तवाजोअ व इन्केसारीः

तवाजोअ व इन्केसारीः
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अपने को दूसरों से छोटा और कमतर समझ कर दूसरों की ताजीम व तकरीम के साथ ख़ातिर मदारात करनी इस आदत को तवाजोअ और इन्केसारी कहते हैं । यह नेक आदत वह जौहरे नायाब है
कि अल्लाह तआला जिसको इस आदत की तौफीक अता फरमा देता है गोया उसको खैरे कसीर का खजाना अता फरमा देता है । जो शख्स हर एक को अपने से बेहतर और अपने को सबसे कमतर समझेगा वह हमे घमन्ड और तकब्बुर की शैतानी खसलत से बचा रहेगा और अल्लाह तआना उसको दोनों जहान में सर बुलन्दी और इज्ज़त व अजमत का बादशाह बल्कि शहनशाह बना देगा ।
हदीस शरीफ में है कि

( इहयाउल उलूम जि . 3 स . 340 )

यानी जो शख्स अल्लाह की रजाजूई के लिए तवाज़ोआ और इन्केसारी की ख़सलत इख्तियार करेगा अल्लाह तआला उसको सरबुलन्दी अता फरमाएगा । हजरत शैख सअदी अलैहिर्रहमा ने फ़रमाया कि– मुरा पीर दानाए रौशन शहाब दो उन्दुजे फरमूद बर रूए आब यके आँकि बर ख्वेश खुद बी मबाश दिगर आँकि बर गैर बद बी मुबाश यानी मुझको मेरे पीर आरिफे खुदा और रौशन दिल शैख शहाबुद्दीन सुहरवरदी अलैहिर्रहमा ने दरियाई सफर में कश्ती पर यह दो नसीहत फरमाई है । एक यह कि अपने को अच्छा और बड़ा न समझो ।
और दूसरी यह कि दूसरो को बुरा और कमतर न समझो बल्कि सब को अपने से बेहतर और अपने को सबसे कमतर समझ कर दूसरों के सामने तवाजोअ व इन्केसारी का मुजाहरा करते रहो और खबरदार हरगिज हरगिज़ कभी भी तकब्बूर और घमन्ड की शैतानी डगर पर चल कर दूसरों को अपने से हकीर न समझो ।
याद रखो कि तवाजोअ और आजिजी व इन्केसारी की आदत रखने वाला आदमी हर शख्स की नज़रों में अजीज हो जाता है । और मुतकब्बिर आदमी से हर शख्स नफ़रत करने लगता है । इस लिए हर मर्द व औरत को लाजिम है कि तवाजोअ की आदत इख्तियार करे और कभी भी हरगिज तकब्बुर और घमन्ड न करे
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*जज़ल्लाहु ख़ैरा*
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