उस्मान गाज़ी के अदल इंसाफ

*इसी तरह एक ओर जमाअत जो मुक़य्यर हज़रात की थी बड़ी मसहूर है जिसका नाम अल अफयान था वो मुसलमानो की माली मदद करती थी, ,जंग में जरूरत के समान मुहैय्या कराती थी और लश्करों का साथ देती थी*

*इस जमाअत में शामिल लोग बड़े बड़े ताजिर थे ओर वो इनकी मदद करते थे तमीरी काम जैसे खानकाहों मसाजिद , वगेरा इस जमाअत में मुमताज़ उलमा भी शामिल थे ,जो इस्लामी तहज़ीब की खिदमत का फ़रीज़ा सर अंजाम देते थे और लोगो के दिलो में इस्लाम के लिए जस्बा पैदा करते थे*

*एक जमाअत ओर थी जो हाजियो पे मुस्तमिल थी*

_जिसका नाम हाजियाते रूम यानी हुज्जाजे अर्ज़े रूम इस जमात का काम इस्लामी सउर की बेदारी इस्लामि उलूम की तरबीजो इसयात ओर इस्लामी तसरियतो क़वानीन में गहरी बसिरत पैदा करना था_

*इनके अलावा कई दूसरी जमाअते भी जिनका हदफ़ मुसलमानो की बिल उमुम मदद करना था*

*एक वाकिया बोहोत मसहूर हे ,,उस्मान गाज़ी के अदल इंसाफ का जिसकी वजह से एक परिवार मुसलमान हुवा*

_उस्मान गाज़ी के पास एक मुसलमान और ईसाई आया और इंसाफ की दरखुवास्त की उस्मान गाज़ी ने फैसला हक़ करते हुवे ईसाई के हक़ में किया ,,जिससे ब्रेजेंटाइन परिवार मुसलमान हो गया_

*उस्मान गाज़ी हमेसा उलमा से मशवरा करते थे , ओर अपनी रियाया के साथ अदल से काम लेते ,जो मुसलमान नही उन्हें इस्लाम की दावत जरूर देते और कई आपके इंसाफ की वजह से मुसलमान हुवे*

*उस्मान गाज़ी की अपने बेटे को नसीहत आज भी तारीख में पढ़ी जा सकती हे*

_जिसका हम मुताला कर सकते है जिसमे तहज़ीबी ओर सराई तरीके-कार जिसपे बाद में उस्मानी सल्तनत कायम रही_

*गाज़ी उस्मान जब बिस्तरे मर्ज पे थे, तो इन्होंने अपने बेटे को वसीयत करते हुवे कहा था*

_आए बेटे किसी ऐसे काम मे मसरूफ ना होना जिसके करने का परवर दिगार ए आलम ने हुक्म ना दिया हो,,_

*जब भी सल्तनत में कोई मुश्किल पेस आये तो उलमा ए इकराम से मशवरा लेना और उनसे इमदाद तलब करना*

*ए बेटे फरमा-बरदार लोगो को एज़ाज़ से नवाजना , फौजो पर इनामों इकराम करना ,कही सीपा ओर दौलत की वजह से शैतान तुम्हे धोखे में ना डाल दे, अहले सरियत से दूर होने से ऐतराज़ करना,*

*बेटा आप जानते हे हमारा मकसद रब्बुल-आलमीन की रज़ा हे और ये के हम जिहाद के जरीए तमाम आफाक में अपने दीन के नूर को आम करदे*

*लिहाज़ा वही बात करना जिसमे अल्लाह करीम की खुशनूदी हो ,बेटा हम वो लोग नही जो लोगो को गुलाम बनाने के लिए जंग करते हे, हमे जिंदा रहना हे तो इस्लाम की खातिर ,मरना है तो इस्लाम की खातिर ,*
*ओर ये है वो चीज़ मेरे बेटे जिसका तू एहल हे*

*ये वसीयत एक जाब्ता थी जिसपे बाद में उस्मानि अमल पहरा रहे*

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