हिजरत का दूसरा साल part 2

जंगे बदर

“बदर” मदीना मुनव्वरा से तकरीबन अस्सी मील के फासले पर एक गाँव का नाम है। जहाँ ज़मानए जाहिलियत में सालाना मेला लगता था। यहाँ एक कुवाँ भी था। जिस के मालिक का नाम “बदर था। इसी के नाम पर इस जगह का नाम “बदर रख दिया गया। इसी मकाम पर जंगे बदर का वो अज़ीम मअरर्का हुआ जिस

में कुफ्फारे कुरैश और मुसलमानों के दर्मियान सख्त छू रेज लडाई हुई। और मुसलमानों को वो अजीमुश्शान फतह मुबीन नसीब हुई जिस के बाद इस्लाम की इज्जत- इकबाल का परचम इतना सर बुलन्द हो गया कि कुफ्फ़ारे कुरैश की अजमत व शौकत बिल्कुल ही खाक में मिल गई। अल्लाह तआला ने जंगे बदर के दिन का नाम “यौमुल फुरकान” रखा। और कुरआन की सूरए अन्फाल में तफ्सील के साथ और दूसरी सूरतों में इजमालन बार बार इस मअर्का का जिक्र फरमाया। और इस जंग में मुसलमानों की फ़तह मुबीन के बारे में एहसान जताते हुए खुदा वंदे आलम ने कुरआन मजीद में इर्शाद फरमाया कि

व-लकद न-स-र-कुमुल्लाहु बि बदरिद व-अन्तुम अज़िल्लतुन फत्तकुल्लाहा ल-अल्लकुम तशकुरूना

(और यकीनन खुदावंद तआला ने तुम लोगों की मदद फ़रमाई बदर में जबकि तुम लोग कमज़ोर और बे सरो सामान थे तो तुम लोग अल्लाह से डरते रहो। ताकि तुम लोग शुक्र गुज़ार हो जाओ।)

जंगे बदर का सबब

जंगे बदर का असली सबब तो जैसा कि हम तहरीर कर चुके हैं “अमर बिनुल हज़रमी के क़त्ल से कुफ्फारे कुरैश में फैला हुआ ज़बरदस्त इश्तेआल था। जिस से हर काफिर की ज़बान पर यही एक नअा था कि “खून का बदला खून’ ले कर रहेंगे।

मगर बिल्कुल नागहानी ये सूरत पेश आ गई कि कुरैश का वो काफला जिस की तलाश में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मकामे “जिल उशैरा” तक तशरीफ ले गए थे मगर वो काफला हाथ नहीं आया था। बिल्कुल अचानक मदीना में खबर मिली कि अब वही काफला मुल्के शाम से लौटकर मक्का जाने

सुफयान बिन हरब व मखरमा बिन नौफल व अमर बिनुल आस

वाला है। और ये भी पता चल गया कि इस काफले में अबू

वगैरा कुल तीस या चालीस आदमी हैं और कुफ्फारे कुरैश का माले तिजारत जो इस काफले में है वो बहुत ज्यादा है। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने असहाब से फरमाया कि कुफ्फारे कुरैश की टोलियाँ लूट मार की निय्यत से मदीने के अतराफ में बराबर गश्त लगाती रहती हैं। और “कुर्ज बिन जाबिर फुहरी” मदीने की चरागाहों तक आकर गारत गिरी और डाका जनी कर गया है। लिहाज़ा क्यों न हम भी कुफ्फारे कुरैश के इस काफले पर हमला करके इस को लूट लें। ताकि कुफ्फारे कुरैश की शामी तिजारत बंद हो जाए। और वो मज़बूर हो कर हम से सुलह कर लें। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ये इर्शादे गिरामी सुन कर अन्सार व महाजिरीन इस के लिए तय्यार

हो गए।

मदीने से रवांगी

चुनान्चे.१२ रमज़ान सन्न २ हिजरी को बड़ी उजलमत के साथ लोग चल पड़ें जो जिस हाल में था उसी हाल में रवाना हो गया । इस लश्कर में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ न ज्यादा हथियार थे न फौजी राशन की कोई बड़ी मिकदार थी क्योंकि किसी को गुमान भी न था कि इस सफर में कोई बड़ी जंग होगी।

मगर जब मक्का में ये खबर फैली कि मुसलमान मुसल्लह हो कर कुरैश का काफ़ला लूटने के लिए मदीना से चल पड़े हैं। तो मक्का में एक जोश फैल गया। और एक दम कुफ्फारे कुरैश की फौज का दल बादल मुसलमानों पर हमला करने के लिए तय्यार हो गया जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इस की इत्तलाअ हुई तो आप ने सहाबए किराम को जमअ फ़रमा कर

सूरते हाल से आगाह किया और साफ साफ़ फरमा दिया कि मुमकिन है कि इस सफर में कुफ्फारे कुरैश के काफले ‘से मुलाकात हो जाए। और ये भी हो सकता है कि कुफ्फारे मक्का के लश्कर से जंग की नौबत आ जाए। इर्शाद गिरामी सुनकर हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु व हजरते उमर फारूक आरै दूसरे महाजिरीन ने बड़े जोश व खरोश का इजहार किया। मगर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अन्सार का मुँह देख रहे थे क्योंकि अन्सार ने आप के दस्ते मुबारक पर बैअत करते वक्त इस बात का अहद किया था कि वो उस वक्त तलवार उठाएँगे जब कुफ्फार मदीना पर चढ़ आएँगे। और यहाँ मदीना से बाहर निकल कर जंग करने का मामला था।

