नमाज़ी के आगे से गुज़रना

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ
नमाज़ी के आगे से किसी का गुज़रना नमाज़ को फ़ासिद नहीं करता चाहे गुज़रने वाला मर्द हो या औरत या कोई जानवर। लेकिन ध्यान रहे नमाज़ी के आगे से गुज़रना बहुत सख़्त गुनाह है।

इसके बारे में कुछ अहादीस यह हैं-

इसमें जो कुछ गुनाह है अगर गुज़रने वाला जानता तो चालीस तक खड़े रहने को गुज़रने से बेहतर जानता। रावी कहते हैं मैं नहीं जानता कि चालीस दिन कहे या चालीस महीने या चालीस बरस।
(सिहा सित्ता)

अगर कोई जानता कि अपने भाई के सामने नमाज़ में आड़े होकर गुज़रने में क्या है तो सौ बरस खड़ा रहना उस एक क़दम चलने से बेहतर समझता।
(इब्ने माजा)

नमाज़ी के सामने गुज़रने वाला अगर जानता उस पर क्या गुनाह है तो ज़मीन में धंस जाने को गुज़रने से बेहतर जानता।
(इमाम मालिक)

नमाज़ी के आगे से गुज़रने के बारे में ज़रूरी मसाइल

मैदान और बड़ी मस्जिद में नमाज़ी के क़दम से “मौज़ा-ए-सुजूद” तक गुज़रना नाजाइज़ है। मौज़ा-ए-सुजूद से मुराद यह है कि क़ियाम की हालत में सजदे की जगह की तरफ़ नज़र करे तो जितनी दूर तक निगाह फैले वह मौज़ा-ए-सुजूद है यानि सजदे की जगह है, उस के दरमियान से गुज़रना नाजाइज़ है।
मकान और छोटी मस्जिद में क़दम से दीवारे क़िब्ला तक कहीं से गुज़रना जाइज़ नहीं अगर “सुतरा” (कोई ऐसी चीज़ जिससे आड़ हो जाये) न हो।
कोई शख़्स ऊँचाई पर नमाज़ पढ़ रहा है उसके नीचे से गुज़रना भी जाइज़ नहीं जबकि गुज़रने वाले के बदन का कोई हिस्सा नमाज़ी के सामने हो छत या तख़्त पर नमाज़ पढ़ने वाले के आगे से गुज़रने का भी यही हुक्म है और अगर इन चीज़ों की इतनी ऊँचाई हो कि गुज़रने वाले के बदन के किसी हिस्से का सामना न हो तो हर्ज नहीं।
नमाज़ी के आगे अगर “सुतरा” हो यानि कोई ऐसी चीज़ जिससे आड़ हो जाये तो उसके आगे से गुज़रने में कोई हर्ज नहीं। “सुतरा” एक हाथ के बराबर ऊँचा और उंगली के बराबर मोटा हो और ज़्यादा से ज़्यादा तीन हाथ ऊँचा हो।
किसी ऐसी खुली जगह पर नमाज़ पढ़ें जहाँ से लोगों के गुज़रने का अंदेशा हो तो मुस्तहब है कि “सुतरा” गाड़ें और “सुतरा” नज़दीक होना चाहिये, और बिल्कुल नाक की सीध पर न हो बल्कि दाहिने या बायें भौं की सीध पर हो और दाहिने की सीध पर होना अफ़ज़ल है।
इमाम का “सुतरा” मुक़तदी के लिये भी “सुतरा” है उसको दूसरे “सुतरा” की ज़रूरत नहीं।
पेड़, जानवर और आदमी वग़ैरा का भी “सुतरा” हो सकता है कि इनके बाद गुज़रने में कुछ हर्ज नहीं मगर आदमी को उस हालत में “सुतरा” किया जाये जब उसकी पीठ नमाज़ी की तरफ़ हो। नमाज़ी की तरफ़ मुँह करना मना है।
नमाज़ी के सामने “सुतरा” नहीं और कोई शख़्स गुज़रना चाहता है तो नमाज़ी को उसे गुज़रने से रोकने की इजाज़त है। इसके लिये या तो “सुब्हानल्लाह” कहे या आवाज़ के साथ क़िरात करे या हाथ, सिर या आँख के इशारे से मना करे इस से ज़्यादा की इजाज़त नहीं। अगर कोई अमल-ए-कसीर हो गया तो नमाज़ ही टूट जाती है।
औरत के सामने से गुज़रे तो औरत तसफ़ीक़ से मना करे यानि दाहिने हाथ की उंगलियाँ बायें हाथ की पीठ पर मारे।
मस्जिदे हराम शरीफ़ में नमाज़ पढ़ता हो तो उस के आगे तवाफ़ करते हुये लोग गुज़र सकते हैं।
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