दवते इस्लाम के लिए तीन दौर

पहला दौर

तीन बरस तक हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इन्तिहाई पोशीदा तौर पर निहायत राजदारी के साथ तब्लीगे इस्लाम का फर्ज अदा फरमाते रहे। और इस दर्मियान में का सब से पहले हज़रते बीबी ख़दीजा रदियल्लाहु अन्हा फिर

हज़रते अली, हज़रते जैद बिन मन हारिसा रदियल्लाहु अन्हु ईमान लाए। फिर हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु की दवत व तब्लीग से हज़रते उसमान हज़रते जुबैर बिनुल अव्वाम हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ़ हज़रते सद बिन अबी वक्कास हज़रते तलहा बिन उबैदुल्लाह रदियल्लाहु अन्हुम भी जल्द ही दामने इस्लाम में आ गए। फिर चन्द दिनों के बाद हज़रते अबू उबैदा बिनुल जर्राह व हज़रते अबू सल्मा अब्दुल्लाह बिनुल असद व हज़रते अरकम बिन अरकम व हजरते उसमान बिन मज़ऊन और उनके दोनों भाई हजरते कदामा, और हज़रते अब्दुल्लाह रदियल्लाहु अन्हु भी इस्लाम में दाखिल हो गए। फिर कुछ मुद्दत के बाद हज़रते अबू ज़र गिफारी, व हज़रते सुहैब रूमी, व हजरते उबैदा बिनुल हारिस बिन अब्दुल मुत्तलिब, व सईद बिन जैद बिन अमर बिन नुफैल और उनकी बीवी फातिमा बिन्तुल ख़त्ताब हजरते उमर रदियल्लाहु अन्हु की बहन रदियल्लाहु अन्हु ने भी इस्लाम कबूल कर लिया। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की चची हज़रते उम्मुल फज़ल हजरते अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब की बीवी; और हज़रते असमा बिन्ते अबू बकर भी मुसलमान हो गईं। इन के अलावा दूसरे बहुत से मर्दो और

औरतों ने भी इस्लाम लाने का शरफ़ हासिल कर लिया।

(जुरकानी अलल मवाहिब जि.१ स.२४६) वाजेह रहे कि सब से पहले इस्लाम लाने वाले जो “साबिकीने अव्वलीन’ के लकब से सरफ़राज़ हैं। उन खुश नसीबों की फेहरिस्त पर नजर डालने से पता चलता है कि सब से पहले दामने इस्लाम में अआने वाले वही लोग हैं जो फ़ितरतन नेक तब और पहले ही से दीने हक की तलाश में सरगरदाँ थे और कुफ्फारे मक्का की शिर्क व बुत परस्ती और मुशरिकाना रुसूम जाहिलीय्यत से

मुतनफ्फ़र व बेज़ार थे। चुनान्चे नबीए बरहक के दामन में दीने हक की तजल्ली देखते ही ये नेक बख्त लोग परवानों की तरह शमले नुबूव्वत पर निसार होने लगे और मुशर्रफ़ ब-इस्लाम हो गए।

दूसरा दौर

तीन बरस की इस खुफ़िया दअवते इस्लाम में मुसलमानों की एक जमाअत तय्यार हो गई। इस के बाद अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर सूरए “शुअरा’ की आयत नाज़िल फरमाई। और खुदावंद तआला का हुक्म हुआ कि ऐ महबूब! आप अपने करीबी खानदान वालों को खुदा से डाराईए तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक दिन कोहे सफा की चोटी पर चढ़कर ” “या मअशरा कुरैश’ कहकर कबीलए कुरैश को पुकारा। जब सब कुरैश जमअ हो गए। तो आप ने फरमाया कि ऐ मेरी कौम! अगर मैं तुम लोगों से ये कह दूँ कि इस पहाड़ के पीछे एक लश्कर छुपा हुआ है। जो तुम पर हमला करने वाला है। तो क्या तुम लोग मेरी बात का यकीन कर लोगे? तो सब ने एक ज़बान हो कर कहा, हाँ हाँ हम यकीनन आप की बात का यकीन कर लेंगे। क्योंकि हम ने आप को हमेशा सच्चा और अमीन