अन्सार में से कबीलए खुज़रज के सरदार हज़रते सझूद बिन बादा रदियल्लाहु अन्हु हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का चेहरए अनवर देखकर बोल उठे कि या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम। क्या आप का इशारा हमारी तरफ़ है? खुदा की कसम! हम वो जाँ निसार हैं कि अगर आप का हुक्म हो तो हम समुन्दर में कूद पड़ें। इसी तरह अन्सार के एक और मुअज्जज़ सरदार हज़रते मिकदाद बिन असवद रदियल्लाहु अनहु ने जोश में भर कर अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हम हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम की कौम की तरह ये न कहेंगे कि आप और आप का खुदा जा कर लडें । बलिक हम लोग आप के दाएँ से, बाएँ से, आगे से, पीछे से लड़ेंगे। अन्सार के इन दोनों सरदारों की तकरीर सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का चेहरा खुशी से चमक उठा।

(बुख़ारी गजवए बदर जि.२ स.५६४) मदीना से एक मील दूर चलकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने लश्कर का जाएजा लिया। जो लोग कम उम्र थे उन को वापस कर देने का हुक्म दिया। क्योंकि जंग के पुर खतर मौका पर भला बच्चों का क्या काम?

नन्हा सिपाही

मगर इन्ही बच्चों में हजरते सञ्द बिन अबी वक्कास रदियल्लाहु

के छोटे भाई हजरते उमैर बिन अबी वक्कास भी थे। जब उन से वापस होने को कहा गया तो वो मचल गए। और फूट फूटकर रोने लगे। और किसी तरह वापस होने पर तय्यार न हुए। उन की बे करारी और गिरया वजारी देखकर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का कल्बे नाजुक मुतास्सिर हो गया। और आप ने उन को साथ चलने की इजाजत दे दी चुनान्चे हजरते सद बिन अबी वक्कास रदियल्लाहु अन्हु ने इस नन्हे सिपाही के गले में भी एक तलवार हमाएल कर दी। मदीना से रवाना होने के वक्त नमाज़ों के लिए हज़रते उम्मे मकतूम रदियल्लाहु अन्हु को आप ने मस्जिदे नबवी का इमाम मुकर्र फ़रमा दिया था। लेकिन जब आप रूहा’ में पहुंचे तो मुनाफिकीन और यहूदियों की तरफ से कुछ ख़तरा महसूस फरमाया। इस लिए आप ने हज़रते अबू लबाबा बिन अब्दुल मनज़र रदियल्लाहु अन्हु को मदीने का हाकिम मुकर्रर फ़रमाकर उन को मदीना में वापस जाने का हुक्म दिया। और हज़रते आसिम बिन अदी रदियल्लाहु अन्हु को मदीने के चढ़ाई वाले गावँ पर निगरानी रखने का हुक्म सादिर फ़रमाया।

इन इन्तिजामात के बाद हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ‘बदर’ की जानिब चल पड़े जिधर से कुफ्फारे मक्का के आने की ख़बर थी। अब कुल फ़ौज की तअदाद तीन सौ तेरह थी जिन में साठ महाजिर और बाकी अन्सार थे मंज़िल ब मंज़िल सफ़र फ़रमाते हुए जब आप मकामे सफ़रा में पहुंचे तो दो आदमियों को जासूसी के लिए रवाना फरमाया। ताकि वो काफले का पता चलाएँ कि वो किधर है? और कहाँ तक पहुँचा है?

(जरकानी जि.१ स.४११)

अबू सुफ़यान की चालाकी

उधर कुफ्फारे कुरैश के जासूस भी अपना काम बहुत मुस्तअदी से कर रहे थे। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मदीना से रवाना हुए तो अबू सुफ़यान को इस की खबर मिल गई। उस ने फौरन ही “ज़मज़म बिन अमर गिफारी” को मक्का भेजा कि वो कुरैश को इस की ख़बर दे ताकि वो अपने काफले की हिफाजत का इन्तिजाम करें और खुद रास्ता बदल कर काफले को समुन्दर की जानिब ले कर रवाना हो गया। अबू सुफ़यान का कासिद ज़मज़म बिन अमर गिफारी जब मक्का पहुँचा तो उस वक्त दस्तूर

के मुताबिक जब कोई ख़ौफ़नाक ख़बर सुनानी होती तो ख़बर सुनाने वाला अपने कपड़े फाड़कर और ऊँट की पीठ पर खा हो कर चिल्ला चिल्ला कर ख़बर सुनाया करता था। ज़मज़म बिन अमर गिफारी ने अपना कुर्ता फाड़ डाला। और ऊँट की पीठ पर खडा हो कर जोर ज़ोर से चिल्लाने लगा। कि अहले मक्का तुम्हारा सारा माले तिजारत अबू सुफ़यान के काफले में है। और मुसलमानों ने इस काफ़ले का रास्ता रोक कर काफला लूट लेने का अज्म कर लिया है लिहाज़ा जल्दी करो। और बहुत जल्द अपने इस काफले को बचाने के लिए हथियार ले कर दौड़ पड़ो।

(जरकानी जि.१ स. ४११)

कुफ्फारे कुरैश का जोश

जब मक्का में ये ख़ौफ़नाक ख़बर पहुँची तो इस कदर हल चल मच गई। कि मक्का का सारा अमन- सुकून गारत हो गया। तमाम कबाएले कुरैश अपने घरों से निकल पड़े। सरदाराने मक्का में से सिर्फ अबू लहब अपनी बीमारी की वजह से नहीं निकला। इस के सिवा तमाम रऊसाए कुरैश (कुरैश के रईस) पूरी तरह मुसल्लह हो कर निकल पड़े। और चूँकि मकामे नख्ला का वाकिआ बिल्कुल ही ताजा था। जिस में अमर बिनुल हज़रमी

