विलादते बा-सआदत हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम

बचपन

विलादते बा-सआदत हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की तारीखे पैदाइश में इख्तिलाफ है। मगर कौले मशहूर यही है कि वाकिअए “अस्हाबे फील’ से पचपन दिन के बाद १२ रबीउल अव्वल मुताबिक २० अप्रेल ५७१ ई. विलादते बा-सआदत की तारीख है। अहले मक्का का भी इसी पर अमलदर आमद है कि वो लोग बारहवीं रबीउल अव्वल ही को काशानए नुबूव्वत की ज़ियारत के लिए जाते हैं। और वहाँ मीलाद शरीफ़ की महफ़िलें मुन्अकिद करते हैं।

(मदारिजुन नुबूवा जि.२ सफा १४)

तारीखे आलम में ये वो निराला और अज्मत वाला दिन है कि इसी रोज़ आलमे हस्ती के ईजाद का बाइस, गर्दिशे लैल- नहार का मतलूब, ख़लके आदम का रम्ज़, कश्तिए नूह की हिफाजत का राज़, बानिए कबा की दुआ. इब्ने मरयम की बिशारत का ज़हूर हुआ। काएनाते वुजूद के उलझे हुए गेसूओं को संवारने वाला. तमाम जहान के बिगड़े निज़ामों को सुधारने वाला यानी वो नबीयों में रहमत लकब पाने वाला

मुरादें गरीबों की बर लाने वाला मुसीबत में गैरों के काम आने वाला

वो अपने, पराए, का ग़म खाने वाला फकीरों का मावा, ज़ईफों का मलजा

यतीमों का वाली, गुलामों का मौला

सनदुल अस्फिया, अशरफुल अंबिया, अहमदे मुज्तबा मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आलमे वजूद में रौनक अफरोज़ हुए और पाकीजा बदन, नाफ़ बरीदा, खतना किए हुए खुश्बू में बसे हुए ब-हालते सज्दा, मक्का मुकर्रमा की मुकद्दस सर ज़मीन में अपने वालिदे माजिद के मकान के अन्दर पैदा हुए। बाप कहाँ थे जो बुलाए जाते और अपने नव निहाल को देख कर निहाल होते। वो तो पहले ही वफात पा चुके थे। दादा बुलाए गए जो उस वक्त तवाफे कबा में मशगूल थे। ये खुशखबरी सुनकर दादा “अब्दुल मुत्तलिब” खुश खुश हरमे कबा से अपने घर आए और वालिहाना जोशे महब्बत में अपने पोते को कलेजे से लगा लिया। फिर कबा में ले जाकर खैरो बरकत की दुआ मांगी। और “मुहम्मद’ नाम रखा। आप के चचा अबुलहब की लौंडी “सुवैबा” खुशी में दौड़ती हुई गई। और अबुलहब” को भतीजा पैदा होने की खुशखबरी दी तो उस ने इस खुशी में “शहादत की उंगली के इशारा से सुवैबा को आज़ाद कर दिया। जिस का समरा अबुलहब को ये मिला। कि उसकी मौत के बाद उस के घर वालों ने उसको ख्वाब में देखा। और हाल पूछा। तो उस ने अपनी उंगली उठाकर ये कहा

‘तुम लोगों से जुदा होने के बाद मुझे कुछ (खाने पीने) को नहीं मिला। ब-जुज़ इस के कि “सुवैबा” को आज़ाद करने के सबब से इस उंगली के ज़रीआ कुछ पानी पिला दिया जाता हूँ।

(बुखारी जि.२ व उम्महतुकुमुल्लती अर्द-नकुम) इस मौकअ पर हज़रत शैख़ अब्दुल हक मुहदिस देहलवी अलैहिर्रहमा ने एक बहुत ही फिक्र अंगेज़ और बसीरत अफ्रोज़ बात तेहरीर फरमाई है जो अहले महब्बत के लिए निहायत ही लज्जत बख है वो लिखते हैं कि :

इस जगह मीलाद करने वालों के लिए एक सनद है कि ये आँहजरत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शबे विलादत में

खुशी मनाते हैं और अपना माल खर्च करते हैं। मतलब ये है कि जब अबुलहब को जो काफिर था। और उस की मजम्मत में कुरआन नाजिल हुआ। आँहजरत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खुशी मनाने और बांदी का दूध खर्च करने पर जजा दी गई। तो उस मुसलमान का क्या हाल होगा जो आँहजरत सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की महब्बत में सरशार होकर खुशी मनाता है। और अपना माल खर्च करता है।

