Itekaf एअतिकाफ

*एतकाफ*

*🌟 اَلصَّــلٰوةُوَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَارَسُوْلَ اللّٰهﷺ*

*_🌴 एतिकाफ की किस्मे_*

🌹 एतिकाफ की तीन किस्मे है (1) ऐतिकाफे वाजिब, (2) ऐतिकाफे सुन्नत, (3) ऐतिकाफे नफ्ल।

*_💖 ऐतिकाफे वाजिब_*

👉 एतिकाफ की नज़र (यानी मन्नत) मानी यानी ज़बान से कहा “में अल्लाह के लिये फुला दिन या इतने दिन एतिकाफ करूँगा”। तो अब जितने भी दिन का कहा है उतने दिन का एतिकाफ करना वाजिब हो गया।
👉 ये बात खास कर याद रखिये की जब कभी किसी भी किस्म की मन्नत मानी जाए जस में ये शर्त है की मन्नत के अल्फ़ाज़ ज़बान से अदा किये जाए सिर्फ दिल ही दिल में मन्नत की निय्यत कर लेने से मन्नत सहीह नही होती।
*📚 (रद्दुल मुहतार, 3/430)*

👉 मन्नत का एतिकाफ मर्द मस्जिद में करे और औरत मस्जिदे बैत में। इन में रोज़ा भी शर्त है। (औरत घर में जो जगह नमाज़ के लिये मखसुस कर ले उसे _मस्जिदे बैत_ कहते है)

*_🇨🇨 ऐतिकाफे सुन्नत_*

👉 रमज़ान के आखरी 10 दिन का एतिकाफ “सुन्नते मुअक्कदा अलल किफाया” है
*📚 (दुर्रे मुख्तार मअ रद्दुल मुहतार, 3/430)*

👉 यानी पुरे शहर में किसी एक ने कर लिया तो सब की तरफ से अदा हो गया और अगर किसी एक ने भी न किया तो सभी मुजरिम हुए।
*📚 (बहारे शरीअत, 5/152)*

👉 इस एतिकाफ में ये ज़रूरी है की रमज़ान की बीसवी तारीख को गुरुबे आफताब से पहले पहले मस्जिद के अंदर ब निय्यते एतिकाफ मौजूद हो और उनतीस के चाँद के बाद या तिस के गुरुबे आफताब के बाद मस्जिद से बहार निकले।
*📚 (बहारे शरीअत, 5/151)*

👉 अगर 20 रमज़ान को गुरुबे आफताब के बाद मस्जिद में दाखिल हुए तो एतिकाफ की सुन्नते मुअककदा अदा न हुई बल्कि सूरज डूबने से पहले पहले मस्जिद में तो दाखिल हो चूके थे मगर निय्यत करना भूल गए थे यानी दिल में निय्यत ही नही थी (निय्यत दिल के इरादे को कहते है) तो इस सुरतमे भी एतिकाफ की सुन्नते मुअककदा अदा न हुई। अगर गुरुबे आफताब के बाद निय्यत की तो नफ्लि एतिकाफ हो गया।
👉 दिल में निय्यत कर लेना ही काफी है ज़बान से कहना शर्त नही। अलबत्ता दिल में निय्यत हाज़िर होना ज़रूरी है साथ ही ज़बान से भी कह लेना ज़्यादा बेहतर है।

*_🌴 एतिकाफ की निय्यत इस तरह कीजिये_*

👉 में अल्लाह की रिज़ा के लिये रमज़ान के आखरी 10 दिन का सुन्नते एतिकाफ की निय्यत करता हु।

*📚 (फ़ज़ाइले रमज़ान, 343)*

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हज़रत उम्मुलमूमिनीन सैय्यदा आईशा सिद्दीक़ह रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायात है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रमज़ान के आख़री अशरह का एतकाफ फरमाया करते।
(बुख़ारी शरीफ)

हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुअतकिफ़ (एतकाफ में बैठने वाले) के बारे में फरमाया:
वह गुनाहों से बाज़ रहता है, और नेकियों से उसे इस क़दर हिस्सा मिलता है जैसे उस ने तनाम नेकियां कीं।
(इब्ने माजा शरीफ)

हज़रत इमामे हुसैन रज़ियल्लाहु अन्ह से रिवायत है कि हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:
जिस ने रमज़ान में दस दिनों का एतकाफ कर लिया तो ऐसा है जैसे दो हज और दो उमरे किये।
(बैहक़ी)

*मसअलह*:- मस्जिद में अल्लाह के लिए नियत के साथ ठहरना एतकाफ है। और उस के लिए मुसलमान आकिल (यानी अक़्ल वाला) और जनाबत (नापाकी) से पाक होना शर्त है।

*मसअलह*:- सब से अफ़ज़ल मस्जिदे हरम शरीफ में एतकाफ है, फिर मस्जिदे नबवी में, फिर मस्जिदे अक़्सा में, फिर उस में जहां बड़ी जमाअत होती हो।

*मसअलह*:- औरत को मस्जिद में एतकाफ मकरूह है, बल्कि वह घर में ही एतकाफ करे। मगर उस जगह करे जो उस ने नमाज़ पढ़ने के लिए मुक़र्रर कर रखी है।

एअतिकाफ

और औरतों को हाथ ना लगाओ जब तुम मस्जिदों में एअतिकाफ से हो

📕 पारा 2,सूरह बक़र,आयत 187

*हदीस* – मोअतकिफ ना तो किसी मरीज़ की इयादत को जा सकता है ना जनाज़े में शामिल हो सकता है ना किसी औरत को छू सकता है और ना मस्जिद से बाहर निकल सकता है

📕 अबु दाऊद,जिल्द 2,सफह 492

*हदीस* – इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का क़ौल है कि हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं जिसने रमज़ान में 10 दिनों का एअतिकाफ किया तो उसे 2 हज व 2 उमरे का सवाब मिलेगा

📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 146

*मसअला* – मस्जिद में रब की रज़ा के लिए ठहरना एअतिकाफ कहलाता है इसकी 3 किस्में हैं

*1. वाजिब* – किसी ने मन्नत मानी कि मेरा ये काम होगा तो मैं 1 या 2 या 3 दिन का एअतिकाफ करूंगा तो उतने दिन का एअतिकाफ उस पर वाजिब होगा

*2. सुन्नते मुअक़्किदह* – रमज़ान में आखिर 10 रोज़ का यानि बीसवें रमज़ान को मग़रिब के वक़्त बा नियत एअतिकाफ मस्जिद में मौजूद हो,ये एअतिकाफ सुन्नते मुअक़्किदह अलल किफाया है यानि अगर पूरे मुहल्ले से 1 आदमी एअतिकाफ में बैठ जाये तो सबके लिए काफी है पर 1 भी नहीं बैठा तो सब गुनाहगार होंगे

*3. मुसतहब* – जब भी मस्जिद में दाखिल हों तो पढ़ लें ‘नवैतो सुन्नतल एअतिकाफ’ तो जब तक मस्जिद में रहेंगे एअतिकाफ का सवाब पायेंगे

📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 147-148

*मसअला* – मर्द का मस्जिद में एअतिकाफ करना ज़रूरी है और अगर औरत एअतिकाफ में बैठना चाहे तो जिस जगह वो नमाज़ पढ़ती है वहां एअतिकाफ में बैठ सकती है

📕 दुर्रे मुख्तार,जिल्द 2,सफह 129

*मसअला* – अगर औरत ने घर में नमाज़ के लिए जगह मुकर्रर नहीं की है तो एअतिकाफ में नहीं बैठ सकती हां ये कर सकती है कि जिस जगह एअतिकाफ में बैठना चाहे तो पहले उसी जगह को नमाज़ के लिए खास कर ले फिर एअतिकाफ में बैठे

📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 147

*मसअला* – एअतिकाफ रमज़ान के लिए रोज़ा रखना शर्त है तो अगर रोज़ा नहीं रखा तो ये एअतिकाफ नफ्ल होगा सुन्नत नहीं

📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 148

*मसअला* – मन्नत के एअतिकाफ के लिए भी रोज़ा रखना शर्त है अगर चे नियत करते वक़्त कहा भी हो कि ‘सिर्फ 1 महीने का एअतिकाफ करूंगा रोज़ा नहीं रखूंगा’ फिर भी रोज़ा रखना वाजिब है

📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 148

*मसअला* – औरत ने एअतिकाफ की मन्नत मानी तो शौहर रोक सकता है अगर रोकता है तो औरत या तो तलाक़ के बाद या उसकी मौत के बाद मन्नत पूरी करे युंही शौहर ने इजाज़त दे दी फिर नहीं रोक सकता हां एक महीने की इजाज़त दी और औरत लगातार 1 महिना एअतिकाफ करना चाहती है तो भी रोक सकता है कि थोड़ा थोड़ा करके एक महीना पूरा करे और अगर किसी खास महीने का नाम लेकर इजाज़त दी तो अब नहीं रोक सकता

📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 149

*मसअला* – अगर मोअतकिफ मस्जिद से बाहर निकला तो एअतिकाफ टूट जायेगा जिसकी क़ज़ा वाजिब होगी

📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 150

*मसअला* – जिस तरह बिला उज़्रे शरई मर्द का मस्जिद से निकलना एअतिकाफ तोड़ देगा उसी तरह औरत का भी घर से बिला उज़्रे शरई निकलना एअतिकाफ को तोड़ देगा जिसकी क़ज़ा उस पर वाजिब होगी अगर चे भूल से ही निकले या सिर्फ 1 मिनट के लिए ही बाहर निकले

📕 दुर्रे मुख्तार,जिल्द 2,सफह 132

*मसअला* – मोअतक़िफ के मस्जिद से बाहर निकलने के 2 उज़्र हैं

*1. हाजते शरई* – मसलन जिस मस्जिद में ये एअतिकाफ में है वहां जुमे की नमाज़ नहीं होती तो जुमा पढ़ने बाहर जा सकता है या अज़ान देने लिए मीनारे पर जाना है और रास्ता बाहर से है तो जा सकता है

*2. हाजते तबई* – मसलन पेशाब पखाना वुज़ू गुस्ल अगर खारिजे मस्जिद में इनका इंतेज़ाम नहीं है तो बाहर जा सकता है

📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 150

*मसअला* – मोअतकिफ को फालतू बातों से परहेज़ ज़रूरी है हां अगर लोगों को दर्स देने के लिए महफिल करता है तो इजाज़त है

📕 दुर्रे मुख्तार,जिल्द 2,सफह 135

*मसअला* – मस्जिद में खाना पीना सिवाये मोअतकिफ के दूसरों को नाजायज़ है तो जो लोग मस्जिद में अफ्तार करते हैं उन्हें चाहिये कि एअतिकाफ की नीयत करके बैठे वरना गुनाहगार होंगे

📕 अलमलफूज़,हिस्सा 2,सफह 108

जारी रहेगा………..

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Aur aurton ko haath na lagao jab tum masjidon me etekaaf se ho

📕 Paara 2,surah baqar,aayat 187

*HADEES* – Motaqif na to kisi mareez ki iyadat ko ja sakta hai na janaze me shaamil ho sakta hai na hi masjid se baahar nikle aur na kisi aurat ko chhuye

📕 Abu daood,jild 2,safah 492

*HADEES* – Imaam husain raziyallahu taala anhu ka qaul hai ki huzoor sallallaho taala alaihi wasallam farmate hain ki jisne ramzan me 10 roz ka eteqaf kiya to use 2 hajj wa 2 umre ka sawab milega

📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 146

*MASLA* – Masjid me rub ki raza ke liye thaharna eteqaf kahlata hai iski 3 kismein hain