मुसलमानों के हाथ से मारा गया था और उस के काफले को मुसलमानों ने लूट लिया था। इस लिए कुफ्फारे कुरैश जोशे इन्तिकाम में आपे से बाहर हो रहे थें एक हजार का लश्करे जर्रार जिस का हर सिपाही पूरी तरह मुसल्लह, दोहरे हथियार, फौज की खुराक का ये इन्तिज़ाम थे कि कुरैश के मालदार लोग यअनी अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब, उत्बा बिन रबीआ, हारिस बिन आमिर, नज़र बिनुल हारिस, अबू जहल, उमय्या वगैरा बारी बारी से रोजाना दस दस ऊँट जिबह करते थे। और पूरे लश्कर को खिलाते थे। उतबा बिन रबीआ जो कुरैश का सब से बड़ा रईसे अअज़म था इस पूरे लश्कर का सिपह सालार था।

अबू सुफ़यान बच कर निकल गया

अबू सुफ़यान जब आम रास्ते से मुड़कर साहिले समुन्दर के रास्ते पर चल पड़ा और ख़तरे के मकामात से बहुत दूर पहुचें गया। और उस को अपनी हिफ़ाज़त का पूरा पूरा इत्मिनान हो गया तो उस ने कुरैश को एक तेज रफ्तार कासिद के ज़रीओ खत भेज दिया कि तुम लोग अपने अपने माल और आदमियों को बचाने के लिए अपने घरों से हथियार ले कर निकल पड़े थे। अब तुम लोग अपने अपने घरों को वापस लौट जाओ। क्योंकि हम लोग मुसलमानों की यलगार और लूटमार से बच गए हैं। और जानमाल की सलामती के साथ हम मक्का पहुँच रहे हैं।

कुफ्फार में इख़्तलाफ

अबू सुफ़यान का ये ख़त कुफ्फारे मक्का को उस वक्त मिला। जब वो मकामे “हुजफा” में थे। ख़त पढ़कर कबीलए बनू ज़हरा और कबीलए बनू अदी के सरदारों ने कहा कि अब मुसलमानों से लड़ने की कोई जरूरत नहीं है। लिहाजा हम लोगों को वापस लौट जाना चाहिए। ये सुनकर अबू जहल बिगड़ गया। और कहने लगा कि हम खुदा की कसम इसी शान के साथ बदर

तक जाएँगे । वहाँ ऊँट ज़िबह करेंगे। खूब खाएँगे, खिलाएँगे, शराब पियेंगे, नाच रंग की महफिल जमाएँगे। ताकि तमाम कबाएले अरब पर हमारी अज्मत व शौकत का सिक्का बैठ जाए। और वो हमेशा हम से डरते रहें। कुफ्फारे कुरैश ने अबू जहल की राय पर अमल किया। लेकिन बनू जहरा और बनू अदी के दोनों कबाएल वापस लौट गए। इन दोनों कबीलों के सिवा बाकी कुफ्फारे कुरैश के तमाम कबाएल जंगे बदर में शामिल हुए।

(सीरते इब्ने हुश्शाम जि.२ स: ६१८ ता ६१९)

कुफ्फारे कुरैश बदर में

कुफ्फारे कुरैश चूँकि मुसलमानों से पहले बदर में पहुँच गए थे, इस लिए मुनासिब जगहों पर उन लोगों ने अपना कब्जा जमा लिया था। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब बदर के करीब पहुँचे तो शाम के वक्त हज़रते अली, हज़रते जुबैर, हज़रते सद बिन अबी वक्कास रदियल्लाहु अन्हुम को बदर की तरफ भेजा.। ताकि ये लोग कुफ्फारे कुरैश के बारे में ख़बर लाएँ। इन हज़रात ने कुरैश के दो गुलामों को पकड़ लिया जो लश्करे कुफ्फार के लिए पानी भरने पर मुकर्रर थे। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उन दोनों गुलामों से दर्याफ्त फ़रमाया कि बताओ। इस कुरैशी फ़ौज में कुरैश के सरदारों में से कौन कौन है? तो दोनों गुलामों ने बताया कि उत्बा बिन रबीआ, शैबा बिन रबीआ, अबुल बख़्तरी, हकीम बिन हज़ाम, नौफ़न बिन खुवेलद, हारिस बिन आमिर, नजर बिनुल हारिस, ज़मआ बिनुल असवद, अबू जहल बिन हश्शाम, उमय्या बिन ख़लफ, सुहैल बिन अमर, अमर बिन अब्द वुद्द, अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिबं वगैरा सब इस लश्कर में मौजूद हैं। ये फेहरिस्त सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपने असहाब की तरफ़ मुतवज्जे हुए और फरमाया कि मुसलमानो! सुन लो। मक्का ने अपने जिगर के

टुकड़ों को तुम्हारी तरफ डाल दिया है।

(मुस्लिम जि.२ स.१०२ गजवए बदर व जरकानी बगैरा)

