शिअबे अबी तालिब सन्न ७ नबवी

शिअबे अबी तालिब सन्न ७ नबवी

एअलाने नुबूव्वत के सातवें साल ७ नबवी में कुफ्फारे मक्का ने जब देखा कि रोज़ ब-रोज़ मुसलमानों की तअदाद बढ़ती जा रही है और हज़रते हम्जा व हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हुमा जैसे बहादुराने कुरैश भी दामने इस्लाम में आ गए। तो गैज- गजब में ये लोग आपे से बाहर हो गए। और तमाम सरदाराने कुरैश और मक्का के दूसरे कुफ्फार ने ये स्कीम बनाई कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और आप के ख़ानदान का मुकम्मल बाइकाट कर दिया जाए। और उन लोगों को किसी तंग व तारीक जगह में महसूर (कैद) करके उनका दाना पानी बन्द कर दिया जाए ताकि ये लोग मुकम्मल तौर पर तबाह व बरबाद हो जाएँ। चुनान्चे इस ख़ौफ़नाक तजवीज़ के मुताबिक तमाम कबाइले कुरैश ने आपस में ये मुआहदा किया कि जब तक बनी हाशिम के

खानदान वाले हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को कल्ल के लिए हमारे हवाले न कर दें :(१) कोई शख्स बनू हाशिम के खानदान से शादी ब्याह न करें। (२) कोई शख्स इन लोगों के हाथ किसी किसम के सामान की

खरीद-ो फरोख्त न करे। (३) कोई शख्स इन लोगों से मेल जोल, सलाम- कलाम और

मुलाकात बात न करे। (8) कोई शख्स इन लोगों के पास खाने पीने का कोई सामान न जाने दे

। मनसूर बिन अकरमा ने इस मुआहदा को लिखा । और तमाम सरदाराने कुरैश ने इस पर दस्तखत करके इस दस्तावेज़ को कबा के अन्दर आवेजा (लटका) कर दिया। हज़रते अबू तालिब हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और दूसरे तमाम खानदान वालों को ले कर पहाड़ की उस घाटी में जिस का नाम “शिअबे अबी तालिब’ था पनाह गज़ी हुए। अबू लहब के सिवा खानदाने बनू हाशिम के काफिरों ने भी ख़ानदानी हमय्येत व पासदारी की बिना पर इस मामले में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का साथ दिया। और सब के सब पहाड़ के इस तंग व तारीक दर्रे में महसूर हो कर कैदियों की जिन्दगी बसर करने लगे। और ये तीन बरस का ज़माना इतना सख्त और कठिन गुजरा

कि बनू हाशिम दरख्तों के पत्ते, और सूखे चमड़े पका पका कर खाते थे। और उनके बच्चे भूक प्यास की शिद्दत से तड़प तड़पकर दिन रात रोया करते थे। संग दिल और जालिम काफिरों ने हर तरफ पहरा बिठा दिया था कि कहीं से भी घाटी के अन्दर दाना पानी न जाने पाए। (जरकानी अलल मवाहिब जि.१२७८)

मुसलसल तीन साल तक हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और ख़ानदाने बनू हाशिम उन होश रुबा मसाएब को झेलते रहे। यहाँ तक कि खुद कुरैश के कुछ रहम दिलों को बनू हाशिम की इन मुसीबतों पर रहम आ गया। और उन लोगों ने इस

जालिमाना मुआहदा को तोड़ने की तहरीक उठाई। चुनान्चे हश्शाम बिन अमर व आमिरी, जुहैर बिन उमय्या, मुतअम बिन अदी, अबुल बख्तरी, जम्आ बिनुल असवद वगैरा ये सब मिलकर एक साथ हरमे कञ्बा में गए। और जुहैर ने जो अब्दुल मुत्तलिब के नवासे थे। कुफ्फारे कुरैश को मुखातिब करके अपनी पुर जोश तकरीर में ये कहा कि ऐ लोगो! ये कहाँ का इन्साफ है? कि हम लोग तो आराम से जिन्दगी बसर कर रहे हैं। और ख़ानदाने बनू हाशिम के बच्चे भूक प्यास से बे कार हो कर बिलबिला रहे हैं। खुदा की कसम जब तक इस वहशियाना मुआहदा की दस्तावेज़ फाड़ कर पाँव से न रौंद दी जाएगी मैं हरगिज हरगिज चैन से नहीं बैठ सकता। ये तकरीर सुनकर अबू जहल ने तड़पकर कहा कि खबरदार! हरगिज़ हरगिज़ तुम इस मुआहदा को हाथ नहीं लगा सकते। ज़म्आ ने अबू जहल को ललकारा। और इस ज़ोर से डाँटा कि अबू जहल की बोलती बन्द हो गई। इसी तरह मुतअम बिन अदी और हश्शाम बिन अमर ने भी ख़म ठोंक कर अबू जहल को झिड़क दिया और अबुल बख्तरी ने तो साफ़ साफ़ कह दिया कि ऐ अबू जहल! इस ज़ालिमाना मुआहदे से न हम पहले राजी थे। और न अब हम इस के पाबन्द हैं!

