आदाब महफ़िले मिलाद शरीफ़

जगह पाक हो पैसा हलाल कमाई का सर्फ़ किया जाए खुशबू नुजूरात अतरयात और फूल वगैरह जिस क़दर मुमकिन हो बेहतर है, नमूद रियाको बिल्कुल दखल न होमिमबर या चौकी ऊँची हो उसपर मसनद

या कोई कपड़ा पाक हो आराइश जेबो जीनत का इज़हार मुसर्रत के वास्ते जितनी बन पड़े एहतिमाम करे, गुरबा व मसाकीन वगैरह के वास्ते मुयस्सर हो तो खाने का भी इन्तेजाम करें फातिहा के वास्ते मुसलमान हलवाई के यहां की बनी हुई शीरीनी हो और रोशनी के वास्ते मोमबत्ती होतो अच्छा है क्योंकि मिट्टी के तेल वगैरह की बदबू से भी यह मजलिसे मुबारक पाक होनी चाहिये सामईन व हाज़रीन पाक व साफ़ बा वुजू हों और अदबसे बैठे मिलाद शरीफ़ के पढ़ने वाले मुत्तबे शरीअत हों, दुरूद ख्वानी की बार-बार ताकीद हो।

फ़ज़ाइल मिलाद शरीफ़

ज़िक्र सालेहीनके वक्त अल्लाह तआला की रहमत का नुजूल होता है, चे जाएकि तमाम सालेहीन और मुरसलीन के पेशवा हज़रत अहमद मुजतबा मुहम्मद मुस्तफा सल्ल० का ज़िकरे खैर हो और उस पर यह भी खूबी कि दुरूद.शरीफ़ की सदायें बुलंद हों वहां के हाज़रीन पर क्यों न रहमत का नुजूल होसामईन को क्यों न नक़द मुददुआ वसूल हो मनकूत है कि जिस मकान में यह महफ़िले मुबारक होती है उसपर साल भरतक रहमत का मेंह बरसता है और उस मकान के रहने वाले हिफज व अमान में रहते हैं और बे इन्तेहा खैरो बरकत शामिले हाल रहती है, और मक्का मुअज्जमा व मदीना मुनव्वरा में तो यह हाल है कि जब किसी के यहां लड़का पैदा होता है या ख़त्ना या शादी या नया मकान बने, या सफ़र से कोई वापस आये या बीमारी से सेहत पाए, हर किस्म की तकरीबों में महफिले मिलाद शरीफ ज़रूर होती है। अल्लाह पाक हम लोगों को भी ऐसी ही तौफीक दे कि अपने घरों को और मजलिस को जिके मुहम्मदी से मुनव्वर और मुशर्रफ़ किया करें, और तमाम रुसूमाते खुराफ़ात मिस्ले नाच गाना रंगे या बाजा वगैरह से बचते रहें। आमीन या रब्बिल आलमीन ।

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