ताजदारे दो आलम बदर के मैदान में

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जब बदर में नुजूल फ़रमाया। तो ऐसी जगह पड़ाव डाला कि जहाँ न कोई कुदाँ था न चश्मा। और वहाँ की जमीन इतनी रेतीली थी कि घोड़ों के पावँ जमीन में धंसते थे। ये देखकर हज़रते हुबाब बिन मुनजिर रदियल्लाहु अन्हु ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! सल्लल्लाहु आप ने पड़ाव के लिए जिस जगह को मुन्तख़ब फ़रमाया है। ये “वही” की रू से है या फौजी तदबीर है? आप ने फरमाया कि इस के बारे में कोई “वही” नहीं उतरी है हजरते हब्बाद बिन मुनज़िर रदियल्लाहु अनहु ने कहा कि फिर मेरी राय में जंगी तदाबीर की रू से बेहतर ये है कि हम कुछ आगे बढ़कर पानी के चष्मोंपर कब्जा कर लें। ताकि कुफ्फार जिन कुओं पर काबिज़ हैं दो बेकार हो जाएँ क्योंकि इन्ही चश्मों पर से उन कुओं में पानी जाता है। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उन की राय को पसन्द फ़रमाया। और इसी पर अमल किया गया। खुदा की शान कि बारिश भी हो गई जिस से मैदान की गर्द और रेत जम गई। जिस पर मुसलमानों के लिए चलना फिरना आसान हो गया। और कुफ्फार की ज़मीन पर कीचड़ हो गई। जिस से उन को चलने फिरने में दुश्वारी हो गई। और मुसलमानों ने बारिश का पानी रोक कर जा बजा हौज़ बना लिए। ताकि ये पानी गुस्ल और वुजू के काम आए। इसी एहसान को खुदा वंदे आलम ने कुरआन में इस तरह बयान फ़रमाया कि:क्-यु-नज्जिलु अलैकुम मिनस समाइ मॉअल लियुतह-हि-र-कुम बिही। (अन्फाल)

(और खुदा

ने आस्मान से पानी बरसा दिया। ताकि वो तुम लोगों को पाक करे।)

सरवरे काएनात की शब बेदारी

१७ रमज़ाम सन्न २ हिजरी जुमअ की रात थी तमाम फौज तो आराम व चैन की नींद सो रही थी। मगर एक सरवरे काएनात की जात थी जो सारी रात खुदावंदे आलम से लौ लगाए दुआ

में मसरूफ थी सुबह नमूदार हुई। तो आप ने लोगों को नमाज के लिए बेदार फ़रमाया। फिर नमाज़ के बाद कुरआन की आयाते जिहाद सुनाकर ऐसा लरज़ा खेज और वलवला अंगेज बयान फ्रमाया कि मुजाहिदीने इस्लाम की रगों के खून का कतरा कतरा जोश- ख़रोश का समुन्दर बनकर तूफानी मौजें मारने लगा और लोग मैदाने जंग के लिए तय्यार होने लगे।

कौन कब? और कहाँ मरेगा?

रात ही चन्द जाँ निसारों के साथ आप ने मैदाने जंग का मुआएना फ़रमाया। उस वक्त दस्ते मुबारक में एक छड़ी थी। आप उसी छडी से जमीन पर लकीर बनाते थे और ये फरमाते जाते थे कि ये फुलाँ काफ़िर के कत्ल होने की जगह है। और कल यहाँ फुलाँ काफ़िर की लाश पड़ी हुई मिलेगी। चुनान्चे ऐसा ही हुआ कि आप ने जिस जगह जिस काफिर की कत्ल गाह बताई थी उस काफ़िर की लाश ठीक उसी जगह पाई गई। उन में से किसी एक ने लकीर से बाल बराबर तजावुज़ नहीं किया । (अबू दाऊद जि.२ स. ३६४ मतबअ नामी व मुस्लिम जि.२ स.१०२ गज़वए बदर)

इस हदीस से साफ और सरीह तौर पर ये मस्अला साबित हो जाता है कि कौन कब? और कहाँ मरेगा? इन दोनों गैब की बातों का इल्म अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अता फरमाया था।

लड़ाई टलते टलते फिर ठन गई

कुफ्फारे कुरैश लड़ने के लिए बेताब थे। मगर उन लोगों में कुछ सुलझे दिलो दिमाग के लोग थे जो खू रेज़ी को पसन्द नहीं करते थे। चुनान्चे हकीम बिन हज़ाम जो बाद को मुसलमान हो गए। बहुत ही संजीदा और नर्म खू थे। उन्होंने अपने लश्कर के सिपह सालार उत्बा बिन रबीआ से कहा कि आखिर इस खू रेजी से क्या फायदा? मैं आप को एक निहायत ही मुस्लिसाना मश्वरा देता हूँ। वो ये है कि कुरैश का जो कुछ मुतालबा है वो अम्र बिनुल हजरमी का खून है। और वो आप का हलीफ़ है। आप उस का खून बहा अदा कर दीजिए। इस तरह ये लड़ाई टल जाए जाएगी। और आज का दिन आप की तारीखे जिन्दगी में आप की नेकनामी की यादगार बन जाएगा। कि आप के तदब्बुर से एक बहुत ही खौफनाक और खू रेज़ी लड़ाई टल गई। उतबा ब-जाते खुद बहुत ही मुदब्बिर और नेक नफ्स आदमी था। उसने ब-खूशी इस मुखलिसाना मश्वरा को कबूल कर लिया। मगर इस मामले में अबू जहल की मंजूरी भी जरूरी थी। चुनान्चे हकीम बिन हजाम जब उतबा बिन रबीआ का ये पैगाम लेकर अबू जहल के पास गए तो अबू जहल की रगे जहालत भड़क उठी। और उस ने एक खून खौला देने वाला तङ्ना मारा और कहा कि हाँ, हाँ! मैं खूब समझता हूँ कि उतबा की हिम्मत ने जवाब दे दिया चूँकि उस का बेटा हुजैफा मुसलमान हो कर इस्लामी लश्कर के साथ आया है इस लिए वो जंग से जी चुराता है ताकि उस के बेटे पर आँच न आए।

फिर अबू। जहल ने इसी पर बस नहीं किया। बल्कि अम्र बिनुल हजरमी मकतूल के भाई आमिर बिनुल हजरमी को

बुलाकर कहा कि देखो तुम्हारे मकतूल भाई उमर बिनुल हज़रमी के का बदला लेने की सारी स्कीम तहस नहस हुई जा रही है। क्योंकि हमारे लश्कर के सिपह सालार उतबा बुज़दिली जाहिर कर रहा है। ये सुनते ही आमिर बिलनुल हजरमी ने अरब के दस्तूर केमुताबिक अपने कपड़े फाड़ डाले और अपने सर पर धूल डालते हुए