(मदारिजुन नुबूवा जि.२ सफा १९)

मौलिदुन्नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम

जिस मुकद्दस मकान में हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की विलादत हुई। तारीखे इस्लाम में उस मकाम का नाम “मौलिदुन्नबी” (नबी की पैदाइश की जगह) है। ये बहुत ही मुतबर्रक मकाम है। सलातीने इस्लाम ने इस मुबारक यादगार पर बहुत ही शानदार इमारत बना दी थी। जहाँ अहले हरमैन शरीफैन, और तमाम दुनिया से आने वाले मुसलमान दिन रात महफिले मीलाद शरीफ मुन्अकिद करते और सलात- सलाम पढ़ते रहते थे। चुनान्चे हजरत शाह वलीयुल्लाह साहिब मुहद्दिस देहलवी अलैहिर्रहमा ने अपनी किताब “फुयूजुल हरमैन में तहरीर फरमाया है कि मैं एक मर्तबा उस महफिले मीलाद में हाज़िर हुआ। जो मक्का मुकर्रमा में बारहवीं रबीउल अव्वल को “मौलिदुन्नबी में मुन्अकिद हुई थी। जिस वक्त विलादत का ज़िक्र पढ़ा जा रहा था तो मैने देखा कि एकबारगी उस मजलिस से कुछ अनवार बुलन्द हुए। मैने उन अनवार पर गौर किया मालूम हुआ कि वो रहमते इलाही, और उन फिरिश्तों के अनवार थे जो ऐसी महफिलों में हाज़िर हुआ करते थे

(फुयूजूल हरमैन) जब हिजाज़ पर नज्दी हुकूत का तसल्लुत हुआ तो मकाबिरे जन्नतुल मुअल्ला व जन्नतुल बकीअ के गुंबदों के साथ साथ नज्दी

हुकूमत ने इस मुकद्दस यादगार को भी तोड़ फोड़ कर मिस्मार कर दिया और बरसों ये मुबारक मकाम वीरान पड़ा रहा। मगर मैं जब जून १९५९ ईसवी में इस मरकज़े खैर- बरकत की ज़ियारत के लिए हाजिर हुआ। तो मैं ने इस जगह छोटी सी बिल्डिंग देखी जो मुकपफल थी। बअज अरबों ने बताया कि इस बिल्डिंग में मुख़्तसर लायबेरी, और एक छोटा सा मकतब है। अब इस जगह न मीलाद शरीफ हो सकता है न सलातो सलाम पढ़ने की इजाजत है मैं ने अपने साथियों के साथ बिल्डिंग से कुछ दूर खड़े हो कर चुपके चुपके सलातो सलाम पढ़ा और मुझ पर ऐसी रिक्कत तारी हुई कि मैं कुछ देर तक रोता रहा।

दूध पीने का ज़माना सब से पहले हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अबू लहब की लौंडी “हज़रते सुवैबा” का दूध नोश फ़रमाया। फिर अपनी वालिदा माजिदा हज़रते आमिना के दूध से सैराब होते रहे। फिर हज़रते हलीमा सअदिया आप को अपने साथ ले गईं। और अपने कबीले में रखकर आप को दूध पिलाती रहीं। और उन्हीं के पास आप के दूध पीने का ज़माना गुजरा (मदारिजुन नुबूब्वा जि.२ स.१८)

शुरफ़ाए अरब की आदत थी कि वो अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए गिर्द- नवाह के देहातों में भेज देते थे देहात की साफ सुथरी आबो हवा में बच्चों की तन्दुरुस्ती और जिस्मानी सेहत भी अच्छी हो जाती थी। और वो ख़ालिस और फसीह अरबी ज़बान सीख जाते थे। क्योंकि शहर की ज़बान बाहर के आदमियों के मेल जोल से खालिस और फसीह व बलीग़ ज़बान नहीं रहा करती थी।

हज़रते हलीमा रदियल्लाहु अन्हा का बयान है कि मैं “बनी सअद” की औरतों के हमराह दूध पीने वाले बच्चों की तलाश में मक्का को चली। उस साल अरब में बहुत सख्त काल पड़ा हुआ