पाया है। आप ने फरमाया कि अच्छा तो फिर मैं ये कहता हूँ कि तुम लोगों को अज़ाबे इलाही से डरा रहा हूँ। और अगर तुम लोग ईमान न लाओगे। तो तुम पर अज़ाबे इलाही उतर पड़ेगा। ये सुनकर तमाम कुरैश जिन में आप का चचा अबू लहब भी था सख़्त नाराज़ हो कर सब के सब चले गए। और हुजूर की शान में औल फौल बकने लगे। (बुख़ारी जि.२ स.७०२ व आम्मा तफ्सीर)

तीसरा दौर

अब वो वक्त आ गया कि एअलाने नुव्वत के चौथे साल सूरए हजर की आयत Hab “फस-दअ बिमा तु-मरु’ नाज़िल हो गई। और हज़रते हक जल्ल शा-नहू ने ये हुक्म फ़रमाया कि ऐ महबूब! आप को जो हुक्म दिया गया उस को अलल एलान बयान फ़रमाइए चुनान्चे इस के बाद एअलानिया तौर पर दीने इस्लाम की तब्लीग फ़रमाने लगे। और शिर्क व बुत परस्ती की खुल्लम खुल्ला बुराई बयान फ़रमाने लगे। और तमाम कुरैश, बल्कि तमाम अहले मक्का बल्कि पूरा अरब आप की मुखालफत पर कमर बस्ता हो गया। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और मुसलमानों को ईज़ा रिसानियों का एक तूलानी सिलसिला शुरू हो गया।

रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर जुल्म व सितम

पर जुल्म व सितम कुफ्फारे मक्का ख़ानदाने बनू हाशिम के इन्तिकाम और लड़ाई भड़क उठने के खौफ से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को कत्ल तो नहीं कर सकते थे। लेकिन तरह तरह की तकलीफों और ईजा रसानियों से आप पर जुल्म-7 सितम का पहाड़ तोड़ने लगे। चुनान्चे सब से पहले तो हुजूर सल्लल्लाहु

तआला अलैहि वसल्लम को काहिन, साहिर, शाइर, मजनून होने का चर्चा हर कूचा व बाजार में जोरदार प्रोपागन्डा करने लगे। आप के पीछे शरीर लड़कों का गौल लगा दिया। जो रास्तों में आप पर फ़बतियाँ कसते, गालियाँ देते और ये दीवाना है ये दीवाना है का शोर मचा मचाकर आप के ऊपर पत्थर फेंकते। कभी कुफ्फारे मक्का आप के रास्तों में काँटे बिछाते कभी आप के जिस्म मुबारक पर नजासत डाल देते। कभी आप को धक्का देते। कभी आप की मुकद्दस और नाजुक गर्दन में चादर का फंदा डाल कर गला घोटने की कोशिश करते ।

रिवायत है कि एक मर्तबा आप हरमे कबा में नमाज़ पढ़ रहे थे कि एक दम संगदिल काफ़िर उक्बा बिन अबी मुहंत ने आप के गले में चादर का फंदा डाल कर इस ज़ोर से खींचा कि आप का दम घुटने लगा। चुनान्चे ये मंज़र देखकर हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु बे करार हो कर दौड़ पड़े। और उक्या बिन मुहंत को धक्का दे कर दफ़ों किया। और ये कहा कि क्या तुम लोग ऐसे आदमी को कत्ल करते हो जो ये कहता है कि मेरा रब अल्लाह है” इस धक्कम धक्का में हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु ने कुफ्फारे मक्का को भी मारा और कुफ्फार की मार भी खाई। (जुरकानी जिं.१ स. २५२ व बुख़ारी जि.१ स. ५४४)

