नमाज़ और सलात के फर्क को

आइये आज समझते हैं नमाज़ और सलात के फर्क को…
आसान भाषा में सलात दर्शन है और नमाज़ प्रदर्शन है…
असल में सलात के मानी दर्शन के हैं.. दीदार.. तसव्वुर के हैं….. सलात कायम हो जाती है और नमाज़ पढ़ी जाती है… सलात में अपने गुरु का दर्शन हर समय है और ये चौबीस घंटे कायम रहती है.. गुरु का चेहरा हर वक़्त आँखों में बसा हुआ होता है जो गुनाहों से रोकता रहता है और अच्छे कामों के लिए निरंतर प्रेरित करता रहता है….. कोई ऐसा इंसान जिसने वक़्त के मोहम्मद यानी कामिल मुर्शिद यानी असली गुरु को आँखों और दिल में बसा लिया तो समझ लीजिये कि उसकी सलात कायम है लेकिन जिनके दिल और आँखों में कोई सूरत नहीं होती और वो बिना देखे गए अल्लाह के लिए नमाज़ पढ़ते हैं उन्हें क्या मिलेगा?? जिसको देखा ही न हो उसकी क्या कोई तारीफ़ करेगा और कैसे करेगा?? मोलवी साहब सलात को समझ ही नहीं पाए और उन्होंने बता दिया कि सलात का मतलब नमाज़ है और ये सिर्फ अल्लाह के लिए पढ़ी जायेगी और वो पढ़ रहे हैं… कोई दर्शन नहीं और कोई मार्गदर्शन नहीं… सब कुछ ख्वाबो ख़याल में है कि ऐसा होगा वैसा होगा….
जो मैं सर ब सजदा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा..
तेरा दिल तो है सनम आशना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में..

अल्लामा इकबाल…

इस शेर में सलाती और नमाज़ी दोनों को समझिये..
अरबी का लफ्ज़ है सलात .. इसको फ़ारसी में नमाज़ और दुरूद कहा जाता है और इसीलिए नमाज़ लफ्ज़ कुरान में नहीं है कहीं भी… दुरूद नमाज़ से अफज़ल है… और दुरूद बिना दर्शन के पेश नहीं किया जा सकता क्यूंकि जिसे कुछ पेश किया जाता है उसका आँखों के सामने मौजूद रहना अनिवार्य है.. कोई भी चीज़ किसी को हवाओं में नहीं पेश की जा सकती है… और अल्लाह को किसी ने कभी इसलिए नहीं देखा क्यूंकि वो शख्स नहीं बल्कि ज़ात है… अब ऐसे में हमें अल्लाह की सबसे आला ज़ात में मौजूद उसकी सबसे ख़ूबसूरत ज़ात को पहचानना है और उस ज़ात का नाम मोहम्मद है जो हुज़ूर के बाद से अब तक चली आ रही है… और उन पर ही सलात कायम करनी है और ये सलात तब कायम होगी जब आप उनसे जुड़ कर मुसलमान से मोहम्मदी हो जायेंगे…
सलात को हिंदी में समझने की ज़रुरत है.. सलात की मीनिंग हिंदी में दर्शन है और दर्शन के दो अर्थ होते हैं.. एक तो है दीदार.. वो दीदार चाहे आँखों के सामने मौजूद गुरु का हो या फिर गुरु के दूर होने पर उनके तसव्वुर में होने वाला दीदार हो… कुल मिला के गुरु से खाली नहीं रह सकता असली भक्त… वो चाहे दूर हों या पास हों.. इससे कोई भी फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि उसका अपने गुरु पर दर्शन यानी सलात कायम है.. दर्शन की दूसरी मीनिंग है फलसफा यानी फिलासफी … तो जिसकी सलात कायम है वो दर्शनार्थी भी है और दार्शनिक भी है… दीदार का तालिब भी है और फलसफी यानी फिलासफ़र भी है…
मार्गदर्शन केवल उनका होता है इस दुनिया में जिसने देखे गए अल्लाह के सबसे सुन्दर रूप यानी रब यानी मार्गदर्शक के क़दमों में सर झुका के दर्शन कायम कर लिया… और जिन्होंने अनदेखे अल्लाह के लिए नमाज़ पढ़ी उनको कभी कोई दर्शन नहीं हो सकता… वो न अल्लाह की ज़ात को समझ सकते हैं न मोहम्मद की ज़ात को.. जब ये गुनाह करेंगे तो इन्हें कभी भी अल्लाह रोकने टोकने नहीं आएगा इसलिए ये मार्गदर्शन से वंचित रह कर पूरी ज़िन्दगी सिर्फ गुनाह में डूबे रहेंगे इस उम्मीद पर कि गुनाह माफ़ हो जायेगे और मोहम्मद उनकी सिफारिश करेंगे अल्लाह से मर के आसमान पहुँचने पर….
