हिजरत का तीसरा साल part 1

सन्न ३ हिजरी

जंगे उहुद

इस साल का सब से बड़ा वाकिआ “जंगे उहुद” है। “उहुद” एक पहाड़ का नाम है। जो मदीना मुनव्वरा से तकरीबन तीन मील दूर है। चूंकि हक व बातिल का ये अजीम मअरका इसी पहाड़ के दामन में दरपेश हुआ । इस लिए ये लड़ाई “गजवए उहुद’ के नाम से मशहूर है और कुरआने मजीद की मुख्तलिफ आयतों में इस लड़ाई के वाकिआत का खुदावंदे आलम ने तज़्किरा फ़रमाया है।

जंगे उहुद का सबब ये आप पढ़ चुके हैं कि जंगे बदर में सत्तर कुफ्फार कत्ल और सत्तर गिरफ्तार हुए थे और जो कत्ल हुए उनमें से अकसर कुफ्फारे कुरैश के सरदार, बल्कि ताजिर थे। इस बिना पर मक्का का एक एक घर मातमकदा बना हुआ था। और कुरैश का बच्चा बच्चा जोशे इन्तिकाम में आतिशे गैज़- गज़ब का तनूर बनकर मुसलमानों से लड़ने के लिए बेकरार था। अरब खुसूसन कुरैश का ये तुर्रए इम्तियाज़ था कि वो अपने एक एक मकतूल के खून का बदला लेने को इतना बड़ा फ़र्ज़ समझते थे जिसको अदा किए बिगैर गोया उनकी हस्ती काएम नहीं रह सकती थी। चुनान्चे जंगे बदर के मकतूलों के मातम से जब कुरैशियों को फुर्सत मिली तो उन्होंने ये अज़्म कर लिया कि जिस कदर मुमकिन हो जल्द

से जल्द मुसलमानों से अपने मकतूलों के खून का बदला लेना चाहिए। चुनान्चे अबू जहल का बेटा इकरमा और उमय्या का लड़का सफ़वान और दूसरे कुफ्फारे कुरैश जिनके बाप भाई बेटे जंगे बदर में कत्ल हो चुके थे सब के सब अबू सुफयान के पास गए। और कहा कि मुसलमानों ने हामरी कौम के तमाम सरदारों को कत्ल कर डाला है। इस का बदला लेना हमारा कौमी फ़ीज़ा है। लिहाजा हमारी ख्वाहिश है कि कुरैश की मुर्तका तिजारत में इमसाल जितना नफअ हुआ है। वो सब कौम के जंगी फ़न्ड में जमअ हो जाना चाहिए। और उस रकम से बेहतरीन हथियार ख़रीदकर अपनी लश्करी ताक़त बहुत जल्द मजबूत कर लेनी चाहिए। और फिर एक अज़ीम फ़ौज लेकर मदीना पर चढ़ाई करके बानीए इस्लाम और मुसलमानों को दुनिया से नेस्त व नाबूद कर देना चाहिए। अबू सुफयान ने खुशी खुशी कुरैश की इस दरख्वासत को मंजूर कर लिया। लेकिन कुरैश को जंगे बदर से ये तर्जबा हो चुका था कि मुसलमानों से लड़ना कोई आसान काम नहीं है। आँधियों और तूफानों का मुकाबला, समुन्द्र की मौजों से टक्कर लेना, बहुत आसान है। मगर मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आशिकों से जंग करना बड़ा ही मुश्किल काम है। इस लिए उन्होंने अपनी जंगी ताकत में बहुत ज़्यादा इज़ाफ़ा करना निहायत ज़रूरी ख़याल किया। चुनान्चे उन लोगों ने हथियारों की तय्यारी और सामाने जंग की तय्यारी में पानी की तरह रुपया बहाने के साथ साथ पूरे अरब में जंग का जोश और लड़ाई का बुखार फैलाने के लिए बड़े बड़े शाएरों को मुन्तख़ब किया। जो अपनी आतश बयानी से तमाम कबाएले अरब में जोशे इन्तिकाम की आग लगा दी। “अमर जुमही” और “मुसाफ़ ये दोनों अपनी शाएरी में ताक बेमिसाल और आतश बयानी में शोहरए आफ़ाक मशहूर थे। इन दोनों ने बा काएदा दौरा करके तमाम कबाइले अरब में ऐसा जोश और इश्तिआल पैदा कर दिया कि बच्चा बच्चा “खून का बदला खून’ का नअरा लगाते हुए मरने

