ज़िंदा ओ जाविद का मातम नहीं करते

” ज़िंदा ओ जाविद का मातम नहीं करते”

सबसे पहले तो हम ये बतादें की ये शेर उस शख़्स का है जो हुज़ूर अलैहिस्सलाम को तो ज़िंदा नहीं मानता मगर हुसैन ए पाक को ज़िंदा कहकर ये रद्दे राफ़ज़ियत करने की कोशिश में है !

दूसरी बात ये है की ये शायर कहता है की हम ज़िंदा ओ जाविद का मातम नही करते यानी की इस शायर के यहां मुर्दों का मातम होता है क्यों की इसने मातम का इनकार नहीं किया बल्कि ज़िंदा ओ जाविद के मातम का इनकार किया है !

” हमे मातम से क्या लेना देना मातम वालो क्या करते हैं क्या नहीं हमें उनसे ग़रज नहीं हम ग़मे हुसैन के क़ाइल हैं

” और शायर कहता है की रोये वो जो मुनकिर हो शहादते हुसैन के ” ????

तो क्या सैयदना इमाम ज़ैनुल आबेदीन रोकर शहादते इमाम ए हुसैन के मुनकिर हो गए ?
इमाम बाकर इमाम जाफ़र और तमाम अहलेबैत ए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम रोकर शहादते इमाम ए हुसैन ए पाक के मुनकिर हो गए ?

सैयदना मख़्दूम ए पाक किछौछवी
सैयदना वारिस ए पाक मूसवी
सैयदना बाबा फरीरूद्दीन गंजशकर
सैयदना मौलाना शाह नियाज़ बे नियाज़ अल्वी बरेलवी
सैयदना सरकार ए कलां किछौछवी
और बेशुमार औलिया अल्लाह जो मुहर्रम का महीना आते ही रोरोकर बेहाल हुए जाते थे ये सब शहादत ए इमाम ए हुसैन के मुनकिर हो गए ??

याद रखो रद्दे राफ़ज़ियत के चक्कर में दामन ए अहलेबैत तो नहीं छोड़ रहे हो !

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