (फेहरिस्त जुरकानी अलल मवाहिब जि.२ स. ३५०)

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