और मारने पर तय्यार हो गया। जिसका नतीजा ये हुआ कि एक बहुत बड़ी फौज तय्यार हो गई। मर्यों के साथ साथ बड़े बड़े मुअज्जज़ और मालदार घरानों की औरतें भी जोशे इन्तिकाम से लबरेज हो कर फौज में शामिल हो गईं। जिन के बाप, भाई, बेटे, शौहर जगे बदर में कत्ल हुए थे उन औरतों ने कसम खाई थी कि हम अपने रिश्तेदारों के कातिलों का खून पीकर ही दम लेंगी। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के चचा हजरते हम्जा रदियल्लाहु अन्हु ने हुन्द के बाप उतबा और जुबैर बिन मुतअम

के चचा को जगे बदर में कत्ल किया था। इस बिना पर हुन्द’ ने ३वहशी को जो जुबैर बिन मुतअम का गुलाम था हज़रते हम्जा रदियल्लाहु अनहु के कत्ल पर आमादा किया। और ये वदा किया कि अगर उसने हज़रते हमज़ा रदियल्लाहु अन्हु को कत्ल कर दिया तो वो इस कारगुजारी के सिले में आज़ाद कर दिया जाएगा।

मदीना पर चढ़ाई

अल गरज़ बे पनाह जोश- खरोश और इन्तिहाई तय्यारी के साथ लश्करे कुफ्फार मक्का से रवाना हुआ और अबू सुफ़यान इस लश्करे जर्रार का सिपह सालार बना। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के चचा हज़रते अब्बास रदियल्लाहु अन्हु जो खुफिया तौर पर मुसलमान हो चुके थे। और मक्का में रहते थे। उन्होंने एक ख़त लिखकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को कुफ्फारे कुरैश की लश्कर कशी से मुत्तलअ कर दिया। जब आप को ये खौफनाक खबर मिली। तो आप ने ५ शव्वाल ३ हिजरी को हज़रते अदी बिन फजाला रदियल्लाहु अन्हु के दोनों लड़कों हज़रते अनस और हज़रते मूनस रदियल्लाह अन्हुमा को जासूस बनाकर कुफ्फारे कुरैश के लश्कर की ख़बर लाने के लिए रवाना फ़रमाया। चुनान्चे उन दोनों ने आकर ये परेशानकुन खबर सुनाई

कि अबू सुफयान का लश्कर मदीना के बिलकुल करीब आ गया है और उनके घोडे मदीना की चरागाह (उरीज) की तमाम घास

मुसलमानों की तय्यारी और जोश

ये खबर सुनकर १४ शब्बाल ३ हिजरी जुमअ की रात में हज़रते सद बिन मुआज़ व हज़रते उसीद बिन हुजैर व हजरते सद बिन उबादा रदियल्लाहु अन्हुम हथियार लेकर चन्द अन्सास्थिों के साथ रातभर काशानए नुबूब्बत का पेहरा देते रहे। और शहरे मदीना के अहम नाकों पर भी अन्सार का पेहरा बिठा दिया गया। सुबह को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अन्सार व मुहाजिरीन को जमअ फ़रमा कर मश्वरा तलब फ़रमाया कि शहर के अन्दर रहकर दुश्मनों की फौज का मुकाबला किया जाए। या शहर से बाहर निकलकर मैदान में जंग लड़ी जाए? मुहाजिरीन ने आम तौर पर और अन्सार में से बड़े बूढों ने ये राय दी कि औरतों और बच्चों को किलओं में महफूज कर दिया जाए। और शहर के अन्दर रहकर दुश्मनों का मुकाबला किया जाए। मुनाफ़िकों का सरदार अबदुल्लाह बिन उबई भी इस मजलिस में मौजूद था। उसने भी यही कहा कि शहर में पनाहगीर होकर कुफ्फारे कुरैश के हमलों की मदाफअत बचाव की जाए। मगर चन्द कमसिन नव जवान जो जंगे बदर में शरीक नहीं हुए थे। और जोशे जिहाद में आपे से बाहर हो रहे थे। वो इस राय पर अड़ गए कि मैदान में निकलकर उन दुश्मनाने इस्लाम से फैसलाकुन जंग लड़ी जाए! हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने सब की राय सुनली। फिर मकान में जाकर हथियार जेबे तन फ़रमाया। और बाहर तशरीफ़ लाए अब तमाम लोग इस बात पर मुत्तफ़िक हो गए कि शहर के अन्दर ही रहकर कुफ्फारे कुरैश के हमलों को रोका जाए। मगर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया

कि “पैगम्बर के लिए ये जेबा नहीं है कि हथियार पहनकर उतार दे यहाँ तक कि अल्लाह तआला उसके दुश्मनों के दर्मियान फैसला फरमादे। अब तुम लोग खुदा का नाम ले कर मैदान में निकल पड़ो। अगर तुम लोग सब्र के साथ मैदाने जंग में डटे रहोगे तो जरूरी तुम्हारी फतह होगी। (मदारिज जि.२ स.११४)

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यहूद की इमदाद को को ठुकरा दिया

शहर से निकलते ही आप ने देखा कि एक फौज चली आ रही है। आपने पूछा कि ये कौन लोग हैं? लोगों ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! ये रईसुल मुनाफ़िकीन अब्दुल्लाह बिन उबई के हलीफ़ यहूदियों का लश्कर है। जो आपकी इमदाद के लिए आ रहा है। आपने इर्शाद फरमाया कि :

“उन लोगों से कहदो कि वापस लौट जाएँ हम मुशरिकों के मुकाबले में मुशरिकों की मदद नहीं लेंगे। (मदारिज जि.२ स.११४)

चुनान्चे यहूदियों का ये लश्कर वापस चला गया। फिर अब्दुल्लाह बिन उबई (मुनाफ़िकों का सरदार’) भी जो तीन सौ आदमियों को लेकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ आया था। ये कहकर वापस चला गया कि

मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ने मेरा मश्वरा कुबूल नहीं किया। और मेरी राय के खिलाफ मैदान में निकल पड़े। लिहाज़ा मैं उनका साथ नहीं दूंगा। (मदारिज जि.२ स.११४)

अब्दुल्लाह बिन उबई की बात सुनकर कबीलए खुजरज में से “बनू सल्मा और कबलए अवस में से “बनू हारिसा के लोगों ने भी वापस लौट जाने का.इरादा कर लिया। मगर अल्लाह तआला ने उन लोगों के दिलों में अचानक महब्बते इस्लाम का ऐसा जज्बा पैदा फ़रमा दिया कि उन लोगों के कदम जम गए। चुनान्चे अल्लाह तआला ने कुरआने मजीद में उन लोगें का तजिकरा

फरमाते हुए इर्शाद फरमाया कि – इज हम्मत तॉइफतानि मिन्कुम अन तफ-शला, वल्लाहु वलीगुहुमा व अलल-लाही फल-य-त-वक्कलिल मुअमिनून। (आले इमरान)

तर्जमा :- जब तुम में के दो गुरोहों का इरादा हुआ कि ना मदी कर दी जाए। और अल्लाह उनको संभालने वाला है और

मुसलमानों को अल्लाह ही पर भरोसा चाहिए।

अब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लश्कर में कुल सात सौ सहाबा रह गए जिन में कुल एक सौ जिरह पोश थे। और कुफ्फार की फौज में तीन हज़ार अशरार का लश्कर था। जिन में सातै सौ जिरह पोश जवान, दो सौ घोड़े, तीन हज़ार ऊँट और पन्द्रह औरतें थीं।

शहर से बाहर निकलकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी फौज का मुआएना फ़रमाया। और जो लोग कम उम्र थे, उनको वापस लौटा दिया। जंग के हौलनाक मौकअ पर बच्चों का क्या काम?