सलात यानी दर्शन महसूस करने की चीज़ है दिखावे की नहीं.. मेरे तसव्वुर में इस वक़्त कौन है और उनसे मैं और वो मुझसे क्या क्या बातें कर रहे हैं ये कोई नहीं समझ सकता… ये वो छुपा हुआ ज़िक्र और छुपी हुई इबादत है जो हर वक़्त मोमिन करते रहते हैं… सलात ही मोमिन की मेराज है. यानी जिसने सलात कायम कर ली वक़्त के मोहम्मद पर उसकी मेराज हो गयी यानी अब उसका जीवन का उद्देश्य पूरा हुआ… सलात को दिखाया नहीं जा सकता इसलिए मुल्ला ताना देता है कि ये शख्स नमाज़ नहीं पढ़ रहा है इसका ठिकाना जहन्नम है जबकि इस बेवकूफ को ये नहीं मालूम कि जहन्नम तो उसका ठिकाना तय हो चुका है क्यूंकि वो न रब को समझा और न सलात को…. उसको कैसे दिखाया जाए कि हम सलाती हैं या बे सलाती .. उसको तो प्रदर्शन चाहिए.. दर्शन से उसका क्या वास्ता… उसे तो दिखावा यानी रियाकारी चाहिए.. वो खुद ही अल्लाह मियाँ बना जा रहा है कि किसी को देख के समझ जाता है कि इसके दिल में क्या है और खड़े खड़े फैसला भी सुना देता है अल्लाह बन कर कि कौन जन्नत में जाएगा कौन जहन्नम में जबकि अपने आमाल और जन्नत दोज़ख की उसको खबर नहीं है…
जिनके दिलों में अपने सनम यानी अपने रब की मूरत है और वो जानते हैं कि ये मोहम्मद हैं वक़्त के.. उनको इस नमाज़ में क्या मिलेगा जिसमें कोई तसव्वुर ही न हो.. उस अल्लाह को ये रब कहते हैं जिसको किसी ने कभी देखा नहीं और जिसने आ कर कभी किसी की रबूबियत यानी मार्गदर्शन ही न किया हो… उस अल्लाह का क्या अहसान जिसने अच्छा बुरा न सिखाया हो ऊँगली पकड़ कर… जिसने सब कुछ किया सामने आ कर और ज़िन्दगी जीने का सलीका सिखाया.. अल्लाह की पहचान बतायी… अल्लाह से मुलाक़ात कराई.. उसका एहसान न मान कर अल्लाह का एहसान मानने वाले लोग ही नमाज़ पढ़ सकते हैं स्वरचित अल्लाह के तसव्वुर में.. मोमिन का इनसे क्या वास्ता???
अब एक ख़ास बात और समझ लीजिये प्रदर्शन के बारे में.. प्रदर्शन मुसलमान जब करते हैं तो ये नमाज़ कहलाती है.. मुल्ला जी को अगर आप सर्टिफिकेट नहीं देंगे नमाज़ पढ़ के तो वो आपको जीने नहीं देंगे क्यूंकि उनकी रोज़ी रोटी आपसे जुडी है.. अगर आप मस्जिद नहीं आयेंगे तो फिर माल कौन देगा… फिर तनख्वाहें कैसे मिलेंगी.. इसलिए वो तो जान ले लेंगे या दे देंगे अगर आप नमाज़ पढने नहीं आये.. घर में पढने की इजाज़त मुल्ला जी क़यामत तक नहीं दे सकते क्यूंकि आप घर में पढ़ लेंगे तो मस्जिद का चन्दा कौन देने आएगा.. इसलिए जमात के साथ पढ़िए आ के….प्रदर्शन करिए अपनी इबादतों का.. दुनिया को दिखाइये.. रियाकारी कीजिये…. प्रदर्शनकारी बनिए….
लेकिन मोमिन भी प्रदर्शन करता है और उसका प्रदर्शन है ताजियादारी.. ये वो खुले आम करता है… ताजियादारी एक विरोध प्रदर्शन यानी एहतिजाज का नाम है… और ये विरोध प्रदर्शन मोमिन १४०० साल से कर रहे हैं और इस विरोध प्रदर्शन को बंद करने के लिए मुल्ला १४०० साल से जान दिए दे रहा है कि ये प्रदर्शन न करिए.. ये विरोध न करिए.. भूल जाइए कर्बला और साबरीन के कातिलों को .. ये गुनाह है.. ये शिर्क है.. ये कुफ्र है… मोमिन भी नक्कारों और ढोल की चोब पर कहता है कि हुसैन ज़िंदा हैं.. हुसैन ज़िंदा हैं… तो इसको मौत आ जाती है.. ये सोचने लगता है कि अगर फ़ौरन इसका विरोध न किया तो इसके आकाओं और इसके उन पूर्वजों जिन्होंने हुसैन पर कुफ्र का फतवा दिया था और उनके क़त्ल का हुक्म दिया था उनके चेहरे नंगे हो जायेंगे.. इसलिये इस प्रदर्शन को फ़ौरन बंद कराओ…
नमाज़ के प्रदर्शन और ताजियादारी के प्रदर्शन .. दोनों प्रदर्शनों में कितना फर्क है ये सोचिये….
मैं नमाज़ पढूंगा या नहीं पढूंगा इसका फैसला मुझे करना है मुल्ला जी को नहीं… सिर्फ नमाज़ में इनको इतना इंटरेस्ट क्यूँ है.. नमाज़ पढो.. नमाज़ कायम करो.. ये वाले पोस्टर छपवा के गली गली तो लगवा दिए मुल्ला ने लेकिन सलात न समझा.. सलात इसलिए नहीं समझा क्यूंकि दीन की बुनियाद कलमा को ही न समझा और आसमानी अल्लाह को सजदा करा रहा है जबकि शैतान के बारे में बता रहा है कि वो इसलिए शैतान हो गया क्यूंकि उसने आदम का सजदा नहीं किया था…. पोस्टर तो ये छपने चाहिए कि कलिमा सीखो और सिखाओ.. जब तक कलमा नहीं सीखोगे तब तक आसमान के अल्लाह को देखने के लिए आसमान की तरफ ताकते रहोगे.. और जिस दिन कलमा सीख लोग उस दिन निगाहें आसमान से हट कर ज़मीन पर आ जायेंगी और नीचे देख के चलना सीख लोगे.. नीचे मौजूद अल्लाह की मखलूक से मोहब्बत करने लगोगे.. नीचे मौजूद मोहम्मद की ज़ात को पहचान के उसको अपना रब मान कर उनकी रबूबियत यानी मार्गदर्शन हासिल करोगे और ये दुनिया खुद ब खुद जन्नत बन जायेगी.. इसके लिए मर के ऊपर आसमान में जन्नत पाने की तलब न रह जायेगी….
