इल्मे ग़ैबे मुसतफा صلى الله عليه وسلم

क़ुरान में 15 16 आयतें एैसी है जिनको पढ़ने से ये मालूम होता है कि ग़ैब का जानने वाला सिर्फ ख़ुदा ही है और किसी को ग़ैब नहीं मसलन

*_1. तुम फरमादो मैं तुमसे नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं और न ये कहूं कि खुद ही ग़ैब जान लेता हूँ_*

_*📕 पारा 7, सूरह इनआम, आयत 50*_

*_2. और उसी के पास है कुंजियाँ ग़ैब की और उन्हें वही जानता है_*

_*📕 पारा 7, सूरह इनआम, आयत 59*_

*_3. तुम फरमादो मैं अपनी जान के बुरे भले का इख्तेयार नहीं रखता मगर जो अल्लाह चाहे_*

_*📕 पारा 11, सूरह यूनुस, आयत 49*_

*_4. अगर मैं ग़ैब जान लिया करता तो यूँ होता कि मैंने बहुत भलाई जमा करली और मुझे कोई बुराई न पहुँचती_*

_*📕 पारा 9, सूरह एराफ़, आयत 188*_

*_5. मैं नहीं जानता कि मेरे साथ क्या किया जाएगा और तुम्हारे साथ क्या_*

_*📕 पारा 26, सूरह अहकाफ, आयत 9*_

खैर इसी तरह की 10 11 आयतें और हैं जिनका निचोड़ यही है जैसा कि आपने पढ़ा की ग़ैब का जानने वाला सिर्फ ख़ुदा है और ख़ुदा के सिवा किसी को ग़ैब नहीं अगर क़ुरान की इन आयतों का यही मतलब है जैसा की वहाबी बद अक़ीदों ने समझा और हमें समझाने की कोशिश करते हैं तो इसी क़ुरान में 18,19 आयतें ये भी कह रहीं हैं पढ़िए

*_6. और अल्लाह ने आदम को तमाम अश्या के नाम सिखाये_*

_*📕 पारा 1, सूरह बक़र, आयत 31*_

*_अल्लाह ने आदम अलैहिस्सलाम को 7 लाख ज़बानों का इल्म दिया था_*

_*📕 तफ़सीरे नईमी, जिल्द 1, सफह 291*_

*_7. और हमने ख़िज़्र को अपने पास से इल्म सिखाया_*

_*📕 पारा 15, सूरह कहफ, आयत 65*_

*_8. और उसे एक इल्म वाले लड़के (इस्हाक़ ) की बशारत दी_*

_*📕 पारा 26, सूरह ज़ारियात, आयत 28*_

*_9. और बेशक याक़ूब साहिबे इल्म हैं हमारे सिखाये से_*

_*📕 पारा 13, सूरह यूसुफ, आयत 68*_

*_10. और मैं तुम्हे बताता हूँ जो कुछ खाते हो और अपने घरों में जो कुछ जमा करके रखते हो_*

_*📕 पारा 3, सूरह आले इमरान, आयत 49*_

*_11. याक़ूब ने कहा कि मुझे वो बातें भी मालूम है जो तुम्हे मालूम नहीं_*

_*📕 पारा 12, सूरह यूसुफ, आयत 24*_

*_ये तो हुई दीगर अम्बिया अलैहिस्सलाम की बातें अब आइये आगे बढ़ें_*

*_12. और ये नबी (रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ) ग़ैब बताने में बख़ील नहीं_*

_*📕 पारा 30, सूरह तक़वीर, आयत 24*_

*_बख़ील कहते हैं कंजूस को और कंजूस वो होता है जिसके पास माल हो और वो उसे खर्च न करे अगर होगा ही नहीं तो कंजूस न कहेंगे बल्कि फ़क़ीर कहेंगे यहाँ रब अपने महबूब को फरमा रहा है कि मेरा महबूब ग़ैब बताने में कंजूस नहीं मतलब ये कि मैं इन्हे ग़ैब बताता हूँ और ये अपने सहाबा को उस पर इत्तेला कर देते हैं_*

*_13. अल्लाह ग़ैब पर किसी को मुसल्लत नहीं करता सिवाए अपने पसंदीदा रसूलों के_*

_*📕 पारा 29, सूरह जिन्न, आयत 26*_

*_14. अल्लाह की शान ये नहीं है कि ऐ आम लोगों तुम्हे ग़ैब का इल्म दे हाँ अल्लाह चुन लेता है अपने रसूलों में से जिसे चाहे_*