बच्चों का जोशे जिहाद

मगर जब हज़रते राफेअ बिन ख़दीज रदियल्लाहु अनहु से कहा गया कि तुम बहुत छोटे हो। तुम भी वापस चले जाओ। तो फौरन अंगूठों के बल तनकर खड़े हो गए ताकि उनका कद ऊँचा नज़र आए। चुनान्चे उनकी तरकीब ये चल गई। ओर वो फौज में शामिल कर लिए गए।

हज़रते समुरा रदियल्लाहु अनहु जो एक कम उम्र नव जवान थे जब उनको वापस किया जाने लगा ता उन्होंने अर्ज किया कि मैं राफेअ बिन ख़दीज को कुश्ती में पछाड़ लेता हूँ। इस लिए अगर

वो फौज में ले लिए गए हैं तो फिर मुझ को भी जरूर जंग में शरीक होने की इजाजत मिलनी चाहिए। चुनान्चे दोनों का मुकाबला कराया गया और वाकेई हज़रते समुरा रदियल्लाहु अन्हु ने हजरते राफेअ बिन खदीज को जमीन पर दे मारा। इस तरह दोनों पुर जोश नव जवानों को जंगे उहुद में शिरकत की सआदत नसीब हो गई।

(मदारिज जि.२ स.११४)

ताजदारे दो आलम मैदाने जंग में

मुशरिकीन तो १२ शव्वाल ३ हिजरी बुध के दिन ही मदीना के करीब पहुँचकर कोहे उहुद पर अपना पड़ाव डाल चुके थे। मगर हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम १४ शव्वाल ३ हिजरी बाद नमाजे जुमआ मदीना से रवाना हुए। रात को बनी नज्जार में रहे और १५ शव्वाल सनीचर के दिन नमाजे फज्र के वक्त उहुद में पहुँचे। हजरते बिलाल रदियल्लाहु अन्हु ने अज़ान दी। और आप ने नमाजे फज पढ़ाकर मैदाने जंग में मोर्चाबंदी शुरू फरमाई। हज़रते उक्काशा बिन मिख्सिन अंसदी को लश्कर के मेमना (दाएँ बाजू) पर । और हज़रते अबू सल्मा बिन अब्दुल असद मख्जूमी को मैसरा (बाएँ बाजू) पर। और हज़रते अबू उबैदा बिनुल जर्राह व हज़रते सअद बिन अबी वकास को मुकदमा (अगले हिस्से) पर। और हजरते मिकदाद बिन उमर को साका (पछले हिस्से) पर अफ़सर मुकर्रर फरमाया। (रदियल्लाहु अन्हुम) और सफबंदी के वक्त उहुद पहाड़ को पुश्त पर रखा और कोहे अनैन को जो वादीए कनात में है अपने बाँए तरफ रखा। लश्कर के पीछे पहाड़ में एक दुरी (रास्ता) था। जिस में से गुज़र कर कुफ्फारे कुरैश मुसलमानों की सफों के पीछे से हमला आवर हो सकते थे। इस लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उस दुरे की हिफाज़त के लिए पचास तीरन्दाजों का एक दस्ता मुकर्रर फरमा दिया। और हज़रते अब्दुल्लाह बिन जुबैर रदियल्लाहु अन्हु को इस

दस्ते का अफसर बना दिया। और ये हुक्म दिया कि देखो हम चाहे मगलूब हों या गालिब । मगर तुम लोग अपनी इस जगह से उस वक्त तक न हटना जब तक मैं तुम्हारे पास किसी को न भेजूं।

(मदारिज जि. २ स. ११५ व बुखारी बाब मा यकरह मिनुत तनाजे)

मुशरिकीन ने भी निहायत बा काएदगी के साथ अपनी सफों को दुरुस्त किया। चुनान्चे उन्होंने अपने लश्कर के मैमना पर खालिद बिन वलीद को। और मैसरा पर इकरमा बिन अबू जहल को अफसर बना दिया। सवारों का दस्ता सफ़वान बिन उमय्या की कमान में था। तीरन्दाज़ों का दस्ता अलग था जिनका सरदार अब्दुल्लाह बिन रबीआ था। और पूरे लश्कर का अलमबरदार तलहा बिन अबू तलहा था तो कबीलए अब्दुद दार का एक आदमी था।

(मदारिज जि.२ स.११५) हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जब देखा कि पूरे लश्करें कुफ्फार का अलमबरदार कबीलए बनी अब्दुद दार का एक शख्स है तो आपने भी इस्लामी लश्कर का झन्डा हज़रते मुसअब बिन उमैर रदियल्लाहु अन्हु को अता फ़रमाया। जो कबीलए अब्दुद दार से तअल्लुक रखते थे।