मुल्ला से जब पूछो कि मुहर्रम में ताजियादारी और ढोल न करें तो क्या करें.. ढोल तो इसलिए हम बजा रहे हैं क्यूंकि यजीद और उसके बाप के मुंह पे जूता मार रहे हैं कि देख लो कि हुसैन ज़िंदा हैं.. नक्कारे की चोब पर हम बताते हैं कि हुसैन ज़िंदा हैं.. तुम मर गए और तुम्हारी औलादें मर गयीं लेकिन हुसैन ज़िंदा हैं…. इसमें इनके सीने में आग लग जाती है क्यूंकि ये सब यजीद के बाप के ही तैयार किये गए जन्नत के एजेंट हैं…. मुल्ला बताता है कि मुहर्रम में उनके लिए दुआ करिए कि अल्लाह उन्हें आला से आला मक़ाम अता करें.. उनके लिए नमाज़ पढ़ के दुआ कीजिये कि उनको रहमत और बरकत मिल जाए जो रुकी हुई है १४५० साल से.. इब्राहीम और उनकी आल को तो मिल गयी मगर उनको नहीं मिली है इसलिए पहले उन्हें रहमत बरकत दिलाइये.. फिर कुरान पढ़ के उनको बख्शिए ताकि उनकी रूह को सुकून मिले… और जब हम सब मोमिन भी यही कुफ्र करने लगें तब मुल्ला जी को लगेगा कि हाँ आज ये लोग असली मुसलमान हुए और माशाल्लाह माशाल्लाह कह के हमारा माथा चूमने के लिए लपकेगा….
मुल्ला ताजियादारी के तौर पे किये जा रहे विरोध प्रदर्शन का तो विरोध कर रहा है लेकिन मुहर्रम के खिचड़े.. बिरयानी.. ज़र्दा का कोई विरोध नहीं कर रहा है.. दाब के खाता है… अगर अपने असली बाप की औलाद है और ताजियादारी को तूने हराम कहा है तो कभी हाथ न लगाना मोमिनो के खाने पर.. तेरे हाथ और मुंह में कोढ़ हो जाए अगर तू इसको छुए या खा ले…
और सारे मोमिन तय कर लें कि खाना अगर बच जाए तो जानवरों को खिला दें उनको क़सम है उनके रब की मगर उसको न खिलाएं जिसने ताजियादारी का विरोध किया है.. अगर उनको खिला दिया तो आपने बहुत बड़ा जुर्म कर दिया…. जानवर खा लेगा तो सुकून रहेगा मगर ये जानवर न खा पाए…
ताजियादारी का विरोध करने वाले आपको सिर्फ मुल्ला मोलवी में ही नहीं मिलेंगे बल्कि अपने घर परिवार और दोस्तों में भी मिलेंगे.. जब भी कोई नज़र पेश करें आप पंजतन या कर्बला के साब्रीन के लिए उसमें इन लोगों को एक दाना भी नहीं खिलाना है आपको.. गरीबों को बंटवा दीजिये वो सबसे अच्छा रास्ता है.. और सिर्फ उसको खिलाइए जो पंजतनी हैं.. जो अहले बैअत हैं.. ये उनका हक है… सबका हक नहीं है इस नज़र पर… ये कोई शादी या बर्थडे की पार्टी नहीं है जिसमें सब को दावत दी जाए और व्यवहार निभाया जाये..
जिसके पास अनुवाद वाला कुरान है वो उसको खोल के बैठ जाए .. ये सूरह बक़र की आयत नंबर ४३ है… व अकीमुस सलाता व आतुज़ ज़काता व अरकउवा मा अर राकईन…. इसका मतलब ये है कि सलात कायम करो और ज़कात जारी करो… और झुका करो झुकने वाले के साथ…
अये दुनिया के हर मज़हब हर ज़ात हर कौम में मौजूद मोमिनो यानी प्रेमियों अपने माली का पैगाम सुनो… वो रहमतुल लिल आलमीन माली ये हुक्म दे रहे हैं कि सब से पहले तो वक़्त के मोहम्मद के क़दमो में सर झुका के अपना अहंकार और हसद फना कर दो.. फिर उस मोहम्मद को अपना रब मान कर उनके चेहरे को अपनी आँखों और रूह में बसा लो.. एक पल को भी तुम उनसे गाफिल न हो सको.. और जब ऐसा होगा तो उनका मार्गदर्शन जारी रहेगा.. जब भी गुनाह करने चलोगे तो वो रोक देंगे और सीधी सरल और नेक राह दिखाएँगे… इस मार्ग पर चल कर तुमको हर पल नए नए ज्ञान मिलेंगे क्यूंकि अभी तक तो तुम किताबों में उलझे रहे तो ज्ञान तो मिलने से रहा क्यूंकि मोहम्मद ने दुनिया को भटकने से बचने के लिए किताबों का काम ही ख़त्म कर दिया था और मोहम्मद को ज़ात बना के पेश कर दिया था इस हुक्म के साथ कि ये बोलते हुए कुरान हैं.. ये सिखाने वाले कुरान हैं….
और जब तुम्हारी सलात यानी दर्शन कायम हो जाए इन पर तो इनसे जो इल्म मिले उस इल्म की ज़कात बाँट देनी है…. यानी सौ में साढे सत्तानवे उन लोगों पर लुटा देना है जो ईमान वाले हैं यानी प्रेमी…. और साफ़ साफ़ कहा जा रहा है कि जो भी तुमसे झुक के मिले उससे तुमको भी झुक के ही मिलना है…. ज़रा भी तकब्बुर या अकड या घमंड तुम में होना नहीं चाहिए…. वरना फिर ये सलात और ज़कात का मजाक है….