था। मेरी गोद में एक बच्चा था मगर फक्र व फाका की वजह से मेरी छातियों में इतना दूध नहीं था जो इसको काफी हो सके। रात भर वो बच्चा भूक से तड़पता, और रोता बिलबिलाता रहता था। और हम उस की दिलजुई और दिलदारी के लिए तमाम रात बैठकर गुजारते थे। एक ऊँटनी भी हमारे पास थी। मगर उस के भी दूध न था। मक्का मुकर्रमा के सफर में जिस खच्चर पर मैं सवार थी वो कदरे लागर था कि काफिला वालों के साथ न चल सकता था। मेरे हमराही भी इससे तंग आ चुके थे। बड़ी बड़ी मुश्किलों से ये सफ़र तय हुआ। जब ये काफिला मक्का मुकर्रमा पहुँचा तो, जो औरत रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को देखती। और ये सुनती कि ये यतीम हैं तो कोई औरत आप. को लिने के लिए तय्यार नहीं होती थी। क्योंकि बच्चे के यतीम होने के सबब से ज्यादा इनआम व इकराम मिलने की उम्मीद नहीं थी। इधर हजरते हलीमा सदिया की किस्मत का सितारा सुरैय्या से ज़्यादा बुलन्द, और चाँद से ज़्यादा रौशन था। उनके दूध की कमी उन के लिए रहमत की ज़्यादती का बाइस बन गई। क्योंकि दूध को कम देखकर किसी ने उनको अपना बच्चा देना गवारा न किया। हज़रते हलीमा सअदिया ने अपने शौहर “हारिस बिन अब्दुल उज्ज़ा से कहा कि ये तो अच्छा मालूम नहीं होता कि मैं ख़ाली हाथ वापस चलूँ। इस से तो बेहतर यही है कि मैं इस यतीम ही को ले चलूँ। शौहर ने इस को मंजूर कर लिया। और हज़रते हलीमा उस दु यतीम को ले आईं जिस से सिर्फ हज़रते हलीमा और हज़रते आमिना ही के घर में नहीं। बल्कि काएनाते आलम के मशरिक व मगरिब में उजाला होने वाला था। ये खुदावंदे कुडूस का फज्ले अज़ीम ही था कि हज़रते हलीमा की सोई हुई किस्मत बेदार हो गई। और सरवरे काएनात सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम उन की आगोश में आ गए। अपने ख़ीमे में ला कर जब दूध पिलाने बैठी तो बाराने रहमत की तरह बरकाते नुबूव्वत का जुहूर शुरू हो

गया। खुदा की शान देखिए कि हजरते हलीमा के मुबारक पिस्तान में इस कदर दूध उतरा कि रहमते आलम ने भी और उन के रिजाई भाई ने भी खूब शिकम सेर हो कर दूध पिया। और दोनों आराम से सो गए। इधर ऊँटनी को देखा तो उस के थन दूध से भर गए थे। हजरते हलीमा के शौहर ने दूध दुहा। और मियाँ बीवी ने खूब सेर हो कर दूध पिया। और दोनों शिकम सेर हो कर रात भर सुख और चैन की नींद सोए।

हजरते हलीमा का शौहर हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ये बरकतें देखकर हैरान रह गया। और कहने लगा कि हलीमा! तुम बड़ा ही मुबारक बच्चा लाई हो। हजरते हलीमा ने कहा कि वाकई मुझे भी यही उम्मीद है कि ये निहायत ही बा बरकत बच्चा है और खुदा की रहमत बन कर हम को मिला है। और मुझे यही तवक्कोअ है कि अब हमारा घर खैर- बरकत से भर जाएगा।

हज़रते हलीमा फरमाती हैं कि इस के बाद हम रहमते आलम को अपनी गोद में ले कर मक्का मुकर्रमा से अपने गाँव की तरफ रवाना हुए। तो मेरा वही खच्चर अब इस कदर तेज़ चलने लगा कि किसी की सवारी उसकी गर्द को नहीं पहुँती.थी। काफिला की औरतें हैरान होकर मुझसे कहने लगी कि ऐ हलीमा! क्या ये वही खच्चर है? जिस पर तुम सवार हो कर आई थीं। या कोई तेज़ रफ्तार खच्चर तुम ने ख़रीद लिया है? अल गरज़ हम अपने घर पहुँचे। वहाँ सख्त कहत पड़ा हुआ था। तमाम जानवरों के थन में दूध खुश्क हो चुके थे। लेकिन मेरे घर में कदम रखते ही मेरी बकरियों के थन दूध से भर गए। अब रोज़ाना मेरी बकरियाँ जब चरागाह से घर वापस आतीं तो उनके थन दूध से भरे होते, हालाँकि पूरी बस्ती में और किसी को अपने जानवरों का एक कतरा दूध नहीं मिलता था मेरे कबीले वालों ने अपने चरवाहों से कहा कि तुम लोग भी अपने जानवरों को उसी जगह चराओ जहाँ