कुफ्फार आप के मुअजिज़ात और रूहानी तासीरात व तसर्रुफात को देखकर आप को सब से बड़ा जादूगर कहते। जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कुरआन शरीफ की तिलावत फरमाते तो ये कुफ्फार कुरआन और कुरआन को लाने वाले (जिबरईल) और कुरआन को नाज़िल फरमाने वाले (अल्लाह तआला) को और आप को गालियाँ देते। और गली कूचों में पहरा बिठा देते कि कुरआन की आवाज़ किसी के कान में न पड़ने पाए। और तालियाँ पीट पीट कर और सीटियाँ बजा बजाकर इस कदर शोर व गुल मचाते कि कुरआन की आवाज़ किसी को सुनाई नहीं.

देती थी। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब कहीं किसी आम मजमअ में, या कुफ्फार के मेलों में कुरआन पढ़कर सुनाते, या दवते ईमान का वज़ फरमाते तो आप का चचा अबू लहब आप के पीछे चिल्ला चिल्लाकर कहता जाता था कि ऐ लोगो! ये मेरा भतीजा झूटा है। ये दीवाना हो गया है। तुम

लोग इस की कोई बात न सुनो! (मआजल्लाह)

एक मर्तबा हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम “जुल मजाज़* के बाजार में दअवते इस्लाम का वअज फरमाने के लिए तशरीफ ले गए और लोगों को कलिमए हक की दअवत दी। तो अबू जहल आप पर धूल उड़ाता जाता था और कहता था कि ऐ लोगो! इस के फरेब में मत आना । ये चाहता है कि तुम लोग लात व उज्ज़ा की इबादत छोड़ दो। (मसनद इमाम अहमद जि.४ वगैरा)

इसी तरह एक मरतबा जब कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हरमे कबा में नमाज़ पढ़ रहे थे जैन नमाज़ की हालत में अबू जहल ने कहा, कि कोई है? जो आले फुलाँ कि ज़िबड़ किए हुए ऊँट की ओझड़ी ला कर सज्दे की हालत में उन के कन्धों पर रख दे। ये सुन कर उक्बा बिन अबी मुझैत काफ़िर उठा। और उस ओझड़ी को ला कर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दोशे मुबारक पर रख दिया। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सज्दा में थे। देर तक ओझड़ी कन्धे और गर्दन पर पड़ी रही। और कुफ्फार ठठ्ठा मार मार कर हंसते रहे और मारे हंसी के एक दूसरे पर गिर गिर पड़ते रहे। आख़िर बीबी फातिमा रदियल्लाहु अन्हा जो उन दिनों अभी कमसिन लड़की थीं। आईं और उन काफिरों को बुरा भला कहते हुए उस ओझड़ी को दोशे मुबारक से हटा दिया। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के कल्ब मुबारक पर कुफ्फारे कुरैश की इस शरारत से इन्तिहाई सदमा गुजरा। और नमाज़ से फारिग हो कर तीन मर्तबा माँगी कि.

बि-कुरैशिन” यानी ऐ अल्लाह! तू कुरैश को अपनी गिरफ्त में पकड़ ले फिर अबू जहल, उतबा बिन रबीआ, शैबा बिन रबीआ. वलीद बिन उत्बा, उमय्या बिन ख़लफ, उमारा बिन वलीद का नाम ले कर दुआ माँगी कि इलाही! तू इन लोगों को अपनी गिरफ्त में।

के ले ले। हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद रदियल्लाहु अन्हु फरमाते दिन देखा। कि इन की लाशें ज़मीन पर पड़ी हैं फिर इन सब कुफ्फार की लाशों को निहायत जिल्लत के साथ घसीट कर बदर के एक गढ़े में डाल दिया गया। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि इन गढ़े वालों पर खुदा की लअनत है। (बुख़ारी जि.१ सफा ७४ बाबुल मरातुत्तरह)