अब वक़्त के दज्जालों ने इस पर क्या काम लगाया वो समझिये… अकीमुस सलात का मतलब है सलात कायम करो… और कायम सिर्फ दीदार होता है उसके सिवा कुछ नहीं… हिन्दू भाई भले ही पत्थर के देवताओं पर सलात कायम करे हुए हैं वो अलग बात है लेकिन सलात वही है कि जब वो पूजा अर्चना कर रहे हों या मन में प्रभु को याद कर रहे हों तो उनके जहन में एक तस्वीर होती है.. लेकिन मोहम्मद ने जो कांसेप्ट दिया वो ये है कि हमें ज़िंदा सामने मौजूद वक़्त के मोहम्मद के किरदार को आँखों में बसाना है.. उनकी सूरत को आँखों में बसाना है.. अगर किरदार नहीं है तो वो दो कौड़ी का है चाहे जितना बड़ा दावा करने वाला हो….
अकीमुस सलात यानी दर्शन कायम करो… और इस आयत में सलात के मानी नमाज़ कर दिए कि नमाज़ पढो… और फिर अगली लाइन आतुज़ ज़कात.. यानी जो इल्म हासिल हुआ इस सलात से उसकी ज़कात अदा करनी थी लेकिन इस ज़कात को टैक्स वाली ज़कात बना दिया.. आज के ज़माने में हम मार्च के महीने में इनकम टैक्स अदा करते हैं.. पूरे साल की हमारी इनकम काउंट होती है और फिर उस पर इनकम के हिसाब से अलग अलग स्लैब में टैक्स देना पड़ता है और जो न अदा करे उसपर लीगल एक्शन होता है.. तो आज से 1400 साल पहले रुपया पैसा नहीं बल्कि सोना देखा जाता था कि किसके पास कितना है और उस सोने पर ढाई परसेंट टैक्स का हुक्म हुआ खलीफाओं के ज़माने में… अब हम हिन्दुस्तानी भारत सरकार को भी टैक्स दें और फिर जो कसर रह जाए वो मुल्ला जी को भी ज़कात दें… यानी हम डबल टैक्स देते रहें.. कुछ सालों के बाद पूरा सोना ज़कात में ही निबट जाए…
अगर तुम अकीमुस सलात में सलात लफ्ज़ के माने बदल के फ़ारसी का लफ्ज़ नमाज़ कर रहे थे तो तुम्हें उस नियम के हिसाब से अगली लाइन आतुज़ ज़कात में ज़कात लफ्ज़ को भी फ़ारसी के लफ्ज़ में बदल देना चाहिए था.. मगर मुजरिम चाहे जितना बड़ा हो अपने जुर्म के सुबूत छोड़ जाता है…. यहाँ गच्चा खा गए…. लफ्ज़ बदलते तो दोनों बदलते.. एक ही क्यूँ बदला???
सलात को नमाज़ में बदल के बजाये सामने मौजूद रब का सजदा करने के हमें आसमानी अल्लाह का सजदा शुरू करा दिया ताकि आसमानी निजाम और जन्नत दोज़ख कायम रहें और ज़कात जो इल्म की थी उसको पैसे की कर दी ताकि इनकम होती रहे… और साथ में ये भी हुक्म दे दिया कि मुसलमान को ही ज़कात देनी है किसी गैर मुस्लिम को नहीं और जिसको देना बता के देना कि ये ज़कात है ताकि अगर कोई शरीफ और खुद्दार इंसान इनकार कर दे लेने से तो फिर वो ज़कात हमारी झोली में आ कर गिरे….. और कहा जा रहा है कि झुकने वालों के साथ झुको तो यहाँ भी नमाज़ को ठूंस दिया कि जैसे अल्लाह के सामने मुल्ला और उसके पीछे नमाज़ी नमाज़ के लिए झुक रहे हैं वैसे ही तुम झुका करो.. सारी कहानी ही ख़त्म… सारा मकसद ही ख़त्म … चित भी मेरी पट भी मेरी टैयाँ मेरे बाप की.. चारों तरफ से फिट कर लिया अपने हिसाब से दीने मोहम्मद को….
किसी महफ़िल में कोई वक़्त के मोहम्मद मौजूद हों और सामने २० लोग बैठे हों.. इनमें से पांच ऐसे हैं जो बैअत हैं वक़्त के मोहम्मद से तो ज़ाहिर है कि सलात यानी दर्शन का फार्मूला तो उन पर ही अप्लाई होगा… और बाक़ी पंद्रह ऐसे हैं जो बैअत ही नहीं हैं इसलिए उन पर सलात का फार्मूला अभी अप्लाई नहीं हो सकता क्यूंकि सलात कायम करने के लिए मोहम्मद के चेहरे की ज़रुरत है… बड़े बड़े सूफियों को गच्चा खाते देखा है महफिलों में इस नमाज़ और सलात के चक्कर में… अब होता ये है कि उन पंद्रह नमाज़ी लोगों में कोई एक उठ खडा हुआ और बोला कि क्या नमाज़ नहीं पढना चाहिये??? तो वक़्त के मोहम्मद क्या जवाब दें??? अगर ये कह दें कि नहीं पढना चाहिए तो एक फितना और दुष्प्रचार शुरू… इसलिए यहाँ हिकमत की ज़रुरत होती है कि ऐसा क्या कहा जाए कि बाक़ी पांच सूफी इन पंद्रह नमाजियों से महफूज़ रहें और वक़्त के मोहम्मद की तौहीन भी न करें… तो वक़्त के मोहम्मद ने बयान दिया कि नमाज़ पढो तो नमाज़ में अपने रब का सजदा करो… और नमाज़ तो आखिरी सांस तक माफ़ नहीं है…. बस समझ लो कि सजदा किसको करना है और नमाज़ में सिर्फ रब की तारीफ़ करनी है किसी गैर का ज़िक्र नहीं करना है…
अब ऐसे ऐसे सूफी मिलते हैं कि दूसरे दिन से शुरू हो जाते हैं कि पीर साहब ने बताया है कि नमाज़ तो पढनी पड़ेगी… जबकि ये इल्म उस वक़्त मौजूद सूफियों के लिए नहीं था बल्कि उनके लिए था जिनका एडमीशन एल के जी में होने जा रहा था… नमाज़ पढ़े बिना कहाँ सलात तक इंसान पहुँच सकता है… बस जो नमाज़ पढ़ रहे हैं उनके तसव्वुर में अगर रब मोहम्मद हैं तो यकीनन वो सलात कायम करने वाले हैं लेकिन नमाज़ पढ़ते वक़्त जिनके तसव्वुर में आसमानी अल्लाह है वो इस जनम तो क्या अगले हज़ार जनम में भी सलात न कायम कर पायेंगे…. न सलात कायम करेंगे और न उनमें सलात कायम करने के लिए वक़्त के मोहम्मद की तलाश होगी और न उनकी आँखों को कभी कोई चेहरा नसीब हो सकेगा…. वो किरदार की अहमियत को ही न समझ पायेंगे और न ये समझ पायेंगे कि मोहम्मद को इस तरह मौत नहीं है.. वो कामिल मुर्शिद के रूप में हर जगह मौजूद हैं..