“व-अअ-मराह व–अअ-मराह” का ना मारना शुरू कर दिया। इस कारवाई ने कुफ्फारे कुरैश की तमाम फौज में आग लगा दी और सारा लश्कर खून का बदला खून के नअरों से गूंजने लगा। और हर सिपाही जोश में आपे से बाहर हो कर जंग के लिए बेताब व बेकरार हो गया। उत्बा ने अबू जहल का तअना सुना तो वो भी गुस्से में भर गया। और कहा कि अबू जहल से कह दो कि मैदाने जंग बताएगा कि बुजदिल कौन है? ये कहकर लोहे की टोपी तलब की। मगर उस का सर इतना बड़ा था कि कोई टोपी उस के सर पर ठीक नहीं बैठी। तो मजबूरन उसने अपने सर पर कपड़ा लपेटा और हथियार पहनकर जंग के लिए तय्यार हो गया।

मुजाहिदीन की सफ़ आराई

१७ रमज़ान २ हिजरी जुमअ के दिन हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मुजाहिदीने इस्लाम को सफ बंदी का हुक्म दिया। दस्ते मुबारक में एक छड़ी थी। उस के इशारे से आप सफें दुरुस्त फरमा रहे थे कि कोई शख्स आगे पीछे न रहने पाएं जैन ऐसे वक्त में कि जंग का नक्कारा बजने वाला है। दो ऐसे वाकिआत दरपेश हो गए जो निहायत ही इबरत खेज़ और बहुत ज्यादा नसीहत अमोज हैं।

शिकमे मुबारक को बोसा

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपनी छड़ी के इशारे से सफें सीधी फरमा रहे थे। तो आप ने देखा कि हजरते सवाद अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु का पेट सफ से कुछ आगे निकला हुआ था। आप ने अपनी छडी से उन के पेट पर एक कोंचा देकर फरमाया कि

सीधे खड़े हो जाओ (हज़रते सवाद रदियल्लाहु अन्हु ने अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! आप ने मेरे शिकम पर छड़ी मारी है। मुझे आप से इस का किसास (बदला) लेना है। ये सुनकर आप ने अपना पैराहन शरीफ उठाकर फरमाण। कि ऐ सवाद! लो मेरा शिकम हाजिर है। तुम इस पर छड़ी मारकर मुझ से अपना किसास ले लो। हज़रते सवाद रदियल्लाहु अन्हु ने दौड़कर आप के शिकमें मुबारक को चूम लिया। और फिर निहायत ही वालिहाना अन्दाज में इन्तिहाई गर्मजोशी के साथ आप के जिस्मे अकदस से लिपट गए। आप ने इर्शाद फरमाया। कि ऐ सवाद! तुम ने ऐसा क्यों किया? अर्ज किया कि या रसूलल्लाह! मैं इस वक्त जंग की सफ़ में अपना सर हथेली पर रख कर खड़ा हूँ। शायद मौत का वक्त आया हो इस वक्त मेरे दिल में इस तमन्ना ने जोश मारा कि काश मरते वक्त मेरा बदन आपके जिस्मे अतहर से छू जाए। ये सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हजरते सवाद रदियल्लाहु अन्हु के इस जज़्बए महब्बत की कदर फ़रमाते हुए उनके लिए खैर- बरकत की दुआ फ़रमाई। और हज़रते संवाद रदियल्लाहु अन्हु ने दरबारे रिसालत में मज़िरत करते हुए अपना किसास मुआफ कर दिया। और तमाम सहाबए किराम हज़रते सवाद रदियल्लाहु अन्हु की इस आशिकाना अदा को हैरत से देखते हुए उनका मुँह तकते रह गए ।(सीरते इने हुश्शाम गज़वए बदर जि.२ स.६२६)

अहद की पाबन्दी

इत्तिफाक से हजरते हुजैफा बिन अलीमान और हज़रते अबू हसील रदियल्लाहु अन्हुमा, ये दोनों सहाबी कहीं से आ रहे थे। रास्ते में कुफ्फार ने उन दोनों को रोका कि तुम दोनों बदर के मैदान में मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) की मदद करने के लिए जा रहे हो, उन दोनों ने इन्कार किया। और जंग में शरीक न होने का अहद किया। चुनान्चे कुफ्फार ने उन दोनों

सल्लल्लाहु तआला को छोड़ दिया। जब ये दोनों बारगाहे रिसालत में हाजिर हुए और अपना वाकिआ बयान किया । तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उन दोनों को लड़ाई की सफों से अलग कर दिया। और इर्शाद फरमाया कि हम हर हाल में अहद की पाबन्दी करेंगे हग को सिर्फ खुदा की मदद दरकार है।

(मुस्लिम बाबुल वफा बिल अहद जि.२ स.१०६) नाज़रीने किराम! गौर कीजिए। दुनिया जानती है कि जंग के मौकअ पर खुसूसन ऐसी सूरत में जब कि दुश्मनों के अजीमुश्शान लश्कर का मुकाबला हो। एक एक सिपाही कितना कीमती होता है? मगर ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी कमजोर फौज को दो बहादुर और जाँबाज़ मुजाहिदों से महरूम रखना पसन्द फरमाया। मगर कोई मुसलमान किसी काफ़िर से भी बद अहदी और वअदा खिलाफी करे इस को गवारा नहीं फरमाया!