चन्द शरीर कुफ्फार जो

कुफ्फार हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की दुश्मनी और ईज़ा रिसानी में बहुत ज़्यादा सर गर्म थे। उन में से चन्द शरीरों के नाम ये हैं :

अबू लहब’, बभू जहल’, असवद बिन अब्दे यगूस, हारिस बिन कैस बिन अदी’, वलीद बिन मुगैरा, उमय्या बिन खलफ, उबई बिन ख़लफ’, अबू कैस बिन फाकहा, आस बिन वाएल. नज़र बिन हारिस19. मुनब्बा बिनुल हज्जाज”. जुहैर बिन अबी उमय्या12, साएब बिन सैफ़ी13, अदी बिन हमरा14, असवद बिन अबदुल असदा, आस बिन सईदं बिनुल आस16, आस बिन हाशिम”, उक्बा बिन अबी मुब18. हकम बिन अबिल आस. ये सब के सब हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पड़ौसी थे। और इन में से अकसर बहुत ही.मालदार और साहिबे इक्तिदार थे। और दिन रात सरवरे काएनात सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम की ईज़ा रसानी में मसरूफ़ रहते थे। (नऊजु बिल्लाह मिन ज़ालिक)

मुसलमानों पर मज़ालिम

हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ साथ गरीब मुसलमानों पर भी कुफ्फारे मक्का ने ऐसे ऐसे जुल्म-7 सितम के पहाड़ तोड़े कि मक्का की जमीन बिलबिला उठी। ये आसान था कि कुफ्फारे मक्का इन मुसलमानों को दम ज़दन में कत्ल कर डालते। मगर इस से इन काफिरों के जोशे इनितकाम का नशा नहीं उतर सकता था। क्योंकि कुफ्फारे मक्का इस बात में अपनी शान समझते थे कि इन मुसलमानों को इतना सताओ कि वो इस्लाम को छोड़कर फिर शिर्क व बुत परसती करने लगे। इस लिए कत्ल कर देने के बजाए कुफ्फ़ारे मक्का मुसलमानों को तरह तरह की सज़ाओं और ईज़ा रसानियों के साथ सताते थे। मगर खुदा की कसम शराबे तौहीद के इन मस्तों ने अपने इस्तिकलाल व इस्तिकामत का वो मंजर पेश कर दिया कि पहाड़ों की चोटियाँ सर उठाकर हैरत के साथ इन बला कुशाने इस्लाम के जज्बए इस्तिकामत का नज्जारा करती रहीं। संगदिल, बेरहम और दरिन्दा सिफत काफिरों ने इन गरीब व बे-कस मुसलमानों पर जबर- इकराह, और जुल्म-7 सितम का कोई दकीका बाकी नहीं छोड़ा। मगर एक मुसलमान का बच्चा भी इस्लाम से मुँह फेर कर काफ़िर व मुरतद नहीं हुआ।

कुफ्फारे मक्का ने इन गुरबा मुस्लिमीन पर जोर- जफा कारी के बे पनाह अन्दोह नाक मज़ालिम ढाए। और ऐसे ऐसे रूह फरसा और जाँ सोज़ अज़ाबों में मुब्तला किया कि अगर इन मुसलमानों की जगह पहाड़ भी होता तो शायद डगमगाने लगता। सहराए अरब की तेज़ धूप में जबकि वहाँ की रेत के ज़र्रात तनूर की तरह गरम हो जाते। इन मुसलमानों की पुश्त को कोड़ों की मार से जख्मी करके उस जलती हुई रेत पर पीठ के बल लिटाते। और सीनों पर इतना भारी पत्थर रख देते कि वो करवट न बदलने पाएँ लोहे को आग में गरम करके इस से इन मुसलमानों को