*1. Wajib* – kisi ne mannat maani ki mera ye kaam ho jayega to main 1,2 ya 3 din ka eteqaf karunga to ab itne din ka eteqaf karna waajib hoga

*2. Sunnate muaqqidah* – ramzan me aakhir roz ka yaani beeswe ramzan ko magrib ke waqt ba niyat eteqaf masjid me maujood ho,ye eteqaf sunnate muaqqidah alal kifaya hai yaani agar poore muhalle se 1 aadmi baith jaaye to sabke liye kaafi hai aur agar ek bhi nahin baitha to sab gunahgar honge

*3. Mustahab* – jab bhi masjid me daakhil hon to padhen ‘nawaito sunnatal eteqaf’ ye mustahab hai ki jab tak masjid me rahenge eteqaf ka sawab paayenge

📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 147-148

*MASLA* – Mard ke liye masjid me eteqaf karna zaruri hai aur agar aurat eteqaf me baithna chahe to jis jagah wo namaz padhti hai wahan eteqaf me baith sakti hai

📕 Durre mukhtar,jild 2,safah 129

*MASLA* – Agar aurat ne ghar me namaz ke liye jagah muqarrar nahin ki hai to etikaaf me nahin baith sakti haan ye kar sakti hai ki jis jagah etikaaf me baithna chahe to usi jagah ko namaz ke liye khaas kar le

📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 147

*MASLA* – Eteqaf ramzan ke liye roza rakhna shart hai to agar kisi ne eteqaf to kiya magar roza nahin rakha to ye eteqaf sunnat nahin balki nafl hoga

📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 148

*MASLA* – Mannat ke etikaaf ke liye bhi roza rakhna shart hai agar che niyat karte waqt kaha bhi ho ki “sirf etikaaf 1 mahine ka etikaaf karunga roza nahin rakhunga” phir bhi roza rakhna waajib hai

📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 148

*MASLA* – Aurat ne etikaaf ki mannat maani to shauhar rok sakta hai agar rokta hai to aurat ya to talaaq ke baad ya uski maut ke baad mannat poori kare yunhi shauhar ne ijazat de di phir nahin rok sakta haan ek mahine ki ijazat di aur aurat lagataar 1 mahina etikaaf karna chahti hai to bhi rok sakta hai ki thoda thoda karke ek mahina poora kare aur agar kisi khaas mahine ka naam lekar ijazat di to ab nahin rok sakta

📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 149

*MASLA* – Agar motaqif masjid se baahar nikla to eteqaf toot jayega jiski qaza uspar waajib hogi

📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 150

*MASLA* – Jis tarah bila uzre sharayi mard ka masjid se nikalna eteqaf tod dega usi tarah aurat ka bhi ghar se bila uzre sharayi nikalna eteqaf ko tod dega jiski qaza uspar wajib hogi agar che bhool se hi nikle ya sirf 1 minute ke liye hi baahar ho

📕 Durre mukhtar,jild 2,safah 132

*MASLA* – Motaqif ke masjid se baahar nikalne ke liye 2 sharayi uzr hain

*1. Haajate sharayi* – Maslan jis masjid me ye eteqaf me baitha hai wahan jume ki namaz nahin hoti to juma padhne ke liye wo doosri masjid me ja sakta hai magar sirf namaz ke liye yunhi azaan dene ke liye meenare par jaana hai aur raasta baahar se hai to ja sakta hai

*2. Haajate tabayi* – Maslan peshab pakhana gusl wuzu agar in sabka intezam khaarije masjid me nahin hai to baahar ja sakta hai

📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 150

*MASLA* – Motaqif ko faaltu baaton se parhez zaruri hai haan agar logon ko dars dene ke liye mahfil karta hai to ijazat hai

📕 Durre mukhtar,jild 2,safah 135

*MASLA* – Masjid me khaana peena siwaye motaqif ke doosro ko najayaz hai to jo log masjid me aftaar wagairah karte hain unko chahiye ki eteqaf ki niyat karke baithen warna sakht gunahgar honge

📕 Almalfooz,hissa 2,safah 108

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