शबे आशूरा हज़रत शहरबानो का ख्वाब

शबे आशूरा हज़रत शहरबानो का ख्वाब
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मैदाने करबला में शबे आशूरा ( Shab-E-Ashura ) हज़रत शहरबानो ने एक ख्वाब देखा कि एक नूरानी सूरत मुक़द्दस खातून हैं ! जो बडी परेशान नजर आ रही’ हैं !

करबला की ज़मीन साफ़ कर रही हैं ! हज़रत शहरबानो ने इन मुकद्दस खातून से दर्याफ्त फ़रमाया कि आप कौन हैं ? और इस ज़मी को क्यों साफ़ कर रही हैं ? तो उन्होंने जवाब में फ़रमाया कि :

बेटी सुन मैं फातिमा हू बिन्त शाहे मशरिकैन

सुबह इस मक़तल में लेटेगा मेरा प्यारा हुसैन

इसलिये मैं झाड़ती हूं करबला की यह ज़मीं

उसके ज़ख़्मो में न चुभ जाये कोई कंकर कहीँ

( तनक़ीहुश-शहादतैन सफ़ा 110 )

सबक – हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की शहादत का आपकी वालिदा हज़रत खातूने जन्नत रजियल्लाहु तआला अन्हु को इल्म था !

कब्रे अनवर में तशरीफ़ फरमा होकर भी अपने बेटे के इस इम्तिहान को मुलाहज़ा फरमा रही थीं ! चूंकि मां थी इसलिये अपने लख्ते जिगर के मसाइब (मुसीबतें) से मुतअक्सिर थीं !

फिर जिन जालिमों ने हज़रत इमाम को इस कद्र सताया ! उन्होंने हज़रत फातिमा रजियल्लाहु तआला अन्हु की किस कद्र नाराजगी मोल ले ली

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