इमाम हसन अलैहिस्सलाम को किस ज़हर से शहीद किया गया था ?

इमाम हसन अलैहिस्सलाम को किस ज़हर से शहीद किया गया था ? रोम का बादशाह भी था शामिल… अमरीकी वैज्ञानिकों ने पता लगाया!

इमाम हसन अलैहिस्सलाम को किस ज़हर से शहीद किया गया था ? रोम का बादशाह भी था शामिल… अमरीकी वैज्ञानिकों ने पता लगाया!
ईरान के फितरुस मीडिया ने एक डाक्यूमेंट्री बनायी है जिसमें इमाम हसन अलैहिस्सलाम को शहीद किये जाने की शैली के बारे में चर्चा की गयी है। फितरुस मीडिया के सीईओ हसन मलकूती ने इस डाक्यूमेंट्री के बारे में विस्र से बताया है। यह डाक्यूमेंट्री यू ट्यूब पर Rereading a Biological Assassination के नाम से मौजूद है जिसे गुरुवार 15 अक्तूबर सन 2020 में अपलोड किया गया। यहां उसके कुछ हिस्से पेश किये जा रहे हैं।

अमरीकी वैज्ञानिकों ने मध्युगीन काल में एक एक रहस्यमय हत्या के राज़ से पर्दा उठाया है। इस हत्या में रोमन शासक, मुसलमाने खलीफा और क़त्ल किये जाने वाली की पत्नी शामिल थी।

हसन इब्ने अली की हत्या ” मर्करी क्लोराइड ” से की गयी थी।

ज़हर से हत्या का इतिहास!

