ख़ातिमुन नबीय्यीन अरब में क्यों? ?

मुल्के अरब

ये बरे अअज़म एरिया के जुनूब मगरिब में वाकेअ है। चूंकि इस मुल्क को तीन तरफ से समुन्दर ने और चौथी तरफ से दरियाए फिरात ने जजीरा की तरह घेर रखा है। इस लिए इस मुल्क को “जज़ीरतुल अरब’ भी कहते हैं? इस के शुमाल (उत्तर) में शाम व इराक, मगरिब (पच्छिम) में बहरे अहमर (बहरे कुलजुम) जो मक्का मुअज्जमा से बजानिब मगरिब तकरीबन सतहत्तर (७७) किलोमीटर के फ़ासिले पर है। और जुनूब (दक्खिन) में बहरे हिन्द और मशरिक (पूरब) में ख़लीजे अम्मान व खलीजे फारस हैं!

इस मुल्क में काबिले ज़राअत जमीनें कम हैं। और इस का कसीर हिस्सा पहाड़ों और रेगिस्तानी सहराओं परं मुश्तमिल है।

(तारीख दूलूल अरब वल इस्लाम जि.१ स.३) ओलमाए जुगराफ़िया ने ज़मीनों की तबई साख्त के लिहाज से इस मुल्क को आठ हिस्सों में तक़सीम किया है!

(१) हिजाज़ (२) यमन (३) हज़रमूत (४) महरा (५) अम्मान (६) बहरेन (७) नज्द (८) अहकाफ

(तारीख़ दूलूल अरब वल इस्लाम जि१ स.३)

हिजाज़

ये मुल्क के मगरिबी हिस्से में बहरे अहमर (बरे कुलजुम) के साहिल के करीब वाकेअ है हिजाज़ से मिले हुए साहिले समुन्दर को जो नशेब में वाकेअ है “तहामा’ या गौर (पस्त जमीन) कहते हैं और हिजाज़ से मशरिक की जानिब जो मुल्क का हिस्सा है वो “नज्द (बुलन्द ज़मीन) कहलाता है। “हिजाज़” चूँकि “तहाम” और “नज्द के दर्मियान हाजिज़ और हाएल है। इसी लिए मुल्क के इस हिस्से को “हिजाज़’ कहने लगे। (दूलूल अरब वल इस्लाम जि१ स.४)

हिजाज़ के मुन्दर्जा जैल मकामात तारीखे इस्लाम में बहुत ज्यादा मशहूर है।

मक्का मुकर्रमा, मदीना मुनव्वरा, बदर, उहुद, खैबर, फ़िदक हुनैन, ताएफ, तबूक, गदीरखुम वगैरा ।

हज़रते शुब अलैहिस्सलाम का शहर “मदयन’ तबूक के } मुहाज़ में बहरे अहमर के साहिल पर वाकेअ है। मकामे “हिज” में

जो वादीउल कुरा है वहाँ अब तक अजाबे इलाही से कौमे समूद की उलट पलट कर दी जाने वाली बस्तियों के आसार पाए जाते हैं। ‘ताएफ हिजाज़ में सब से ज़्यादा सदेऔर सर सब्ज़ मकाम है और यहाँ के मेवे बहुत मशहूर हैं।

मक्का मुकर्रमा

हिजाज़ का ये मशहूर शहर मशरिक में “जबले अबू कुबैस और मगरिब में जबले कुकिआन” दो बड़े बड़े पहाड़ों के दर्मियान वाकेा है और इस के चारों तरफ़ छोटी छोटी पहाड़ियों, और रेतीले मैदानों का सिलसिला दूर दूर तक चला गया है। इसी शहर में हुजूर शहंशाहे कौनैन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की विलादते बा सआदत हुई।

इस शहर और इस के अतराफ़ मुन्दर्जा जैल मशहूर मकामात वाकेअ हैं।

कअबा मुअज्जमा, सफा, मरवा. मिना, मुजदलिफा, अरफात, गारे हिरा, गारे सौर, जबले तनईम, जिइर्राना वगैरा ।

मक्का मुकर्रमा की बन्दरगाह और हवाई अड्डा “जिद्दह” है जो तकरीबन चव्वन किलोमीटर से कुछ जाएद के फासिले पर बहरए कुलजुम के साहिल पर वाकेअ है।