हलीमा के जानवर चरते हैं। चुनान्चे सब लोग उसी चरागाह में अपने मवेशी चराने लगे जहाँ बकरियाँ चरती थीं। मगर यहाँ तो चरागाह और जंगल का कोई अमल वदखल नहीं था। ये तो रहमते आलम के बरकाते नुबूव्वत का फैज था जिस को मैं और मेरे शौहर के सिवा मेरी कौम का कोई शख्स नहीं समझ सकता था।

अलगरज इसी तरह हर दम हर कदम पर हम बराबर आप की बरकतों का मुशाहदा करते रहे । यहाँ तक कि दो साल पूरे हो गए। और मैं ने आप का दूध छुड़ा दिया। आप की तन्दुरुस्ती और नशो-नुमा का हाल दूसरे बच्चों से इतना अच्छा था कि दो साल में आप खूब अच्छे बड़े मालूम होने लगे। अब हम दस्तूर

के मुताबिक रहमते आलम को उन की वालिदा के पास लाए। और उन्होंने हस्बे तौफीक हम को इनआम व इकराम से नवाजा।

गो काएदा के मुताबिक़ अब हमें रहमते आलम को अपने पास रखने का कोई हक नहीं था ।मगर आपकी बरकाते नुबूव्वत की वजह से एक लम्हा के लिए भी हम को आपकी जुदाई गवारा नहीं थी। अजीब इत्तिफाक कि इस साल मक्का मुअज्जमा में वबाई बीमारी फैली हुई थी। चुनान्चे हम ने इस वबाई बीमारी का बहाना करके हज़रते आमिना बीबी को राजी कर लिया। फिर हम रहमते आलम को वापस अपने घर लाए। और फिर हमारा मकान रहमतों और बरकतों का कान बन गया। और आप हमारे पास निहायत खुश व खुर्रम रहने लगे। घर से बाहर निकलते और दूसरे लड़कों को खेलते हुए देखते। मगर खुद हमेशा हर किस्म के खेल कूद से अलाहदा रहते!

एक रोज मुझ से कहने लगे कि अम्मा जान! मेरे दूसरे भाई बहन दिन भर नज़र नहीं आते। ये लोग हमेशा सुबह उठकर रोजाना कहाँ चले जाते हैं? मैं ने कहा कि ये लोग बकरियाँ चराने चले जाते हैं। ये सुनकर आप ने फरमाया मादरे मेहरबान! आप मुझे भी मेरे भाई बहनों के साथ भेजा कीजिए। चुनान्चे आप के

इसरार से मजबूर होकर आप को हजरते हलीमा ने अपने बच्चों के साथ चरागाह जाने की इजाजत दे दी। और आप रोज़ाना जहाँ हजरते हलीमा की बकरियाँ चरती थीं तशरीफ ले जाते रहे। और बकरियाँ चरागाहों में ले जाकर उनकी देखभाल करना जो तमाम अंबिया और रसूलों की सुन्नत है। आपने अपने अमल से बचपन ही में अपनी एक ख़सलते नुबूब्बत का इज़हार फ़रमा दिया।

शक्के सदर

एक दिन आप चरागाह में थे कि एकदम हज़रते हलीमा के एक फ़रज़न्द ‘जमरा’ दौड़ते और हाँपते काँपते हुए अपने घर पर आए और अपनी माँ हज़रते बीबी हलीमा से कहा कि अम्माँ जान! बड़ा गज़ब होगया मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को तीन आदमियों ने जो बहुत ही सफ़ेद लिबास पहने हुए थे चित लिटा कर उन का शिकम फाड़ डाला है। और मैं इसी हाल में उनको छोड़कर भागा हुआ आया हूँ। ये सुनकर हज़रते हलीमा और उन के शौहर दोनों बद हवास होकर घबराए हुए दौड़कर जंगल में पहुंचे तो ये देखा कि आप बैठे हुए हैं। मगर खौफनै हरास से चेहरा ज़र्द और उदास है। हज़रते हलीमा ने इन्तिहाई मुशफिकाना लहजे में प्यार से चुमकार कर पूछा कि बेटा! क्या बात है? आप ने फरमाया कि तीन शख्स जिन के कपड़े बहुत ही सफेद और साफ सुथरे थे। मेरे पास आए और मुझको चित लिटाकर मेरा शिकम चाक करके उस में से कोई चीज़ निकालकर बाहर फेंक दिया। और फिर कोई चीज़ मेरे शिकम में डालकर शिगाफ को सी दिया। लेकिन मुझे ज़र्रा बराबर भी तकलीफ नहीं हुई। (मदारिजुन नुबूब्बा जि.२ स.२१)