जंग की इब्तिदा

सब से पहले कुफ्फारे कुरैश की औरतें दफ़ बजा बजा कर ऐसे अश्आर गाती हुई आगे बढ़ी जिनमें बदर के मकतूलों का मातम, और इन्तिकामे खून का जोश भरा हुआ था। लश्करे कुफ्फार के सिपह सालार अबू सुफयान की बीवी हुन्द’ आगे आगे और कुफ्फार कुरैश के मुअज्जज़ घरानों की चौदह औरतें उसके साथ साथ थीं। और ये सब आवाज़ मिलाक़र ये अश्आर गा रही थीं कि

ननु बिनातु तारिक

नमशी अलन-नमारिक हम आस्मान के तारों की बेटियाँ हैं। हम कालीनों पर चलने वालियाँ हैं।

इन तुक-बिलू नुआनिक

अव तुदबिरु नुफारिक अगर तुम बढ़कर लड़ोगे तो हम तुमसे गले मिलेंगे। और पीछे कदम हटाया तो हम तुम से अलग हो जाएँगे।

मुशरिकीन की सफ़ों में से सब से पहले जो शख्स जंग के लिए निकला वो “अबू आमिर अवसी” था। जिसकी इबादत और पारसाई की बिना पर मदीना वाले उसको “राहिब’ कहा करते थे। मगर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उसका नाम “फासिक रखा था। ज़मानए जाहिलीयत में ये शख्स अपने कबीलए अवस का सरदार था और मदीना का मकबूले आम आदमी था। मगर जब रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मदीना तशरीफ लाए तो ये शख्स जज्बए हसद से जल भुनकर खुदा के महबूब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मुखालिफ़त करने लगा। और मदीना से निकल कर मक्का चला गया और कुफ्फारे कुरैश को आप से जंग करने पर आमादह किया। इसको बड़ा भरोसा था कि मेरी क़ौम जब मुझे देखेगी तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का साथ छोड़ देगी। चुनान्चे उसने मैदान में निकलकर पुकारा कि ऐ अन्सार! क्या तुम लोग मुझे पहचानते हो? मैं अबू आमिर राहिब हूँ। अन्सार ने चिल्लाकर कहा कि हाँ, हाँ! ऐ फ़ासिक! हम तुझको खूब पहचानते हैं। खुदा तुझे जलील फ़रमाए। अबू आमिर अपने लिए फासिक का लफ्ज़ सुनकर तिलमिला गया। कहने लगा हाय अफ्सोस! मेरे बाद मेरी कौम बिल्कुल बदल गई। फिर कुफ्फारे कुरैश की टोली जो उसके साथ थी मुसलमानों पर तीर बरसाने लगी। इसके जवाब में अन्सार ने भी इस ज़ोर की संग बारी की

कि अबू आमिर और उसके साथी मैदान से भाग खड़े हुए।

(मदारिज जि.२ स.११६)

लश्करे कु फार का अलमबरदार तलहा बिन अबू तलहा सफ से निकलकर मैदान में आया। और कहने लगा कि क्यों मुसलमानो। तुम में कोई ऐसा है कि या वो मुझको दोजख में पहुँचा दे या खुद मेरे हाथ से वो जन्नत में पहुँच जाए। इसका ये घमंड से भरा हुआ कलाम सुनकर हज़रते अली शेरे खुदा रदियल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि हाँ। “मैं हूँ” ये कहकर फातहे खैबर ने जुल फ़िकार के एक वार से उसका सर फाड़ दिया । और वो ज़मीन पर तड़पने लगा। और शेरे खुदा मुँह फेरकर वहाँ से हट गए। लोगों ने पूछा कि आपने उसका सर क्यों नहीं काट लिया। शेरे खुदा ने फ़रमाया कि जब वो ज़मीन पर गिरा तो उसकी शर्मगाह खुल गई। और वो मुझे कसम देने लगा कि मुझे मुआफ कर दीजिए। इस बे हया को बे सत्र देखकर मुझे शर्म दामनगीर हो गई इस लिए मैं ने मुँह फेर

