ला इकरा फिददीन दीन मे कोई जबरदस्ती नही है

सिर्फ जिंदा दिल, हक हज़म करनेवाले, हलाली यो के लिए वालोला इकरा फिददीनदावा ए खिलाफत
बा सनद मी बायद
मनकुन तो हदीस ए नबवी.
मी बायद ईं जाए, निफ़ाक, व मुनकिर, व खायन, नेस्त ईं मंज़िल ए असद अली मी बायद खिलाफत का दावा सनद की बुनियाद पर किया जाए इस सिलसिले मे हदीस ए गदीर, मन कुन तो मौला फा हाज़ा अलीयुल मौला के समझने की ज़रूरत है यह मकाम ए खिलाफत निफ़ाक़,व,मुनकिर,व, खायन वालों के लिए नहीं है यह शेरों का मकाम है और इस पर शेरे खुदा हैदर मौला अली इब्न अबू तालिब अ.स. बाद ए रसूल अल्लाह स.अ.व. हैं (इसकी सनद सिलसिले का सजरा शरीफ है के अल्लाह के रसूल हजरत मोहम्मद स.अ.व. के नाम के बाद आपके जाँ नसीन ,सज्जादा नसीन खलीफा हजरत मौला अली इब्न अबू तालिब करमअल्लाह वज्ह का नाम ए पाक लिखा है जिसका हम विर्द करते हैं) जैसे फरमान ए रसूल अल्लाह है
हज़रत मोहम्मद स.अ.व. ने गदीर ए खुम मे ऊँटों के पालान से बने यादगार मिम्बर से मौला अली इब्न अबू तालिब का हाथ अपने हाथों से उठा कर सवा लाख सहाबीयो को खिताब फरमाया
मै जिसका मौला हूँ अली इब्न अबू तालिब उसके मौला हैंमजमूआँजिसने भी दिलो जान से हजरत मोहम्मद मुस्तफा स.अ.व. को अपना मौला माना या मान रहे हैं या मानेगें
कौल ए रसूल स.अ.व. के मुताबिक उन सब के मौला अली इब्न अबू तालिब अ.स. थे और हैं और रहेंगें
और जिन्होने रसूल अल्लाह स.अ.व. को दिलो जान से मौला नही सिर्फ ज़बान से दिखावा करा वही लोग
मौला अली अ.स. से अपने दिल मे बुग़्ज़ इनाद रखते थे रखते हैं और रखेंगें
और ऐसे लोगों की मुनाफकत दुनीया मे ही ज़ाहिर हो जाती है जो भी लोग मौला अली इब्न अबू तालिब अ.स. के मरतबे, म़ंजिलत, के मुकाबले मे दूसरों की झूठी मंजलत बताने की कोशिश करते हैं और ज़िक्रे मौला अली अ.स. के मुकाबले मे दूसरों के ज़िक्र को तरजीह देने लगते हैं तो उनकी मुनाफ़ेकत ज़ाहिर हो जाती है
और फिर कौल ए रसूल अल्लाह स.अ.व. समझने की ज़रूरत है
हजरत मोहम्मद नूर ए खुदा स.अ.व. ने फरमाया ऐ अली अबू तुराब तुझ से सिर्फ हलाली मोहब्बत करेगा और हरामी तुझ से बुग़्ज़ इनाद रखेगा
क्यों कि अल्लाह तआला ने अपने महबूब और उनकी आल पाक से बुग़्ज़ इनाद रखने वालो को, हरामी, कहा है
उतुल्लिन बादा ज़ालेका ज़नीन० उसकी पैदाइस ज़िना से है यानी हरामी है किसी ने इसे अपने अश्आर मे यूँ कहा है बुग़्ज़े पंजतन खामीए खिलक़त की अलामत हम से ना उलझ माँ की ख़्यानत का गिला कर
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कुफ़्र दर दिल बर ज़बाँ अल्लाहो अकबर दाशतन, आल ए अहमद कुशतन व हम हुब्बे हैदर दाशतन
