बू अ’ली शाह क़लन्दर

बू अ’ली शाह क़लन्दर
(1209 – 1324)
शैख़ शरफ़ुद्दीन बू-अ’ली क़लंदर, साहिब जज़्ब-ओ-साहिब-ए-करामत थे। औलिया-ए-नामदार में से हैं। आपकी विलादत 605 हिज्री मुताबिक़ 1209 ई’स्वी को पानीपत में हुई। आप इमाम-ए-आ’ज़म अबू-हनीफ़ा की औलाद में से हैं। ये भी कहा जाता है कि आप शैख़ जमालुद्दीन हांस्वी के ख़ाला-ज़ाद भाई थे। आप के वालिद का नाम फ़ख़्रुद्दीन और वालिदा का नाम बी-बी फ़ातिमा है। बा’ज़ का खयाल है कि बी-बी हाफ़िज़ जमाल है।
बू-अ’ली क़लंदर कहलाने की वज्ह-ए-तस्मिया ये है कि हज़रत मौला अ’ली कर्मुल्लाह वज्हहु ने जब आप को दरिया से बाहर निकाला तो आप उसी वक़्त से मस्त-अलस्त हो गए और उसी दिन से शरफ़ुद्दीन बू-अ’ली क़लंदर कहलाने लगे।

आप को रहबर की तलाश हुई। बा’ज़ का ख़याल है कि आप मुरीद-ओ-ख़लीफ़ा ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी और शैख़ शहाबुद्दीन के आ’शिक़ थे। ये भी कहा जाता है कि आप मुरीद-ओ-ख़लीफ़ा ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी क् थे। बा’ज़ का ख़्याल है कि आप मुरीद-ओ-ख़लीफ़ा शैख़ नज्मुद्दीन क़लंदर के थे। बा’ज़ के नज़्दीक आप मुरीद-ओ- ख़लीफ़ा शैख़ शहाबुद्दीन आ’शिक़-ए- ख़ुदा के थे जो मुरीद-ओ-ख़लीफ़ा शैख़ इमामुद्दीन अब्दाल के थे और वो मुरीद-ओ-ख़लीफ़ा ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी के थे।
आप के मक्तूबात का एक मजमूआ’ ब-नाम इख़्तियारुद्दीन किताबी शक्ल में सामने आया। ये मक्तूबात तौहीद के मज़ामीन का उ’म्दा नमूना हैं। मस्नवी बू-अ’ली क़लंदर अगर्चे मुख़्तसर है मगर रुमूज़-ए-तौहीद और मआ’रिफ़ से माला-माल है। आप के दूसरे अश्आ’र रुबाइ’यात, ग़ज़ल और दूसरी अस्नाफ़ पर मुश्तमिल हैं।
दीवान-ए-शरफ़ुद्दीन बू-अ’ली क़लंदर फ़ारसी में एक अ’ज़ीम तसव्वुफ़ की किताब है। आपने हज़रत अ’ली के बारे फ़ारसी में मशहूर शे’र लिखा
हैदरीयम क़लंदरम मस्तम
बंदा-ए-मुर्तज़ा अ’ली हस्तम
पेशवा-ए-तमाम रा न-दानम
कि सग-ए-कू-ए-शे’र-ए-यज़दानम