दागते। पानी में इस कदर डुबकियाँ देते कि उन का दम घुटने लगता। चटाईयों में इन मुसलमानों को लपेट कर उन की नाकों में धुवाँ देते जिस से सांस लेना मुश्किल हो जाता और वो कर्ब व बे चैनी से बद हवास हो जाते। हजरते खब्बाब रदियल्लाहु अन्हु ये उस ज़माने में इस्लाम लाए जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हज़रते अरकम बिन अरकम रदियल्लाहु अन्हु के घर में मुकीम थे और सिर्फ चन्द ही आदमी मुसलमान हुए थे कुरैश ने उन को बे हद सताया। यहाँ तक कि कोएले के अंगारों पर उन को चित लिटाया। और एक शख्स उन के सीने पर पाँव रखकर खड़ा रहा। यहाँ तक कि उन की पीठ की चर्बी और रतूबत से कोएले बुझ गए। बरसों के बाद जब हज़रते ख़ब्बाब रदियल्लाहु अन्हु ने हज़रते अमीरुल मुमिनीन उमर रदियल्लाहु अन्हु के सामने बयान किया। तो अपनी पीठ खोल कर दिखाई। पूरी पीठ पर सफेद दाग धब्बे पड़े हुए थे। इस इबरतनाक मंज़र को देखकर हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु का दिल भर आया और वो रो पड़े।

(तबकात इब्ने सअद जि.३ तकिरा खब्बाब) हज़रते बिलाल रदियल्लाहु अन्हु को जो उमय्या बिन ख़लफ़ काफ़िर के गुलाम थे। उन की गर्दन में रस्सी बाँधकर कूचे व बाजार में उन को घसीटा जाता था। उन की पीठ पर लिाठियाँ बरसाई जाती थीं। और ठीक दोपहर के वक़्त तेज़ धूप में गरम गरम रेत पर उनको लिटाकर इतना भारी पत्थर उन की छाती पर रख देया जाता है, उन की ज़बान बाहर निकल आती थी। उमय्या काफिर कहता था कि इस्लाम से बाज़ आ जाओ। वरना इसी तरह घुट घुट कर मर जाओगे मगर इस हाल में भी हज़रते बिलाल रदियल्लाहु अन्हु की पेशानीपर बल नहीं आता था। बल्कि जोर जोर से Kisan “अहद अहृद” का ना लगाते थे। और बुलन्द आवाज से कहते थे कि खुदा एक है। खुदा एक है।

(सीरते इब्ने हश्शाम जि.१ स.३१७ ता ३१८)

हज़रते अम्मार बिन यासिर रदियल्लाहु अन्हु को गरम गरम बालू पर चित लिटाकर कुफ्फारे कुरैश इस कदर मारते.थे कि ये बे होश होजाते थे। उन की वालिदा हज़रते बीबी सुमय्या रदियल्लहु अन्हा को इस्लाम लाने की बिना पर अबू जहल ने उन की नाफ ने नीचे ऐसा नेजा मारा कि ये शहीद हो गईं। हजरते अम्मार रदियल्लाहु अन्हु के वालिद हज़रते यासर रदियल्लाहु अन्हु भी कुफ्फार की मार खाते खाते शहीद हो गए। हज़रते सुहैब रूमी रदियल्लाहु अन्हु को कुफ्फारे मक्काइस कदर तरह तरह की अज़ीय्यत देते और ऐसी ऐसी मार धाड़ करते कि ये घन्टों बे होश रहते। जब ये हिजरत करने लगे तो कुफ्फारे मक्का ने कहा कि तुम अपना सारा माल व सामान यहाँ छोड़ कर मदीना जा सकते हो। आप खुशी खुशी दुनिया की दौलत पर लात मार कर अपनी मताओ ईमान को साथ ले कर मदीना चले गए।