मर मरा बावर ना मै आयद ज़े रूऐ अएतेक़ाद, हक के ज़हरा खूरदन व दीन ए प्यमबर दाशतनदिल मे कुफ़्र रखना और ज़बान से अल्लाह अकबर कहना और आल ए अहमद स.अ.व. को कत्ल करना और मौला अली हैदर अ.स. से मोहब्बत ज़ाहिर करना मै परेशान हो जाता हूँ और यक़ीन नही आता है और तआज्जुब होता है के सैयदा बीबी ज़हरा स.म.अ. का हक (जागीर ए फिदक) मार देना और पैगम्बर हजरत मोहम्मद स.अ.व. के दीन मे भी काइम रहनामजमुआसैयदा बीबी स.म.अ. जिनकी ताज़ीम के लिए इमामुल अंबीया स.अ.व. खड़े होते हों जिन्हें रहमतललिल आलमीन स.अ.व. उम्मे अबीहा कह कर मुखातिब करतें हो जिनके दरवाजे पर
आयत ए ततहीर नाजिल होने के बाद से रोजाना नमाज ए फज्र पढ़ाने से पहले दर ए सैयदा बीबी ज़हरा स.म.अ. मे बा आवाज बुलंद सलाम पेश करते हों
खातून ए कयामत यानी आखरत की मलका
खातून ए महशर
यानी महशर की मलका
खातून ए जन्नत
यानी जन्नत की मलका
को दुनीयावी खिलाफत के दरबार मे खड़ा रखा गया और वहाँ मौजूद लोग खुद बैठे रहकर कितनी बड़ी बे आदबी की है जिसको सुनने के बाद ईमान वालों की रूह काँप जाती है और सैयदा ए काएनात से गवाह मागें गएपहले गवाह
अमीरुल मोमनीन
इमामुल औलीया
मौला ए काएनात अली इब्न अबू तालिब अ.स. जिनकी गवाही नही मानी गई मै आपके सामने दो बातें लिख रहा हूँ दोनो मे कौन सी बात सच है अब बहुत दिल साफ रखकर बहुत ईमानदारी से बहुत गौरो फ़िक्र करके बतलाइए, समझिए।1- कि मशहूर हदीस है हजरत आएशा र.अ. फरमाती हैं के बज़्मे मोहम्मद मुस्फता रसूल अल्लाह स.अ.व. मे मेरे वालिद अबू बक़्र बैठे हुए हजरत अली इब्न अबू तालिब (वज़्ह अल्लाह) के चहरा ए अनवर की तरफ देख रहे हैं मैने अपने वालिद से पूछा जब उस बज़्म मे अल्लाह के रसूल स.अ.व. मौजूद थे उसके बावजूद आप अली इब्न अबू तालिब के चहरे को देख रहे थे मेरे वालिद अबू बक्र ने कहा ऐ आयशा अल्लाह के रसूल स.अ.व. ने फ़रमाया है कि अली इब्न अबू तालिब का चहरा देखना इबादत है और मै तो इबादत कर रहा था2- और जागीर ए फ़िदक के मामले मे
सैयदा ए कायनात के गवाह मौला ए कायनात की गवाही को ना मानना
जिसका चहरा देखना इबादत बताने वाले और उसी कि गवाही ना मानना
कुदरत ऐसे ही इमतेहान लेती है के आप किसी को दिल से मानते हैं या ज़बान से वकती दिखावे के लिए
सैयदा ए कायनात स.म.अ. के दूसरे गवाह जन्नत के नौ जवानों के सरदार हसनैन करीमैन अ.स.1- एक और ऐसी ही बात बहुत मशहूर है के अब्दुल्ला बिन उमर बचपन मे हस्नैन करीमैन के साथ खेल रहे थे
बात बात इमाम हुसैन अ.स. ने अब्दुल्ला बिन उमर को कहा तू हमारा गुलाम जादा है उन्हे यह बात बुरी लगी और उन्होने अपने वालिद हजरत उमर बिन खित्ताब से इसकी शिकायत की जब हजरत उमर को यह बात मालूम हुई तो उन्होने इमाम हुसैन अ.स. के पास जाकर अर्ज किया की आपने मुझे अपना गुलाम कहा है इसे लिख दीजीए