मक्का मुकर्रमा में हर साल जुल हिज्जा के महीने में तमाम दुनिया के लाखों मुसलमान बहरी, हवाई और खुश्की के रास्तों से हज्ज के लिए आते हैं।

मदीना मुनव्वरा

मक्का मुकर्रमा से तकरीबन तीन सौ बीस किलोमीटर के फ़ासिले पर मदीना मुनव्वरा है जहाँ मक्का मुकर्रमा से हिजरत फ़माकर हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तशरीफ़ लाए और दस बरस तक मुकीम रहकर इस्लाम की तब्लीग फरमाते रहे और इसी शहर में आप का मजारे मुकद्दस है जो मस्जिदे नबवी के अन्दर “गुम्बदे ख़ज़रा” के नाम से मशहूर

मदीना मुनव्वरा से तकरीबन साढ़े चार किलोमीटर शुमाल को उहुद’ का पहाड़ है। जहाँ हक व बातिल की मशहूर लड़ाई जंगे उहुद लड़ी गई। इसी पहाड़ के दामन में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के चचा हज़रते सय्येदुश्शोहदा हम्जा रदियल्लाहु अन्हु का मज़ारे मुबारक है जो जंगे उहुद में शहीद हुए। ।

मदीना मुनव्वरा से तकरीबन पाँच किलोमीटर की दूरी पर “मस्जिदे कुबा है। यही वो मुकद्दस मकाम है जहाँ हिजरत के बाद हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने कयाम फरमाया। और अपने दस्ते मुबारक से इस मस्जिद को तअमीर फरमाया। इस के बाद मदीना. मुनव्वरा में तशरीफ लाए और मस्जिदे नबवी की तअमीर फरमाई। मदीना मुनब्बरा की बन्दरगाह “यंबुअ है जो मदीना मुनव्वरासे एक सौ सतरह (११७) किलोमीटर के फ़ासिले पर बहरे कुलजुम के साहिल पर वाके है।

ख़ातिमुन नबीय्यीन अरब में क्यों? ?

अगर हम मुल्के अरब को कुर्रए जमीन के नक्शे पर देखें तो इसके महले वकूअ से यही मालूम होता है कि अल्लाह तआला ने मुल्के अरब को एशिया, योरोप और अफरीका तीन बरे अअजमों के वस्त में जगह दी है। इस से बखूबी ये समझ में आ सकता है कि अगर तमाम दुनिया की हिदायत के वास्ते एक वाहिद मरकज काएम करने के लिए हम किसी जगह का इन्तिख़ाब करना चाहें तो मुल्के अरब ही इस के लिए सब से ज्यादा मौजूअ और मुनासिब मकाम है। खुसूसन हुजूर ख़ातिमुन-नबीय्यीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ज़माने पर नजर करके हम कह सकते हैं कि जब अफरीका और योरोप और एशिया की तीन बड़ी बड़ी सल्तनतों का तअल्लुक मुल्के अरब से था। तो ज़ाहिर है कि मुल्के अरब से उठने वाली आवाज़ को उन बरे अअजमों में पहुँचाए जाने के ज़राए बखूबी मौजूद थे। गालिबन यही वो हिकमते इलाहिया है कि अल्लाह तआला ने हुजूर ख़ातिमुन-नबीय्यीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को मुल्के अरब में पैदा फ़रमाया, और उन को अकवामे आलम की हिदायत का काम सिपुर्द फ़रमाया। (वल्लाहु तआला अलम)

अरब की सियासी पोजीशन

हुजूर नबीए आख़िरुज्जमाँ सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की विलादते मुबारका के वक्त मुलके अरब की सियासी हालत का ये हाल था कि जुनूबी हिस्से पर सल्तनते हब्शा का। और मशरिकी हिस्से पर सलतनते फारस का कबज़ा था। और शुमाली टुकड़ा सल्तनते रौम की मशरिकी शाख़ सल्तनते कुसतुनतुनया के ज़ेरे असर था। अन्दुरूने मुलक, ब-ज़ोअम खुद मुल्के अरब आज़ाद था। लेकिन उस पर कब्ज़ा करने के लिए हर एक सल्तनत कोशिश में लगी हुई थी। और दर हकीकत इन सल्तनतों की

