हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और गाय

क़ुरान में सूरह बक़र को बक़र यानि गाय वाली सूरह इसलिए कहा जाता है कि इसमें हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और एक गाय का ज़बरदस्त वाक़िया है,जो कि आयत नं0 67 से 73 तक है,आईये उसकी तफसील जानते हैं

बनी इस्राईल में एक नेक शख्स था जिसका एक छोटा सा बेटा था,उस शख्स ने एक बछिया बड़ी मुहब्बत से पाली थी,जब उसकी मौत का वक़्त करीब आया तो वो बछिया को लेकर एक जंगल में गया और उसको मौला के सुपुर्द करके वहीं छोड़ आया कि जब मेरा बेटा जवान हो जाए तो ये उसके काम आए,वो तो मर गया और गाय जंगल में और उसका बेटा मां के पास परवरिश पाता रहा,लड़का भी नेक और परहेज़गार था जब वो बड़ा हो गया तो उसकी मां ने उससे कहा कि तेरे बाप ने उस जंगल में तेरे लिए एक गाय छोड़ी है और उसकी निशानियां बताई तू जाकर उसे ले आ,लड़का गया और पहचान कर गाय ले आया,अब उसकी मां ने कहा कि इसे बाज़ार ले जा और 3 अशर्फियों से कम में हरगिज़ न बेचना और बेचने से पहले मुझे ज़रूर बता देना,लड़का गया और उसे एक खरीदार मिला उसने कीमत पूछी इसने 3 अशर्फी बताया और मां की इजाज़त शर्त है उसने कहा कि 6 दूंगा मगर मां से ना पूछ,लड़के ने नहीं बेचा और वापस आ गया,सारा माजरा मां से कहा तो मां ने कहा कि 6 अशर्फी में बेच देना मगर सौदा होने से पहले मुझसे पूछ लेना,लड़का फिर बाज़ार गया फिर वही गाहक मिला अब उसने 12 अशर्फियां देने को कहा मगर मां से ना पूछे,लड़का फिर वापस आ गया,उसकी मां अक़लमंद थी वो समझ गयी कि ये गाहक कोई आम आदमी नहीं बल्कि फ़रिश्ता है जो इम्तिहान लेने की गर्ज़ से आया है,उसने लड़के को फिर बाज़ार भेजा और कहा कि जाकर उनसे पूछ कि हम गाय बेचें कि रोके रहें,लड़का गया तो उस फ़रिश्ते ने कहा कि अपनी मां से कहना कि अभी जल्दी न करे कि अनक़रीब बनी इस्राईल को इस गाय की सख्त ज़रूरत पड़ने वाली है और जब वो इसको खरीदना चाहें तो कीमत ये तय करना कि पूरी खाल को सोने की अशर्फियों से भर दिया जाए,ये कहकर वो ग़ायब हो गया लड़का घर को वापस आ गया*_उधर बनी इस्राईल में आबील या आमील नाम का एक शख्स था जिसकी कोई औलाद नहीं थी,उसके चचाज़ाद भाई ने जायदाद की लालच में आकर उसका क़त्ल कर दिया और उसकी लाश को दूसरी बस्ती में फेंक आया,और दूसरे दिन खुद ही उसके खून का मुद्दई बनकर बस्ती वालों पर उसके चचा के क़त्ल का मुक़दमा करके उनसे उसके खून का बदला यानि खून बहा लेना चाहा,वहां के लोगों से जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने पूछा तो उन लोगों ने साफ़ इनकार कर दिया और आपसे दुआ की दरख्वास्त की कि आपही कुछ हल फरमायें,आपने बारगाहे खुदावन्दी में दुआ की तो मौला फरमाता है कि ऐ मूसा इनसे कह कि एक गाय ज़बह करके उसका गोश्त इस मक़तूल की लाश पर मारें तो लाश खुद ही ज़िंदा होकर अपने क़ातिल का नाम बताएगी,आपने बनी इस्राईल को रब का ये फरमान सुना दिया जिस पर वो कहने लगे कि आप हमसे मज़ाक कर रहे हैं हम आपसे क़ातिल का सुराग चाह रहे हैं और आप हमें गाय ज़बह करने का हुक्म दे रहे हैं इस पर आप फरमाते हैं कि मेरे रब ने मुझे ऐसा ही हुक्म दिया है तब वो सोचने लगे की शायद ये गाय कोई ख़ास गाय होगी और उसकी निशानियां पूछने लगे तो आप फरमाते हैं कि वो ना तो बिलकुल बूढ़ी हो और ना जवान बल्कि बीच की उम्र की हो,इससे बनी इस्राईल को तशफ्फी नहीं हुई और उन्होंने उसका रंग पूछा तो आप फरमाते हैं कि उसका रंग ज़र्द है जो देखने वालों को भला मालूम होता है इस पर भी उनकी समझ में नहीं आया और जानकारी चाही तो आप फरमाते हैं कि ना तो उससे खेती सैराब की गयी हो और ना ही उसने हल चलाया हो,और ना उसके जिस्म पर कोई दाग धब्बा हो तब बनी इस्राईल कहते हैं कि अब आपने पूरी बात बतायी अब हम ऐसी गाय को ढूंढ़ लेंगे,और बिल आखिर ढूंढ़ते ढूंढ़ते वो उसी लड़के के पास पहुंच गए जब उन्होंने गाय खरीदना चाहा तो उसने वही कीमत बता दी जो फ़रिश्ते ने कही थी,चूंकि बनी इस्राईल पर इलज़ाम आयद था और उनको इस इल्ज़ाम से बचना था तो उन्होंने इतनी भारी कीमत पर वो गाय खरीद ली और उसे ज़बह करके उसका गोश्त लाश पर मारा तो बहुकमे खुदावन्दी लाश ने फ़ौरन अपने क़ातिल यानि चचाज़ाद भाई का नाम बता दिया,अब उसके क़त्ल के जुर्म में उसका क़त्ल किया गया और उधर उस लड़के को रब की अता से बेशुमार दौलत मिल गई_*

📕 तफ़सीरे खज़ाएनुल इरफ़ान,पारा 1,स 14
📕 तफ़सीरे नईमी,जिल्द 1,सफह 581
📕 तज़किरातुल अम्बिया,सफह 324
📕 क्या आप जानते हैं,सफह 156

सबक़

हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि नबी ने जब ये फ़रमाया कि तुम गाय ज़बह करो तो बनी इस्राईल चाहते तो कोई भी गाय ज़बह करके इतनी मुश्किलात में ना पड़ते और ना इतनी भारी कीमत पर गाय खरीदनी पड़ती मगर ये मुसीबत उन्होंने खुद मोल ली,कि जैसे जैसे नबी से सवाल करते जाते वैसे वैसे उस पर शर्तें बढ़ती जाती,लिहाज़ा किसी भी बुज़ुर्ग या वली से अगर किसी सवाल का जवाब मिल गया हो तो फ़ौरन वहां से उठ जाए और फ़िज़ूल के सवाल करके उस पर पाबंदियां ना लगवानी चाहिए

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का ज़माना नबी करीम सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की विलादत से 2300 साल क़ब्ल है

📕 मआरेजुन नुबुव्वत,जिल्द 2,सफ़ह 32

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