Hazrat Hurr – हज़रत हुर्र रजियल्लाहु तआला अन्हु कीशहादत



हज़रत हुर्र (Hazrat Hurr) का जिक्र पहले गुज़रा ! आपने पढा कि हजरत हुर्र (Hazrat Hurr) रजियल्लाहु तआला अन्हु मर्दे सईद और खुशनसीब थे ! लशकर इब्जे सअद में हज़रत हमाम हुसैन रजियल्लाहु तआला अन्हु के साथ लडने आये थे !

मगर उनकी तकदीर में कुछ और ही लिखा था ! हजरत इमाम आली मकाम रजियल्लाहु तआला अन्हु के असहाब व अंसार जब यजीदिंयों के साथ लडते हुए शहीद हो चुक थे !

हजरत इमाम रजियल्लाहु तआला अन्हु के पास भाई, भतीजों, भान्जो, लडकों और तीन खादिमों के और कोई बाकी न रहा ! तो यह सूरते हाल देखकर हज़रत इमाम बे-इख्यियार रो पडे ! और पुकार उठे ! है कोई हमारी फ़रयाद सुनने और मदद करने वाला ?

यह दर्दनाक आवाज़ सुनकर हजरत हुर्र (Hazrat Hurr) रजियल्लाहु तआला अन्हु के कानों में पडी ! तो कलेजा दहल गया ! और फौरन अपने घोडे की लगाम दोजख की तरफ़ से फेरकर जन्नत की तरफ़ कर ली !

यानी लशकर इब्ने सअद से घोडा दौडाकर हज़रत इमाम की खिदमत में हाजिर हो गये ! और रकाब का बोसा देकर अर्ज किया: हुजूर मेरा कुसूर माफ़ करें ! मेरी तौबा कुबूल होगी या नहीं ?

इमाम रजियल्लाहु तआला अन्हु ने उनके सर पर दस्ते मुबारक फेरकर फ़रमाया ! अल्लाह तआला अपने बंदों की तौबा कूबूल फ़रमाता है ! में तुमसे खुश हूं ! हजरत यह बशारत सुनकर लशकरे इमाम में शामिल हो गये !

(तजकिरा सफा 73 )

हज़रत हुर्र रजियल्लाहु तआला अन्हु की शहादत
हज़रत हुर्र (Hazrat Hurr) रजियल्लाहु तआला अन्हु यजीदी लशकर से निकलकर हुसैनी लशकर में आ मिले ! इस तरह उन्होंने अपने आपको आग से बचाकर जन्नत ख़रीद ली थी !

आप बहुत बडे बहादुर और दिलेर थे ! इब्ने सअद के लशकर के आप सिपहसालार थे ! इब्ने सअद ने जब उन्हें हुसैनी लशकर में मिलते हुए देखा तो वह बहुत घबराया ! और सफ़वान से कहने लगा ! तू जा ! और हुर्र को समझाकर वापस फेर वरना सर तन से जुदा कर ला !

चुनांचे सफ़वान ने हुर्र से आकर कहा कि तुम मर्दाना आकिल होकर यजीद जैसे अजीम हाकिम की रिफाकत छोडकर हुसेन की तरफ़ क्यो चले आये ? चलो वापस चलो ।

हजरत हुर्र (Hazrat Hurr) रजियल्लाहु तआला अन्हु ने फ़रमाया: अब में वापस नहीं जा सकता ! सफवान ने पूछा क्यो ? तो फ़रमाया :

क्यो छोड़ के दीन फौज में गुमराह के आऊं

हाकिम को हंसाऊं मैं, मुहम्मद को रुलाऊं

क्या हाकिमे दुनिया का तो एहसास करूं मैं

और जोहरा के रोने का न कुछ पास करूं मैं

ऐ सफ़वान ! यजीद नापाक है ! ओंर हुसेन पाक हैं ! और रैहाने मुस्तफा हैं ! सफ़वान ने गुस्से में आकर हुर्र के नेजा मारा !

हज़रत हुर्र (Hazrat Hurr) ने नेजा तोड़ डाला ! और फिर उसे एक नेजा मारा ! जो उसक सीने के पार हो गया ! और वह जहन्नम सिधार गया !

यह सूरते हालत देखकर सफ़वान के भाई दौडे !

हज़रत हुर्र (Hazrat Hurr) ने उन्हें भी मार डाला और फिर खुद वहां से फिरकर हज़रत इमाम के पास आकर अर्ज-की ! हुजूर अब तो आप मुझसे राजी हैं !
फ़रमाया में तुझसे राजी हू ! तू आजाद है ! जैसा कि तेरी मां ने तेरा नाम रखा है ! हज़रत हूर्र (Hazrat Hurr) ! यह खुशखबरी सुनकर फिर मैदान में आये !

जिस तरफ़ हमला किया कुश्तो के पुश्ते लगा दिये ! एक यजीदी ने आकर आपके घोडे को जख्मी कर दिया ! आप पैदल ही लड़ने लगे ! इमाम ने दूसरा घोडा भेज दिया !

हजरत हुर्र उस पर सवार हो गये ! लेकिन उन जालिमों ने एक दम हल्ला बोल दिया ! हज़रत हुर्र ने एक बार और खिदमत इमाम में हाजिर होने का इरादा किया ! कि गेब से आवाज आयी अब न जाओं ! हुरे तुम्हारी मुन्तजिर हैं ! हज़रत हुर्र (Hazrat Hurr) रजियल्लाहु तआला अन्हु ने वहीँ से अर्ज की या इब्ने रसूलल्लाह ! यह गुलाम आपके नाना जान के पास जा रहा है ! कुछ फ़रमाइये तो कह दूं !

इमाम ने रो रोकर फरमाया हम भी तुम्हारे पीछे आ रहे हैं ! उसके बाद हजरत हुर्र Hazrat Hurr रजियल्लाहु तआला अन्हु जालिमों के मुतावातिर हमलों से निढाल होकर गिर पडे ! और इमाम को आवाज दी !

हज़रत इमाम आवाज सुनकर दौडे ! और हुर्र को उठाकर लशकर में से ले आये ! जानू मुबारक पर उनका सिर रखकर चेहरे का गर्द व गुबार साफ़ करने लगे !

हज़रत हुर्र (Hazrat Hurr) ने अपनी आंखें खोलीं ! और अपना सिर इमाम के जानू पर देखकर मुस्कराए ! और जन्नत को सिधारे ! इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन (तज़किरा सफा 75 , सिर्रुश शहा दतैन सफा 22 )

सबक :

  1. जिनका नसीब अच्छा हो वह किसी न किसी वक्त गुमराही से निकलकर हिदायत की तरफ़ आ जाते हैं !
  2. हज़रत हुर्र (Hazrat Hurr) रजियल्लाहु तआला अन्हु अपने नाम के मुताबिक वाकई जहन्नम से आजादी हासिल करके जन्नत के मालिक बन गये ! और यह दर्स दे गये कि दुनिया चंद रोजा है !

एक दिन आखिर मरना है ! फिर क्यों न ऐसी मौत मरा जाये जिससे अल्लाह व रसूल खुश हों ! और आकबत दुरुस्त हो जाये !

फिर आज अगर कोई कहलाये हुसैनी और न नमाज पढे ! न दाढी रखे ! भंग पिये, चरस पिये, और बुजुर्गों की तौहीन करे !

गोया कहलाये हुसैनी और काम यजीदियों के करे तो उसके मुतअल्लिक क्यों न कहा जाये ! कि यह हुसैनी लशकर से हटकर यजीदी लश्कर में जा मिला है !

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