बाहमी रकाबतों ही के तुफैल में मुल्के अरब आजादी की नेअमत से बेहरा वर था।

अरब की अख्लाकी हालत

अरब की अख्लाकी हालत निहायत ही अब्तर बल्कि बद से बदतर थी जहालत ने उन में बुत परस्ती को जन्म दिया था और बुत परस्ती की लअनत ने उन के इन्सानी दिल- दिमाग पर काबिज़ हो कर उन को तवहुभ परस्त बना दिया था। वो मज़ाहिर फ़ितरत की हर चीज़ पत्थर, दरख्त, चाँद, सूरज, पहाड़, दरिया वगैरा को अपना मअबूद समझने लग गए थे। और खुद साख़्ता मिट्टी और पत्थर की मूरतों की इबादत करते थे। अकाएद की ख़राबी के साथ साथ उन के अअमाल व अफ़आल बे

हृद बिगडे हुए थे। कत्ल, रहज़नी, शराब खोरी, फहश गोई, गरज़ कौन सा ऐसा गन्दा और घिनावना अमल था जो उन की. सरिश्त में न रहा हो। छोटे बड़े सब के सब गुनाहों के पुतले और पाप के पहाड़ बने हुए थे।

हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम की औलाद

बानीए कबा हज़रते इब्राहीम ख़लीलुल्लाह अलैहिस्सलाम के एक फ़रज़न्द का नाम हज़रते इस्माईल अलैहिस्सलाम है जो हज़रते बीबी हाजिरा के शिकमे मुबारक से पैदा हुए थे। हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उन को और उन की वालिदा हज़रते बीबी हाजिरा को मक्का मुकर्रमा में लाकर आबाद किया। और अरब की जमीन उन को अता फरमाई।

हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दूसरे फ़रज़न्द का नाम नामी हजरते इस्हाक अलैहिस्सलाम है हजरते बीबी सारा के शिकम से तवल्लुद हुए थे। हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम की तीसरी बीवी हज़रते कतूरा के पेट से जो औलाद “मदयन’ वगैरा हुए उन को आप ने यमन का इलाका अता फरमाया!

औलादे हज़रते इस्माईल अलैहिस्सलाम

हजरते इस्माईल अलैहिस्सलाम के बारह बेटे हुए। और उन की औलाद में खुदावंदे कुडूस ने इस कदर बरकत अता फ़रमाई कि वो बहुत जल्द तमाम अरब में फैल गए। यहाँ तक कि मगरबि में मिस्र के करीब तक उन की आबादियाँ जा पहुँचीं। और जुनूब की तरफ उन के खीमे यमन तक पहुँच गए। और शुमाल की तरफ उन की बस्तियों मुल्के शाम से जा मिली हज़रते इस्माईल अलैहिस्सलाम के एक फरज़न्द जिन का नाम “कैदार’ था बहुत ही नामवर हुए और उनकी औलाद खास मक्का में आबाद रही और ये लोग अपने बाप की तरह हमेशा क बा मुअज्जमा की खिदमत करते रहे जिस को दुनिया में तौहीद की सब से पहली दर्सगाह होने का शरफ हासिल है!

उन्हीं केदार की औलाद में “अदनान” नामी निहायत ही ऊलुल अज्म शख्स पैदा हुए और अदनान की औलाद में चन्द पुश्तों के बाद कुस्सा बहुत ही जाह- जलाल वाले शख्स पैदा हुए जिन्होंने मक्का मुकर्रमा में मुश्तरका हुकूमत की बुनियाद पर ४४०ई. में एक सल्तनत काएम की। और एक कौमी मजलिस (पार्लमेन्ट) बनाई जो ‘दारुल नदवा” के नाम से मशहूर है। और अपना एक ‘कौमी झन्डा बनाया जिसको “लिवा’ कहते थे। और मुन्दर्जा जैल चार ओहदे काएम किए। जिन की ज़िम्मेदारी चार कबीलों को सौंप दी। (१) रिफादह (२) सकायह (३) हिजाबह (४) कयादह।

“कुस्सा के बाद उन के फरज़न्द “अब्दे मुनाफ’ अपने बाप के जानशीन हुए। फिर उन के फरज़न्द हाशिम फिर उन के फिरजन्द “अब्दुल मुत्तलिब” यके बाद दीगरे एक दूसरे के जानशीन होते रहे। इन्ही अब्दुल मुत्तलिब के फरज़न्द हज़रत अब्दुल्लाह

हैं। जिन के फरजनदे अरजुमन्द हमारे हुजूर रहमतुल लिल-आलमीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हैं।

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