ज़हर से हत्या का इतिहास बहुत पुराना है लेकिन इसका प्रमाणित सुबूत उस समय से मिलता है जब हज़रत ईसा के जन्म से 13 सौ साल पहले, मिस्र के शासक फिरऔन के विशेष चिकित्सक ” सीनूहे ” ने हेटी समुदाय के नेता की हत्या ज़हर इस्तेमाल किया था। हेटी क़बीले के सरदार को ज़हर मिलाया हुआ शर्बत दिया गया था। इसके बाद से मानव समाज में धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विरोधियों को चुपचाप रास्ते से हटाने का यह लोकप्रिय तरीका बन गया। यहां तक कि ज़हर देना एक समय में सामूहिक हत्या का भी तरीक़ा बन गया था। इन्सानों में मारने का यह जटिल और भयानक तरीका आज वैज्ञानिकों के लिए रूचि का केन्द्र है और वह इतिहास में प्रसिद्ध लोगों को ज़हर से मारने की घटना का अध्ययन कर रहे हैं। ब्रिटेन की प्रसिद्ध पत्रिका मेडिसिन साइंस एंड द लॉ ने इतिहास की एक बेहद क्रूरता पूर्ण हत्या का अध्ययन किया। अध्ययन के बाद इस पत्रिका में लेख छपा है। इस लेख को लिखने वाले अमरीकी वैज्ञानिक हैं जिन्हों पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम की हत्या का अध्ययन किया है। इस हत्या की जांच करने वाली टीम में हर धर्म के लोग शामिल हैं और वास्तव में धर्म से उनका कोई संबंध नहीं है और वह सब के सब सेकुलर लोग हैं जिन्होंने एक वैज्ञानिक के रूप में इस हत्या की जांच की है। जांच के बारे में उन्होंने बताया है कि इतिहासिक तथ्यों और गवाहियों पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है। यह अध्यन कैलिफोर्निया में किया गया है। इस अध्ययन के अनुसार सन 606 ईसवी में जेरुश्लम में मुआविया इब्ने अबू सुफियान को खलीफा घोषित किया गया। पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने सत्ता पर दावा छोड़ दिया जिसकी वजह उन्होंने खुद साथियों की कमी बतायी। संधि हुई और फिर मुआविया ने अपने बेटे यज़ीद को अपना उत्तराधिकारी बनाया और इसके लिए उसने इमाम हसन को ज़हर दे दिया। प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान हाकिमे नीशापूरी ने अपनी किताब " अलमुस्तदरक" में लिखा है कि हसन इब्ने अली को कई बार ज़हर दिया गया और हर बार वह बच गये लेकिन आखिरी बार जब ज़हर दिया गया तो उनका जिगर फट गया और उनकी वफात हो गयी लेकिन क्या किसी किताब में उस ज़हर के बारे में भी कुछ कहा गया है जो उन्हें दिया गया था? तबरी दलाएलुल इमामा में इमाम हसन को दिय गये ज़हर के बारे में लिखा है कि " सोने का बुरादा" उन्हें दिया गया था। लेख के आरंभ में ही इस बात पर ध्यान दिया गया है और यह भी कहा गया है कि सोने का बुरादा ज़हर नहीं है और इससे इन्सान की इस तरह से मौत नहीं हो सकती। तो इसका मतलब यह है कि इमाम हसन को किसी एसे ज़हर से शहीद किया गया जो सोने के बुरादे से मिलता जुलता था। इसके लिए भुगोल खंगालना पड़ेगा। एहतेजाज तबरसी में सालिम इब्ने अबीजह्ल के हवाले से लिखा गया है कि मुआविया ने बाइज़ेंटाइन सम्राट यानी रोम के राजा को खत लिख कर उससे भयानक ज़हर की मांग की। रोम के शासक ने भी कुछ शर्तों के साथ मुआविया के लिए ज़हर भिजवा दिया। तो इस तरह से यह साबित हुआ कि इमाम हसन अलैहिस्साम को जिस ज़हर से शहीद किया गया था वह रोम के राजा ने भेजा था और उस समय रोम साम्राज्य का केन्द्रीय क्षेत्र वही था जिसे आज तुर्की कहा जाता है। पश्चिमी तुर्की में इज़मीर नाम का एक शहर है जहां मर्करी की खदाने हैं जिन्हें ईसा मसीम के जन्म से 5 सौ साल पहले से इस्तेमाल किया जाता रहा है। मर्करी का कोई बायोलोजिकल प्रभाव साबित नहीं है लेकिन यह चीज़ हमेशा से इन्सानों के लिए ज़हर समझी जाती रही है। मिसाल के तौर पर मर्करी क्लोराइड मध्य युगीन काल में अरब मुसलमान वैज्ञानिकों द्वारा बनाया जाने वाला पहला पदार्थ था और इसे उस समय भी इन्सानों को बेरहमी से मारने वाला एक भयानक ज़हर समझा जाता था। लेकिन सवाल यह है कि तुर्की में मर्करी खदानों में मिलने वाला ज़हरीला पदार्थ सोने की तरह नज़र आता है? अध्ययन करने वाले अमरीकी वैज्ञानिकों की हैरत का ठिकाना न रहा जब तुर्की के इज़मीर क्षेत्र में मर्करी की खदानों में उनके अध्ययन से यह पता चला कि इस इलाके का पारा, जो सफेद रंग का होता है, सोने के वर्क में बदल जाता है।

तुर्की का यह पारा, सुनहरी वर्क में बदल जाता है

इस तरह से जब यह पता चल गया कि इज़मीर का मर्करी, बेहद पतले सुनहरे कागज़ की तरह नज़र आता है तो फिर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि रोम के शासक ने इमाम हसन अलैहिस्सलाम को शहीद करने के लिए कौन सा ज़हर मुआविया को भेजा था? इस का एक और सुबूत ज़हर खाने के बाद इमाम हसन की हालत थी है। बदन का हरा हो जाना और खून की उल्टी करना। यह हालत, सफेद मर्करी खाने के बाद होती है। इमाम हसन अलैहिस्सलाम के बदन के हरे होने की वजह, मर्करी खाने से गुर्दे को पहुचंने वाला नुक़सान हो सकता है। मर्करी से किडनी लगभग फेल हो जाती है। इसी तरह मर्करी खाने से ग्रासनली में खून जम जाता है जो मुंह के रास्ते बाहर निकालता है। यही वजह है कि इतिहास में आया है कि ज़हर खाने के बाद इमाम हसन के मुंह से जिगर के टुकड़े गिर रहे थे। लेख में आखिर में कहा गया था कि इतिहासिक और रासायनिक तथ्यों से पता चलता है कि इमाम हसन की शहादत, मर्करी क्लोराइड से हुई है। इस ज़हर का इंतेज़ाम रोमन बादशाह ने मुआविया के कहने पर किया था और ज़हर इमाम हसन अलैहिस्सलाम की बीवी, " जोअदा" ने उन्हें दिया था।

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