जो लोग ताज़ीया शरीफ को मआज़ अल्लाहहराम कहते हैं

जो लोग ताज़ीया शरीफ को मआज़ अल्लाह
हराम कहते हैं
यह उन्की ज़िम्मेदारी है के वो बताऐं के यह कुरआन शरीफ की किस आयत के मुखालिफ़ है
और कोई भी हो
अदना हो या आला
कभी साबित नही कर सकते
ऐसे लोगों के लिए अल्लाह तआला ने कुरआन शरीफ मे आयतें नाज़िल करके इनकी और इनके मकाम की पहचान बता दी है
व मन लम यहकुम बेमा अनज़ला अल्लाहो
फ़ ऊलाएका हुमुल काफ़ेरून ०
और जो अल्लाह के नाज़िल किए पर हुक्म ना करे (यानी अपना हुक्म चलाए) वो लोग काफ़िर हैं
व मन लम यहकुम बेमा अनज़ला अल्लाहो
फ़ उलाएका हुमुल ज़ालेमून ०
और जो अल्लाह के नाज़िल किए पर हुक्म ना करें
(और अपने मनगढ़ंत हुक्म चलाऐं)
वही लोग ज़ालिम है

व मन लम यहकुम बेमा अनज़ला अल्लाहो
फ़ उलाएका हुमुल फ़ासेकून०
और जो अल्लाह के नाजिल किए पर हुक्म ना करे (यानी अपने दुनीयावी इल्म से लोगों को गुमराह करे)
वही लोग फ़ासिक़ हैं

अब फ़ासिकों , ज़ालिमों , काफ़िरों का मकाम ठिकाना ज़हन्नम है

अब चाहे
अदना हो या आला हो जो भी हो और वो अल्लाह के रसूल स.अ.व.के नवासे
मौला अली अ.स.के शहजादे
सैयदा बीबी बतूल स.म.अ. के जिगर के टुकड़े और जन्नत के नौ जवानों के सरदार
इमाम हसन अ.स.के भाई इमाम हुसैन अ.स. जिनकी आल पाक सुलतानुल अज़म ख्वाजा गरीब नवाज़ र.अ.है
यानी हुसैनी निसबत से बनी ताजीयों को
मआज़ अल्लाह हराम कहते
है
और उसे अल्लाह की किताब कुरआन शरीफ़ से अपनी बात को सही साबित नही करते पाते हैं
अगर वो हलाली नुतफ़े से होगें तो ऊपर लिखी आयतों मे खूब गौरो फ़िक्र करके
बारगाह ए पंजतन पाक मे इंशाअल्लाह तौबा कर लेगें
लेकिन जो हराम नुतफें से होगें वो अपनी हठधर्मी मे डटे रहेंगें
अल्लाह तआला ने ऐसे लोगों के बारे मे फ़रमाया है
व जअलना मिम बैने ऐदीहिम सददन व मिन ख़लफ़ेहिम सददन फ़अग़शैनाहुम फ़हुम ला युबसेरून०
और हमने उनके आगे दीवार बना दी और उनके पीछे एक दीवार और उन्हे ऊपर से ढाकं दिया तो उन्हे कुछ नही सूझता
(कि वो कुरआन शरीफ मे अल्लाह के नाज़िल किए हलाल को हलाल समझें और हराम को हराम समझें और अपने मनगढ़ंतं इल्म से
हलाल को हराम और हराम को हलाल न बताऐं )
जो हलाली लोग होगें वो इस पैगाम को पढ़कर गौरो फिक्र कर इस बात के सही या गलत होने की बात ज़रूर लिखेंगे़
ताके लोगों को सही बात मालूम हो सके
और जो हरामी नुतफ़े की पैदाइस वाले होगें
वो ताजिया शरीफ के बारे मे कुछ गलत बोलने के पहले अपने और अपने मकाम के बारे मे सोचने पर मजबूर होगें
हक बात बोलना सिर्फ़ दुनीयावी डिगरी लिए लोगों की जिम्मेदारी नही है
किसी ने हर किसी को इमाम हुसैन अ.स.का पैगाम अपने अशआर मे दिया है के
वो सर कटा के ये पैगाम दे गए हैं हमें
जियो तो हक के लिए
और मरो तो हक के लिए
के मेरे गम मे ना मसरूफ़ बैन हो जाना
अगर कहीं हको बातिल की जंगं छिड़ जाऐ
तो उस मकाम पे तुम भी हुसैन हो जाना

मै समझता हूँ के इस ग्रुप मे सारे मिम्बर सुम्मुन बुकमुन उमयुन शायद नही है
इंशाअल्लाह अपनी अच्छी राय से ज़रूर कुछ ना कुछ लिखेगें
ला इकरा फिददीन
दीन मे कोई जबरदस्ती नहीं

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