ये वाकिआ सुनकर हज़रते हलीमा और उन के शौहर दोनों बेहद घबराए और शौहर ने कहा कि हलीमा! मुझे डर है कि इनके ऊपर शायद कुछ आसेब का असर है। लिहाज़ा बहुत जल्द तुम

इन को इन के घर वालों के पास छोड आओ। इस के बाद हज़रते हलीमा आप को लेकर मक्का मुकर्रमा आईं। क्योंकि इन्हें इस वाकिआ से ये खौफ पैदा हो गया था कि शायद अब हम कमा हक्कहू उनकी हिफाजत न कर सकेंगे। हजरते हलीमा ने जब मक्का मुअज्जमा पहुँचकर आप को आप की वालिदा माजिदा के सिपुर्द किया तो उन्होंने दर्याफ्त किया कि हलीमा! तुम तो बड़ी ख्वाहिश और चाह के साथ मेरे बच्चे को अपने घर ले गई थीं। फिर इस कदर जल्द वापस ले आने की वजह क्या है? जब हजरते हलीमा ने शिकम चाक करने का वाकिआ बयान किया। और आसेब का शुब्हा जाहिर किया तो हज़रते बीबी आमिना ने फ़रमाया कि हरगिज़ नहीं। खुदा की कसम मेरे नूरे नज़र पर हरगिज़ हरगिज कभी भी किसी जिन्न या शैतान का अमल दखल नहीं हो सकता। मेरे बेटे की बड़ी शान है। फिर अय्यामे हमल और वक्ते विलादत के हैरत अंगेज़ वाकिआत सुनाकर हज़रते हलीमा को मुतमइन कर दिया और हज़रते हलीमा आप को आप की वालिदा माजिदा के सिपुर्द करके अपने गाँव वापस आईं और आप अपनी वालिदा माजिदा की आगोश में तर्बियत पाने लगे।

शक्के सदर कितनी बार हुआ?

हज़रते मौलाना शाह अब्दुल अज़ीज़ साहिब मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह अलैहि ने सूरए “अलम नशरह” की तफ्सीर में तहरीर फ़रमाया है कि चार मर्तबा आप का मुकद्दस सीना चाक किया गया। और उस में नूर व हिकमत का खजीना भरा गया।

पहली मर्तबा जब आप हज़रते हलीमा के घर थे जिस का जिक्र हो चुका उस की हिकमत ये थी कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम उन वसवसों और खयालात से महफूज रहें जिन में बच्चे मुब्तला हो कर खेल कूद और शरारतों की तरफ माएल हो जाते हैं। दूसरी बार दस बरस की उम्र में हुआ। ताकि

जवानी की पुर आशोब शहवतों के खतरात से आप बे ख़ौफ हो जाएँ। तीसरी बार गारे हिरा में शक्के सदर हुआ। आप के कल्ब में नूरे सकीना भर दिया गया। ताकि आप वहीए इलाही के अज़ीम गिरौं बार बोझ को बर्दाश्त कर सकें। चौथी मर्तबा शबे मेअराज में आप का मुबारक सीना चाक करके नूर व हिकमत के ख़ज़ानों से मामूर किया गया। ताकि आप के कल्बे मुबारक में इतनी दुसअत और सलाहियत पैदा हो जाए कि दीदारे इलाही की तजल्लियों और कलामे रब्बाने की हैबतों और अजमतों के मुतहम्मिल हो सकें।

उम्मे ऐमन

जब हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हजरते हलीमा के घर से मक्का मुकर्रमा पहुँच गए और अपनी वालिदा मुहतरमा के पास रहने लगे। तो हज़रते “उम्मे ऐमन’ जो आप के वालिदे माजिद की बाँदी थीं आप की खातिरदारी और खिदमत गुजारी में दिन रात जी जान से मसरूफ रहने लगीं। उम्मे ऐमन का नाम “बरकत है। ये आप को आप के वालिद से मीरास में मिली थीं। यही आप को खाना खिालाती थीं। कपड़े पहनाती थीं। आप के कपड़े धोया करती थीं। आप ने अपने आज़ाद कर्दा गुलाम हज़रते’जैद बिन हारिसा से इन का निकाह कर दिया था। जिन से हज़रते उसामा बिन ज़ैद पैदा हुए। (रदियल्लाहु अन्हुम)

