बनु उमय्या की अहलेबैत علیهم السلام से नफ़रत

बनु उमय्या की अहलेबैत علیهم السلام से नफ़रत

“अबु अब्दुल रहमान अल मुख़री ने फ़रमाया जब भी बनु उमय्या ये सुनते थे की किसी बच्चे का नाम जो पैदा हुआ है उसका नाम अली होता तो वो(बनु उमय्या) उस बच्चे को क़त्ल कर देते”

हवाला- 📘 “सियर अलम अन-नुबला जिल्द 5, सफ़ह 101,102 अल्लामा हाफ़िज़ ज़हबी मुतवफ़्फ़ा 748 हिजरी

मदैनी फ़रमाते हैं के वो मामून के यहाँ तशरीफ़ ले गया और उनके सामने इमाम अली के मुताल्लिक़ रिवायत फ़रमाई तो मामून ने बनु उमय्या पर लानत की
फिर मैंने फ़रमाया के मुसन्ना बिन अब्दुल्लाह अंसारी ने कहा कि “मैं शाम में था और मैंने वहाँ किसी का भी नाम अली या हसन नही सुना लेकिन जो भी मैंने नाम सुने वो मुआविया, यज़ीद अल-वलीद ही थे”….और इसके आख़िर में जो बात है उसे नक़्ल फ़रमान मेरे मुम्किनात में से नही….अल्लाहु-अकबर 😭

👍 हवाला- 📙📘📚👇👇👇
“सियर अलम अन-नुबला जिल्द10, सफ़ह 400,401,402 अल्लामा हाफ़िज़ ज़हबी 748 हिजरी”
(नोट:-इसी तरह के नाम इस दौर में भी रखने की कोशिश एक तंज़ीम करवा रही है यानी दुश्मने अहलेबैत की ये आदत थी और इस दौर के दुश्मने अहलेबैत भी अपने बाप दादाओ के इस अमल को अपनाए हुए हैं)

“इमाम इब्ने हजर अस्क़लानी رضی اللہ تعالی عنه
ने अपनी किताब अल-मतालिब उल-आलिया बिज़वाइद इल मसानिद समानिया जिल्द 18 में एक बाब बांधा है जिसका नाम ही है
باب لعن رسول اللہ صلی اللہ تعالی علیه وآله وسلم الحکم بن أبي العاص وبنیه وبني أمیة

“रसूलल्लाह صلی اللہ تعالی علیه وآله وسلم का अल-हकम इब्ने अबी अल-आस और उसके बच्चों पर और बनु उमय्या पर लानत भेजने पर बाब”……………जिसकी पहली रिवायत मुलाहिज़ा फरमाएं 👇👇👇👇👇

“मैं इमाम हसन और इमाम हुसैन علیهما السلام के साथ था और मरवान ने इमाम आली मक़ाम इमाम हुसैन علیه السلام पर माज़अल्लाह लानत भेजी…मरवान ने कहा अहलेबैत लानती हैं(माज़अल्लाह) इस पर इमाम हुसैन علیه السلام ग़ुस्सा हो गए और फ़रमाया क्या तू ये कह रहा है के अहलेबैत علیهم السلام लानती हैं???(माज़अल्लाह)……फिर इमाम हुसैन علیه السلام
ने फ़रमाया के ख़ुदा की क़सम रसूलल्लाह صلی اللہ تعالی علیه وآله وسلم ने तुझ पर उस वक़्त लानत की थी जब तू अपने बाप के सुल्ब में थे.

☝”ये हदीस इस सनद के साथ सहीह है और इसका रिजाल भी सिक़ाह(Trustworthy) है और तवील फ़ेहरिस्त बयान फ़रमाई है कि ये बात किन किन किताबों में सहीह अस्नाद के साथ मौजूद है”

☝📚इमाम इब्ने हजर अस्क़लानी 852 हिजरी

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