(मदारिज जि.२ स.११६) तलहा के बाद उसका भाई उस्मान बिन अबू तलहा रजज़ का ये शेअर पढ़ता हुआ हमला आवर हुआ कि

लिया।

इन्ना अला अहलिल लिवाइ हक्का

अय्यख-दिबल लिवाआ अव तन-दक्का अलमबरदार का फ़र्ज़ है कि नेज़े को खून में रंग दे। या वो टकरा कर टूट जाए।

हजरत हम्जा रदियल्लाहु अन्हु उसके मुकाबले के लिए तलवार लेकर निकले। और उसके शाने पर ऐसा भरपूर हाथा मारा कि तलवार रीढ़ की हड्डी को काटती हुई कमर तक पहुँच गई। और आपके मुँह से ये न रा निकला कि

अना इब्नु साकिल हजीजी मैं हाजियों के सैराब करने वाले अब्दुल मुत्तलिब का बेटा हूँ

(मदारिज जि. २ स.११६) इसके बाद आम जंग शुरू हो गई। और मैदाने जंग में कुश्त- खून का बाज़ार गरम हो गया।

अबू दुजाना की खुश

नसीबी हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दस्ते मुबारक एक तलवार थी जिस पर ये शेअर कन्दा था कि –

फ़िल जुनि आऊँव-वफ़िल इक़बालि मक-रु-मतुन

वल-मरउ बिल जुलि ला यन्जु मिनल कदरि (बुज़दिली में शर्म है। और आगे बढ़कर लड़ने में इज्जत है और आदमी बुज़दिली करके तक़दीर से नहीं बच सकता।)

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि “कौन है जो इस तलवार को लेकर हक अदा करे ये सुनकर बहुत से लोग इस सआदत के लिए लपके। मगर ये फ़ख- शर्फ हज़रते अबू दुजाना रदियल्लाहु अन्हु के नसीब में था कि ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी तलवार अपने हाथ से हज़रते अबू दुजाना रदियल्लाहु अन्हु के हाथ में दे दी। वो ये एअज़ाज़ पाकर जोशे मुसर्रत में मस्त-ने बे हो गए। और अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! इस तलवार का हक क्या है। इर्शाद फरमाया कि

‘तू इस से काफ़िरों को कत्ल करे यहाँ तक कि ये टेढ़ी हो जाए।

हज़रते अबू दुजाना रदियल्लाहु अनहु ने अर्ज किया कि या

रसूलल्लाह! मैं इस तलवार को इसके हक के साथ लेता हूँ फिर वो अपने सर पर एक सुर्ख रंग का रुमाल बाँधकर अकड़ते और इतराते हुए मैदाने जंग में निकल पड़े और दुश्मनों की सफों को चीरते

हुए तलवार चलाते हुए आगे बढ़ते चले जा रहे थे कि दम उनके सामने अबू सुफयान की बीवी “हुन्द’ आ गई। हज़रते अबू दुजाना रदियल्लाहु अन्हु ने इरादा किया कि इस पर तलवार चला दें मगर फिर इस ख़याल से तलवार हटा ली। कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मुकद्दस तलवार के लिए ये जेब नहीं देता कि वो किसी औरत का सर काटे।

(जरकानी जि. २ स.२९ व मदारिज जि.२ स.११६) हज़रते अबू दुजाना रदियल्लाहु अन्हु की तरह हज़रते हम्जा और हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हुमा भी दुश्मनों की सफों में घुस गए और कुफ्फ़ार का कतले आम शुरू कर दिया।

हज़रते हम्जा रदियल्लाहु अन्हु इन्तिहाई जोशे जिहाद में दो दस्ती तलवार मारते हुए आगे बढ़ते चले जा रहे थे इसी हालत में “सिबा ग़बशानी सामने आ गया। आपने तड़पकर फ़रमाया कि ऐ औरतों का खत्ना करने वाली औरत के बच्चे! ठहर, कहाँ जाता है? तू अल्लाह व रसूल से जंग करने चला है। ये कहकर उसपर तलवार चला दी। और वो दो टुकड़े होकर ज़मीन पर ढेर हो गया।