_*📕 पारा 4, सूरह आले इमरान, आयत 179*_

*_15. ना ज़मीन में ना आसमान में और ना इससे छोटी और ना उससे बड़ी कोई चीज़ नहीं जो एक रौशन किताब ( क़ुरान ) में ना लिखा हो_*

_*📕 पारा 11, सूरह यूनुस, आयत 37-41*_

*_लौहे महफूज़ में जो कुछ लिखा है वो सब क़ुरान मुक़द्दस में मौजूद है_*

_*📕 अलइतक़ान, जिल्द 1, सफह 58*_

*_और उसी क़ुरआन के बारे में अल्लाह फरमाता है कि_*

*_16. रहमान ने अपने महबूब को क़ुरान सिखाया इंसानियत की जान मुहम्मद को पैदा किया मकान व मा यकून का उन्हें बयान सिखाया_*

_*📕 पारा 27, सूरह रहमान, आयत 1-4*_

अब पूरी बात को आपके लफ़्ज़ों में समझाता हूँ क़ुरआन की जिन आयतों में ये है कि ग़ैब का जानने वाला सिर्फ अल्लाह है और किसी को ग़ैब नहीं उसका मतलब ये है कि ग़ैब का बिज़्ज़ात जानने वाला सिर्फ अल्लाह है उसको इल्म जानने की ज़रुरत किसी से न पड़ी जैसे वो अल्लाह है अजली व अबदी यानि हमेशा से है और हमेशा रहेगा उसी तरह उसकी तमाम सिफ़तें भी अजली व अबदी हैं मगर नबियों का इल्म अल्लाह के देने से है और यही हम अहले सुन्नत व जमात का अक़ीदा है अगर कोई नबी के लिए ग़ैबे ज़ाती जाने बिला शुबह वो काफिर होगा क्योंकि ग़ैबे ज़ाती सिर्फ अल्लाह को है और नबी का इल्म अल्लाह के बताने से और वलियों का इल्म नबी के बताने से है अगर ये तफ़्सीर सही नहीं तो फिर आप ही बताएं कि कुरान की जिन आयतों में रब अपने महबूबों के लिए ग़ैब मान रहा है उसे कैसे पढेंगे क्या तर्जुमा करेंगे क्युंकि क़ुरान की किसी एक भी आयत का इन्कार करना कुफ्र है,वहाबी का काम सिर्फ शाने रिसालत में नुक़्स निकालना है हालांकि नबी की ज़ाते पाक को रब ने बे अ़ैब बनाया है अब एक ऐसी आखिरी आयत पेश करता हूँ कि जिसको पढ़ने के बाद किसी तरह की कोई शक़ की गुंजाइश बाक़ी न रहेगी और मुनाफ़िक़ों के लिए ये आयत 1000 एैटम बम के बराबर है, आइये पढ़िए

*_17. ऐ महबूब तुम उनसे पूछो तो कहेंगे कि हम तो यूँही हंसी खेल में थे तुम फरमाओ क्या अल्लाह और उसकी आयतों और उसके रसूल पर हँसते हो बहाने न बनाओ तुम काफिर हो चुके मुसलमान होकर_*

_*📕 पारा 10, सूरह तौबा, आयत 66*_

*_इस आयत का शाने नुज़ूल ये है कि हज़रते अब्बास रज़ी अल्लाहो तआला अन्हु फरमाते हैं कि किसी शख्स की ऊंटनी खो गई उसकी तलाश जारी थी हुज़ूर को जब खबर हुई तो आपने फरमाया कि फलां की ऊंटनी फलां जंगल में है इस पर एक मुनाफ़िक़ बोला की मुहम्मद कहते हैं कि फलां की ऊंटनी फलां जंगल में है वो ग़ैब क्या जाने इसपर ये आयत नाज़िल हुई_*

*📕 तफ़सीर इब्ने जरीर तबरी,जिल्द 10,सफह 105*

*_इस एक आयत से कितने मसले हल हुए ये देखिये_* *_! नबी अलैहिस्सलाम को ग़ैब है_*
*_! जो नबी के ग़ैब का इंकार करेगा काफिर है_*

 

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