अल्लाहु अकबर! ऐ अक़वामे आलम के बादशाहो! लिल्लाह मुझे बताओ कि क्या तुम्हारी तारीखे ज़िन्दगी के बड़े बड़े दफ्तरों में कोई ऐसा चमकता हुए वरक भी है? ऐ चाँद व सूरज की दूर बी निगाहो! तुम खुदा के लिए बताओ? क्या तुम्हारी आँखों ने भी कभी सफ़हए हस्ती पर पाबन्दीए अहद की कोई ऐसी मिसाल देखी है? खुदा की कसम! मुझे यकीन है कि तुम इसके जवाब में “नहीं” के सिवा कुछ भी नहीं कह सकते?

दोनों लश्कर आमने सामने

अब वो वक्त है कि मैदाने बदर में हक व बातिल की दोनों सफें एक दूसरे के सामने खड़ी हैं कुरआन एअलान कर रहा है कि :कद काना लकुम आ-यतुन फी फि-अतैनिल त-क-ता। फि-अतुन तुकातिलु फी सबीलिल्लाहि व-उखुरा काफिरतुन (आले इमरान)

तर्जमा जो लोग बाहम लड़े उन में तुम्हारे लिए इबरत का निशान है। एक खुदा की राह में लड़ रहा था और दूसरा मुन्किरे खुदा था। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम

मुजाहिदीने इस्लाम की सफबंदी से फारिग होकर मुजाहिदीन की करारदाद केमुताबिक अपनी उस छप्पर में तशरीफ़ ले गए। जिस को सहाबए किराम ने आप की निशस्त के लिए बना रखा था। अब उस छप्पर की हिफाज़त का सवाल बेहद अहम था। क्योंकि कुफ्फारे कुरैश के हमलों का असल निशाना हुजूर ताजदारे मदीना सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही की ज़ात थी। किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी कि उस छप्पर का पहरा दे। लेकिन इस मौकअ पर भी आप के यारे गार हज़रते सिद्दीक बा वकार ही की किस्मत में ये सआदत लिखी थीं कि वो नंगी तलवार ले कर उस झोंपड़ी के पास डटे रहे और हज़रते सद बिन मुआज रदियल्लाहु अन्हु भी चन्द अन्सारियों के साथ उस छप्पर के गिर्द पहरा देते रहे।

(जरकानी जि.१ स. ४१८)

दुआए नबवी

हुजूरे सरवरे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इस नाजुक घड़ी में जनाबे बारी से लौ लगाए गिरया वज़ारी के साथ खडे होकर हाथ फैलाए दुआ माँग रहे थे।

“खुदावंदा! तू ने मुझ से जो वअदा फरमाया है। आज उसे पूरा फ़रमादे ।।

आप पर इस क़दर रिक्कत और महवियत तारी थी कि जोशे गिरया में चादर मुबारक दोशे अनवर से गिर गिर पड़ती थी। मगर आप को खबर नहीं होती थी। कभी आप सज्दा में सर रख कर इस तरह दुआ माँगते कि:

“इलाही! अगर ये चन्द नुफूस हलाक हो गए। तो फिर

कियामत तक रुए ज़मीन पर तेरी अबादत करने वाले न रहेंगे।”

(सीरते इब्ने हुश्शाम जि.२ स.६२७) हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु आप के यारे गार थे। आप को इस तरह बे करार देखकर उनके दिल का सुकून करार जाता रहा । और उन पर रिक्कत तारी हो गई और उन्होंने चादरे मुबारक को उठाकर आप के मुकद्दस कन्धे पर डाल दी। और आप का दस्ते मुबारक थामकर भर्राई हुई आवाज़ में बड़े अदब के साथ अर्ज किया कि हुजूर! अब बस कीजिए। ख़ुदा जरूर अपना वअदा पूरा फरमाएगा!

अपने यारे गार सिद्दीके जाँ निसार की बात मानकर आप ने दुआ खत्म कर दी और आप की जबाने मुबारक पर इस आयत का विर्द जारी हो गया कि:

6 सयुह-जमुल जम्ञ व युवल्लूनद दुबुर। (कमर)

(तर्जमा : अन्क़रीब (कुफ्फार की) फौज को शिकस्त दे दी जाएगी और वो पीठ फेरकर भाग जाँएगे।)

आप इस आयत को बार बार पढ़ते रहे जिस में फ़तहे मुबीन की बिशारत की तरफ इशारा था!

लड़ाई किस तरह शुरू हुई?

जग ती इब्तिदा इस तरह हुई कि सब से पहले आमिर बिनुल हजरमी जो अपने मकतूल भाई अमर बिनुल हज़रमी के खून का बदला लेने के लिए बे करार था। जंग के लिए आगे बढ़ा। उसके के मुकाबले के लिए हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु के गुलाम हजरते मेहजअ रदियल्लाहु अन्हु मैदान में निकले। और लड़ते हुए शहादत से सरफ़राज़ हो गए। फिर हज़रते हारिसा बिन सुराका अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु हौज से पानी पी रहे थ कि नागहाँ उनको कुफ्फार का एक तीर लगा और वो शहीद हो गए।

(सीरते इब्ने हुश्शाम जि. २ स.६२७)

हज़रते उमैर का शौके शहादत

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जब जोशे जिहाद का वज फरमाते हुए इर्शाद फरमाया कि मुसलमानो! उस जन्नत की तरफ बढ़े चलो जिस की चौड़ाई आस्मान व जमीन के बराबर है। तो हज़रते उमैर बिनुल हमाम अन्सारी रदियल्लाहु अन्हु बोल उठे। कि या रसूलल्लाह. क्या जन्नत की चौड़ाई जमीन व आस्मान के बराबर है? इर्शाद फरमाया कि “हाँ” ये