हज़रते अबू फकीहा रदियल्लाहु अन्हु सफ़वान बिन उमय्या काफ़िर के गुलाम थे और हज़रते बिलाल रदियल्लाहु अन्हु ही मुसलमान हुए थे। जब सफ़वान को उन के इस्लाम का पता चला तो उसने उनके गले में रस्सी का फंदा डालकर उनको घसीटा। और गरम जलती हुई ज़मीन पर उन को चित लिटाकर सीने पर वज़नी पत्थर रख दिया। जब उनको कुफ्फार घसीट कर ले जा रहे थे। रास्ते में इत्तिफाक से एक गुबरीला नज़र पड़ा। उमय्या काफिर ने तअना मारते हुए कहा कि “देख तेरा खुदा यही तो नहीं है” अबू फकीहा ने फरमाया कि ऐ काफ़िर के बच्चे! खामोश । “मेरा और तेरा खुदा अल्लाह है। ये सुन कर उमय्या काफिर गज़बनाक हो गया। और इस जोर से इनका गला घोंटा कि वो बे होश हो गए। और लोगों ने समझा कि उन का दम निकल गया।

इसी तरह हजरते आमिर बिन फुहैरा रदियल्लाहु अन्हु को भी इस कदर मारा जाता था कि उन के जिस्म की बोटी बोटी दर्दमंद

हो जाती थी।

हज़रते बीबी लुबीना रदियल्लाहु अन्हा जो लौंडी थीं। हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु जब कुफ्र की हालत में थे उस गरीब लौंडी को इस कदर मारते थे कि मारते मारते थक जाते थे। मगर हज़रते लुबीना रदियल्लाहु अन्हा उफ नहीं करती थीं। बल्कि निहायत जुर्रत व इस्तिकलाल के साथ कहती थीं कि ऐ उमर! अगर तुम खुदा के सच्चे रसूल पर ईमान नहीं लाओगे तो खुदा तुम से जरूर इन्तिकाम लेगा।

हज़रते जिन्नीरा रदियल्लाहु अन्हा हज़रते उमर रदियल्लाहु अन्हु के घराने में बाँदी थीं। ये मुसलमान हो गईं। तो उनको इस कदर काफिरों ने मारा कि उन की आँखें जाती रहीं। मगर खुदा वंद तआला ने हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की दुआ से फिर उन की आँखों में रौशनी अता फरमा दी। तो मुशरिकीन कहने लगे कि ये मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) के जादू का असर है। (जुरकानी अलल मवाहिब जि.१ स.२७०)

इसी तरह हज़रते बीबी “नहदिया और हज़रते बीबी उम्मे उबीस रदियल्लाहु तआला अन्हुमा भी बाँदियाँ थीं। इस्लाम लाने के बाद कुफ्फारे मक्का ने उन दोनों को तरह तरह की तकलीफें दे कर बे-पनाह अजीय्यतें दीं। मगर ये अल्लाह वालियाँ सब्र व शुक्र

के साथ उन बड़ी बड़ी मुसीबतों को झेलती रहीं। मगर इस्लाम से उन के कदम नहीं डगमगाए।

हज़रते यारे गारे मुस्तफा अबू बकर बा सफा रदियल्लाहु तआला अन्हु ने किस किस तरह इस्लाम पर अपनी दौलत निसार की? इस की एक झलक ये है कि आप ने उन गरीब व बेकस मुसलमानों में से अकसर की जान बचाई। आप ने हज़रते बिलाल व आमिर बिन फुहैरा व अबू फकीहा व लुबीना व जिन्नीरा व नहदिया व उम्मे उबैस रदियल्लाहु अन्हुम उन तमाम गुलामों को बड़ी बड़ी रकमें दे कर खरीदा। और सब को आजाद कर दिया