मुझसे मेरी पोस्ट पर अगर कोई आसमानी अल्लाह को सजदा करने वाला मुस्लमान ये सवाल करे कि क्या नमाज़ नहीं पढनी चाहिए… तो मैं उससे ये तो कभी नहीं कह सकता कि नहीं पढनी चाहिए क्यूंकि अगर अभी उससे कह दिया तो वो तो न इधर का रहेगा न उधर का क्यूंकि अभी वो गुरु के चरणों में गिरा कहाँ है.. वो तो बिलकुल छुट्टा बैल हो जाएगा कि चलो फुर्सत मिली.. अब क्या करना नमाज़ पढ़ के जबकि सलात तो मरते दम तक जारी रहनी है.. इससे निजात कहाँ है… इसलिए मैं उसको सही तरीका बता दूंगा कि नमाज़ आसमानी अल्लाह के लिए नहीं है.. ये रब के लिए है और रब हैं मोहम्मद… और नमाज़ में तुमको सिवाय रब की तारीफ़ के कुछ भी नहीं पढना है… लेकिन यही बात अगर कोई सूफी मुझसे पूछ बैठे तो मुझे हैरत के सिवा क्या होगा??? सूफी बैअत भी हो चुका है और अभी उसको उसके मुर्शिद ने सलात का मतलब नहीं बताया है… शायद वो मुर्शिद अपने को गुनेहगार समझते हों और इस लायक न समझते हों कि कोई उनके तसव्वुर में सलात कायम कर सके.. और अगर कोई सलात उनके चेहरे पे कायम भी कर ले तो जकात कहाँ से मिल जायेगी.. इल्म की ज़कात तो सिर्फ कामिल मुर्शिद ही दे सकते हैं…. जब तक अपने जिस्म में मौजूद रहे तो सामने बैठ कर देते रहे और जब पर्दा कर लिया तो दिल और दिमाग बन कर देते रहे.. ये सिलसिला कहाँ ख़त्म होने वाला है.. सलात है तो फिर ज़कात भी है…. लेकिन नमाज़ अगर है तो फिर ज़कात नहीं…. ज़कात का हक़दार सिर्फ वो है जिसकी सलात कायम है…
जो लोग कहते हैं कि हुज़ूर भी नमाज़ पढ़ते थे और पढ़ाते थे वो बेवकूफ हैं.. उन्हें ये कहना चाहिए कि हुज़ूर ने आसमानी अल्लाह पर जान दिए दे रहे छोटे छोटे एल के जी के बच्चों को नमाज़ पढ़ के दिखाया है यानी डेमो दिया है कि जब तक मोहम्मद पे सलात कायम न हो तब तक नमाज़ भी पढना तो ऐसे पढना और इसीलिए आपने अबू बकर को हुक्म दिया था कि बा आवाज़ बुलंद नमाज़ पढाओ ताकि सब सुन लें कि नमाज़ में किस का ज़िक्र हुआ और किस की तारीफ़ हुई.. क्यूंकि आप जानते थे कि आपके बाद नमाज़ का क्या हाल किया जाने वाला है.. सिर्फ अलहम्दो शरीफ पढ़ी जाती थी… रुकू में सुबहान रब्बे अज़ीम.. यहाँ भी रब की तारीफ़… सजदे में सुबहान रब्बे आला और सजदे में ही दुआ मांगने का हुक्म… और हुज़ूर ही तो अल्लाह का जमाल हैं और उन्हें तो हर नमाज़ी के दिल की धडकनों तक की खबर है… आपकी नज़र से कौन बच सकता था या बच सकता है.. किसने आसमान के अल्लाह को सजदा किया और किसने मोहम्मद को.. उनको खबर थी और खबर है… हुज़ूर तो रहमतुल लिल आलमीन हैं यानी सारे लोगों के लिए रहमत तो वो तो किसी को दुत्कार के भगा भी नहीं सकते .. उन्हें तो सबसे मोहब्बत है मगर उनकी उम्मत को आसमान के अल्लाह से मोहब्बत है.. उसके लिए तो मोहम्मद सिवाय गुनाहों से माफ़ी की सिफारिश करने वाले से जियादा कुछ भी नहीं हैं….जो लोग मोहम्मद को सजदा करते हैं अपनी नमाज़ों में वो एक न एक दिन उस ऊंचे चबूतरे पे बैठने के मुस्तहेक हो जाते हैं जो असहाबे सुफ्फा यानी सूफियों के लिए है….