हज़रते हम्जा रदियल्लाहु अन्हु की शहादत

“वहशी’ जो एक हब्शी गुलाम था। और उसका आका जुबैर बिन मुतअम उससे वअदा कर चुका था कि तू अगर हज़रते हम्जा को कत्ल कर देगा। तो मैं तुझको आज़ाद कर दूंगा। वहशी एक चट्टान के पीछे छुपा हुआ था। और हज़रते हम्ज़ा रदियल्लाहु अन्हु की ताक में था। चूँही आप उसके करीब में पहुँचे उसने से अपना नेज़ा फेंक कर मारा जो आपकी नाफ में लगा। और पुश्त के पार हो गया। इस हाल में भी हज़रते हमज़ा रदियल्लाहु अन्हु

तलवार लेकर उसकी तरफ बढ़े। मगर जरम की ताब न लाकर गिर पड़े और शहादत से सरफराज हो गए।

(बुखारी बाब कत्ले हमजा जि.२ स.५८३) कुफ्फार के अलमबरदार खुद कट कट कर गिरते चले जा रहे थे मगर उनका झन्डा गिरने नहीं पाता था एक के कत्ल होने के बाद दूसरा उस झन्ड को उठा लेता था। उन काफिरों के जोश- खरोश का ये आलम था कि जब एक काफ़िर ने जिसका नाम “सुवाब” था मुशरिकीन का झन्डा उठाया। तो एक मुसलमान ने उसको इस ज़ोर से तलवार मारी कि उसके दोनों हाथ कट कर जमीन पर गिर पड़े मगर उसने अपने कौमी झन्डे को जमीन पर गिरने नहीं दिया। बल्कि झन्डे को अपने सीने से दबाए हुए ज़मीन पर गिर पड़ा। इसी हालत में मुसलमानों ने उसको कत्ल कर दिया। उसके मरते ही एक बहादुर औरत जिसका नाम “अमरा” था उसने झपटकर कौमी झन्डे को अपने हाथ में लेकर बुलन्द कर दिया। ये मंज़र देखकर कुरैश को गैरत आई और उनकी बिखरी हुई फौज सिमट आई। और उनके उखड़े हुए कदम फिर जम गए।

(मदारिज जि.२ स. ११६ वगैरा)

हज़रते हन्जला रदियल्लाहु अन्हु की शहादत

अबू आमिर राहिब कुफ्फार की तरफ़ से लड़ रहा था। मगर उसके बेटे हज़रते इन्जला रदियल्लाहु अनहु परचमे इस्लाम के नीचे जिहाद कर रहे थे। हज़रते इन्जला रदियल्लाहु अन्हु ने वारगाहे रिसालत में अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! मुझे इजाज़त दीजिए मैं अपनी तलवार से अबू आमिर राहिब का सर काटकर लाऊँ। मगर हुंजूर रहमतुल लिल आलमीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की रहमत ने ये गवारा नहीं किया कि बेटे की तलवार बाप का सर काटे। हज़रते हन्जला रदियल्लाहु अन्हु इस कदर जोश में भरे हुए थे कि सर हथेली पर रखकर इन्तिहाई जाँ

बाजी के साथ लड़ते हुए कल्बे लश्कर तक पहुंच गए। और कुफ्फार के सिपह सालार अबु सुफयान पर हमला कर दिया। और करीब था कि हजरते हन्जला रदियल्लाहु अन्हु की तलवार अबू सुफयान का फैसला कर दे कि अचानक पीछे से शदाद बिनुल असवद ने झपट कर वार को रोका और हज़रते हन्जला रदियल्लाहु अन्हु को शहीद कर दिया।

हजरते हन्जला रदियल्लाहु अनहु के बारे में हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इर्शाद फरमाया कि “फिरिश्ते हन्जला को गुस्ल दे रहे हैं। जब उनकी बीवी उनका हाल दर्याफ्त किया गया तो उसने कहा कि जंगे उहुद की रात में वो अपनी बीवी के साथ सोए थे। गुस्ल की हाजत थी। मगर दअवते जंग की आवाज़ उनके कान में पड़ी। तो वो उसी हालत में शरीके जंग हो गए। ये सुनकर हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि यही वजह है जो फ़िरिश्तों ने उसको गुस्ल दिया। इस वाकिआ की बिना पर हज़रते इन्जला रदियल्लाहु अन्हु को “गसीलुल मलाएका’ के लकब से याद किया जाता है।