और उन मजलूमों को काफिरों की ईजाओं से बचा लिया।

(जुरकानी अलल मवाहिब व सीरते इने हश्शाम जि.१ स. ३१९) हज़रते अबू जर गिफारी रदियल्लाहु तआला अन्हु जब दामने इस्लाम में आए तो मक्का में मुसाफिर की हैसियत से कई दिन तक हरमे कबा में रहे। ये रोजाना जोर जोर से चिल्लाकर अपने इस्लाम का एअलान करते थे। और रोजाना कुफ्फारे कुरैश उनको इस कदर मारते थे कि ये लहू लुहान हो जाते थे। और उन दिनों में आबे ज़मज़म के सिवा उनको कुछ भी खाने पीने को नहीं मिला। (बुखारी जि.१ स. ५४४ बाबे इस्लाम अबी जर)

वाजेह रहे कि कुफ्फारे मक्का का ये सुलूक सिर्फ गरीबों और गुलामों ही तक महदूद नहीं था बल्कि इस्लाम लाने के जुर्म में बड़े बड़े मालदारों और रईसों को भी उन जालिमों ने नहीं बख्शा। हज़रते अबू बकर सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु जो शहरे मक्का के एक मतमव्वल और मुमताज मुअज्जिजीन में से थे। मगर उनको भी हरमे कबा में कुफ्फारे कुरैश ने इस कदर मारा कि उन का सर खून से लत पत हो गया। इसी तरह हज़रते उस्माने गनी रदियल्लाहु तआला अन्हु जो निहायत मालदार और साहिबे इक्तिदार थे। जब ये मुलमान हुए तो गैरों ने नहीं बल्कि खुद उनके चचा ने उनको रस्सियों में जकड़कर खूब खूब मारा। हज़रते जुबैर बिनुत अब्बाम रदियल्लाहु तआला अन्हु बड़े रोअब और दबदबा के आदमी थे मगर उन्होंने जब इस्लाम कबूल किया तो उनके चचा उनको चटाई में लपेटकर उन की नाक में धुवाँ देते थे। जिस से उनका दम घुटने लगता था। हजरते उमर रदियल्लाहु तआला अन्ह

के चचा जाद भाई और बहनोई हज़रते सईद बिन जैद रदियल्लाहु अन्हु कितने जाह- एअजाज वाले रईस थे मगर जब उनके इस्लाम का हजरते उमर रदियल्लाहु अन्हु को पता चला तो उनको रस्सी में बाँधकर मारा। और साथ ही हजरते उमर रदियल्लाहु तआला अन्हु ने अपनी बहन हज़रते बीबी फातिमा.

बिन्तुल ख़त्ताब को भी इस ज़ोर से थप्पड़ मारा कि उनके कार के आवेजे गिर पड़े। और चेहरे पर खून बह निकला।

कुफ्फार का वफ्द बारगाहे रिसालत में

एक मर्तबा सरदाराने कुरैश हरमे कबा में बैठे हुए ये सोचा लगे कि आखिर इतनी तकालीफ़ और सख्तियाँ बर्दाश्त करने के बा वुजूद मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) अपने तब्लीग क्यों बन्द नहीं करते? आख़िर उनका मकसद क्या है मुमकिन है ये इज़्ज़त व जाह, या सरदारी व दौलत के ख्वाहाँ हाँ चुनान्चे सभों ने उतबा बिन रबीआ को हुजूर सल्लल्लाहु तआल अलैहि वसल्लम के पास भेजा कि तुम किसी तरह उनका दिली मकसद मालूम करो। चुनान्चे उतबा तन्हाई में आप से मिला। और कहने लगा कि ऐ मुहम्मद! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आख़िर इस दअवते इस्लाम से आप का मकसद क्या है? क्या आप मक्का की सरदारी चाहते हैं? या इज़्ज़त व दौलत के ख्वाह हैं? या किसी बड़े घराने में शादी के ख्वाहिशमंद हैं? आप के दिल में जो तमन्ना हो खुले दिल के साथ कह दीजिए। मैं इसकी ज़मानत लेता हूँ कि अगर आप दअवते इस्लाम से बाज आ जाएँ। तो पूरा मक्का आप के ज़ेरे फ़रमान हो जाएगा। और आप की हर ख्वाहिश और तमन्ना पूरी कर दी जाएगी। उतबा की साहिराना तकरीर सुन कर हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जवाब में कुरआन मजीद की चन्द आयतें तिलावत फरमाईं। जिन को सुनकर उतबा इस कदर मुतास्सिर हुआ कि उसके जिस्म का रौंगटा रौंगटा, और बदन का बाल बाल खौफे जुल जलाल से लरज़ने और काँपने लगा। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मुँह पर हाथ रखकर कहा कि मैं आप को रिश्तेदारी का वास्ता देकर दरख्वास्त करता हूँ कि बस कीजिए। मेरा दिल इस कलाम की अज़मत से फटा जा रहा है।