कुरान में तीस पारे हैं… लेकिन कोई मुझे बताये कि सूरह फातिहा यानी अलहम्दो शरीफ किस पारे में है.. वो तो किसी भी पारे में नहीं है… पहला पारा तो अलिफ़ लाम मीम से शुरू होता है और इस अलिफ़ लाम मीम से पहले सूरह फातिहा है और सूरह फातिहा को जिसने समझ लिया उसने असली कुरान को समझ लिया.. एक तरफ तीस पारे और एक तरफ सिर्फ सूरह फातिहा… अगर दज्जाल ने जालिकल किताब के मानी न बदले होते और वो किताब बना रहने दिया होता तो आज लोग सूरह फातिहा में ही सारे समुन्दरों का इल्म पा लेते लेकिन उसने जालिकल किताब को ये किताब कह दिया और मुसलमान कभी सलात और नमाज़ और रब को न समझ पाए….
अगर किसी मुसलमान के साथ मस्जिद में कोई सूफी नमाज़ पढ़ रहा है तो मुल्ला जी दोनों को देख के बहुत खुश हो सकते हैं कि देखिये साहब ये हैं असली लोग… लेकिन मुल्ला जी आपको ये कैसे पता चलेगा कि नमाज़ पढने वाले इन दो लोगों में कौन आसमानी अल्लाह को सजदा कर रहा है और कौन वक़्त के मोहम्मद को??? यहाँ तक तो आपकी पहुँच भी नहीं है.. आपकी आँखों के सामने वो सूफी मोहम्मद को सजदा कर के चला आया और आपको खबर तक न हुई…. क्या कर लेंगे आप उसका??? इसलिए कहते हैं कि इन्नमल आमाल बिन नियात.. यानी तुम्हारे हर अमल का फैसला तुम्हारी नीअत पर है….
दिलशाद खां ने एक सवाल किया है मेरी पोस्ट पर कि जनाज़े की नमाज़ क्या है… मैं तो हमेशा से ही कहता आया हूँ कि मुल्ला न नमाज़ को समझा है न सलात को.. एक तरफ वो रुकू और सजदा वाले अमल को भी नमाज़ कहता है और एक तरफ जनाज़े में जो खड़े ही खड़े पढ़ी जा रही है उसको भी नमाज़ कह रहा है.. लेकिन जो मुर्दे की नमाज़ है उसको आप पुलिस फ़ोर्स या सेना के शहीद हुए जवानो की तरह समझें.. किसी के जनाज़े के सामने खड़े हो कर दुआ करना ये बस एक एहतराम है और एक श्रद्धांजलि है… एक तरीका ये है कि कोई मर जाए तो उसे साइकिल के करियर में पीछे बांधो और या तो कब्र में दफ़न कर आओ वैसे ही या फिर जला डालो या बहा दो… लेकिन एक अच्छी रस्म है कि चलो ये कैसा भी इंसान रहा हो.. इसको तो अपने आमाल की सज़ा भुगतनी ही भुगतनी है.. नमाज़ क्या बल्कि पूरी दुनिया की किताबें भी उस पर पढ़ के फूँक दी जाएँ मगर कुछ नहीं होगा.. जो बोया है वो काटना ही होगा… सिर्फ उसके घर वालों को थोड़ा सा सुकून मिल जाता है जब किसी मुर्दे का एहतराम कर दिया जाता है और कोई मुर्दा कभी लौट के भी नहीं आता जो बताये कि उसके लिए जो इतना सब कुछ पढ़ा गया उसका कोई फायदा उसे मिला या नहीं मिला.. बस कल्पनाओं में ही तो जी रहे हैं हम… अपने आप तय कर लेते हैं कि उसके गुनाह माफ़ हो गए होंगे या जन्नत मिल गयी होगी…
तो बस ऐसा समझिये कि जैसे किसी बॉडी के एहतराम में उसको सलामी दी जाए या उसका एहतराम कर के उस पर फूल चढ़ाए जाएँ और सम्मान के साथ उसके शव को ले जाया जाए… इतना ही काम है जनाज़े की नमाज़ का…. इससे आगे कोई दिमाग न लगाइयेगा.. बेहतर वो लोग हैं जो अपनी ज़िन्दगी में ऐसे काम करते हैं कि जिनको किसी की सिफारिश की या दुआओं की ज़रुरत ही नहीं रहती क्यूंकि वो जानते हैं कि गुनाहों की कोई भी माफ़ी नहीं……. कोई सिफारिश नहीं… एक सुअवसर मिलता है.. चाहो तो इसको भुना के अमर हो जाओ और चाहो तो इसको गंवा के ज़िन्दगी में भी और मरने के बाद भी गाली खाते रहो.. नमाज़े जनाज़ा तो कातिलों की भी होती है.. मुजरिमों की भी होती है.. बलात्कारियों की भी होती है… जालिमों की भी होती है.. तो क्या ये सब निजात पा जायेंगे??? अपने दिमाग से सारे वहम और ग़लतफहमियाँ निकाल दीजिये… मुर्दे को चाहे जलाया जाए या दफनाया जाए या बहाया जाए.. मकसद सिर्फ एक है कि हमें उसके बदन से उठने वाली बदबू और सड़न से निजात पानी है.. इसके सिवा कोई मकसद है नहीं… मुख्य भूमिका जान और आत्मा की है…
मुल्ला को कुछ बातों पे बड़ा नाज़ है अपने ऊपर और उसको ये ग़लतफहमी हो गयी है कि उसको ये अवाम कभी नकार नहीं सकती क्यूंकि अगर मैं नहीं तो फिर कौन निकाह पढ़ायेगा… अगर मैं नहीं तो कौन जनाज़े की नमाज़ पढ़ायेगा.. अगर मैंने इनकार कर दिया तो न शादी हो सकेंगी और न लोगों को जन्नत मिल सकेगी मरने के बाद क्यूंकि अल्लाह मियाँ तो उस मुर्दे को सीधे जहन्नम रसीद कर देंगे जिसकी नमाज़ जनाज़ा नहीं पढ़ी गयी.. मुल्ला को नाज़ है कि अगर वो न होगा तो फातिहा कौन देगा…. मुल्ला को नाज़ है कि अगर वो न होगा तो अरबी कौन पढ़ायेगा… हमें उसके ये सारे नाज़ मिटटी में मिलाने होंगे… सूफियों को चाहिए कि वो अपने अपने शहर और कस्बे में किसी ईमानदार शख्स को चुनें जो मोमिनो के अक्द.. नमाज़े जनाज़ा और नज़र पेश करने में अपनी खिदमत पेश कर सकें और जो भी मोमिन ख़ुशी से जो दे दे वो ले लें… जब तक आप ऐसा नहीं करेंगे आप इनके चंगुल से नहीं निकल सकते क्यूंकि कहीं न कहीं आपको इनकी ज़रुरत पड़ेगी और आपके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है और ये आखिर में ये कहेंगे कि ज़िन्दगी भर हमको बुरा कहते रहे और हमने ही जनाज़े की नमाज़ पढ़ दी है या निकाह पढ़ा दिया है..
