हज़रत उमर रज़ी अल्लाहु अन्ह और ख़शियते इलाही

हज़रत उमर रज़ी अल्लाहु अन्ह और ख़शियते इलाही

हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ी अल्लाहु अन्ह की सीरत के बाब में मंक़ूल है कि जब क़ुरआन ए पाक की तिलावत करते हुए वो किसी मुक़ाम पर आते जिसमें किसी हवाले से अज़ाबे आख़िरत का ज़िक्र होता तो उनपर नशे की हालत तारी हो जाती जो कई कई दिन बरक़रार रहती और अहबाब अयादत के लिए उनके घर आते-नफ़ली इबादत तक़र्रुबे इलाही का ज़रिआ हैं इस बारे में एक हदीसे क़ुदसी मन्क़ूल है जिसमें अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त अपने इबादत गुज़ार बन्दे का ज़िक्र इन अल्फ़ाज़ में फ़रमाता है-

मेरा बन्दा नवाफ़िल के ज़रिए मेरे इस क़दर क़रीब हो जाता है यहाँ तक कि मैं उस से मुहब्बत करने लगता हूँ फ़िर मैं उसके कान बन जाता हूँ जिस से वो सुनता है उसकी आँखें बन जाता हूँ जिस से वो देखता है और उसके हाथ बन जाता हूँ जिस से वो पकड़ता है और उसके पैर बन जाता हूँ जिन से वो चलता है और अगर वो मुझसे सवाल करे तो ये में उसे ज़रूर अता करता हूँ और अगर वो मुझसे पनाह मांँगे तो मैं उसे अपनी पनाह अता करता हूँ,

📗 सही बुख़ारी शरीफ़

(अल्लाह अज़्जा व जल्ल जिस्म व जिस्मानियात से पाक है, खुलासा यह कि बन्दा ए मोमिन जो भी काम करता है वह अल्लाह अज़्जा व जल्ल की मर्जी के मुताबिक करता है यानी इसमें अल्लाह अज़्जा व जल्ल उसकी मदद फ़रमाता है)

इस हदीस ए मुबारका से ज़ाहिर है कि कसरते तवातुर के साथ नवाफ़िल की अदाइगी बन्दे को उस मुक़ामे महबूबियत पर फ़ाइज़ कर देती है कि उस से सादिर होने वाले तमाम अफ़आल ज़ाते बारी तआल़ा से मन्सूब होने लगते हैं और वो बन्दा अपने रब की अमान में आकर हर गुनाह से महफ़ूज़ कर दिया जाता है जो उस से बिसारत, सिमाअत, और दीगर आज़ा ए जवारेह के रास्ते सादिर हो सकते हैं,

ये बात मुसल्लमा है कि तरीक़त की राह का कोई सालिक अपना रूहानी सफ़र बग़ैर नमाज़ के ना कभी तय कर सका है और ना कभी तय कर सकेगा इस पर मुस्तज़ाद अहले तरीक़त बिला इस्तिसना नमाज़े तहज्जुद की पाबन्दी को ज़िन्दगी भर अपना शिआर रखते चले आए हैं बल्कि बाज़ बुज़ुर्ग ऐसे भी गुज़रे हैं जिन्होंने नमाज़े तहज्जुद के अलावा अपने उपर पाँच सौ से लेकर डेढ़ हज़ार रकअत तक नवाफ़िल को लाज़िम किया हुआ था और यह उनका ज़िन्दगी भर मामूल रहा, अहले सफ़ा के लिए नमाज़े पंजगाना के बाद तहज्जुद की पाबन्दी फ़र्ज़ का दर्जा रखती है हमारे बाज़ असलाफ़ के अहवाल में मज़कूर है कि जब वो सुबह एक दुसरे से मिलते तो अगर किसी की नमाज़े तहज्जुद क़ज़ा हो गई होती तो वो पहचान जाते और इज़हारे तअस्सुफ़ के तौर पर कहते के आज तुमपर किया उफ़ताद पड़ी के रात अहलुल्लाह की मजलिस से ग़ायब थे,

अफ़सोस सद अफ़सोस कि आज हमारे बाज़ नाम निहाद सूफ़ी और तरीक़त के नाम निहाद दावे दार नमाज़े तहज्जुद की पाबन्दी को चन्दा ज़रूरी नहीं समझते-शोमिए क़िस्मत से हमने अपने हाँ जिस क़िस्म के तसव्वुफ़ को रिवाज़ दे रखा है वो महज़ ढोंग और तरीक़त के नाम पर ज़ाती कारोबार चमकाने और दुनियावी माल व मताअ जमा करने का ज़रिआ हैं सिर्फ और सिर्फ,

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