हज़रत बू-अ’ली शाह क़लंदर के मुरीद-ए-मजाज़ हज़रत मख़दूम सय्यद लतीफ़ुद्दीन दानिश-मंद बड़े पाया के बुज़ुर्ग हुए जिनका मज़ार मोड़ा तालाब बिहार शरीफ़ में मरजा’-ए-ख़लाएक़ है।
मज़ार-ए-पुर अनवार पानीपत में मरजा’-ए-ख़लाएक़ है।
شیخ شرف الدین بوعلی قلندر، صاحب جذب وصاحب کرامت تھے۔ اولیائےنامدارمیں سے ہیں۔ آپ کی ولادت 605ھ مطابق 1209ء کو پانی پت میں ہوئی۔ آپ امام اعظم ابوحنیفہ کی اولادمیں سےہیں۔ یہ بھی کہاجاتاہے کہ آپ شیخ جمال الدین ہانسوی کےخالہ زادبھائی تھے۔ آپ کےوالد کانام فخرالدین اور والدہ کانام بی بی فاطمہ ہے۔بعض کاخیال ہے کہ بی بی حافظ جمال ہے۔
بوعلی قلندرکہلانے کی وجہ تسمیہ یہ ہے کہ حضرت مولیٰ علی کرم اللہ وجہہ نےجب آپ کودریاسےباہرنکالا توآپ اسی وقت سےمست الست ہوگئے اور اسی دن سے شرف الدین بوعلی قلندرکہلانےلگے۔

آپ کورہبرکی تلاش ہوئی ۔بعض کاخیال ہے کہ آپ مریدوخلیفہ خواجہ قطب الدین بختیارکاکی اور شیخ شہاب الدین کےعاشق تھے۔ یہ بھی کہاجاتاہےکہ آپ مریدوخلیفہ خواجہ قطب الدین بختیارکاکی کےتھے۔ بعض کاخیال ہےکہ آپ مریدوخلیفہ شیخ نجم الدین قلندرکےتھے ۔بعض کےنزدیک آپ مریدوخلیفہ شیخ شہاب الدین عاشق خداکےتھے جومریدوخلیفہ شیخ امام الدین ابدال کے تھےاوروہ مریدوخلیفہ خواجہ قطب الدین بختیارکاکی کےتھے۔
ﺁﭖ ﮐﮯ ﻣﮑﺘﻮﺑﺎﺕ ﮐﺎ ﺍﯾﮏ ﻣﺠﻤﻮﻋﮧ ﺑﻨﺎﻡ ﺍﺧﺘﯿﺎﺭﺍﻟﺪﯾﻦ ﮐﺘﺎﺑﯽ ﺷﮑﻞ ﻣﯿﮟ ﺳﺎﻣﻨﮯ ﺁﯾﺎ۔ ﯾﮧ ﻣﮑﺘﻮﺑﺎﺕ ﺗﻮﺣﯿﺪ ﮐﮯ ﻣﻀﺎﻣﯿﻦ ﮐﺎ ﻋﻤﺪﮦ ﻧﻤﻮﻧﮧ ﮨﯿﮟ۔ ﻣﺜﻨﻮﯼ ﺑﻮ ﻋﻠﯽ ﻗﻠﻨﺪﺭ ﺍﮔﺮﭼﮧ ﻣﺨﺘﺼﺮ ﮨﮯ ﻣﮕﺮ ﺭﻣﻮﺯ ﺗﻮﺣﯿﺪ اور ﻣﻌﺎﺭﻑ ﺳﮯ ﻣﺎﻻ ﻣﺎﻝ ﮨﮯ۔ ﺁﭖ ﮐﮯ ﺩﻭﺳﺮﮮ ﺍﺷﻌﺎﺭ ﺭﺑﺎﻋﯿﺎﺕ، ﻏﺰﻝ ﺍﻭر ﺩﻭﺳﺮی اصناف پر مشتمل ہیں۔
دیوان شرف الدین بو علی قلندر فارسی میں ایک عظیم تصوف کی کتاب ہے۔ آپ نے حضرت علی کے بارے فارسی میں مشہور شعر لکھا

حیدریم قلندرم مستم
بندہ مرتضٰی علی ہستم
پیشوائے تمام را ندانم
کہ سگِ کوئے شیرِ یزدانم

حضرت بو علی شاہ قلندر کے مرید مجاز حضرت مخدوم سید لطیف الدین دانشمند بڑے پایہ کے بزرگ ہوئے جن کا مزار موڑہ تالاب بہار شریف میں مرجع خلائق ہے۔

مزار پرانوار پانی پت میں مرجع خلائق ہے۔

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