उतबा बारगाहे रिसालत से वापस हुआ। मगर उसके दिल की दुनिसा में एक नया इन्किलाब रूनुमा हो चुका था। उतबा एक बड़ा ही साहिरुल बयान खतीब और इन्तिहाई फसीह व बलीग आदमी था। उसने वापस लौटकर सरदाराने कुरैश से कह दिया कि

मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) जो कलाम पेश करते हैं वो न जादू है, न कहानत, न शाओरी बल्कि वो कोई और ही चीज़ है। लिहाज़ा मेरी राय है कि तुम लोग उनको उनके हाल पर छोड़ दो। अगर वो कामयाब हो कर सारे अरब पर गालिब हो गए तो इस में हम कुरैशियों ही की इज्जत बढ़ेगी वरना सारा अरब उनको

खुद ही फना कर देगा। मगर कुरैश के सरकश काफिरों ने उतबा का ये मुख्लिसाना और मुदबिराना मशवरा नहीं माना। बल्कि अपनी मुखालफत और ईजा रसानियों में और ज्यादा अजाफा कर दिया। (जुरकानी अलल मवाहिब जि, १ स.२५८ व सीरते इने हश्शाम जि. १ स.२९४)

कुरैश का वफद हजरत अबू तालिब के पास

कुफ्फारे कुरैश में कुछ लोग सुलह पसन्द भी थे वो चाहते थे कि बात चीत के जरीओ सुलह व सफाई के साथ मामला तय हो जाए। चुनान्चे कुरैश के चन्द मुअज्जल रुउसा हजरत अबू तालिब के पास आए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की दअवते इस्लाम और बुत परस्ती के खिलाफ तकरीरों की शिकायत की। हजरत अबू तालिब ने निहायत नर्मी के साथ उन लोगों को समझा बुझाकर रुख्सत कर दिया। लेकिन हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम खुदा के फरमान “

की तअमील करते हुए अलल एलान शिर्क व बुत परस्ती की मज़म्मत और दवते तौहीद का वअज फ़रमाते ही रहे। इस लिए कुरैश का गुस्सा फिर भड़क उठा। चुनान्चे तमाम सरदाराने कुरैश यानी उतबा, व शैबा व अबू सुफयान, व आस बिन

हश्शाम, व अबू जहल, व वलीद बिन मुगैरा” व आस बिन वाएल वगैरा वगैरा सब एक साथ मिलकर अबू तालिब के पास आए और ये

कहा कि आप का भतीजा हमारे मअबूदों की तौहीन करता है इस लिए या तो आप दर्मियान में से हट जाएँ। और अपने भतीजे को हमरे सिपुर्द कर दें।

उन की हाशिमी रगों के खून का कतरा कतरा भतीजे की महब्बत में गरम हो कर खौलने लगा। और इन्तिहाई जोश में आ कर कह दिया कि जाने अम! जाओ। मैं तुम्हारे साथ हूँ। जब तक मैं ज़िन्दा हूँ कोई तुम्हारा बाल बीका नहीं कर सकता। (सीरते इबने हश्शाम जि.१ स.२६६ वगैरा)

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