वाक़िआ बाबा फरीद गंज ए शकर रहमतुल्लाह अलैह और एक मौलवी साहब का

वाक़िआ बाबा फरीद गंज ए शकर रहमतुल्लाह अलैह और एक मौलवी साहब का !बाबा फरीद के पास अक्सर एक मोलवी साहब आया करते और अपने इल्म के गुरूर में आप को वो हल्के में लेता और आपके सामने सीना तानकर बैठता और मसले – मसायल में छेड़ – छाड़ किया करते एक बार मोलवी साहब आए तो बाबा फरीद ने मोलवी साहब से सवाल किया कि बतावो मोलवी साहब इस्लाम के कितने अरकान है मोलवी साहब ने फरमाया 5 है ईमान, नमाज़, रोज़ा, जकात हज, बाबा फरीद ने फरमाया मैंने सुना है कि एक रुक्न और है और वो है रोटी ।
मोलवी साहब गरजते हुए बोले वाह पीर साहब वाह क्या नई बात फरमाये हैं आज तक किसी भी किताब में न देखा ना सुना फिर मोलवी साहब कुछ बड बड़ाते हुए उठकर जाने लगे तो बाबा फरीद ने कहा देखियेगा कहीं मिल जाए किसी किताब में तो, लेकिन मिलेगी ज़रूर।
कुछ दिनो बाद मोलवी साहब हज में चले गये और वो वहाँ 8-10 साल रहे खूब इबादतें की रोज़े रखे नफिल नमाज़ पढ़ी अब वापसी का इरादा किया इतेफ़ाक से जहाज डूब गया जिसमें मोलवी साहब सवार थे जहाज़ का एक हिस्सा इसके हाथ लगा लकड़ी के एक पल्ले के सहारे टापू तक पहुंचे तब इनके जान में जान आई अब भूख की सिद्दत मे परेशान हो गए खूब अल्लाह से दुआ करते रोते गिड़गीड़ाते,, अल्लाह की कूदरत देखिए उस टापू मे एक आदमी सिर पर टोकनी रखे हुए हैं और वो रोटी बेच रहा है रोटी वाले को मोलवी साहब ने पास बुलाया और कहा रोटी मुझे दो उसने पैसा मांगा तो मोलवी साहब ने कहा मेरे पास नहीं है मै परेशान हूँ भूखा हूँ भूखे को खाना खिलाना सवाब है रोटी वाले ने कहा वो सब ठीक है लेकिन ऐसे करूँगा तो मेरे बच्चे भूखे रह जाएंगे मै सिर्फ इतनी ही रोटी बेचता हूँ लेना है तो लो वर्ना मै चला मोलवी साहब गिड़गीड़ाने लगे तब रोटी वाले ने कहा – हाँ सिर्फ़ एक शर्त में रोटी दे सकता हूं मोलवी साहब ने कहा क्या शर्त है रोटी वाले ने कहा कि आप अपने उमर भर की नमाज़ का सवाब दे दो मोलवी साहब ने मज़बूरन सब नमाज़ का सवाब दे दिया दूसरे दिन यही हाल फिर हुआ इस दिन पूरे रोज़े का सवाब फिर इसी तरह मोलवी साहब ने पूरी ज़िंदगी की नेकियाँ दे दी अब सिर्फ मोलवी साहब के पास ईमान बचा अब रोटी बेचने वाले ने कहा कि ये सब मुझे एक कागज़ पर लिख कर दे दें मोलवी साहब ने सारी नेकियाँ लिखकर दे दीं वो रोटी बेचने वाला थोड़ी देर बाद नज़रों से ओझल हो गया दूसरे दिन ताज़ीरो का एक काफिला ज़हाज़ से जा रहा था मोलवी साहब ने चिल्ला चिल्ला कर अपने अमामे के इशारे से उन्हे बुलाया जब उनकी नज़रें मोलवी साहब पर पड़ी तो कुछ लोग छोटी सी कश्ती में सवार होकर मोलवी साहब के पास आये तो कुछ लोगों ने मोलवी साहब को पहचान लिया कि ये तो हमारे गांव के मोलवी साहब है खैर किसी तरह इन लोगों ने इन्हें पार् लगाया अल्लाह – अल्लाह करते ये घर पहुंचे दूसरे दिन मोलवी साहब बाबा फरीद के पास पहुंचे आप ने मोलवी साहब को देखते ही मुस्कुराये और फरमाया कि आप का हज कैसा रहा खैरियत तो है फिर बाबा फरीद ने पूछा कि मोलवी साहब मैंने आप से इस्लाम का एक रुक्न रोटी के बारे में पूछा था क्या वो कहीं मिला उसने कहा नहीं। तब बाबा फरीद ने कहा मैंने तो सुना था मगर ये बात मुझे लिखी हुई भी मिली तब मोलवी साहब ने हैरत का इज़हार करते हुए वो तहरीर देखने की ख्वाहिश जाहिर की बाबा फरीद ने खादिम से कहा वो तहरीर लाओ तहरीर लाया गया जिसमें मोलवी साहब ने रोटी के बदले अपनी पूरी नेकियाँ तहरीर करके रोटी बेचने वाले को दे दी थी अब मोलवी साहब ने अपनी वो तहरीर देखी तो बाबा फरीद के कदमों में गिर गए और अपनी गुस्ताखी की माफी तलब की । इससे ये जाहिर होता है कि हमेशा बुज़ुर्गों के सामने अपने इल्म का रौब नहीं झाड़ना चाहिए वर्ना दीन व दुनिया व आखिरत बर्बाद हो सकती है।
*हक़ फरीद या फरीद*

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