बचपन की अदाएँ

हजरते हलीमा का बयान है कि आप का गहवारा यानी झूला फिरिश्तों के हिलाने से हिलता था। और बचपन में चाँद की तरफ उंगली उठाकर इशारा फरमाते थे तो चाँद आप की उंगली के इशारों पर हरकत करता था। जब आप की जबान खुली तो सब से अव्वल जो कलाम आप की जबाने मुबारक से निकला वो ये था।”

अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर अल्हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आ-लमीन व सुब्हानल्लाहि बकरतुवँ व असीला। बच्चों की आदत के मुताबिक कभी भी आप ने कपड़े में बोल व बराज नहीं फरमाया। बल्कि हमेशा एक मुअय्यन वक्त पर रफअ हाजत फरमाते । अगर कभी आप की शर्मगाह खुल जाती तो आप रो रो कर फरयाद करते और जब तक शर्मगाह न छुप जाती आप को चैन और करार नहीं आता था। और अगर शर्मगाह छुपाने में मुझसे ताखीर हो जाती तो गैब से कोई आप की शर्मगाह छुपा देता। जब आप अपने पाँव पर चलने के काबिल हुए तो बाहर निकल कर बच्चों को खेलते

देखते। मगर खुद खेल कूद में शरीक नहीं होते थे। लड़के आप को खेलने के लिए बुलाते तो आप फ़रमाते मैं खेलने के लिए नहीं पैदा किया गया हूँ। (मदारिजुन नुबूब्वा जि. २ स. २१)

हज़रते आमिना की वफात

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की उम्र शरीफ जब छः बरस की हो गई,तो आप की वालिदा माजिदा आप को साथ ले कर मदीना मुनव्वरा आप के दादा के नानिहाल । बनू अदी बिन नज्जार में रिश्तेदारों की मुलाकात, या अपने शौहर की. कब्र की जियारत के लिए तशरीफ़ ले गईं। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वालिद माजिद की बाँदी उम्मे ऐमन भी इस सफ़र में आप के साथ थीं। वहाँ से वापसी पर अबवा” नामी गाँव में हज़रते बीबी आमिना की वफात हो गई। और वो वहीं मदफून हुई। वालिदे माजिद का साया तो विलादत से पहले ही उठ चुका था। अब वालिदा माजिदा की आगोशे शफकत का भी ख़ात्मा हो गया। लेकिन हज़रते बीबी आमिना का ये दुरे यतीम जिस आगोशे रहमत में परवरिश पा कर परवान चढ़ने वाला है। वो इन सब ज़ाहिरी असबाबे तर्बीयत से बे नियाज़ है।

हज़रते बीबी आमिना की वफात के बाद हज़रते उम्मे ऐमन

हजरत आप को क्का लाईं। और आप के दादा अब्दुल मुत्तलिब

के सिपुर्द किया और दादा ने आप को अपने आगोशे तर्बीयत

में इन्तिहाई शफकत व महब्बत के साथ परवरिश किया और हज़रते उम्मे ऐमन आप की ख़िदमत करती रहीं। जब आप की उम्र शरीफ आठ बरस की हो गई तो आप के दादा अब्दुल मुत्तलिब का भी इन्तिकाल हो गया।

हजरत अबू तालिब के पास

हजरत अब्दुल मुत्तलिब की वफ़ात के बाद आप के चचा हजरत अबू तालिब ने आप को अपने आगोशे तर्बीयत में ले लिया और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नेक ख़सलतों और दिल

लुभा देने वाली बचपन की प्यारी प्यारी अदाओं ने हजरत अबू तालिब को आप का ऐसा गिरवीदा बना दिया कि मकान के अन्दर और बाहर हर वक्त आप को अपने साथ ही रखते। अपने साथ खिलाते पिलाते। अपने पास ही आप का बिस्तर बिछाते और एक लम्हा के लिए भी कभी अपनी नज़रों से ओझल नहीं होने देते थे। हज़रत अबू तालिब का बयान है कि मैं ने कभी भी ऐसा नहीं देखा कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम किसी वक्त भी झूट बोले हों। या कभी किसी को धोका दिया हो। या कभी किसी को ईजा पहुँचाई हो। या बेहूदा लड़कों के पास खेलने के लिए गए हों। या कभी कोई ख़िलाफे तहज़ीब बात की हो। हमेशा इन्तिहाई खुश अख्लाक नेक, अतवार; नर्म गुफ्तार, बुलन्द किरदार, और अअला दर्जे के पारसा और परहेज़गार रहे!