अब आइये बात करते हैं फिर से सलात यानी दर्शन की… सलात दो तरह से है.. एक सलात तो वो है जो अपने ही हाथों से बनाये गए पत्थर के बुतों पर कायम है… कोई भी गैर मुस्लिम हो.. हिन्दू हो कि ईसाई हो कि बौद्ध हो कि पारसी या जैन.. वो जिस बुत पर भी दर्शन कायम करता है उस दर्शन में कोई हरकत नहीं होती.. यानी वो बुत न आगे बढ़ के सर पे हाथ रख सकता है न नज़र उठा के मुस्कुरा के देख सकता है न किसी दुआ के मांगने पर एवमस्तु कह सकता है .. उस बुत का तसव्वुर यानी दर्शन ठीक वैसा ही कायम होता है जैसा उसको किसी बुतखाने में देखा था…. किसी बुतपरस्त ने उस बुत से कभी न बात की थी न मिला था न उस बुत ने कभी अपना हाथ उसके सर पे रक्खा था और न खुद अपनी जुबान से कोई ज्ञान दिया था… लेकिन अपनी माँ का तसव्वुर कीजिये वो चाहे ज़िंदा हों या इन्तिकाल, कर गयी हों.. उनका तसव्वुर और दर्शन कायम कीजिये.. बाकायदा चलता फिरता बात करता नज़र आएगा.. जितने लम्हात आपने उनके साथ गुज़ारे हैं वो सब हरकत में हैं…. ऐसा इसलिए है क्यूंकि आपने उनको अपनी आँखों से देखा है और उनके किरदार को देखा है.. दरअसल हरकत में वही सलात या दर्शन हो सकता है जिसमें चरित्र होगा.. चरित्र ही दर्शन का सबसे बड़ा मार्गदर्शन है.. एक ऐसा चरित्र जिसको हमने खुद अपनी आँख से देखा हो.. उस चरित्र के मालिक को अपने कानों से सुना हो और चरित्र से महसूस किया हो….
तो बात ये हुई कि जितने भी दुनिया में भगवान् या अवतार हुए उनमें से किसी ने भी ये आदेश नहीं दिया कि उनके बाद उनकी मूर्तियाँ बनायी जाएँ या उनके नाम से किताबें पेश की जाएँ.. जो भी किया वो उसने किया जिसे धर्म के नाम की रोटी खानी थी और ये सबसे बड़ा व्यवसाय है जो खौफ.. लालच और उम्मीदों पर टिका है.. इसमें सिर्फ कल्पना करनी है कि ऐसा होगा वैसा होगा… इसके सिवा कुछ है नहीं.. न कोई सुबूत है और न कोई हरकत है और न कोई जवाब है और न कोई मार्गदर्शन है… अगर मार्गदर्शन होता और उस बुत के चेहरे में कोई हरकत होती तो क्या इंसान में इतनी ताक़त थी कि वो गुनाह कर लेता… न जाने कितने पुजारी और उनके समर्थक दिन रात गुनाहों में डूबे हैं और हराम माल कमा रहे है और उस हराम माल का बहुत बड़ा हिस्सा उनके दरबारों में ये सोच कर चढ़ा आते हैं कि इससे वो बुत खुश हो जायेंगे और उन्हें गुनाह करने की छूट देते रहेंगे… अपने दिमाग से वाश आउट कर दीजिये ये सारी गलतफहमियां… गुनाह एक तो छोडिये आधा भी न माफ़ होगा और न कोई सिफारिश न रिश्वत… सब आपके मन का भरम है… और ये भरम मुल्ला पंडित ने अपनी तरफ से बनवा दिया है जिसमें आप सब मस्त हैं….