और फिर वसीयत की जब मेरा इंतकाल हो तो इस गुलामी की सनद को मेरे सीने मे रख देना मै बारगाह रब्बुल आलमीन मे पेश कर अपनी बख्शिस का तलबगार रहूँगा2- जागीर ए फिदक मे इन जन्नत के सरदारों अ.स. की गवाही नही मानी गयी दरबार मे हजरत उमर बिन खित्ताब खिलाफत के बायें हाथ भी वहाँ मौजूद रहे अब कौन सी बात सही है फरमान ए रसूल अल्लाह स.अ.व. के फरमान के मुताबिक यह ना देखो के कौन बोल रहा है बलके यह देखो के क्या बोल है
हक या बातिल
सच या झूठ
अच्छा या बुरानोट:- दुनीया मे हर मामले मे सुममुन, बुकयुन, उमयुन, यानी आँख होते हुऐ अंधे मत बने रहिए, कान होते हुए बहरे मत बने रहिए, ज़बान होते हुए गूँगे मत बने रहिए, हक देखिए, हक सुनीए, और हक बोलिए और कुरआन की आयत के मुताबिक हक बोलीए, हक को मत छुपाइए और हक को बातिल से मत मिलाइए, जैसे नूर और ज़ुल्म बराबर नही होता रौशनी और अधेंरा बराबर नही होता, हक और बातिल बराबर नही होता, सच्चा और झूठा बराबर नही होता, तैयब और खबासत बराबर नही हो सकते, आँख वाला और अंधा बराबर नही हो सकता, हलाल और हराम बराबर नही हो सकता, हलाली और हरामी बराबर नही हो सकते ऐसे ही असहाबुल जन्नत
और असहाबुन नार बराबर नही हो सकते यानी जन्नती सहाबा और दोज़खी़ सहाबा बराबर नही हो सकते
ला यसतवी असहाबुन नारे व असहाबुल जन्नता असहाबुल जन्नता हुमुल फाएजून और जन्नती सहाबी अपने मकाम पर फाइज़ है मै हजरत नियाज़ अहमद चिश्ती के इन अशआर के सदके जाऊँ नियाज़ अंदर क्यामत बे सरो सामाने ख़्वाहिस शुद के अज़ हुब्बो तवललाए आली दारे तो सामाने
सरकार फरमाते हैं ए नियाज बरोज ए महशर मे बारगाह रब्बुल आलमीन मे पेश करने के लिए सिवाए मौला अली अ.स. की मोहब्बत के अलावा और कोई सामान नही है मेरे पास जो कुछ है वो मौला अली अ.स. की मोहब्बत है
हजरत हुसैनी लाल शाहबाज कलंदर र.अ. फरमाते हैदरियम, कलंदरम, मस्तम, बंदा ए मुर्तज़ा, अली हसतम,
मै हैदरी हूँ, मैं कलंदर हूँ, मैं मस्त हूँपेशवा ए तमाम रिन दानम, के सगे कोए शेर यज दानम, मैं रिंदों का पेशवा हूँ, और मौला अली शेरे खुदा की गलीयों का कुत्ता हूँ, गैर हैदर अगर हमीं दानम, काफ़िरियम, यहूदो, नसरानम।
अगर मै मौला अली के अलावा किसी और जानू मानू तो मै काफिर हुँ नसरानी हूँ यहूदी हूँजब आल पाक का यह आलम है तो हम गुनाहगारों की क्या औकात है
हाँ इनकी गुलामी पे नाज हैदुनीया मे मौला ने जो अपना बनाया है
महशर मे भी कह देंगे ये हैं मेरे दीवाने
हम तेरे इकबाल से चलते हैं सीना तान कर नाज आ जाता है हमको तेरा कहलाने के बाद समझा जो समझा कोई भी पैगाम या तो आदमी पढ़कर या सुनकर या सोहबत मे रहकर हासिल करता है और अपने मौलाई गुलामो को पहुँचाता है और हमे ये पैगाम आले नबी औलाद ए अली
जाने हसनैन करीमैन जिगर गोसा ए बतूल ख्वाजा ए ख्वाजगान सैयद मूईनुददीन हसन संजरी चिश्ती सुम्मुल अजमेरी र.अ. का फैज ए करम से,ला इकरा फिददीन
दीन मे कोई जबरदस्ती नही है,

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