आप की दुआ से बारिश एक मर्तबा मुल्के अरब में इन्तिहाई खौफनाक कहत पड़ गया। अहले मक्का ने बुतों से फरयाद करने का इरादा किया। मगर एक हसीन-ने जमील बूढ़े ने मक्का वालों से कहा कि ऐ

अहले मक्का! हमारे अन्दर हजरत अबू तालिब मौजूद हैं। जो बानीए कअबा हज़रते इब्राहीम खलीलुल्लाह की नस्ल से हैं। और कबा के मुतवल्ली और सज्जादा नशीन भी हैं। हमें उनके पास चलकर दुआ की दरख्वास्त करनी चाहिए। चुनान्चे सरदाराने अरब हजरत अबूं तालिब की खिदमत में हाजिर हुए। और फरयाद करने लगे। कि ऐ अबू तालिब! कहत की आग ने सारे अरब को झुलस कर रख दिया है। जानवर घास पानी के लिए तरस रहे हैं। और इन्सान दाना पानी न मिलने से तड़प तड़प कर दम तोड़ रहे हैं। काफ़िलों की आमद-ो रफ्त बंद हो चुकी है और हर तरफ बरबादी व वीरानी का दौर दौरा है। आप बारिश के लिए दुआ कीजिए। अले अरब की फरयाद सुनकर हजरत अबू तालिब का दिल भर आया। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपने साथ ले कर हरमे कञ्बा में गए। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को दीवारे कस्बा से टेक लगाकर बिठा दिया और दुआ माँगने में मशगूल हो गए । दर्मियाने दुआ में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी अंगुश्ते मुबारक को आसमान की तरफ उठा दिया। एक दम चारों तरफ से बदलियाँ नुमूदार हुईं और फौरन ही इस जोर का सबाराने रहमत बरसा कि अरब की जमीन सैराब हो गई। जंगलों और मैदानों में हर तरफ पानी ही पानी नज़र आने लगा चटियल मैदानों की सरज़मीनें सर सब्ज व शादाब हो गई। कहत दफअ हो गया। और काल कट गया। और सारा अरब खुशहाल और निहाल हो गया।

चुनान्चे हजरत अबू तालिब ने अपने उस तवील कसीदा जिस को उन्होंने हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मदह में नजम किया है इस वाकिआ को एक शेअर में इस तरह जिक्र किया है।

(हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ऐसे गोरे रंग वाले हैं कि जिन के रुखे अनवर के जरी बदली से बारिश तलब की जाती है वो यतीमों का ठिकाना और बेवाओं के निगहबान हैं। (जुरकानी अलल मवाहिब जि. १.स. १८०),

उम्मी लकब

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का लकब “उम्मी’। इस लफ्ज़ के दो मानी हैं या तो ये “उम्मुल कुरा” की तरफ निस्बत है। ‘उम्मुल कुरा” मक्का मुकर्रमा का लकब है। लिहाज़ा ‘उम्मी’ के मानी मक्का मुकर्रमा के रहने वाले। या “उम्मी के ये मानी हैं कि आपं ने दुनिया में किसी इन्सान से लिखना पढ़ना नहीं सीखा। ये हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का बहुत ही अजीमुश्शान मुअजिज़ा है कि दुनिया में किसी ने भी आप को नहीं पढ़ाया लिखाया। मगर खुदा वंदे कुटूस ने आप को इस कदर इल्म अता फरमाया कि आप का सीना अव्वलीन व आखिरीन के उलूम व मआरिफ़ का खजीना बन गया । और आप पर ऐसी किताब नाज़िल हुई जिस की शान “तिबयानन लिकुल्लि शय-इन (हर हर चीज़ का रौशन बयान है) हजरत मौलाना जामी रहमतुल्लाह अलैहि ने क्या खूब फरमाया है कि निगारे मन कि बि मक्तब न-रफ्त- ख़त न-नविश्त

ब-मगजए. सबक आमोज़े सद मुदरिंस शुद यानी मेरे महबूब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम न कभी मकतब में गए। न लिखना सीखा। मगर अपने चश्म व अबरू के इशारे से सैकड़ों मुदरिसों को सबक पढ़ा दिया।