(मदारिज जि. २.स.१२३) इस जंग में मुजाहिदीने अन्सार व महाजिरीन बड़ी दिलेरी और जाँबाज़ी से लड़ते रहे। यहाँ तक कि मुशरिकीन के पावँ उखड़ गए। हज़रते अली व हज़रते अबू दुजाना व हज़रते सद बिन अबी वक्कास वगैरा रदियल्लाहु अन्हुम के मुजाहिदाना हमलों ने मुशरिकीन की कमर तोड़ दी। कुफ्फार के तमाम अलमबरदार उस्मान, अबू सईद, मुसाफ़अ तलहा बिन अबी तलहा वगैरा एक एक करके कट कट कर ज़मीन पर ढेर हो गए। कुफ्फार को शिकस्त हो गई और वो भागने लगे और उनकी औरतें जो अश्आर पढ़ पढ़ कर लश्करे कुफ्फार को जोश दिला रहीं थीं वो भी बद हवासी के आलम में अपने इज़ार उठाए हुए बरहना साक भागती हुई पहाड़ों पर दौड़ती हुई चली जा रही थीं। और मुसलमान कत्ल मशगूल व गारत में थे।

नागहाँ जंग का पांसा पलट गया

कुफ्फार की भगदड़ और मुसलमानों के फातिहना कत्ल व गारत का ये मंजर देखकर वो पचास तीरन्दाज़ मुसलमान जो दुरी की हिफाजत पर मुकर्रर किए गए थे। वो भी आपस में एक दूसरे से ये कहने लगे कि गनीमत लूटो, गनीमत लूटो, फतह तुम्हारी हो गई। उन लोगों के अफसर हज़रते अब्दुल्लाह बिन जुबैर ने हरचंद रोका । और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का फरमान याद दिलाया। और फ़रमाने मुस्तफवी की मुख़ालिफ़त से डराया। मगर उन तीरन्दाज़ मुसलमानों ने एक नहीं सुनी और अपनी जगह छोड़कर माले गनीमत लूटने में मशगूल हो गए। लश्करे कुफ्फार का एक अफसर “खालिद बिन वलीद” पहाड़ की बुलन्दी से ये मंजर देख रहा था। जब उसने ये देखा कि दर्रा पहरादारों से ख़ाली हो गया। फौरन ही उसने दर्रा के रास्ते से फौज लाकर मुसलमानों के पीछे से हमला कर दिया। हज़रते अब्दुल्लाह बिन जुबैर रदियल्लाहु अन्हु ने चन्द जाँ निसारों के साथ इन्तिहाई दिलेराना मुकाबला किया। मगर ये सब के सब शहीदद हो गए। अब क्या था। काफिरों की फौज के लिए रास्ता साफ हो गया। ख़ालिद बिन वलीद ने ज़बरदस्त हमला कर दिया। ये देखकर भागती हुर्द कुफ्फारे कुरैश की फौज फिर पलट पड़ी। मुसलमान माले गनीमत लूटने में मसरूफ़ थे। पीछे फिर कर देखा तो तलवारें बरस रही थीं। और कुफ्फार आगे पीछे दोनों तरफ से मुसलमानों पर हमला कर रहे थे। और मुसलमानों का लश्कर चक्की के दो पाटों में दाना की तरह पिसने लगा और मुसलमानों में ऐसी बद हवासी और अबतरी फैल गई कि अपने और बेगाने की तमीज़घ नहीं रही। खुद मुसलमान मुसलमान की तलवारों से कत्ल हुए। चुनान्चे हज़रते हुजैफा रदियल्लाहु अन्हु के वालिद हज़रते यमान रदियल्लाहु अन्हु खुद मुसलमानों की तलवार से शहीद हुए। हज़रते हुजैफा रदियल्लाहु अन्हु चिल्लाते ही रहे कि ऐ मुसलमानो!

ये मेरे बाप हैं। ये मेरे बाप हैं।” मगर कुछ अजीब बद हवासी फैली हुई थी कि किसी को किसी का ध्यान ही नहीं था। और मुसलमानों ने हज़रते यमान रदियल्लाहु अन्हु को शहीद कर दिया।

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