सारे ही पैगम्बर और अवतार जिन जिन के नाम दुनिया में लिए जाते हैं वो सब के सब हुज़ूर से पहले दुनिया में आ चुके थे.. हुज़ूर तो सबसे आखिर में आखिरी कानून ले कर आये और खात्मा कर दिया सारे नबियों का.. और बता दिया कि अब कोई नबी नहीं आएगा न पैगम्बर.. मैं आखिरी हूँ.. मेरे कानून आखिरी हैं.. मैं फाइनल डिसीज़न दे रहा हूँ दुनिया को… अब किसी भी बुत की पूजा नहीं होगी.. अब सिस्टम चलेगा मुर्शिद यानी गुरु और मुरीद यानी चेले का… सामने ज़िंदा मौजूद गुरु का दर्शन करना है.. उनसे इल्म हासिल करना है.. उनका सजदा करना है उनकी जिस्मानी ज़िन्दगी में भी और उनके पर्दा कर लेने के बाद भी… यही असली हज होगा.. उनके किरदार पे नज़र रख के वैसा ही किरदार अपनाना होगा… वैसा ही बनने की लगातार कोशिश करनी होगी.. और अगर गुरु हज़ारों मील दूर रहता है तो भी परेशान न होना जो सलात का सिस्टम दिया जा रहा है उसके लिए कोई दूरी नहीं.. जैसे आज आप देख सकते हैं कि भारत का रहने वाला जापान वाले से विडियो कालिंग कर रहा है.. इन्टरनेट के लिए कोई दूरी नहीं… और इसी दर्शन के फार्मूले को अपना कर वैज्ञानिक ने दूरदर्शन की ईजाद की है.. ये मुल्ला ने नहीं बनाया है न पंडित ने.. ये तसव्वुफ़ यानी दर्शन की ताक़त रखने वाले का काम है……
और दुनिया में सिर्फ अकेला ये फार्मूला है जो दीने मोहम्मद ने पेश किया है जिसमें मोहम्मद को मौत नहीं है… मोहम्मद को इसलिए मौत नहीं है क्यूंकि मोहम्मद तो चरित्र का नाम है और चरित्र को कभी मौत नहीं होती… चरित्र की न कोई तस्वीर होती है न मूरत होती है… चरित्र क्या है ये तभी पल्ले पडेगा जब आँख से किसी का चरित्र देखा हो… सिर्फ सुन लेने से किसी के चरित्र की अनुभूति नहीं होती… जब किसी का चरित्र देखेंगे तो अनुसरण की तरफ बढ़ेंगे.. तब उसका आशीर्वाद लेंगे जब वो अपना हाथ खुद आपके सर पर रख दें… चरित्र तब समझ में आयेगा जब आपके मुर्शिद आपका हाथ बन जाएँ.. पैर बन जाएँ.. जुबान बन जाएँ.. दिमाग बन जाएँ.. दिल बन जाएँ और यहाँ तक कि आपकी रूह में समा जाएँ…. और जब ये स्थिति आ जाए तो जिस तरफ नज़र उठाएंगे उनका ही उनका जलवा नज़र आयेगा… फिर न मूर्तियों की ज़रुरत होगी न तस्वीरों की…. यही असली सलात है और यही मोमिन की मेराज है…. और ये मेराज तभी हासिल होती है जब आप अपनी एक एक इन्द्रिय का कत्ल कर दें अपने मुर्शिद यानी गुरु की मोहब्बत में…
और कोई सवाल जो सलात और नमाज़ से ही सम्बंधित हो वो पूछ सकते हैं.. बात इतनी सी है कि जिसका कोई गुरु नहीं है उसका गुरु इब्लीस है जो आदम को तो छोडिये मोहम्मद को भी सजदा नहीं करने देता है और बस ऊपर वाला ऊपर वाला बता बता के पागल किये रहता है और ये दुनिया का सबसे मुख्य कुफ्र है कि अल्लाह की असीमित ज़ात से एक ज़र्रे को भी अलग मान लिया जाए…. जिसका कोई गुरु नहीं वो तो तब तक नमाज़ ही पढता रहेगा जब तक गुरु नहीं होगा चाहे हज़ार नहीं करोड़ जनम ले ले.. उसे न अल्लाह के दर्शन होंगे न मोहम्मद के…. लेकिन अगर वो सिर्फ एक काम ही कर ले कि अपनी नमाज़ों में मोहम्मद के तसव्वुर में ही उनका सजदा करता रहे उनको रब मान कर और उनके सिवा किसी भी गैर का ज़िक्र न करे तो भी उसकी तरक्की होने की सम्भावना है.. अगला क्लास मिलने की सम्भावना है.. अगला जीवन अच्छा मिलने की सम्भावना है… और मोमिन वो है जिसको असली मुर्शिद मिल गया हो.. वैसे तो ज़यादातर ढोंगियों में फंसे हैं और ऐसे ढोंगी कि जिनकी अपनी खुद की सलात नहीं कायम है… क्यूंकि अगर सलात कायम होती तो हराम का लुकमा खाने से पहले मर जाते.. लेकिन जिनको कामिल मुर्शिद मिल गए समझ लीजिये कि उनको अल्लाह मिल गया और अल्लाह के रसूल मिल गए…. और सलात यानी दर्शन सिर्फ उनका ही मुक़द्दर है.. बाक़ी किसी और का नहीं…
मेरा काम सिर्फ दुनिया को आगाह यानी सतर्क करना है.. दीने मोहम्मद में न कभी जबरदस्ती थी न है न होगी.. दीने मोहम्मद तो सिर्फ सच्चाई की रौशनी पेश करता है.. अब किसके नसीब में रौशनी है और किसके नसीब में अन्धेरा ये उसके कर्म तय करते हैं…. सच्चाइयां लगातार पेश कर रहा हूँ ताकि कोई भी इंसान इस दुनिया का ये न कह सके कि उस तक सच्चाई नहीं आ सकी.. कौन मेरे इन बयानों को समझेगा और अपनी ज़िन्दगी को खूबसूरत बनाएगा.. कौन मेरे बयानों को पढ़ के मुझे गाली दे कर खुद को दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञाता और काबिल समझेगा और अपनी श्रद्धा को सर्वोपरि मान के वही करता रहेगा जो करता आया है.. इन सब से मुझे कोई मतलब नहीं .. प्रेमी का काम है प्रेम के सन्देश देना.. दुनिया को जगाना… और वो काम मैं मोअज़्ज़िन बन के पूरा कर रहा हूँ और सारी दुनिया को मोहबत और इंसानियत की दावत दे रहा हूँ.. बाक़ी लोग जानें और उनका काम जाने.. हर इंसान अपने अपने कर्मों का खुद ज़िम्मेदार है… कोई किसी को न नेकी दे सकता है और न कोई किसी के गुनाह कम करा सकता है.. जैसा बोया है वैसा ही काटने को हर शख्स तैयार रहे

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