आप के उम्मी लकब होने का हकीकी राज क्या है? इस को तो खुदावंदे अल्लामुल गुयूब के सिवा और कौन बाता सकता है? लेकिन बजाहिर इस में चन्द हिकमतें और फवाएद मालूम होते हैं।

अव्वल : ये कि तमाम दुनिया को इल्म व हिकमत सिखाने वाले हुजूरे. अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हों। और आप का उस्ताद सिर्फ खुदावंदे आलम ही हो। कोई इन्सान आप का उस्ताद न हो। ताकि कभी कोई ये न कह सके कि पैगम्बर तो मेरा पढ़ाया हुआ शागिर्द है। दुव्वम’:

ये कि कोई शख्स कभी ये खयाल न कर सके कि फुलाँ आदमी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का उस्ताद था तो शायद वो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से ज्यादा इल्म वाला होगा।

सुव्वम :हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बारे में कोई ये वहम न कर सके कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम चूँकि पढ़े लिखे आदमी थे इस लिए उन्होंने खुद ही कुरआन की आयतों को अपनी तरफ से बना कर पेश किया है। और कुरआन उन्हीं का बनाया हुआ कलाम है।

। चहारुम : जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सारी दुनिया को कितब व हिकमत की तअलीम दें तो कोई ये न कह सकेगा कि पहली और पुरानी किताबों को देख देख कर इस किस्म की अनमोल और इनकलाब आफरीं तअलीमात दुनिया के सामने पेश कर रहे हैं।

पंजुम : अगर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को कोई उस्ताद होता तो आप को उस की तअजीम करनी पड़ती। हालाँकि हुज़रूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को खालिके काएनात ने इस लिए पैदा फ़रमाया था कि सारा आलम आप की तअजीम करे। इस लिए हक जल्ला शानहू ने इस को गवारा नहीं फरमाया कि मेरा महबूब किसी के आगे जानूए तलम्मुज़ तह करे। और कोई उसका उस्ताद हो। वल्लाहु तआला अअलमा

सफ़रे शाम और बुहैरा

जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की उम्र शरीफ़ बारह बरस की हुई। तो उस वक्त हजरत अबू तालिब ने तिजारत की गरज़ से मुल्के शाम का सफर किया। हजरत अबू तालिब को चूंकि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से बहुत ही वालिहाना महब्बत थी इस लिए वो आप को भी इस सफर में हमराह ले गए। हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एअलाने नुबूब्वत से कब्ल तीन बार तिजारती सफ़र फ़रमाया। दो मर्तबा मुल्के शाम गए और एक मर्तबा यमन तशरीफ़ ले गए। ये मुल्के शाम का पहला सफ़र है। इस सफ़र के दौरान “बुसरा” में “बुहैरा’ राहिब (ईसाई साधू) के पास आप का कयाम हुआ। उस ने तौरात व इंन्जील में बयान की हुई नबी आख़िरुज़्ज़माँ की निशानियों से आप को देखते ही पहचान लिया। और बहुत ही अकीदत और एहतराम के साथ उस ने आप के काफिला वालों की दअवत की। और हजरत अंबू तालिब से कहा कि ये सारे जहाँ के सरदार और रब्बुल आलमीन के रसूल हैं। जिन को खुदा ने रहमतुल लिल आ-लमन बनाकर भेजा है। मैं ने देखा कि शजर व हजर इन को सज्दा करते हैं। और अब उन पर साया करता है। और उन के दोनों शानों के दर्मियान मुहरे नुबूव्वत है। इस लिए तुम्हारे और इन के

हक भी यही बेहतर होगा कि अब तुम इन को ले कर आगे न जाओ। और अपना माले तिजारत यहीं फरोख्त करके बहुत जल्द मक्का चले जाओ। क्योंकि मुलके शाम में यहूदी लोग इन

के

बहुत बड़े दुश्मन हैं। वहाँ पहुँचते ही वो लोग इन को शहीद कर डालेंगे। बुहैरा राहिब के कहने से हजरत अबू तालिब को खतरा महसूस होने लगा। चुनान्चे उन्होंने वहीं अपनी तिजारत का माल फरोख्त कर दिया। और बहुत जल्द हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अपने साथ ले कर मक्का मुकर्रमा वापस आ गए। बुहैरा राहिब ने चलते वक्त इन्तिहाई अकीदत के साथ आप को सफर का कुछ तोशा भी दिया। (तिर्मिजी जि. २ बाब माजा फी बद नबवतुन नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम)

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