सुनकर हज़रते उमैर रदियल्लाहु अन्हु ने कहा कि “वाह-वाह’ आप ने दर्याफ्त फरमाया कि क्या ऐ उमैर तुम ने “वाह-वाह किस लिए कहा? अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! फ़कत इस उम्मीद पर कि मैं भी जन्नत में दाखिल हो जाऊँ। आप ने खुशखबरी सुनाते हुए इर्शाद फ़रमाया। कि ऐ उमैर! तू बेशक जन्नती है। हज़रते उमैर रदियल्लाहु अन्हु उस वक्त खजूरें खा रहे थे। ये बिशारत सुनी तो मारे खुशी के खजूरें फेंक कर खड़े हो गए। और एक दम कुफ्फार के लश्कर पर तलवार ले कर टूट पड़े और जाँबाजी के साथ लड़ते हुए शहीद हो गए। (मुस्लिम किताबुल जिहाद बाबे सुकूत फ़र्जुल जिहाद अनिल मझुतरीन जि.२ स. १२९)

कुफ्फार का सिपह सालार मारा गया

कुफ्फार का सिपह सालार उतबा बिन रबीआ अपने सीने पर शुतुर मुर्ग का पर लगाए हुए अपने भाई शैबा बिन रबीआ और अपने बेटे वलीद बिन उतबा को साथ ले कर गुस्से में भरा हुआ अपनी सफ़ से निकल कर मुकाबला की दअवत देने लगा। इस्लामी सफों में से हज़रते औफ़ व हज़रते मुआज़ व अब्दुल्लाह बिन रवाहा रदियल्लाहु अन्हुम मुकाबला को निकले। उतबा ने उन लोगों से नाम व नसब पूछो । जब मालूम हुआ कि ये लोग अन्सारी हैं। तो उतबा ने कहा कि हम को तुम लोगों से कोई ग़रज़ नहीं। फिर उतबा ने चिल्लाकर कहा कि ऐ मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला

अलैहि वसल्लम) ये लोग हमारे जोड के नहीं हैं। अशराफे कुरैश को हम से लड़ने के लिए मैदान में भेजिए। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते हम्जा व हजरते अली व हजरते उबैदा रदियल्लाहु अन्हुम को हुक्म दिया कि आप लोग इन तीनों के मुकाबले के लिए निकलें। चुनान्चे ये तीनों बहादुराने इस्लाम मैदान में निकले। चूँकि ये तीनों हज़राता सर पर खूद पहने हुए थे। जिस से उन के चेहरे छुप गए थे इस लिए उतबा ने इन हज़रात को नहीं पहचाना। और पूछा कि तुम कौन लोग हो? जब उन तीनों ने अपने नाम व नसब बताए। तो उतबा ने कहा कि हाँ अब हमारा जोड़ है। जब उन लोगों में जंग शुरू हुई तो हजरते हम्जा व हज़रते अली व हज़रते उबैदा रदियल्लाहु अन्हुम ने अपने ईमानी शुजाअत का ऐसा मुजाहरा किया कि बदर की जमीन दहल गई। और कुफ्फार के दिल थर्रा गए और उनकी जंग का अंजाम ये हुआ कि हज़रते हम्जा रदियल्लाहु अन्हु ने उतबा का मुकाबला किया। दोनों इन्तिहाई बहादुरी के साथ लड़ते रहे। मगर आखिरकार हज़रते हम्ज़ा रदियल्लाहु अन्हु ने अपनी तलवार की वार से मार मार कर उतबा को जमीन पर ढेर कर दिया। वलीद ने हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु से जंग की। दोनों ने एक दूसरे पर बढ़ बढ़कर कातिलाना हमला किया और खूब लड़े। लेकिन असदुल्लाहुल गालिब की जुल-फ़िकार ने वलीद को मार गिराया। और वो ज़िल्लत के साथ कत्ल हो गया। मगर उतबा के भाई शैबा ने हज़रते उबैदा रदियल्लाहु अन्हु को इस तरह ज़ख़्मी कर दिया कि वो ज़ख्मों की ताब न लाकर जमीन पर बैठ गए। ये मंज़र देखकर हज़रते अली रदियल्लाहु अन्हु को अपने कान्धे पर उठाकर बारगाहे रिसालत में लाए। उन की पिन्डली टूट कर चूर चूर हो गई थी

और नली का गूदा बह रहा था। इस हालत में अर्ज कि या रसूलल्लाह! क्या मैं शहादत से महरूम रहा? इर्शाद फरमाया कि नहीं। हरगिज़ नहीं। बल्कि तुम शहादत से सरफराज हो गए। हज़रते उबैदा रदियल्लाहु अन्हु ने कहा कि या रसूलल्लाह! अगर आज मेरे और आप के चचा अबू तालिब ज़िन्दा होते तो वो मान

लेते कि उनके इस शेअर का मिसदाक मैं हूँ कि –

व नुस-लिमुहू हत्ता नुसर-रआ हव-लहू

व नज़हलु अन अबना-इना वल-हलाइली यानी हम मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को उस वक्त दुश्मानों के हवाले करेंगे जब हम उनके गिर्द लड़ लड़कर पछाड़ दिए जाएंगे। और हम अपने बेटों और बीवीयों को भूल जाएँगे। (अबू दाऊद जि. २ स. ३६१ मतबअ नामी व जरकानी अलल मवाहिब जि.१ स. ४१८)

हज़रते जुबैर की तारीख़ी बरछी

इसके बाद सईद बिनुल आस का बेटा “उबैद” सर से पाच तक लोहे के लिबास और हथियारों से छुपा हुआ सफ़ से बाहर निकला। और ये कहकर इस्लामी लश्कर को ललकारने लगा कि