इसी मजमअ में एक तरफं, हजरत अबू तालिब भी बैठे हुए थे। उन्होंने कहा कि ऐ लोगो! मेरे भतीजे मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) कहते हैं कि इस मुआहदे की दस्तावेज़ को कीड़ों ने खा डाला है। और सिर्फ जहाँ जहाँ खुदा का नाम लिखा हुआ है। इस को कीड़ों ने छोड़ दिया है। लिहाजा मेरी राय ये है कि तुम

लोग इस दस्तावेज़ को निकाल कर देखो। अगर वाकेई इस को कीड़ों ने खा लिया है। जब तो इस को चाक कर के फेंक दो। और अगर मेरे भतीजे का कहना गलत साबित हुआ तो मैं मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को तुम्हारे हवाले कर दूंगा। ये सुनकर मुतअम बिन अदी कअबे के अन्दर गया। और दस्तावेज़ को उतार

लाया। और सब लोगों ने उस को देखा तो वाकई ब-जुज़ अल्लाह तआला के नाम के पूरी दस्तावेज़ को कीड़ों ने खा लिया था। मुतअम बिन अदी ने सब के सामने उस दस्तावेज़ को फाड़ कर फेंक दिया। और फिर कुरैश के चन्द बहादुर बावुजूद ये कि ये सब के सब उस सवक्त कुफ्र की हालत में थे। हथियार ले कर घाटी में पहुंचे और खानदाने बनी हाशिम के एक एक आदमी को वहाँ से निकाल लाए और उन को उन के मकानों में आबाद कर दिया। ये वाकिआ १० नबवी का है। मन्सूर बिन इकरमा जिस ने इस दस्तावेज़ को लिखा था उस पर कहरे इलाही टूट पड़ा कि उस का हाथ शल होकर सूख गया। (मदारिजुन नुबूव्वा जि.२ स.४६ वगैरा)

गम का साल सन्न १० नबवी

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम “शिअबे अबी तालिब’ से निकल कर अपने घर तशरीफ़ लाए और चन्द ही रोज़ कुफ्फारे कुरैश के जुल्म व सितम से कुछ अमान मिली थी कि अबू तालिब बीमार हो गए। और घाटी से बाहर आने के आठ महीने बाद उन का इन्तिकाल हो गया। अबू तालिब की वफात हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिए एक बहुत ही जाँ गुदाज़ और रूह फरसा हादिसा था क्योंकि बचपन से जिस तरह प्यार व महब्बत के साथ अबू तालिब ने आप की परवरिश की थी और और ज़िन्दगी के हर मोड़ पर जिस जाँ निसारी के साथ आप की नुसरत व दस्तगीरी की। और आप के दुश्मनों के मुकाबिल सीना सिपर हो कर जिस तरह आलाम व मसाइब का मुकाबला किया। उस को भला हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम किस तरह भूल सकते थे?

हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा की वफात

अभी हज़रत अबू तालिब के इन्तिकाल का जख्म ताज़ा ही था कि हज़रत अबू तालिब की वफ़ात के तीन दिन या पाँच दिन के बाद हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाह तआला अन्हा भी दुनिया से रेहलत फरमा गईं। मक्का में हज़रत अबू तालिब के बाद सब से ज़्यादा जिस हस्ती ने रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नुसरत व हिमायत में अपना तन मन धन सब कुछ कुर्बान किया। वो हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा की जाते गिरामी थी। जिस वक्त दुनिया में कोई आप का मुख्लिस मुशीर व गमख्वार नहीं था। हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा ही थीं कि हर परेशानी के मौका पर पूरी जाँ निसारी के साथ आप की गमख्वारी और दिलदारी करती रहती थीं ।इस लिए हज़रत अबू तालिब और हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु । तआला अन्हा दोनों की वफ़ात से आप के मददगार और गमगुसार दोनों ही दुनिया से उठ गए जिस से आप के कल्बे नाजुक पर इतना अजीम सदमा गुज़रा कि आप ने इस साल का नाम आमुल हुज्न’ (गम का साल) रख दिया।

हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा ने रमजान १० नबवी में वफात पाई। ब-वक्ते वफात पैंसठ बरस की उम्र थी। मकामे हजून , (कब्रिस्तान जन्नते मुअल्ला) में मदफून हुईं। हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम खुद बनफ्से नफीस उनकी कब्र में उतरे। और अपने मुकद्दस हाथों से उन की लाशे मुबारक को जमीन के सिपुर्द किया। (जरकानी जि. १ स.२९६)

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