अबू करश हूँ” उस की ये मगरूराना ललकार सुनकर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के फूफी ज़ाद भाई हज़रते जुबैर बिनुल अव्वाम रदियल्लाहु अन्हु जोश में भरे हुए अपनी बरछी ले कर मुकाबला के लिए निकले मगर ये देखा कि उन की दोनों आँखों के सिवा उस के बदन का कोई हिस्सा भी ऐसा नहीं जो लोहे से छुपा हुआ न हो। हज़रते जुबैर रदियल्लाहु अन्हु ने ताक कर उस की आँख में इस ज़ोर से बरछी मारी कि वो जमीन पर गिरा और मर गया। बरछी उस की आँख को छेदती हुई खोपड़ी की हड्डी में चुभ गई थी। हज़रते जुबैर रदियल्लाहु अन्हु ने जब उस की लाश पर पाएँ रखकर पूरी ताक़त से खींचा तो बड़ी मुश्किल से बरछी निकली। लेकिन उस का सर मुड़कर ख़म हो गया। बरछी एक तारीख़ी यादगार बन कर बरसों तबर्रुक बनी रही। हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते जुबैर रदियल्लाहु अन्हु से ये बरछी तलब फ़रमा ली। और इस को

हमेशा अपने पास रखा। फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बाद चारो खुलफाए राशिदीन के पास मुन्तकिल होती रही। फिर हजरते जुबैर रदियल्लाहु अनहु के फरजन्द हजरते अब्दुल्लाह बिन जुबैर रदियल्लाहु अन्हुमा के पास आई। यहाँ तक कि ७३ हिजरी में जब बनू उमय्या के कब्जे में चली गई। फिर इस के बाद ला पता हो गई। बुखारी गजवए बदर जि. २ स ५०० )

अबू जहल ज़िल्लत के साथ मारा गया

हजरते अब्दुर्रहमान बिन औफ रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि मैं सफ में खडा था। और मेरे दाएँ बाएँ दो नव उम्र लड़के खड़े थे। एक ने चुपके से पूछा कि चचा जान! क्या आप अबू जहल को पहचानते हैं? मैं ने उस से कहा कि क्यों भतीजे! तुम को अबू जहल से क्या काम है? उस ने कहा कि चचा जान मैं ने खुदा से अहद किया है कि मैं अबू जहल को जहाँ देख लूँगा। या तो उस को कत्ल कर दूंगा या खुद लड़ता हुआ मारा जाऊँगा। क्योंकि वो अल्लाह के रसूल का बहुत ही बड़ा दुश्मन है। हजरते अब्दुर्रहमान कहते है कि मैं हैरत से उस का मुँह तक रहा था कि दूसरे नव जवान ने भी मुझ से यही कहा। इतने में अबू जहल तलवार घुमाता हुआ सामने आ गया। और मैं ने इशारे से बता दिया। कि अबू जहल यही है बस फिर क्या था। ये दोनों लडके तलवारें ले कर उस पर इस तरह झपटे जिस तरह बाज अपने शिकार पर झपटता है। दोनों ने अपनी तलवारों से मार मार कर अबू जहल को ढेर कर दिया। ये दोनों लड़के हजरते मुऔज़ और मुआज रदियल्लाहु अन्हुमा थे उफरा के बेटे थे। अबू जहल के बेटे इकरमा ने अपने बाप के कातिल हजरते मुआज पर हमला कर दिया। और पीछे से उन के बाए शाने पर तलवार मारी जिस से उन का बाजू कट गया लेकिन थोडा सा चमडा बाकी रह गया। और हाथ लटकने लगा हजरते मुआज ने इकरमा का पीछा किया और दूर तक

दौड़ाया। मगर इकरमा भाग कर बच निकला। हज़रते मुआज । रदियल्लाहु अन्हु इस हालत में भी लड़ते रहे। लेकिन कटे हुए हाथ के लटकने से जहमत हो रही थी। तो उन्होंने अपने कटे हुए हाथ को पावँ से दबाकर इस ज़ोर से खींचा कि तस्मा (चमडा) अलग हो गया। और फिर वो आज़ाद हो कर एक हाथ से लड़ते रहे। हजरते अब्दुल्लाह बिन मसऊद रदियल्लाहु अन्हु अबू जहल के पास से गुजरे। उस वक्त अबू जहल में कुछ कुछ ज़िन्दगी की रमक बाकी थी। हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद रदियल्लाहु अन्हु ने उस की गर्दन को अपने पावँ से रौंद कर फ़रमाया कि “तू ही अबू जहल है? बता आज तुझे अल्लाह ने कैसा रुसवा किया”

अबू जहल ने इस हालत में भी घमन्ड के साथ ये कहा कि तुम्हारे लिए ये कोई बड़ा कारनामा नहीं है। मेरा कतल हो जाना इस से ज्यादा नहीं है कि एक आदमी को उसकी कौम ने कत्ल कर दिया। हाँ मुझे इस. का अफ़सोस है कि काश मुझे किसानों के सिवा कोई दूसरा शख्स कत्ल करता। हज़रते मुऔज़ और हजरते मुआज रदियल्लाहु अन्हु चूँकि ये दोनों अन्सारी थे। और अन्सार खेती बाड़ी का काम करते थे और कबीलए कुरैश के लोग किसानों को बड़ी हिकारत की नज़र से देखा करते थे। इसलिए अबू जहल ने किसानों के हाथ से कत्ल होने को अपने लिए काबिले अफसोस बताया।

जंग खत्म हो जाने के बाद हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हजरते अब्दुल्लाह बिन मसऊद को साथ ले कर जब अबू जहल की लाश के पास गुजरे। तो लाश की तरफ़ इशारा करके फरमाया कि अबू जहल इस ज़माने का फ़िरऔन है। फिर अब्दुल्लाह बिन मसऊद रदियल्लाहु अन्हु ने अबू जहल का सर काट कर ताजदारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के कदमों में डाल दिया।

(बुख़ारी गजवए बदर व दलाएलुन नुबूव्वत जि.२ स.१७३)

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